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कोरोना महामारी के हाथों भारत में अनगिनत मौतें हो रही हैं। सत्ता पक्ष कौए की तरह अपनी शक्ति बढ़ाने के लालच में चुनाव पे चुनाव कराता जा रहा है तो विपक्ष गिद्ध की तरह मृतकों की गिनती करने में हीं लगा हुआ है। इन कौओं और गिद्धों की प्रवृत्ति वाले लोगों के बीच मजदूर और श्रमिक पिसते चले जा रहे है।आज के माहौल में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इन कौओं और गिद्धों की तरह अवसरवादी प्रवृत्ति वाली राजनैतिक पार्टियों के बीच बदहाली बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धा हो रही है। इस बदहाली का शिकार श्रमिक और मजदूर ज्यादा हो रहे हैं। आम जनता खासकर मज़दूरों और श्रमिकों की बदहाली पर प्रकाश डालती हुई व्य्यंगात्मक कविता प्रस्तुत है "कोरोना से हार चुके क्या ईश्वर से ये कहे बेचारे?"

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कोरोना बीमारी की दूसरी लहर ने पूरे देश मे कहर बरपाने के साथ साथ भातीय तंत्र की विफलता को जग जाहिर कर दिया है। चाहे केंद्र सरकार हो या की राज्य सरकारें, सारी की सारी एक दूसरे के उपर दोषरोपण में व्यस्त है। जनता की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव प्रचार हो गया है। दवाई, टीका, बेड आदि की कमी पूरे देश मे खल रही है। प्रस्तुत है इन्ही कुव्यथाओं पर आक्षेप करती हुई कविता  "बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के"।

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महाभारत के शुरू होने से पहले जब कृष्ण शांति का प्रस्ताव लेकर दुर्योधन के पास आये तो दुर्योधन ने अपने सैनिकों से उनको बन्दी बनाकर कारागृह में डालने का आदेश दिया। जिस कृष्ण से देवाधिपति इंद्र देव भी हार गए थे। जिनसे युद्ध करने की हिम्मत देव, गंधर्व और यक्ष भी जुटा नहीं पाते थे, उन श्रीकृष्ण को कैद में डालने का साहस दुर्योधन जैसा दु:साहसी व्यक्ति हीं कर सकता था। ये बात सही है कि श्रीकृष्ण की अपरिमित शक्ति के सामने दुर्योधन कहीं नही टिकता फिर भी वो श्रीकृष्ण को कारागृह में डालने की बात सोच सका । ये घटना दुर्योधन के अति दु:साहसी चरित्र को परिलक्षित करती है । कविता के द्वितीय भाग में दुर्योधन के इसी दु:साहसी प्रवृति का चित्रण है। प्रस्तुत है कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" का द्वितीय भाग।

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दुर्योधन कब मिट पाया [भाग-1]

जब सत्ता का नशा किसी व्यक्ति छा जाता है तब उसे ऐसा लगने लगता है कि वो सौरमंडल के सूर्य की तरह पूरे विश्व का केंद्र है और पूरी दुनिया उसी के चारो ओर ठीक वैसे हीं चक्कर लगा रही है जैसे कि सौर मंडल के ग्रह जैसे कि पृथ्वी, मांगल, शुक्र, शनि इत्यादि सूर्य का चक्कर लगाते हैं। न केवल वो अपने हर फैसले को सही मानता है अपितु उसे औरों पर थोपने की कोशिश भी करता है। नतीजा ये होता है कि उसे उचित और अनुचित का भान नही होता और अक्सर उससे अनुचित कर्म हीं प्रतिफलित होते हैं।कुछ इसी तरह की मनोवृत्ति का शिकार था दुर्योधन प्रस्तुत है महाभारत के इसी पात्र के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती हुई कविता "दुर्योधन कब मिट पाया" का प्रथम भाग।

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किसी की जीत या किसी की हार का बाजार शोक  नहीं मनाता। एक व्यापारी का पतन दूसरे व्यापारी के उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। सत्यनिष्ठा,  ईमानदारी, प्रेम इत्यादि की बातें व्यापार में खोटे सिक्के की तरह हैं, जो मूल्यवान दिखाई तो पड़ती है , परन्तु होती हैं मूल्यहीन । अक्सर बेईमानी , धूर्त्तता, रिश्वतखोरी, दलाली और झूठ की राह पर चलने वाले बाजार में  तरक्की का पाठ पढ़ाते हुए मिल जाएंगे। बाजार में मुनाफा से बढ़कर कोई मित्र नहीं और नुकसान से बुरा कोई शत्रु नहीं। हालाँकि बाजार के मूल्यों पर आधारित जीवन वालों का पतन भी बाजार के नियमों के अनुसार हीं होता है। ये ठीक वैसा हीं है जैसे कि जंगल के नियम के अनुसार जीवन व्यतित करनेवाले राजा बालि का अंत भी  जंगल के कानून के अनुसार हीं हुआ। बाजार के व्यवहार  अनुसार जीवन जीने वालों को इसके दुष्परिणामों के प्रति सचेत करती हुई व्ययंगात्मक कविता।

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वो पश्चाताप जो केवल जुबाँ से किया गया हो  क्या एक आत्मा के अध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो सकता हैं?

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हरेक ऑफिस में कुछ सहकर्मी मिल हीं जाएंगे जो समय पर आ नहीं सकते। इन्हें आप चाहे लाख समझाईये पर इनके पास कोई ना कोई बहाना हमेशा हीं मिल हीं जाएगा। यदि कोई बताने का प्रयास करे भी तो क्या, इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती। लेट लतीफी इनके जीवन का अभिन्न हिस्सा होता है। तिस पर तुर्रा ये कि ये आपको हीं पाठ पढ़ाने लगते हैं । ऐसे हीं महानुभावों के चरण कमलों में आदरपूर्वक सादर नमन है ये कविता , मिस्टर लेट लतीफ़ ।

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जीवन यापन के लिए बहुधा व्यक्ति को वो सब कुछ करना पड़ता है , जिसे उसकी आत्मा सही नहीं समझती, सही नहीं मानती । फिर भी भौतिक प्रगति की दौड़ में स्वयं के विरुद्ध अनैतिक कार्य करते हुए आर्थिक प्रगति प्राप्त करने हेतु अनेक प्रयत्न करता है और भौतिक समृद्धि प्राप्त भी कर लेता है , परन्तु उसकी आत्मा अशांत हो जाती है। इसका परिणाम स्वयं का स्वयम से विरोध , निज से निज का द्वंद्व।  विरोध यदि बाहर से हो तो व्यक्ति लड़ भी ले , परन्तु व्यक्ति का सामना उसकी आत्मा और अंतर्मन से हो तो कैसे शांति स्थापित हो ? मानव के मन और चेतना के अंतर्विरोध को रेखांकित करती हुई रचना ।  

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जानवर और आदमी में अंतर ये है कि आदमी को शारीरिक क्षुधा के साथ साथ बौद्धिक क्षुधा को भी शांत करना होता है। यही कारण है कि आदमी के जीवन में सुबह की चाय और अख़बार अभिन्न हिस्सा बन गए हैं। अख़बार में आदमी किस तरह की खबर रोज पढ़ता है , इससे जानवर के आदमी होने के छलांग का अंदाजा लगाया जा सकता है । क्या आप जानवर के आदमी होने की छलांग का अंदाजा लगा सकते हैं ? नकारात्मक पत्रकारिता पर चोट करती हुई व्ययंगात्मक रचना।

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सत्य का पालन करना श्रेयकर है। घमंडी होना, गुस्सा करना, दूसरे को नीचा दिखाना , ईर्ष्या करना आदि को निंदनीय माना  गया है। जबकि चापलूसी करना , आत्मप्रशंसा में मुग्ध रहना आदि को घृणित कहा जाता है। लेकिन जीवन में इन आदर्शों का पालन कितने लोग कर पाते हैं? कितने लोग ईमानदार, शांत, मृदुभाषी और विनम्र रह पाते हैं।  कितने लोग इंसान रह पाते हैं? बड़ा मुश्किल होता है , आदमी का आदमी बने रहना।

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