I teach in a College in Himachal Pradesh. Writing stories ,poems and other articles is my passion and hobby.I have self published one of my collection of poems few years back and now after coming in touch with matrubharti i would like to publish my next collection through matrubharti..I love to participate in the competitions of matrubharti.Its a very good platform for the new writers and for those whose writings are lying unpublished.

वो कृश काया और बरगद सी छाया ,
खोकर उसको मैंने कुछ भी ना पाया,
वो सदा रहता संग मेरे, जो इक साया,
गुम हो गया इक सुबह,फिर ना आया।

वो संभालता मेरी बचपन की गुड़िया,
बनाता वो मेरे सब खेलों की पुड़िया,
साथ साथ मेरे उड़ाता इक चिड़िया,
वो था तो बचपन था कितना बढ़िया।

वो मेरे मेलों ठेलों का पक्का साथी ,
मिलकर देखा हमने सर्कस का हाथी,
न मेरा इक बेटा ,ना ही उसका नाती,
सब खेल खिलौनों के हम दो ही साथी ।

वो बनाता रोज दो प्याली कड़क चाय,
मांगता फिर वो चाय पर मेरी नेक राय,
क्या कहती कि ये अमृत का है प्याला ,
पितृस्नेह जिसमें तुमने है पूरा डाला ।

वो जिसपर जीवन का आधार बनाया ,
उसको मैंने खुद ही उस पार पहुंचाया,
दूर हुआ मुझसे मेरा वो इक सरमाया
एक बार भी उसने मुझको नहीं बुलाया।

गोद में जिसकी झूला मेरा बचपन ,
भूला नहीं मुझे वो इक पल, इक क्षण,
कहां गया वो तोड़ के सब ये बंधन,
सुनता है क्या वो,जो पुकारे मेरा मन ।

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मुझे प्यार मिला कई कई बार,
पूछे मुझसे उसने सवाल हजार,
मन में उठाए उसने कई विचार,
कुछ अच्छे कुछ निरे बेकार।

मुझे प्यार मिला कई कई बार,
रंग अलग ,अलग रूप ,आकार,
कभी हंसाए,कभी रुलाए अपार,
कुछ नासमझ,कुछ समझदार।

मुझे प्यार मिला कई कई बार,
बूंद-बूंद अमृत,बूंद बूंद विषाक्त,
कभी समझाए,कभी भरमाए
कुछ भोला,कुछ चतुर चालाक।

मुझे प्यार मिला कई कई बार,
कभी उंगली ,कभी थामे हाथ,
बिन बोले जाने मन की बात,
कुछ मुंह फट,कुछ मूक प्यार ।

मुझसे खोया प्यार कई बार,
जाना मैंने उसे खोने के बाद,
वो था हंसने ,रोने का साथ,
कुछ अपने कुछ सपने सा प्यार ।

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बचपन में छोटी लाड़ली ,
मां के साथ सोती,
मां के साथ जागती ,
मां की बात कभी न टालती।
छोटी सी लाडली
मां के संग दौड़ती
मां संग भागती,
मां को ही वो बस जानती।
बचपन की लाडली
थोड़ी सी बावली
मां सी सांवली
मां को ही जग मानती।
छोटी सी लाडली
हुई बहुत बड़ी ,
रही छोटी बावली,
मां सी सलोनी,मां सी सांवली
मां को ही सखी मानती।
भोली सी लाडली
सपने न पालती,
मां के मन को पढ़कर
मां के संग चलकर
मां के सपने को जानती।
जंगली सी लाडली
अस्त व्यस्त सी लाडली
श्रृंगार से अंजानी
न करती मनमानी,
बाल भी उसके मां ही संवारती।
मां की लाडली
घर से निकलकर
बन कर ,संवरकर
पंखों को अपने फैलाकर
उड़ना न जानती,
मां को ही अंबर मानती।
अल्हड़ मस्त लाडली
मां संग रुकी,संग चली,
मां उसको लगती भली,
न फूल बनी ,रही कली,
मुरझाने से पहले लाडली
मां की छोटी लाडली।


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He came in my early life
Those carefree and lovely days
His smile and caring ways.
All came in my early life

I grew a little day by day
Those happy and growing days
All by my side ,he used to stay
All was so well each passing day

I stepped slowly out of those days
A new beginning and new Rays
And changed all my ways..

I smiled with him,cried with him,
A new feeling came all the way
Those were so exciting days
We laughed heartily throughout the day

Life rolled on its way,they say
Some rain ,some sunshine.a Ray
Those were so zig zag days

I held his hand .down the way
There was not a word to Say..
Those were so tough days
We solved together LIFE'S MAZE..

I ...a kid,a girl,a woman.. they say
HE ...a father ,a friend, a life partner..to say
It was simply LOVE I say

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#Moral stories

It was a cool summer morning .Amy had just returned from college.
"Amy come here ,see I have bought a new suit for your farewell party.You will look a real princess in this dress",Amy's mother was more excited than Amy for her party.
"I will see it later mummy,please don't disturb me.",Amy replied little rudely.

Amy was busy chatting with her friend on phone and it seemed to her that her mother is disturbing her.

Actually Amy was in love with a person who was hardly interested in her.So Amy was always busy thinking of how to impress him.
Months and years passed by and Amy did not pay a heed to her mother's words of wisdom.She was so engrossed in her so called platonic love that she couldn't see the years fly by and one day when she started thinking of getting settled in life,she found noneby her side.
Now It was only her mother who could help her come out of that shock.
"Amy,don't worry ,to err is human ",but you can always start fresh.
Amy's siblings and friends had left her long back and now Amy was unable to gather strength to mend the relations..
Amy was so depressed that now even her mother's friendly advice couldn't help her.Though Amy had realised her mistake but it was too late .
Years passed by and the guilt killed Amy's enthusiasm for life.
Moral Parents are our true guides and friends


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Dear Mummy ,
I cant tell you in words how much i love you.In the last forty seven years of our togetherness,despite all odds , ups and downs I have found my best friend in you , i am so happy that you have also found a friend in me.Right from my teenage to adulthood and then the age of forties ,i have looked upto you as an APARAJITA MAA and the way you have developed the bonds of love around me in various ways,i have started admiring you.Love you maa for giving me didi your true copy of strength.

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ना चाहूँ
तू मुस्कान मीठी बन आता है
बैठ मेरे इन अधरों पर ,
ना चाहूँ मैं तो भी तू
स्मित रेखा सा खिंच जाता है |
तू आंसू खारे बन आता है
सूनी सी आँखों से झरकर ,
ना चाहूँ मैं तो भी तू
हर पीड़ा को हर लेजाता है |
तू भाव कोमल बन आता है
जीवन के कोरे कागज़ पर ,
ना चाहूँ मैं तो भी तू
गीत मधुर लिख जाता है |
तू डोर प्रेम की बन आता है
झीनी सी जीवन चादर को,
ना चाहूँ मैं तो भी तू
जाने क्यों सी जाता है |
तू श्वास स्वतः बन आता है
निष्प्राण सी काया को मेरी ,
ना चाहूँ मैं तो भी तू
प्राणों को स्पंदन से भर जाता है
तू विश्वास अडिग बन कर आता है
पत्थर सी इस माया नगरी में ,
ना चाहूँ मैं तो भी तू
घर को मेरे मंदिर कर जाता है |
तू प्रकाश निर्मल बन कर आता है
अंधियारे से मन में मेरे ,
ना चाहूँ मैं तू भी तू
विश्वास दीप रख ही जाता है |
तू सुख दुःख मेरे सुन जाता है
उलझे से इस जीवन ताने बाने को ,
ना चाहूँ मैं तो भी तू
सुलझा कर बुन जाता है |

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कब चाहा ...
चाह नही भाग्य से ऐसा लेख ,
वसुदेव सा हो मेरा वंश नेक
वासुदेव तुम हो,मेरे अंश एक'
और आह्लादित होऊं ,तुम्हे देख।
बस तकती हूँ राह तुम्हारी ,
बंदीगृह सी आस लिए '
खुल जाएंगे बंधन तब,
आओगे जब तुम पास प्रिय ।

नंदबाबा सा हो आँगन मेरा ,
और तुम उसमे पलने आओ,
कब चाहा मैंने ,शिशु लीला
से अपनी मन को मेरे छल के जाओ ।
बस तकती हूँ राह तुम्हारी ,
वन मयूर सी आस लिए ,
आओगे तुम गईया के संग ,
होता है ऐसा आभास प्रिय ।

कब चाहा यशोदा बन
लोरी मैं भी गए पाती,
मेरे आँचल की छाँव तुम्हें
सबसे ज्यादा भा जाती |
बस तकती हूँ राह तुम्हारी
कदम्ब सा मैं विश्वास लिए
बैठ मेरी इक डाल पर
लोगे तुम कुछ श्वास प्रिय |

कब चाहा मैंने कान्हा ,
बलदाऊ सी मैं बड़ी हो जाऊं ,
जाओ तुम जिस ओर भी
रक्षा में तुम्हारी खडी होजाऊं |
मर मर कर जीती हूँ
जैसे कोई कंस जिए,
उड़ जाउंगी देख तुम्हे
एक दिन बन हंस प्रिय |

रुक्मिणी सा हो भाग्य मेरा
और उसपर मैं इतराऊं;

बस तकती हूँ राह तुम्हारी
सुदामा सी मैं आस लिए ,
कभी कराओगे मुझको भोजन
बिठा अपने पास प्रिय |

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