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ये कविता आत्मा और मन से बीच संवाद पर आधारित है। इस कविता में आत्मा मन को मन के स्वरुप से अवगत कराते हुए मन के पार जाने का मार्ग सुझाती है ।

रे मेरे अनुरागी चित्त मन,
सुन तो ले ठहरो तो ईक क्षण।
क्या है तेरी काम पिपासा,
थोड़ा सा कर ले तू मंथन।

कर मंथन चंचल हर क्षण में,
अहम भाव क्यों है कण कण में,
क्यों पीड़ा मन निज चित वन में,
तुष्ट नहीं फिर भी जीवन में।

सुन पीड़ा का कारण है भय,
इसीलिए करते नित संचय ,
निज पूजन परपीड़न अतिशय,
फिर भी क्या होते निःसंशय?

तो फिर मन तू स्वप्न सजा के,
भांति भांति के कर्म रचा के।
नाम प्राप्त हेतु करते जो,
निज बंधन वर निज छलते हो।

ये जो कति पय बनते  बंधन ,
निज बंधन बंध करते क्रंदन।
अहम भाव आज्ञान है मानो,
बंधन का परिणाम है जानो।

मृग तृष्णा सी नाम पिपासा,
वृथा प्यास की रखते आशा।
जग से ना अनुराग रचाओ ,
अहम त्यज्य वैराग सजाओ।

अभिमान जगे ना मंडित करना,
अज्ञान फले तो दंडित करना।
मृग तृष्णा की मात्र दवा है,
मन से मन को खंडित करना।

जो गुजर गया सो गुजर गया,
ना आने वाले कल का चिंतन।
रे मेरे अनुरागी चित्त मन,
सुन तो ले ठहरो तो ईक क्षण।

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क्या रखा है रोज की कीच कीच,झगड़ा और तकरार में,

आ जाओ कुछ दिवस बिता लो,दिल्ली , एन.सी.आर.में

भारतीय संविधान के निर्माताओं ने आरक्षण की व्यवस्था इसलिए की थी ताकि समाज में जातिगत और धर्मगत असमानताओं को दूर किया जा सके और समतामूलक समाज की स्थापना हो सके। पर इसका  परिणाम उल्टा  हो रहा है। आरक्षण द्वारा ऐसी राजनैतिक पार्टियां उभर गई हैं जो जातिगत और धर्मगत राजनीति कर अपना पोषण कर रहीं हैं। दलितों और पिछड़ों का तो भला नहीं हुआ , अपितु जाति और धर्म गत राजनीति करने वाले नेताओं और राजनैतिक पार्टियों का भला आवश्य हो रहा है। ये राजनैतिक पार्टियाँ , जिनका आधार हीं जातिगत और धर्मगत असामनता हैं , आखिर समतामूलक समाज की स्थापना में अपना सहयोग क्यों दे ? फिर समतामूलक समाज की स्थापना हो कैसे ? आइये देखते हैं इस कविता में।

आरक्षण  का क्षय हो कैसे,  आर्यावर्त का जय हो कैसे? 
सबका एक बराबर हित हो , विषमता का क्षय हो कैसे?
आरक्षण से दलित कुचित औ ,पिछड़ों का हित ना होता,
जो हैं शक्ति पुंज दलित गण , बस उनका पर हित होता।

दो चार के हित से बेशक, खत्म नहीं दलित अत्याचार,
जाति धर्म है रोजी जिनकी,बन जाती उनकी सरकार।
जिन नेताओं की जाति और , धर्म विशेष हीं है पोषण,
वो किंचित क्या चाहेंगे पिछड़ों का ना हो अवशोषण।

अभी आरक्षण से बोलो तुम, क्या बन पाया देश मेरा,
बटा  हुआ है हिन्दू ,मुस्लिम,  दलितों  में है देश मेरा।
कभी महा राज नरेशों को मिट्टी में करके  देश बना,
फिर क्यों जाति धर्म नाम पर टुकड़ो में अवशेष बना?

बिना जाति और धर्म मिटाये नहीं देश का जय होगा,
एक राष्ट्र में एक जाति हो एक धर्म तब जय होगा।
तो आओ हम देखें कैसे, आरक्षण असुर मिटायेंगे,
धर्म जाति गत नेता नीति, पार्टी आदि  हट जाएंगे ।

जाति धर्म के मूल में है क्या, जन्म एक वंश विशेष,
धर्म वंश मूल मिट जाएँ तो , रह पायेगा क्या अवशेष।
इसी लिए  हे राष्ट्र प्रणेता ,  इतनी सी बस है दरकार,
जो जाति के बाहर शादी करते उनको हो अधिकार।

उनको हीं अधिकार मिले , सम्बल मिले आरक्षण का,
जो धर्म इतर से शादी करते, हो अधिकारी रक्षण का।
विजातीय धर्म युगल को, जब मिलता हो प्रोत्साहन,
फिर कैसे इस जाति धर्म का,हो पाये कोई  संवर्द्धन।

माता मुस्लिम, पिता हिन्दू, सोचो जिस परिवार में,
जैन भाभी ओ जीजा क्रिस्चन, क्या होगा विचार में?
वो गेह भी कैसा होगा, दादी वैश्य हो  दादा ब्राह्मण, 
चाचा चाची राजपूत औ परिजन जिनके होते हरिजन।

जब ऐसे हीं परिवार से, नबल बीज उग आएंगे,
फिर जाति धर्म की रटने वालों को क्या ये सुन पाएंगे?
ना कोई रक्षण को उत्सुक फिर परीक्षण क्या होगा,
जाति होगी ना धर्म रहेगा, आरक्षण तब क्या होगा।

इसीलिए इस धर्म जाति का , बंद करो ये आरक्षण,
जाति धर्म के इतर हैं जो भी, उन्हें प्राप्त हो ये रक्षण।
अन्तर्जातीय धर्म शादी से, जाति धर्म का क्षय होगा,
जाति धर्म मिट जाएंगे सब, इस राष्ट्र का जय होगा।

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जीवन की तमाम मुश्किलात हालातों से जूझते हुए कवि अपनी जिंदगी को खुशनुमा तरीके से कैसे गुजार रहा है, ये कविता कवि के उस नजरिये को दिखाती है। 

ख्वाहिशों की बात में इतना सा फन रखा ,
जो हो सके   ना पूरी  उनका दमन  रखा।

जरूरतों की आग ये जला भी दे ना मुझको,
तपन बढ़ी थी अक्सर बाहोश पर बदन रखा।

हादसे जो घट गए थे रोना क्या धोना क्या, 
आ गई थीं मुश्किलें जो उनको दफ़न रखा।

हसरतों जरूरतों के दरम्यान थी जिन्दगी ,
इस पे लगाम  थोड़ा उस पे कफन रखा।

मुसीबतों का क्या था, थी रुबरु पर बेअसर,
थी सोंच में रवानी जज्बात में अगन  रखा।

रूआब  नूर-ए-रूह में कसर रहा ना बाकी ,
थीं जिनसे भी नफरतें इतनी भी अमन रखा।

खुशबुओं की राह में थी फूलों की जरुरत ,
काँटों से ना थी दुश्मनी उनको जतन रखा।

जिंदगी की फ़िक्र क्या मौज में कटती गई ,
बुढ़ापे की राह थी पर जिन्दा चमन  रखा।

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ये कविता भगवान श्रीकृष्ण के जीवन लीला पे आधारित शिक्षाओं को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से लिखी गई है ।


देखो सारे क्या कहते हैं किशन कन्हैया इस जग से,
रह सकते हो तुम सब सारे क्या जग में मैं को तज के?
कृष्ण पक्ष के कृष्ण रात्रि जब कृष्ण अति अँधियारा था,
जग घन तम के  हारन हेतु  , कान्हा तभी पधारा था ।

जग के तारणहार श्याम  को , माता कैसे बचाती थी ,
आँखों में काजल का टीका , धर आशीष दिलाती थी।
और कान्हा भी लुक के छिपके , कैसे दही छुपाते थे ,
मिटटी को मुख में धारण कर पूर्ण ब्रह्मांड दिखाते थे ।

नग्न  गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ बताए,
पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर , मर्यादा भी खूब बचाए।
इस जग को रचने वाले भी कहलाये हैं माखन चोर,
कभी गोवर्धन पर्वतधारी  कभी युद्ध को देते  छोड़।

होठों  पे  कान्हा के जब मुरली  गैया  मुस्काती थीं,
गोपी तजकर लाज वाज सब पीछे दौड़ी आती थीं।
अति प्रेम राधा से करते कहलाये थे राधे श्याम,
पर जग के हित कान्हा राधा छोड़ चले थे राधेधाम।

पर द्वारकाधिश बने जब तनिक नहीं सकुचाये थे,
मित्र सुदामा साथ बैठकर दिल से गले लगाये थे।
देव व्रत जो अटल अचल थे भीष्म प्रतिज्ञा धारी ,
जाने कैसा भीष्म व्रत था वस्त्र  हरण मौन धारी।

इसीलिए कान्हा ने रण में अपना प्रण झुठलाया था,
भीष्म पितामह को प्रण का हेतु क्या ये समझाया था।
जब भी कोई शिशुपाल हो  तब वो चक्र चलाते थे,
अहम मान का राज्य फले तब दृष्टि वक्र उठाते थे।

इसीलिए तो द्रोण, कर्ण, दुर्योधन का संहार किया,
और पांडव सत्यनिष्ठ थे, कृष्ण प्रेम उपहार दिया।
विषधर जिनसे थर्र थर्र काँपे,पर्वत जिनके हाथों नाचे,
इन्द्रदेव का मैं भी कंपित, नतमस्तक हैं जिनके आगे।

पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी ,
कंस आदि के मर्दन कर्ता  कृष्ण अति बलशाली।
वो कान्हा है योगिराज पर भोगी बनकर नृत्य करें,
जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे।

एक हाथ में चक्र हैं जिसके , मुरली मधुर बजाता है ,
गोवर्धन धारी डर कर  भगने का खेल दिखता है। 
जैसे हाथी शिशु  से भी, डर का कोई खेल रचाता है,
कारक बनकर कर्ता का ,कारण से मेल कराता है।

कभी काल के मर्यादा में, अभिमन्यु का प्राण दिया,
जब जरूरी परीक्षित को, जीवन का वरदान दिया।
सब कुछ रचते हैं  कृष्णा पर रचकर ना संलिप्त रहे,
जीत हार के खेल दिखाते , कान्हा हर दम तृप्त रहे।

वो व्याप्त है नभ में जल में ,चल में थल में भूतल में,
बीत गया पल भूत आज भी ,आने वाले उस कल में।
उनसे हीं बनता है जग ये, उनमें हीं बसता है जग ये,
जग के डग डग में शामिल हैं, शामिल जग के रग रग में।

मन में कर्ता भाव जगे ना , तुम से  वांछित धर्म रचो, 
कारक सा स्वभाव जगाकर जग में जगकर कर्म करो।
जग में बसकर भी सारे क्या रह सकते जग से बच के,
कहते कान्हा तुम सारे क्या रह सकते निज को तज के?

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लगभग हरेक ऑफिस में कुछ ऐसे सहकर्मी होते हैं जो अपनी उपस्थिति मात्र से नकारात्मकता का माहौल पैदा कर देते हैं। ये कविता इन्हीं तरह के नकारात्मक प्रवृति के व्यक्तियों के प्रति समर्पित है।  

ऑफिस में भूचाल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया।

आते हीं आलाप करेगा,
अनर्गल प्रलाप करेगा,
हृदय रुग्ण विलाप करेगा,
भाँति भ्रांति अशांति सन्मुख,
जी का एक जंजाल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया ।

अब कोई संवाद न होगा,
होगा जो बकवाद हीं होगा,
अकारण विवाद भी होगा,
हरे शांति और हरता है सुख,
सच में हीं बवाल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया।

कार्य न कोई फलित हुआ है,
जो भी है, निष्फलित हुआ है,
साधन भी अब चकित हुआ है,
साध्य हो रहा, हार को उन्मुख,
कुकर्म घृणित महाकाल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया।

धन धान्य करे संचय ऐसे,
मीन प्रेम बगुले के जैसे,
तुम्हीं बताओ कह दूं कैसे,
कर्म बुरा है मुख भी दुर्मुख,
ऑफिस में फिलहाल आ गया,
हाँ फिर से चांडाल आ गया।

कष्ट क्लेश होता है अक्षय, 
हरे प्रेम बढ़े घृणा अतिशय,
शैतानों की करता है जय,
प्रेम ह्रदय से रहता विमुख,
कुर्म वाणी विकराल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया।

कोई विधायक कार्य न आये,
मुख से विष के वाण चलाये,
ऐसे नित दिन करे उपाय,
बढ़े वैमनस्य, पीड़ा और दुख,
ख़ुशियों का अकाल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया।

बतलाये खुद को वो ज्ञानी,
पर महाचंड वो है अज्ञानी,
मूर्खों में नहीं कोई सानी,
सरल कार्य में धरता है चुक,
बुद्धि का हड़ताल आ गया,
लो फिर से चांडाल आ गया,

आफिस में भुचाल आ गया ,
देखो फिर चांडाल आ गया।

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शहरीकरण के अंधाधुन दौड़ ने गाँव मे बीतती हुई बचपन के अल्हड़पन को लगभग विलुप्त सा कर दिया है। प्रस्तुत है ग्राम्य जीवन के उन्हीं विलुप्त हुई बचपन के स्वप्निल मधुर स्मृतियों को ताजा करती हुई कविता।

धुप में  छाँव में , गली हर ठांव में ,
थकते कहाँ थे कदम , मिटटी में गाँव में।

बासों की झुरमुट से , गौरैया लुक  छिप के ,
चुर्र चूर्र के फुर्र फुर्र के, डालों पे रुक रुक के।
कोयल की कु कु और , कौए के काँव में ,  
थकते कहाँ थे कदम , मिटटी में गाँव में।

फूलों की कलियाँ झुक , कहती  थी मुझसे कुछ ,
अड़हुल वल्लरियाँ सुन , भौरें की रुन झुन गुन।
उड़ने  को आतुर  पर , रहते थे  पांव में ,
थकते कहाँ थे कदम , मिटटी में गाँव में।

वो सत्तू की लिट्टी और चोखे का स्वाद  ,
आती है भुन्जे की चटनी की जब याद ।
तब दायें ना सूझे कुछ , भाए ना बाँव में ,
थकते कहाँ थे कदम  मिटटी में गाँव में।

बारिश में अईठां और गरई पकड़ना ,
टेंगडा  के काटे  पे  झट से  उछलना ।
कि हड्डा से बिरनी से पड़ते गिराँव में ,
थकते कहाँ थे कदम  मिटटी में गाँव में।

साईकिल को लंगड़ा कर कैंची चलाते ,
जामुन पर दोल्हा और पाती लगाते।
थक कर सुस्ताते फिर बरगद की छाँव में,
थकते कहाँ थे कदम  मिटटी में गाँव में।

गर्मी में मकई की ऊँची मचाने थी,
जाड़े  में घुर को तपती दलाने  थीं।
चीका की कुश्ती , कबड्डी  की दांव में,
थकते कहाँ थे कदम  मिटटी में गाँव में।

सीसम के छाले से तरकुल मिलाकर ,
लाल होठ करते थे पान  सा चबाकर ,
मस्ती क्या छाती थी कागज के नाँव में
थकते कहाँ थे कदम  मिटटी में गाँव में।

रातों को तारों सा जुगनू की टीम टीम वो,
मेढक की टर्र टर्र जब बारिश की रिमझिम हो।
रुन झुन आवाजें क्या झींगुर के झाव में,
थकते कहाँ थे कदम मिटटी में गाँव में।

धुप में  छाँव में , गली हर ठांव में ,
थकते कहाँ थे कदम , मिटटी में गाँव में।

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#श्रीराम #मेघनाद #shriram #meghnad

कौन प्रीतिकर पितृप्रेम में मेघनाद कि राम?
एक प्रेम में राज गवाएँ और एक दे प्राण।

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घर में रहकर आराम करें हम ,
नवजीवन प्रदान करें हम
कभी राष्ट्र पे आक्रान्ताओं
का हीं भीषण शासन था,
ना खेत हमारे होते थे
ना फसल हमारा राशन था,
गाँधी , नेहरू की कितनी रातें
जेलों में खो जाती थीं,
कितनी हीं लक्ष्मीबाई जाने
आगों में सो जाती थीं,
सालों साल बिताने पर यूँ
आजादी का साल मिला,
पर इसका अबतक कैसा यूँ
तुमने इस्तेमाल किया?
जो भी चाहे खा जाते हो,
जो भी चाहे गा जाते हो,
फिर रातों को चलने फिरने की
ऐसी माँग सुनते हो।
बस कंक्रीटों के शहर बने
औ यहाँ धुआँ है मचा शोर,
कि गंगा यमुना काली है
यहाँ भीड़ है वहाँ की दौड़।
ना खुद पे कोई शासन है
ना मन पे कोई जोर चले,
जंगल जंगल कट जाते हैं
जाने कैसी ये दौड़ चले।
जब तुमने धरती माता के
आँचल को बर्बाद किया,
तभी कोरोना आया है
धरती माँ ने ईजाद किया।
देख कोरोना आजादी का
तुमको मोल बताता है,
गली गली हर शहर शहर
ये अपना ढ़ोल बजाता है।
जो खुली हवा की साँसे है,
उनकी कीमत पहचान करो।
ये आजादी जो मिली हुई है,
थोड़ा सा सम्मान करो,
ये बात सही है कोरोना
तुमपे थोड़ा शासन चाहे,
मन इधर उधर जो होता है
थोड़ा सा प्रसाशन चाहे।
कुछ दिवस निरंतर घर में हीं
होकर खुद को आबाद करो,
निज बंधन हीं अभी श्रेयकर है
ना खुद को तुम बर्बाद करो।
सारे निज घर में रहकर
अपना स्व धर्म निभाएँ हम,
मोल आजादी का चुका चुकाकर
कोरोना भगाएँ हम।

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छद्म है जगत जो इस भरम के सामने ,
आ जाता है अक्श मेरा सच के सामने .
मान मैं भी लेता जो कहते हो ठीक है ,
पर टूट जाता भरोसा अख्ज़ के सामने.

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