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वास्तविकता कल्पना से होती है विचित्र

कल्पना आभासी, अस्पष्ट व धुंधली होती है जिसकी अभौतिक स्पष्टता स्वयं कल्पना करने वाला ही जान सकता है। वास्तविकता भौतिक रूप से स्पष्ट होती है जिसमे तथ्यों, सूचनाओं, चित्रों, आदि का प्रकट रूप में समावेश होता है।

कल्पना स्थिर नही रहती वह लचीली प्रवर्ती की होती है जो मन के विचलन और विभिन्न आयामो में विचरण करते हुए चिंतन पर निर्भर करती है। और वास्तविकता प्रकट रूप में होती है जो स्थिर रहती है।

जबतक वास्तविकता से सामना न हो तब तक वह मन मे कल्पना रूप में बनी रहती है और जब सामना हो जाता है तब प्रथम दृष्टि में सामने जो प्रकट रूप में वास्तविकता होती है वह हमेशा के लिए मानस पटल पर वास्तविकता के संबंध में बनी कल्पना को ध्वस्त करके स्थाई रूप से अंकित हो जाती है।

वास्तविकता विचित्र इसलिए है क्योंकि वह हमारे कल्पना के बिल्कुल विपरीत होती है । कल्पनाओं में जिन चित्रों को हम बनाते हैं वास्तविकता से सामना होते ही समस्त चित्र अचानक ग़ायब हो जाते हैं और उसके स्थान पर स्पष्ठ वास्तविक चित्रों की छाप बन जाती है।

कोई भी कल्पना को वास्तविकता में ढालने, बदलने का प्रयास कर सकता है पर वास्तविकता को कल्पना में नही बदला जा सकता है। इसलिए वास्तविकता कल्पना से विचित्र होती है ।

- आलोक शर्मा

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दोस्त हैं वो हमारे जो बिन बुलाए चले आयें
क्या बना आज खाने में हक़ जताकर खाएँ

दोस्त है वो हमारे, जो बिन कहे फर्जी में ही हँसाये
कितना भी दुःखी हो मन से आकर तब भी सताएँ

दोस्त हैं वो हमारे जो, बिन बोले छीन ले जायें
खुद हो गर जरूरत एक पैर पे दौड़े चले आएं

दोस्त हैं वो हमारे जो मौक़ा पाते खिल्ली उड़ाए
मायूस हुए जरा से भी गर,तो प्यार बहुत जताएं

दोस्त हैं वो हमारे जो, बिना बात के चर्चा चलायें
कितना भी मना करों बे मतलब बातों में घुस जाएं

रुलाकर हँसाना फिर रुलाना ये कितने कमीने हैं
पल में लड़ाई पल में मेल, न जाने कितने बुने हैं

हम कहें तो चिढ़ जाते पर अपनी कभी न गिने हैं
नाराज़ नही होते , पता नही किस मिट्टी के बने हैं

कर दे गर हालत दर्द ए बयाँ तब भी मजाक बनाये
पहले दे नसीहत ढेरो फिर प्यार से मरहम लगाएं

सच मे जो दोस्त हैं हमारे हर ग़म में साथ निभाएं
हर दिन मिलते रहें ऐसे ही, बस यही दुआ मनाएं

©आलोक शर्मा

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दोस्त वो नही जो आपसे पहले बोले
दोस्त वो हैं जो देखते ही गले लग जाएं

दोस्त वो नही जो दावत दें
दोस्त वो हैं जो आपके घर आयें और
आकर कहें, आज खाने में क्या बना है

दोस्त वो नही जो फोन करके आएं
दोस्त वो हैं जो बिन बतायें चले आएं

दोस्त वो नही जो अपनी टी-शर्ट मांगने पर दें
दोस्त वो हैं जो आपकी टी-शर्ट बिन माँगे लें जाएं

दोस्त वो नही जो जनाजे में आएं
दोस्त वो हैं जो सीधा कब्र पे आयें और
आकर कहें, चल उठ यार इतना क्यों नाराज़ हो
ले अपनी टी- शर्ट
नही चाहिए तेरा एहसान....
तेरे बिन सूना लागे ये जहांन

सच मे दोस्त वो हैं जो दोस्त की जान बन जाएं

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विफलता इंसान से बहुत कुछ कहना चाहती पर शायद हम सफ़लता प्राप्ति की दौड़ में इस क़दर शामिल हैं कि विफलताओं पर ध्यान नही देते और सफ़लता नही प्राप्त कर पाते हैं।
अतः जब हम विफ़ल होते हैं तब विफलता हमसे कुछ कहना चाहती है कि हम कहाँ पर ग़लती कर रहें हैं और साथ मे उसका संक्षिप्त विवरण भी प्रस्तुत करती है ताकि हम पहले से बेहतर कार्य कर सके। आईए पढ़ते हैं की विफलता क्या कहना चाहती है।

विफ़लता कहती है कि भले ही आप मुझे आज कितना भी भला बुरा कहो पर मैं तब तक आपसे रूबरू होती रहूंगी जब तक आप मानसिक, सामाजिक, वा मानवी स्तर पर मजबूत नहीं हो जाते ताकि सफ़लता प्राप्त होने के बाद कभी मुझसे दुबारा रूबरू न होना पड़े।

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