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#श्रीराम #मेघनाद #shriram #meghnad

कौन प्रीतिकर पितृप्रेम में मेघनाद कि राम?
एक प्रेम में राज गवाएँ और एक दे प्राण।

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घर में रहकर आराम करें हम ,
नवजीवन प्रदान करें हम
कभी राष्ट्र पे आक्रान्ताओं
का हीं भीषण शासन था,
ना खेत हमारे होते थे
ना फसल हमारा राशन था,
गाँधी , नेहरू की कितनी रातें
जेलों में खो जाती थीं,
कितनी हीं लक्ष्मीबाई जाने
आगों में सो जाती थीं,
सालों साल बिताने पर यूँ
आजादी का साल मिला,
पर इसका अबतक कैसा यूँ
तुमने इस्तेमाल किया?
जो भी चाहे खा जाते हो,
जो भी चाहे गा जाते हो,
फिर रातों को चलने फिरने की
ऐसी माँग सुनते हो।
बस कंक्रीटों के शहर बने
औ यहाँ धुआँ है मचा शोर,
कि गंगा यमुना काली है
यहाँ भीड़ है वहाँ की दौड़।
ना खुद पे कोई शासन है
ना मन पे कोई जोर चले,
जंगल जंगल कट जाते हैं
जाने कैसी ये दौड़ चले।
जब तुमने धरती माता के
आँचल को बर्बाद किया,
तभी कोरोना आया है
धरती माँ ने ईजाद किया।
देख कोरोना आजादी का
तुमको मोल बताता है,
गली गली हर शहर शहर
ये अपना ढ़ोल बजाता है।
जो खुली हवा की साँसे है,
उनकी कीमत पहचान करो।
ये आजादी जो मिली हुई है,
थोड़ा सा सम्मान करो,
ये बात सही है कोरोना
तुमपे थोड़ा शासन चाहे,
मन इधर उधर जो होता है
थोड़ा सा प्रसाशन चाहे।
कुछ दिवस निरंतर घर में हीं
होकर खुद को आबाद करो,
निज बंधन हीं अभी श्रेयकर है
ना खुद को तुम बर्बाद करो।
सारे निज घर में रहकर
अपना स्व धर्म निभाएँ हम,
मोल आजादी का चुका चुकाकर
कोरोना भगाएँ हम।

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छद्म है जगत जो इस भरम के सामने ,
आ जाता है अक्श मेरा सच के सामने .
मान मैं भी लेता जो कहते हो ठीक है ,
पर टूट जाता भरोसा अख्ज़ के सामने.

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जब रक्षक तक्षक बन जाये

तुम्हें चाहिए क्या आजादी , सबपे रोब जमाने की ,
यदि कोई तुझपे तन जाए , क्या बन्दुक चलाने की ?
ये शोर शराबा कैसा है ,क्या प्रस्तुति अभिव्यक्ति की ?
या अवचेतन में चाह सुप्त है , संपुजन अति शक्ति की .
लोकतंत्र ने माना तुझको , कितने हीं अधिकार दिए ,
तुम यदा कदा करते मनमानी , सब हमने स्वीकार किए .
हाँ माना की लोकतंत्र की , तुमपे है प्राचीर टिकी ,
तेरे चौड़े सीने पे हीं तो , भारत की दीवार टिकी .
हाँ ये ज्ञात भी हमको है , तुम बलिदानी भी देते हो ,
हम अति प्रशंसा करते है , कभी क़ुरबानी भी देते हो .
जब तुम क़ुरबानी देते हो , तब तब हम शीश नवाते हैं ,
जब एक सिपाही मर जाता , लगता हम भी मर जाते हैं .
पर तुम्हीं कहो जब शक्ति से , कोई अनुचित अभिमान रचे ,
तब तुम्हीं कहो उस राष्ट्र में कैसे ,प्रशासन सम्मान फले.
और कहाँ का अनुशासन है , ये क्या बात चलाई है ?
गोली अधिवक्ताओं के सीने पे, तुमने हीं तो चलाई है.
हम तेरे भरोसे हीं रहते , कहते रहते तुम रक्षक हो ,
हाय दिवस आज अति काला है , हड़ताल कर रहे तक्षक हैं ,
एक नाग भरोसे इस देश का , भला कहो कैसे होगा ?
जब रक्षक हीं तक्षक बन जाए , राम भरोसे सब होगा .

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माँ:एक गाथा:खंड काव्य:भाग:1

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