पुस्तक-रोशनी के अंकुर(लघुकथा) अभिरुचि ....शब्दों का जाल बुनना, नयी चीजे सीखना, सपने देखना सविता मिश्रा 'अक्षजा' शिक्षा ..स्नातक पैतालीस साझा-संग्रह | रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा बेब पत्रिकाओं में लगातार छपती रहती हैं | सम्मान - "शब्द निष्ठा लघुकथा सम्मान" 2017, व्यंग्य सम्मान" 2018, लघुकथा विधा में 'जय विजय रचनाकार सम्मान'| "कलमकार कहानी सांत्वना सम्मान" 2018 गहमर में 2018 "समाज सेवी सम्मान" .. अध्यक्षा, महिला काव्य मंच , आगरा .

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परछाई -

सड़क किनारे एक कोने में, छोटे से बच्चे को दीपक बेचते देख रमेश ठिठका |
उसके रुकते ही पॉलीथिन के नीचे किताब दबाते हुए बच्चा बोला - "अंकल कित्ते दे दूँ?"
"दीपक तो बड़े सुन्दर हैं | बिल्कुल तुम्हारी तरह | सारे ले लूँ तो?"
"सारे ! लोग तो एक दर्जन भी नहीं ले रहें | महंगा कहकर, सामने वाली दूकान से चायनीज लड़ियाँ और लाइटें खरीदने चले जाते हैं | झिलमिल करती वो लड़ियाँ, दीपक की जगह ले सकती हैं क्या भला !"
उसकी बातें सुन, उसमें अपना अतीत पाकर, रमेश मुस्करा पड़ा |
"बेटा ! सारे दीपक गाड़ी में रख दोंगे?"
"क्यों नहीं अंकल !" मन में लड्डू फूट पड़ा | पांच सौ की दो नोट पाकर सोचने लगा, 'आज दादी खुश हो जाएगी | उसकी दवा के साथ-साथ मैं एक छड़ी भी खरीदूँगा | चलने में दादी को कितनी परेशानी होती है बिना छड़ी के |'
"क्या सोच रहा है, कम हैं ?"
"नहीं अंकल ! इतने में तो मैं सारे सपने पूरे कर लूँगा।
कहकर वह अपना सामान समेटने लगा | अचानक गाड़ी की तरफ पलटा फिर थोड़ा अचरज से पूछा - "अंकल, लोग मुझपर दया दिखाते तो हैं, पर दीपक नहीं लेते हैं | आप सारे ही ले लिए !" कहते हुए प्रश्नवाचक दृष्टि टिका दी ड्राइविंग सीट पे बैठे रमेश पर |
रमेश मुस्करा कर बोला-
"हाँ बेटा, क्योंकि तुम्हारी ही जगह, कभी मैं था |"
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मौलिक रचना
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
2012.savita.mishra@gmail.com
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परिवर्तन

"मम्मी! ऑन लाइन आर्डर कर दूँगा, या चलिए मॉल से दिला दूँगा| वह भी बहुत खूबसूरत- बढ़िया दीये। चलिए यहाँ से | इन गँवारों की भाषा समझ नहीं आती, ऊपर से रिरियाते हुए पीछे ही पड़ जाते हैं | बात करने की तमीज भी नहीं है इन लोगों में |"
मम्मी उस दूकान से आगे फुटपाथ पर बैठी एक बुढ़िया की ओर बढ़ी। उसके दीये खरीदने को, जमीन में बैठकर ही चुनने लगीं|
देखते ही झुंझलाकर संदीप बोला- "क्या मम्मी, आपने तो मेरी बेइज्ज़ती करा दी | मैं 'हाईकोर्ट का जज' और मेरी माँ जमींन पर बैठी दीये खरीद रही है। जानती हो कैसे-कैसे बोल बोलेंगे लोग .. जज साहब ..."
बीच में ही माँ आहत होकर बोलीं - "इसी ज़मीन में बैठ ही दस साल तक सब्ज़ी बेची है, कई तेरी जैसों की मम्मियों ने ही ख़रीदी है मुझसे सब्जी, तब जाके आज तू बोल पा रहा है।"
संदीप विस्फारित आंखों से माँ को बस देखता रह गया।
मम्मी उसे घूरती हुई आगे बोली-
"वह दिन तू भले भूल गया बेटा, पर मैं कैसे भुलूँ भला | तेरे मॉल से या ऑनलाइन दीये तो मिल जायेंगे बेटा, पर दिल कैसे मिलेंगे भला?"

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सविता मिश्रा 'अक्षजा'
2012.savita.mishra@gmail.com
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रौशनी

"शरीर जल (ख़त्म हो) रहा है, लेकिन आत्मा तो अमर है | मोमबत्ती की तरह मैं भले काल कवलित हो गया हूँ, पर इस लौ की भांति तुम सब की आत्माओं में बसा हूँ |" जब सरकारी स्कूल में गाँधी जयंती पर हिंदी के प्राध्यापक महोदय ने मोमबत्ती की ओर इशारा करके कहा तो रूचि भयभीत हो गयी |
दादी से आत्माओं की कहानी खूब सुन रखी थी उसने | दादी ने कहा था अच्छी आत्मायें, बुरी आत्माओं को खूब सताती है | उसे लगा सत्य, अहिंसा के पुजारी बापू आज उसकी खूब खबर लेंगे | कक्षा क्या, पूरे स्कूल की दादा जो थी वह | सुबह प्रार्थना से पहले ही उसने अपनी दोनों सहपाठियों की पिटाई भी कर दी थी, छोटी-बड़ी मोमबत्ती के लेने को लेकर | बच्चों से मारपीट-गाली गलौज के बाद, शिक्षक से मार खाना तो रोज की आदत-सी थी उसकी |
सहसा उसने बापू के चित्र की ओर देखा - बापू के चित्र पर लौ चमक रही थी, बापू की आँखे भी बंद थी | उसे लगा बापू बच्चों में बसी अच्छी आत्माओं से सम्पर्क कर, उन सब को अपनी तरह बनने की सीख दे रहे हैं |
अगले ही पल वह अपने सहपाठियों से क्षमा मांग, उनके गले लग गयी | उसकी इस अप्रत्यासित हरकत से उनकी आँखों में आँसू आ गये जिनसे रोज ही लड़ती थी वह | और कुछ छात्रा हतप्रभ-सी थी - 'कौवे को हंस रूप में देख' |
प्रधानाचार्य महोदय भी ख़ुश होकर बोले - "भले ही आज लोग सफाई कर ख्याति अर्जित कर रहे हैं, पर असली सफाई तो तुमने की है | आज हमारे स्कूल द्वारा दिया जाने वाला 'गांधी सम्मान' मैं सर्वसम्मति से तुम्हें सौंपता हूँ |"
सविता मिश्रा 'अक्षजा'
2012.savita.mishra@gmail.com
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#LoveYouMummy
माँ
सादर अभिवादन
माँ तू माँ है न तो कैसे न तेरी याद आए | भले मैं माँ बन गयी हूँ पर बेटी को टोंकते समय बरबस ही तेरी याद हो आती है | मेरे बच्चे बड़े हो गये हैं लेकिन उन्हें समझाते हुए मैं खुद में तुझको ही पाती हूँ | बिटिया कह ही देती है कि माँ तुम नानी-सी हो गयी हों | काश माँ तू आज होती तो देखती ! वैसे स्वर्ग में बैठी तू देख तो रही हो न ! मैं तुझे बहुत प्यार करती हूँ माँ ! काश तेरे से कह पाती| आ जा माँ फिर से ! मैं मन की मुराद पूरी कर लूँ | सविता मिश्रा 'अक्षजा'

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राष्ट्रिय काव्य लेखन प्रतियोगिता २०१८
#Kavyotsav

प्यार का संगम-

नफ़रत की अविरल धारा में
प्यार का पानी बरसे
कुछ ऐसी ही कल्पना होती है
मन में ...
पर नफ़रत सदा ही
प्यार को तरसे |

नफ़रत हो न कभी
सदा प्यार ही प्यार रहे
पर होगा क्या ऐसा कभी
जब तक घृणा किसी से रहे |

प्यार का बादल घिर जाये
घृणा की बदबू तक न आये
नफ़रत बिजली की तरह
मिट्टी में मिल जाये|
बस प्यार भरी ...
सावन की घटा छाये|

प्यार का संगम दिखे
हर दिल में
नफरत के पोखर सूख जाये
कुछ ऐसी ही कल्पना
होती है मन में
प्यार ही प्यार सदा बरसे
अपने वतन में |
--00--
सविता मिश्रा 'अक्षजा'

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राष्ट्रिय काव्य लेखन प्रतियोगिता २०१८
#Kavyotsav
विषय-भावनाएं

आँसू बहा रही हूँ~

जख्म जो हरे हैं
उन पर मिट्टी डाल रही हूँ
पुराने जख्मों को याद कर
आँसू बहा रही हूँ |
नये जख्म अभी अभी हुए हैं
अतः दर्द थोड़ा कम है
जब थोड़ा समय की परत पड़ेगी
कोई ऐसी घटना घटेगी
तब यही जख्म पुनः याद आयेंगे
तब हम इसी जख्म पर
फिर से आँसू बहायेंगे |
अभी जो आँसू निकल रहे हैं
वह महज आँखों से बह रहे हैं
कुछ समय पश्चात् इसी जख्म पर
दिल से अश्रु निकलेंगे
उनमें वेदना ,बेचैनी ,अकुलाहट होगी
फिर तो बरबस ही अश्रु छलक जायेंगे |
अभी तो बस लोगो की सहानुभूति का असर है
जो दिल नहीं आँखों से बह रहा है | ..सविता मिश्रा 'अक्षजा'

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राष्ट्रिय काव्य लेखन प्रतियोगिता २०१८
#Kavyotsav
गुस्से से गुस्से की तकरार

गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी
जिह्वा भी गुस्से की ही भेंट चढ़ गयी
एक गुस्से में बोले एक तो दूजा चार बोलता
जिह्वा बेचारी सबके सामने शर्मसार हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ............

एक ने सर फोड़ा तो दूजे ने हाथ तोड़ा
आपस में ही काटम काट हो गयी
एक ने लाठी उठाई तो दूजे ने पत्थर चलाये
देखते ही देखते खून की नदिया बह गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ..........

जब तक आपस में लड़ थक कर चूर ना हुए
धूल धरती की चाटने को मजबूर ना हुए
तब तक एक दूजे के खून के प्यासे रहे बने
मानवता यहाँ शर्मसार हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ..........

होश आया तो शर्म से आंखे झुक गयी
अपनी करनी पर पश्चाताप बहुत हुआ
गाली गलौज कब हाथापाई पर ख़त्म हुई
गुस्से पर गुस्सा प्रभावी ना जाने कब हुआ
गुस्से से गुस्से की तकरार जब हुई
गुस्से से गुस्से की तकरार हुई
तकरार हुई .....हार हुई ..............

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