मैं नौकरीपेशा होने के साथ-साथ लेखक भी हूँ | आप मेरे लेख, कहानी और उपन्यास Google, Amazon और mankiudan.in पर भी पढ़ सकते हैं |

‘मैं’ खोजन जो मैं चला,
न मैं रहा न मेरी ‘मैं’ रही |

योग सूत्र -१

झूठ का सच से आगे बढ़ते हैं |

दोस्तों, अभी तक हमने अपने मन के खेल देखे हैं | अब बात करते हैं कि यह सब क्यों हो रहा है | मन क्यों खेलता है और आध्यात्म क्यों कहता है कि बुरे का फल बुरा और अच्छे का फल अच्छा ही मिलेगा | कोई तो कारण होगा | आज उस कारण को खोजते हैं |
आज का विज्ञान कहता है कि “Newton's first law states that every object will remain at rest or in uniform motion in a straight line unless compelled to change its state by the action of an external force. ... The third law states that for every action (force) in nature there is an equal and opposite reaction.” अब अगर इसे गीता में कहा गया कर्म-योग से मिलान करें तो उसमें कहाँ गलत कहा गया था | अब हम यदि फिजिक्स के circular motion के सिद्धांत को लें तो वह कहता है कि circular motion is a movement of an object along the circumference of a circle or rotation along a circular path. It can be uniform, with constant angular rate of rotation and constant speed, or non-uniform with a changing rate of rotation. The rotation around a fixed axis of a three-dimensional body involves circular motion of its parts. The equations of motion describe the movement of the centre of mass of a body. यानी जो भी हम करेंगे कुछ समय बाद हमारे पास वापिस आएगा | अब आप ही बताइए कि आध्यात्म की सोच और खोज कहाँ गलत थी |
बीज से पौधा, पौधे से पेड़, पेड़ से फल और फिर फल से बीज बनता है ये आज का विज्ञान भी कहता है और आध्यात्म भी कहता है | सब वापिस आता है | प्रकृति, ईश्वर के दूत का सबसे बड़ा उदाहरण है | जंगल इसी circular motion के सिद्धांत पर बढ़ते जाते हैं जब तक कि हम उसे बर्बाद नहीं करते | अगर यह सब प्रकृति कर रही है तो इस धरती पर रहते हुए हम भी तो प्रकृति के अनुसार ही चलेंगे या चलना पड़ेगा | और अगर ये हो रहा है तो हमारी अच्छी सोच, अच्छे कर्म वापिस क्यों नहीं आएंगे और उनका फल अच्छा क्यों नहीं मिलेगा | इसी के मद्देनजर आध्यात्म में कहा गया है कि ईश्वर का अंश आत्मा रूप में हम सब में विद्यमान रहता है | इसका अर्थ है कि हम ईश्वर के अंश के साथ जन्म लेते हैं और वापिस वह अंश ईश्वर में जाकर मिल जाता है | ये भी तो circular motion है | कहाँ कुछ भी गलत कहा गया है | आज का विज्ञान भी अब यह कहने को मजबूर है कि एक God Particle है जिस से सब कुछ बना है सब उस में खो जाता है | यही सब आकाश में भी हो रहा है | सैकड़ो ग्रह, आकाश गंगा जन्म ले रही हैं और खो रही हैं |

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राज भाग – १

अंकुर अपने दादा-दादी को ढूंडते हुए मुम्बई से दिल्ली पहुँचता है | उसके पास दिल्ली का एड्रेस था | लेकिन उसे यहाँ पड़ोसी से पता लगता है कि उसके दादा रिटायरमेंट के बाद हिमाचल में अपने पैतृक घर नालागढ़ में रहने चले गये हैं |
वह अपने दादा-दादी से मिलने नालागढ़ के लिए चल देता है | वह अपने दादा-दादी से पहली बार मिल रहा था | इसके बावजूद उसके दादा-दादी उसे पहचान जाते हैं |

राज भाग – २

जोकि आज १६/५/२०२० को प्रकाशित हो रहा है | इस भाग में आपको पता चलेगा कि उसके दादा-दादी उसे कैसे और क्यों पहचान जाते हैं | अंकुर अकेला अपने दादा-दादी को क्यों ढूंड रहा था | वह क्या राज था जो उसके दादा-दादी एक दूसरे से छुपा रहे थे | ऐसे कई प्रश्नों का हल आपको इस अगले भाग में मिलेगा | यह बहुत ही मार्मिक भाग है | आप सब पढ़ियेगा ज़रूर | धन्यवाद |

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झूठ का सच ? भाग – 7

आपका मन कैसे खेलता है आइये इसे समझते हैं | मान लीजिए कि आप पार्क में चक्कर लगा रहे हैं | अचानक आपको रास्ते के बीचो-बीच एक गड्ढा दिखता है | जब आप वहाँ पहुँचते है तो आपका मन करता है कि इसे छलांग लगा कर पार कर लेते हैं | फिर एक आवाज आती है कि नहीं इसके साइड से निकल जाते हैं | आप मन की बात मान कर यह निश्चय करते हैं कि कूद कर देखते हैं | और जैसे ही आप कूदने लगते हैं तभी आपका मस्तिष्क आपको विश्लेष्ण करके देता है कि आपने आज तक इतने बड़े गड्ढे को कभी कूद कर पार नहीं किया है | यह आपके बस से बाहर है | फिर भी आपका मन आपको एक कोशिश करने को उकसाता है | आप मन की मान कर कूदने की सोचते ही हैं कि आपके अंदर से एक बार फिर आवाज आती है कि यदि आप कूद कर पार नहीं हो पाए तो बिना बात के चोट लग जायेगी | ऐसी बेवकूफी नहीं करनी चाहिए | आपको यह बात ठीक लगती है और आप गड्ढे की साइड से निकल जाते हैं | आपका मस्तिष्क आपको शाबाशी देता है लेकिन आपका मन बार-बार आपको पीछे मुड़ कर देखने को कहता है और आप देखते भी हैं | आगे आने के बावजूद भी आपका मन आपको भड़काता रहता है कि कूद कर देखने में क्या जाता था | कोई ख़ास चोट नहीं लगती | यह जद्दोजहद इसलिए आपके अंदर चल रही थी क्योंकि आपने मन की नहीं मानी | खैर, एक और आवाज आपके अंदर से आई थी जिसे आपने माना और आपके मस्तिष्क ने भी उसे सही ठहराया | वह कहाँ से आई, दोस्तों, यह आवाज आपकी आत्मा की थी | अगर आपके मस्तिष्क और शरीर पर आपके मन का पूरा कब्ज़ा नहीं है तो आपकी आत्मा आपको समय-समय पर सही राह दिखाती रहती है |
आध्यात्म कहता है कि ऐसा सिर्फ ख्वाब में ही हो सकता है कि अच्छा रहे और बुरा खत्म हो जाए | सूर्य की रौशनी की जरूरत तभी है जब रात और अँधेरा होता है | आध्यात्म कहता है कि अच्छे का फल अच्छा मिलेगा और बुरे का फल बुरा मिलेगा | लेकिन इसे तार्किक रूप से पेश नहीं किया गया है | यही वजह है कि आज की पीढ़ी हम से यह सवाल बार-बार करती है कि कहाँ और कब अच्छे का फल अच्छा मिलेगा या मिलता है | चारों तरफ तो बुरा करने वाले हैं और सब फल-फूल रहे हैं | इस में कोई शक की बात नहीं है कि आज ऐसा लगता जरूर है लेकिन है नहीं | गीता में भी कहा गया और रामायण में भी | लेकिन आज की पीढ़ी कहाँ मानती हैं इन बातों को | क्योंकि हम सिर्फ कही गई बातों को दोहरा रहे हैं | उसे साबित कर या उसे आज के माहौल में ढाल कर युवा पीढ़ी को नहीं बता पा रहे हैं |

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झूठ का सच ? भाग – 6

दोस्तों, हमें मुश्किलें सब बताते हैं लेकिन हल कोई नहीं बताता है | पहले दूसरे शासकों ने हमें आगे बढ़ने नहीं दिया | हमारे ज्ञान और ध्यान को विकसित नहीं होने दिया और आज धर्म, धार्मिक कर्म-काण्डी, कथा-वाचक, ध्यान और ज्ञान पर भाषण देने वाले हमें आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं | यह किसी एक धर्म में नहीं, सब धर्मों में हो रहा है |
दोस्तों, जैसा पहले भी कहा गया है कि हमारी आज की स्थिति का जिम्मेदार हमारा मन है | असल में तो हम मन को भी दोषी नहीं ठहरा सकते क्योंकि मन की तो फितरत ही ऐसी है | जिम्मेदार तो असल में हम हैं कि हम आत्मा की आवाज सुनने की बजाय मन की सुन रहे हैं | जिस प्रकार अग्नि का धर्म है जलाना उसी प्रकार मन का धर्म है भटकन देना | आज इन विषम परिस्थितियों के बावजूद भी एक बात सबसे अच्छी है कि युवा, आधुनिक, अत्याधुनिक, भिखारी. सम्पन्न या पूर्ण सम्पन्न सब में ईश्वर के प्रति आस्था और विश्वास दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है | अगर आस्था बढ़ रही है तो फिर आप इसे कलयुग कैसे कह सकते हैं | इस समय लोगों की आस्था तो सतयुग की आस्था से भी ज्यादा है | कमी सिर्फ एक ही है कि ये आस्था दिशाहीन है | और इसे दिशाहीन हमारे तथाकथित धर्मगुरुओं ने बनाया है | उन्हें भी मालूम है कि जिस दिन जनसाधारण को दिशा मिल गई उस दिन उनकी दूकान सदा के लिए बंद हो जायेगी |
दोस्तों, चिकित्सा विज्ञान मानता है कि हमारे शरीर में मस्तिष्क है और मस्तिष्क से ही हमें सारे आदेश मिलते हैं | मस्तिष्क कभी भी खाली नहीं बैठता है | उस में हर समय विचार पनपते ही रहते हैं | एक दिन में लगभग पचास से साठ हजार विचार उठते हैं | हम सोच या विचार को कभी भी किसी भी हालत में रोक नहीं सकते | हाँ, उसे दिशा अवश्य दे सकते हैं | चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मन या आत्मा की कोई जगह शरीर में नहीं है | असल में वह सही कहता है | आध्यात्म के अनुसार विचार के पुंज या ढेर को ही मन या दिल कहते हैं | और जिस शक्ति से शरीर चलता है वह आत्मा है | मस्तिष्क में विचार भी पनपते रहते हैं और साथ ही साथ उनका विशलेषण भी होता रहता है | मन यानी दिल में पुराने नए अनुभव विश्लेषण हर समय होता रहता है | सब आपके मन का खेल है | तभी तो आध्यात्म कहता है कि अपने मन को साधो | सब सांसारिक दुःख और सुख असल में आपके मन के बनाये हुए हैं | इसे ही माया का नाम दिया गया है | ये माया-मोह मन का बनाया हुआ है |

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झूठ का सच ? भाग – 6

दोस्तों, हमें मुश्किलें सब बताते हैं लेकिन हल कोई नहीं बताता है | पहले दूसरे शासकों ने हमें आगे बढ़ने नहीं दिया | हमारे ज्ञान और ध्यान को विकसित नहीं होने दिया और आज धर्म, धार्मिक कर्म-काण्डी, कथा-वाचक, ध्यान और ज्ञान पर भाषण देने वाले हमें आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं | यह किसी एक धर्म में नहीं, सब धर्मों में हो रहा है |
दोस्तों, जैसा पहले भी कहा गया है कि हमारी आज की स्थिति का जिम्मेदार हमारा मन है | असल में तो हम मन को भी दोषी नहीं ठहरा सकते क्योंकि मन की तो फितरत ही ऐसी है | जिम्मेदार तो असल में हम हैं कि हम आत्मा की आवाज सुनने की बजाय मन की सुन रहे हैं | जिस प्रकार अग्नि का धर्म है जलाना उसी प्रकार मन का धर्म है भटकन देना | आज इन विषम परिस्थितियों के बावजूद भी एक बात सबसे अच्छी है कि युवा, आधुनिक, अत्याधुनिक, भिखारी. सम्पन्न या पूर्ण सम्पन्न सब में ईश्वर के प्रति आस्था और विश्वास दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है | अगर आस्था बढ़ रही है तो फिर आप इसे कलयुग कैसे कह सकते हैं | इस समय लोगों की आस्था तो सतयुग की आस्था से भी ज्यादा है | कमी सिर्फ एक ही है कि ये आस्था दिशाहीन है | और इसे दिशाहीन हमारे तथाकथित धर्मगुरुओं ने बनाया है | उन्हें भी मालूम है कि जिस दिन जनसाधारण को दिशा मिल गई उस दिन उनकी दूकान सदा के लिए बंद हो जायेगी |
दोस्तों, चिकित्सा विज्ञान मानता है कि हमारे शरीर में मस्तिष्क है और मस्तिष्क से ही हमें सारे आदेश मिलते हैं | मस्तिष्क कभी भी खाली नहीं बैठता है | उस में हर समय विचार पनपते ही रहते हैं | एक दिन में लगभग पचास से साठ हजार विचार उठते हैं | हम सोच या विचार को कभी भी किसी भी हालत में रोक नहीं सकते | हाँ, उसे दिशा अवश्य दे सकते हैं | चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मन या आत्मा की कोई जगह शरीर में नहीं है | असल में वह सही कहता है | आध्यात्म के अनुसार विचार के पुंज या ढेर को ही मन या दिल कहते हैं | और जिस शक्ति से शरीर चलता है वह आत्मा है | मस्तिष्क में विचार भी पनपते रहते हैं और साथ ही साथ उनका विशलेषण भी होता रहता है | मन यानी दिल में पुराने नए अनुभव विश्लेषण हर समय होता रहता है | सब आपके मन का खेल है | तभी तो आध्यात्म कहता है कि अपने मन को साधो | सब सांसारिक दुःख और सुख असल में आपके मन के बनाये हुए हैं | इसे ही माया का नाम दिया गया है | ये माया-मोह मन का बनाया हुआ है |

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झूठ का सच ? भाग – 5

मन को कैसे काबू किया जाए इसके बारे में हजारों साल पहले आध्यात्म ने बता दिया था लेकिन हमने इस पर कभी गौर ही नहीं किया | और अब हजारों साल के बाद हम एक ऐसे मुकाम पर आ खड़े हुए हैं जहाँ चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ झूठ ही झूठ है |
मन की उड़ान अनंत है | हमें मन की इस अनंत और अंधी दौड़ को दिशा देनी है | क्योंकि मन की दौड़ को रोक नहीं सकते सिर्फ दिशा ही दे सकते हैं और दिशा मिलते ही सब अपने-आप ठीक होना शुरू हो जाएगा |
आज पूरा विश्व महामारी का सामना इसीलिए कर रहा है क्योंकि हम देश, प्रदेश, मजहब, अमीर, गरीब, आधुनिक, अत्याधुनिक में बंटते चले जा रहे थे | प्रकृति के एक झटके ने सब को नजदीक लाना शुरू कर दिया है | अभी शरीरिक रूप से न सही लेकिन मानसिक रूप से जुड़ने लगे हैं | एक दूसरे से मदद माँगने और देने को तत्पर दिख रहे हैं | 2020 की ये घटना, आगे आने वाले समय का बीज है | सब कुछ सामान्य होते-होते यह बीज फूट पौधे में परिवर्तित होगा और पूरे विश्व को एक दिशा देगा कि वह एक बार फिर अपनी पुरानी धरोहरों की ओर वापसी करे | आगे आने वाले समय में धर्म खत्म होंगे और इंसानियत एक बार फिर से जन्म लेगी |
अभी चिकित्सा विज्ञान के सामने एक चुनौती आई है | लेकिन यह चुनौती ईशारा कर रही है कि जल्द ही विज्ञान के सामने भी चुनौती आने वाली है | उस चुनौती से सम्पूर्ण मानव जाति को अंततः यह समझ आ जाएगा कि पूर्णता और सम्पन्नता शारीरिक और मानसिक है | इसके इलावा सब शनिक है |

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झूठ का सच ? भाग – 4

दोस्तों, इस से पहले के भाग में कहीं सब बातों का हमारे झूठ बोलने से सीधे रूप में कोई लेना-देना नहीं है | लेकिन झूठ बोलने में वे सब सहायक अवश्य हैं | अब बात करते हैं कि असल कारण क्या है ?
असल कारण है हमारा मन - आइये, समझते हैं कि कैसे हमारा मन इसके लिए जिम्मेदार है |
दोस्तों, अंग्रेजो के राज से पहले भारत पर लगभग 700 से 800 साल के करीब मुग़ल साम्राज्य रहा (उत्तर भारत में 971 ई. में गजनी के महमूद से आगे का समय लिया गया है) | अगर कुल मिला कर कहें तो पूरे भारत पर आजाद होने से पहले लगभग एक हजार साल से भी ज्यादा समय दूसरों ने राज किया है | यह भी एक कारण है कि हम आजादी से पहले के तीन-चार सौ साल तो बहुत डर-डर कर रहे हैं | इस समय में हमारी सोच और कर्म पर दूसरी हकूमतों का बहुत दबाव पड़ा है | हमारे धर्मों ने हमें और डराया है क्योंकि उन्हें डर था कि हम लोग अपना धर्म छोड़ दूसरा धर्म न अपना लें | उसी दबाव के कारण आज हम आजादी का नाजायज फायदा उठा रहे हैं | हमने जितना समय घुट-घुट कर बिताया है अब उतना समय हम आजाद पंछी की तरह बिताना चाहते हैं | देश, प्रदेश, परिवार की रोकटोक ने एकल परिवार को जन्म दिया | अगर उस समय ज्यादा रोकटोक न लगाई जाती तो आज हम जो पागलपन देख रहे हैं वह न होता | यह इंसानी फितरत है कि हम बहुत जल्दी अपनी सीमाएँ भूल जाते हैं |
दोस्तों, मानसिक और शारीरिक स्वतंत्रता की ओर बेतहाशा भागते-भागते हमारे मन ने हमारे मस्तिष्क पर कब्जा कर लिया है | यह विदेशों में पहले ही था | अब हम विदेशी हो कर न देशी रहे और न विदेशी |
हमारे दिमाग ने अब वैसा ही सोचना शुरू कर दिया है जैसा हमारा मन कहता है | और मन हमेशा नया चाहता है | सच एक-सा है और सच हमेशा सच है और रहेगा | उसमें कोई नयापन नहीं है और मन से कब्जाए हम नया चाहते हैं | हर बार नया और आकर्षित सिर्फ और सिर्फ झूठ ही हो सकता है | झूठ को अनंत तरीकों से पेश किया जा सकता है और वह हर बार नया और आकर्षक ही लगेगा |
अब पीछे मुड़ कर देखिये आप क्या-क्या करते, चाहते या सोचते हैं : जैसे पत्नी, पति से या पति, पत्नी से पूछता है कि क्या मैं मोटी दिखती हूँ या अभी भी मैं आकर्षक दिखता हूँ तो इसका सीधा-सीधा मतलब है कि वह पूछने वाला पूरी तरह से जानता और मानता है कि वह क्या है लेकिन झूठ सुनना चाहता है और झूठी नजर से अपने को देखना चाहता है | ऐसे हजारों उदाहरण हैं | ये क्या है ? ये झूठ ही तो है | आप मन के प्रभाव में आ कर झूठ अढोना चाहते हैं |

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झूठ का सच ? भाग – 3

दोस्तों, हम जैसे-जैसे हम तरक्की करते जा रहे हैं वैसे-वैसे हम अकेले होते जा रहे हैं | पहले पूरा देश, हमारा अपना होता था | वक्त बदला, प्रदेश अपना होने लगा, फिर गाँव | और वक्त बदला, हमारा परिवार अपना होने लगा | यहाँ ‘अपने से’ मतलब है जिसके लिए जान भी दी जा सकती है | फिर वक्त और तरक्की के साथ-साथ, हम अपने बड़े परिवार से अलग हो एकल परिवार में रहने लगे | एकल परिवार में रहने की कई बार मजबूरी भी होती थी लेकिन ज्यादात्तर तो इच्छा होती थी | अब तो ये आलम हो गया है कि चारों तरफ एकल परिवार ही दिखते हैं |
अब हम एकल परिवार होने के कारण ऊबने लगे हैं | ऐसा आपने सुना भी होगा और खुद बोला भी होगा कि बहुत दिन हो गये हैं इस चक्की में पिसते हुए | अब जब भी तीन-चार दिन की छुट्टियाँ होंगी या समय मिलेगा तो कहीं बाहर घूमने चलेंगे या शाम को फिल्म देखने चलते हैं या शाम को पार्टी करते हैं | शहरों में तो अब ये एक रिवाज-सा बनता जा रहा है कि शनिवार और रविवार बाहर मौज-मस्ती में गुजारना ही है | बहुत लोग शाम क्लब में गुजारने लगे हैं | पार्टी, किट्टी-पार्टी एक आम बात हो गई है |
इन सबके साथ-साथ एक और परिवर्तन आ रहा है कि एकल परिवार में रहने वाले लोग किसी छोटी या बड़ी सोसाइटी में मकान लेने की सोच रहे हैं या रहने लगे हैं ताकि परिवार सेफ रहे |
दोस्तों, ऊपर लिखे तीनों points को दुबारा-तिबारा पढ़िए | आपको इन में कुछ बातें कॉमन मिलेंगी |
इन में एक बात कॉमन है कि हम पहले सबका सोचते और करते थे लेकिन अब सिर्फ अपने परिवार और बच्चों का ही सोचने लगे हैं | वैसे तो अब हम धीरे-धीरे और भी भयावह स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं | अब एकल परिवार में भी पति-पत्नी, भाई-बहन या भाई-भाई या बहन-बहन का आपस में मुकाबला शुरू हो गया है | ये सब शुरू होने का मतलब है कि कुछ वर्ष बाद एकल परिवार प्रथा भी खत्म होने की कगार पर पहुँच जाएगी | यह सब बहुत बुरा हो रहा है | गाँव में रहने वाले ये मत सोचें कि ये सब शहर में हो सकता है गाँव में नहीं | शहर में रहने वाले ये मत सोचें कि ये हमारे परिवार में नहीं हो सकता | दोस्तों, ये सब सोचते-सोचते ही हम यहाँ पहुँचे हैं |
एक और बात भी कॉमन है कि हम अपने बड़े परिवार को छोड़ने के बाद भी उसे भूले नहीं हैं | कुछ समय के लिए जरूर अलग हुए थे लेकिन अब पिछले पन्द्रह-बीस साल से फिर उसी ओर बढ़ने लगे हैं | हम ताऊ-चाचा को छोड़ ऑफिस या पार्टी में बने नए दोस्तों में खोने लगे हैं | हम अपने बड़े परिवार को छोड़ सोसाइटी में घर लेकर रहने लगे हैं या सोच रहे हैं | हम शनिक मौज-मस्ती के आदि होते जा रहे हैं |

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झूठ का सच ? – भाग – 2

दोस्तों, हमें नैतिक शिक्षा के नाम पर कहानियाँ सुनाई जाती हैं | दूसरे लोगों के उदाहरण दिए जाते हैं | बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं : “हमें सच बोलना है तो बस बोलना है | हमें इसकी आदत डालनी है | किसी एक से शुरुआत होती है तो तुम ही क्यों नहीं कर सकते | देखना, धीरे-धीरे आपके आस-पास सब को आदत पड़नी शुरू हो जाएगी” | ऐसी बातें सुनते हुए आप सब, मन ही मन ये सोचते हो कि हमें भाषण दे रहा है | पहली शुरुआत अपने से क्यों नहीं करता | लेकिन आप बोल नहीं पाते हैं | मन मसोस कर रह जाते हैं |
आपकी पत्नी आप से पूछती है कि ‘क्या ? मैं मोटी हो गई हूँ’, ऐसा पूछने पर आप असमंजस में पड़ जाते हैं | आप जानते हैं कि अगर आपने सच बोला तो कुछ दिन जीना हराम हो जाएगा | सोच-विचार कर आप इस फैसले पर पहुँचते हैं कि ये झूठ सुनना चाहती है तो अब मैं क्या कर सकता हूँ | मुझे झूठ ही परोस कर देना पड़ेगा और ये विचार आते ही आप झूठ का सहारा ले मोटी पत्नी को भी पतला बता देते हैं | ऐसा माँ-बाप, बहन-भाई, ऑफिस और दोस्तों के बीच लगभग रोज होता है और आपको मजबूरन झूठ का सहारा लेना पड़ता है | कुछ जगह आप चैन से रहने के लिए, कुछ जगह रिश्ते बनाये रखने के लिए तो कुछ जगह भविष्य के लिए झूठ पर झूठ बोलते ही चले जा रहे हैं | ऐसा नहीं है कि आपको इस झूठ की जरूरत नहीं होती | आपको भी इस झूठ की जरूरत पड़ती है | और दूसरे लोग भी आपको झूठ परोस कर देते हैं | कुल मिला कर हर किसी को सिर्फ और सिर्फ झूठ ही चाहिए | कोई सच नहीं सुनना चाहता और इसके बावजूद भी आप हर कोई एक दूसरे को यही बोलते मिल जाएगा कि मैं न झूठ बोलता हूँ और न झूठ सुनता हूँ | दूसरे का झूठ पकड़ कर आप बहुत बड़े-बड़े भाषण देते हैं लेकिन कभी अपने गिरेबान में झाँक कर नहीं देखते हैं कि आप भी हर पल झूठ का सहारा लेते हैं | यानि हम सब ठीकरा दूसरों पर फोड़ते हैं |
दोस्तों, अब बात करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और क्यों झूठ बढ़ता ही जा रहा है | पिछले साठ-सत्तर साल में हमने जितनी तरक्की की है उतनी ही झूठ बोलने में भी की है | ऐसा क्यों हो रहा है इसे बताने से पहले मैं आपका ध्यान एक और बात की ओर ले जाना चाहता हूँ | ताकि आप बेहतर ढ़ंग से समझ पायें और इस झूठ को हम सब एक साथ मिल कर अपनी जिन्दगी से सदा के लिए हटा दें | इस में कोई शक नहीं कि ऐसा करने में हमें समय अवश्य लगेगा लेकिन यह निश्चित है कि इस झूठ का प्रभाव हमारी जिन्दगी से हटना जरूर शुरू हो जाएगा |

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