Hey, I am on Matrubharti!

ऐ बादल तू अब जमके बरस |
ऐ बादल तू अब जमके बरस |
खेतो मे है सूखे पड़े हुए l
महीनों से है ये बंजर बने हुए |
सर पर हाथ धरे किशान अब बैठे हुए |
लाचारी से आधे प्राण त्यजे हुए |
न कर अब तू भी सितम
ये है पहले से सताये हुए |
बिन तेरे अब जिये किस के सहारे |
तू ही बतलादे अब जाये तो जाये कहा ये |
बच्चे घर मे भूखे बैठे हुए |
तन पर कपडे आधे ढके हुए |
भूख उनकी भी रोटी को तरसे |
आंखे उनकी भी बादल सी बरसे |
ये बेबसी के नज़ारे , ये बेबसी के नज़ारे |
जरा देख भी ले इस ओर ये सब है तुम्हारे |
ऐ बादल जरा जमके बरस |
ऐ बादल जरा जमके बरस |

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जागो मोहन प्यारे |
पधारो मोरे अंगना नीस दिन सारे |
तेरे बिन अब ना मोरे सांज सबेरे |
प्रीत संग तारे ऐसी लागी |
न मेरे मन को अब कोई भाये |
जागो मोहन प्यारे |
तुज संग खेलु मे मन की होली |
रंग दे तू चाहे मुज नैनन की चोली
प्रीत ऐसी बाँधी तुज संग मोरी
तेरे बिन अब तो ये मोरी काया अधूरी |
जग की सारी माया अधूरी |
जागो मोहन प्यारे |
चितवन मे अब तो तोहरे दर्शन |
मांगू ना अब मे दूजा दर्पन
तू क्यू खेले आँख मिचोली |
मेरे संग खेले क्यू ये ठिठोली |
अब तो नीर बहे अखियन से |
रुके न ये अब बिन तोरे दरस के..
देर न कर अब , बस भी कर |
तू आजा शावले अब प्रीत मुझसे भी थोड़ी कर |
जागो मोहन प्यारे |
जागो मोहन प्यारे |

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मौसम बदल रहा है |
दिलो की दूरिया जैसे मिलो के फासले ,
आसपास हो फ़िरभी जैसे बदलते रास्ते ,
मौसम वाकई बदल रहा है |
जो पेड़ पौधो पर थे हरे सुनहरे पते ,
आज जैसे हो बिखरे बिखरे
डाली डाली थी जैसे हरियाली |
प्रेम की भी अब अधूरी प्याली |
मधुबन जैसे काँटों की चुभन |
दिलो मे जैसे कोई अगन |
बिता जाये युही वक़्त का सफर |
न मिले मंजिल ना बहारे चमन |
मौसम बदल रहा है |
मौसम बदल रहा है |

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आशियाना.. ढूँढू.. कही ओर बसेरा ढूँढू.. l
मे मोती.. हु... सागर मे... लहेरे ढूँढू.. l
न रहु....सदियों तक.. मिट्टी के मानव मे.. l
मे सदा.. नया पिंजर ढूँढू... l
कहते है.. लोग.. रूह मरती नहीं.. l
मुझसे पूछो.. की ये.. क्या.. खाख.. जी रही हु.. l
दरबदर.. भटकती हु.. l
मंजिल मिलती नहीं.. l
फरियाद.. करने. को... अर्जी करू.. l
तो.. कलम साही मिलती नहीं.. l
आशियाना ढूँढू.. कही और बसेरा ढूँढू l

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आशियाना.. ढूँढू.. कही ओर बसेरा ढूँढू.. l
मे मोती.. हु... सागर मे... लहेरे ढूँढू.. l
न रहु....सदियों तक.. मिट्टी के मानव मे.. l
मे सदा.. नया पिंजर ढूँढू... l
कहते है.. लोग.. रूह मरती नहीं.. l
मुझसे पूछो.. की ये.. क्या.. खाख.. जी रही हु.. l
दरबदर.. भटकती हु.. l
मंजिल मिलती नहीं.. l
फरियाद.. करने. को... अर्जी करू.. l
तो.. कलम साही मिलती नहीं.. l
आशियाना ढूँढू.. कही और बसेरा ढूँढू l

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सरहद पर लड़ते लड़ते..
यारों हम कुरबान होगये..
जमीं अपनी बचाने. हम आसमां बन गये..
जलती ज्वाला सिनेमें रखके...
खून की होली खेल गये...
....... सरहद पर लड़ते लड़ते.
. यारों. हम.. कुरबान. होगये.. l
न मुलाक़ात हुई आख़री...दिलअजीजो से..
बनगये.. मुसाफिर .. लम्बे सफर पे निकल गये..
छोटे थे तो.. तारे आसमा मे .. ढूंढ़ते थे..
क्या पता था.. आज उसी आसमां के
चमकते सितारे बनगये... सरहद पर लड़ते.. लड़ते..
छू लिया था.. समुन्दर की लहेरो.. को दूर से..
ये सोचकर.. की.. कही.. डूब गये..
तो .. बहुत गहरे हो जायेंगे.. पर. क्या पता था..
एक दिन.. लड़ते लड़ते. अम्बर तक छू जायेंगे..

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मुसाफिर हो यारों..
"जिंदगी " का..
मज़ा लीजिये...l
शिकवे गीले करके
न.. खुदको.. "दर्द " दीजिये..l
जो हुआ वो "क्यू" हुआ..
जो होरहाहे.. "क्यू " होरहाहे..
.इन छोटी छोटी.. बातोसे..
समय न. "व्यर्थ " कीजिये... l
बिना मर्जी के उनसे .. न डाली डाली..
न पता पता.. हिल पाता है.... l
फिर तू कौन होता है.. l
सबको आजमाने का हुन्नर क्यू रखता है.. l
जो आजमाएगा वो ऊपर बैठा है... l
बैठे बैठे सबकी खबर रखता है.l
मुसाफिर हो यारों..
.."जिंदगी " का
मज़ा लीजिये.. l

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अहेसास.. बड़ा पास होता है.. l
जीने को ये बहुत.. खास होता है.. l
ये एक ही . ऐसा.. अनुभव है. जो... l
हरवक़्त.. दिल का अज़ीज़ होता है.. l
गुजर जाये... लम्हे... जिंदगी के.
बहुत ऐसे.. जो मुड़कर न आ पाएंगे..
लेजायेगा तब.. ये मुड़के उन्ही लम्हो मे..
ये..थोड़ासा नटखट.. ओर.. थोड़ासा नादान होता है.. l
कोई.. कहता है.. गुण जैसा मीठा होताहे.. l
कोई कहता है... ये..नमकीन होता है..
जैसा भी होता है.. अपने आप मे
बड़ा लजीज होता है.. l

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बड़ा बेरहम है.. ये काम नकाब का.. l
चहेरे पे किसी और का होता है.. l
धोखा किसी और को होता है.. l
सिकंद भी नही आती उनसे.. ..l
तमाशा किसी ओर का होजाता है.. l
खुबिया.. बखूबियो.. से भरा ये आलम.. l
वफा.. बेवफा. के.. मायने अकसर भूल जाताहे.. l
न.. रँग.. बदलता है.. न ठंग बदलता है..
जब भी बदलता है.. चहेरे पे चहेरा.. बदलता है.. l

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मे तो दौड़ता ही रहूँगा.. l
मे तो भागता ही रहूँगा . l
करनेको.. हासिल.. जहाँ......
समय से पहले निकल ने को
बड़ी.. बखूबी.. समय चुराऊँगा.. l
होती है.. छोटी छोटी खुशियाँ भी कुरबान... l
रिश्ते का तो यहाँ.. होजाता है बलिदान..
.... तो क्या हुआ.अगर ना . मिले ये साथ सुहाना
मे तो दौड़ता ही रहूँगा.. l
.मे तो भागता ही रहूँगा... l
न सुबह की पहोर देखी..
न सूरज की लाली देखी..
न बच्चे की.. किलकारियां देखी...
तो क्या हुआ..न . दोस्तों की यारी देखी....
.मे तो दौड़ता ही रहूँगा..l
मे तो भागता ही रहूँगा l
सांज ढले.. पिपल तले..
न चहल पहल.. दोस्ती की.. l
न शाम मस्ती की.... l
बड़ी बुरी हालत होरही है.. मेरी बस्ती की.. l
तो क्या हुआ अगर ना.. मिले.. ये..., ये.. तो सब है बड़ी मुफ्त सी.. l
मे तो दौड़ता ही रहूँगा.. l
मे तो भागता ही रहूँगा.. l

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