होकर के अजनबी, हम यहां मिलते है कभी - कभी

मुझे भी डर है,
असफल होने का फासले बढ़ कर,
दूर होती मंजिल का

लेकिन मंजिल पर पहुंच कर,
गुम हो जाते रास्तों का
नदियों के सूख जाने का,

आसमां के गिर जाने का वृक्षों के सूख जाने,
और तारो के टूट जाने का

इंसान के भीतर की इंसानियत के मर जाने का

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शीघ्र अतिशीघ्र से करे जो कोई काज।
बिगाड़े आपन काज और गवाएं लाज।।

https://www.matrubharti.com/novels/17630/b-b-by-abhinav-bajpai

#शीघ्र

कितना बेवकूफ था वो
जिसने तुम्हारी हर बात पर कर लिया था भरोसा
और कितने बेवकूफ थे तुम
जो तुमने तोड़ दिया उसका भरोसा???

#षणानन
https://www.matrubharti.com/book/19886108/bakri-aur-bachche-1

#बेवकूफ

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बचपन में मेरे आती वो चिड़िया,
बनाने अपना घोंसला
तिनके बीन कर ले जाती मेरे घर से,
कभी खेतो से आयी गेहूं की बाली
तो कभी झाड़ू से उसने सींक निकाली
देखती दूर से हम सबको चुन चुं कर दाने,
चाहा था दबे पांव जाकर पकड़ना मैंने भी
पर वो थी कि, घोंसले में फुर्र से उड़ जाती,
मेरे हाथ कभी ना आती
मेरी ललचाई नज़रों से नहीं कभी घबराई
पर ना जाने क्यों एक दिन, वो शरमाई
और चली गई जहां से वो थी आई
निकली वो बड़ी हरजाई
मै रो- रोकर हुआ बेहाल
काम पूरा होने पर हरएक को होता है जाना
पर मम्मी ने ये बात थी समझाई,
फिर एक दिन मिला उसका घोंसला,
मेरे घर की दीवार के बड़े से छेद में
जिसे मैंने रखा अपनी अलमारी में
उसकी याद में संभाल...

#षणानन

#घोंसला

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पुरानी पोस्ट के साथ🙏

"तनहाई",
https://www.matrubharti.com

#षणानन

एक प्रश्न आप लोगो से..

मैंने बचपन में एक कहानी का नाट्य रूप दूरदर्शन पर देखा था, कहानी और लेखक का नाम मुझे नहीं पता क्या कोई उस कहानी और उसके लेखक का नाम बता सकता है???
उस कहानी का दृश्य इस प्रकार है कि-


"एक कुआं होता है जिसकी सफाई करवाने पर तरह तरह की वस्तुएं निकलती है और प्रत्येक वस्तु की एक कहानी होती है, कुआं कि सफाई करने वाले को बाल्टी में रस्सी बांध कर अंदर भेजते है और वो हर बार किसी एक वस्तु के साथ बाहर आता है फिर उस वस्तु से संबधित व्यक्ति के दिमाग में एक कहानी चलती है"


प्रत्येक निकलती वस्तु के साथ कहानी और रोमांचक होती जाती है। मुझे खेद है कि इस कहानी का अंत में नहीं देख पाया, किंतु यदि आप में से कोई इस कहानी का नाम और लेखक का नाम बता सके तो मैं इसे दोबारा अवश्य पढ़ना चाहूंगा।🙏🙏🙏

#षणानन

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सपने जैसा
बचपन का खेल
जागा तो टूटा

#हाइकु
सूर्य और किसान

(१)
जेठ का सूर्य
तपता रहा दिनभर
किसान पर

(२)
मचल कर
बरसा रहा गर्मी
जबरदस्त

(३)
पर किसान
चलाता रहा हल
खलिहान में

(४)
अन्नदाता है
भाग्यविधाता है वो
हम सबका

#षणानन

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वह जो गली-गली थी भटकती
देखती दिन रात सपने तुम्हारे आने के
करती प्रतीक्षा... मंद-मंद सांसो से
धौकती आग दिल की
सफेदी सी छाई रहती थी
हरदम उसकी आंखों में
उठाती हाथ, दौड़ती पूरब की ओर
मारकर ढहाके जोर-जोर
सोचती थी तुम आओगे एक दिन
मिट जाएंगे उसके सारे संताप
समेट लोगे उसे बाहों में अपनी
भूलकर सभी गुनाह उस के
कर लोगे पापों का पश्चाताप
पर तुम ना आए और
वह चली गई पूरब से दक्षिण
मिटा न पाई अपने हाथों की लकीर
भूख से व्याकुल होकर
भूखी ही तुम्हारे प्रेम की
वह पगली ही तो थी...

#षणानन

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हम सबने राजा और चींटी की कहानी सुनी है, जिसमें एक राजा युद्ध में हारकर एक गुफा में जाता है, और वह एक चीटी से प्रेरणा पाकर दोबारा अपनी सेना एकत्रित कर युद्ध में जीतता है इस प्रकार वह अपना राज्य और सम्मान पुनः प्राप्त करता है, हम सब भी जब अपने जीवन में बार बार असफल होने लगते है, तो कभी - कभी हम अवसाद ग्रस्त हो जाते है, और हम यह मान बैठते है कि अमुक कार्य अब नहीं कर सकते, जब कि यह अंतिम सत्य नहीं होता, क्योंकि हमें आखिरी सांस तक हार नहीं माननी चाहिए और हमे सफलता के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए


एक राजा बैठा था थका हारा
देखा चींटी को पार करते दीवार
जो चढ़ती और गिरती बार-बार
आसान नहीं थी यह चढ़ाई...
कठिन थी, दुष्कर थी,
फिर भी चींटी को हरा ना पाई
चींटी उठती, संभलती...
करती और एक अंतिम प्रयास
यह देख राजा में दौड़ा साहस अनायास
अंत में चढ़ते चढ़ते चींटी दीवार को पा गई..
राजा ने देखा उसको भी यह बात भा गई
सारी घटना देख रहा था, राजा होकर मौन
उसने पहचाना स्वयं को, कि वह है कौन?
राजा के मन में सहसा कौधां एक विचार..
सोंचा उसने जब अदनी सी चींटी,
चढ़ने को दीवार करती प्रयास बार-बार
फिर तो मैं मानव हूं, प्राणियों में श्रेष्ठ,
उस पर भी महान राज्य का महाराजा विशेष
फिर मैं क्यों बैठा मानकर हार
और क्यों होता हूं इतना निराश
भुजाएं लगी उसकी फड़कने
और हृदय लगा मचलने
तेजी से खींची उसने तलवार
चला वहां से लेकर मन में संभावनाएं अपार

#षणानन

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