आलोक मिश्रा मनमौजी व्यंग्य , कहानी लेखक किसी परंपराओं नहीं मानता इसलिए रचनाऐं पारंपरिक श्रेणी में नहीं आती । मेरी रचनाऐं सोचने हेतु मजबूर करती है अधूरी लगती है । सभी अधूरे संवाद के अंतर्गत आती है । मेरी कहानीयाँ परंपरावादी नहीं है । पद्य का परंपरावाद अभिव्यक्ति को पूर्ण प्रवाह में बहने से रोकता है । वास्तव में मै साहित्यकार होने के अभिमान को भी न मानते हुए केवल अभिव्यक्ति करना चाहता हूँ । व्यंग्य प्रिय विधा है जो कहानियों में भी मिलेगा । कभी कभी ही सही परंपरावादियों को खुश करने का प्रयास रहता है

कल इस बज्म में तुम न होगे हम न होंगे ।
आज के चर्चे कल खूब होंगे या न होंगे ।
जिया था इस पल को हमने बस जी भर ।
हमारे यही किस्से तो बस सरेआम होगे  ।

-Alok Mishra

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चीखों,कराहों,अरमानों के एहसास
कहने को कुछ लिखता रहा जरा जरा

-Alok Mishra

फुर्सत है आराम है आज-कल
जमाना छोड़ खुद का ख्याल है आज-कल
कराह कर दम तोड़ रहे हैं लोग
इंसानियत खूंटियो पर टंगी है आज-कल

-Alok Mishra

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मिलने का वादा तो नहीं था ।
बस एक उम्मीद थी इस उम्र की ।
हया थी रोकती रही दोनों को ।
न तुम तोड़ पाए न हम तोड़ पाए ।

-Alok Mishra

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रिश्तों की समझ न तुम में थी न मुझ में ।
महोब्बत की महक न तुम में थी न मुझ में ।
बस दो जिस्म थे मिले और बिछड़ गए
मिलने की ललक न तुम में थी न मुझ में ।

-Alok Mishra

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शहंशाह को बस ताज चाहिए
एक रोटी का सवाल कर लेना।
कहने वाले तो कहते ही रहेंगे
अपने हक में बवाल कर लेना ।

-Alok Mishra

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लड़ने वाले लड़ते ही रहें हैं
सोने का मलाल कर लेना ।
गद्दारी का तगमा चाहिए तो
उनसे एक सवाल कर लेना ।

-Alok Mishra

नफरत की हवाओं मे
दिये प्यार के जलाए रखना।
जिंदगी छोटी है बस
इंसानियत  बनाए  रखना ।
घंटे ,आजान और अरदास
गूंंजते  रहे   समा   में ।
सभी साथ मिल कर रहें ,
सब का सम्मान बनाए रखना ।

-Alok Mishra

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मंदिर  जाऊं  न  मस्जिद  जाऊं ।
मजबूर मजदूर हुं अपने घर जाऊं ।


सड़के पे जाऊ न पटरी पे जाऊं ।
मजबूर मजदूर हुं अपने घर जाऊं।

बाहर मौत का सन्नटा है ।
अंदर भूख का आतंक है ।
मै इधर जाऊं या उधर जाऊं ।

मजबूर मजदूर हुं अपने घर जाऊं।

-Alok Mishra

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