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बनाया था किसी के लिए
फूलों का वो गुलदस्ता
सोंचा था इजहार ए इश्क़ पर देंगे
पर वो दिन आने से पहले ही
फूल मुरझा गए

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बेवजह ही पूछ बैठे हालात ए ज़िंदगी उनकी हमे क्या पता हमारी ही ज़िदगी बर्बाद करने की साज़िश रचे बैठे हैं

- आलोक शर्मा

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साज़िश करना हमे आता नही
यूँ बेवजह दिल तोड़ना भाता नही
काश तुम इत्तफाक से टकरा जाते
साँसों में हवा की तरह समा जाते
न तो ये मंजर होता जुदाई का
और न ही खंजर चुभता रुसवाई का

- आलोक शर्मा

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वो कहते गए बस हम सुनते गए
झूट के सहारे कई बातें बुनते गए
प्यार सच मे था या था बस छलावा
दिल से थी मोहब्बत या था दिखावा
वो धीरे धीरे ज़िंदा होते गए अपनी चाल में
हम धीरे धीरे फँसते गए उनके मोह जाल में
ख़ुद उलझ गए तब अपने ही बनाये जवाब में
रिश्ता डगमगाया जब हुआ उजाला नकाब में

-आलोक शर्मा

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