मुझको मेरे वजूद की हद तक न जानिए, बेहद हूँ बेहिसाब हूँ बेइन्तहा हूँ मैं। गुजरे हुए लम्हों में सदियाँ तलाश करता हूँ,  प्यास गहरी है कि नदियाँ तलाश करता हूँ, हक़ से दो तो तुम्हारी नफरत भी कबूल हमें,  खैरात में तो हम तुम्हारी मोहब्बत भी न लें। हमारे दिल में भी झांको अगर मिले फुर्सत,  हम अपने चेहरे से इतने नज़र नहीं आते। मेरी सादगी ही गुमनामी में रखती है मुझे,  जरा सा बिगड़ जाऊं तो मशहूर हो जाऊं। ........खान@..

चाँद मद्धम है आसमाँ चुप है

नींद की गोद में जहाँ चुप है

दूर वादी में दूधिया बादल

झुक के पर्बत को प्यार करते हैं

दिल में नाकाम हसरतें ले कर

हम तिरा इंतिज़ार करते हैं

इन बहारों के साए में आ जा

फिर मोहब्बत जवाँ रहे न रहे

ज़िंदगी तेरे ना-मुरादों पर

कल तलक मेहरबाँ रहे न रहे!

रोज़ की तरह आज भी तारे

सुब्ह की गर्द में न खो जाएँ

आ तिरे ग़म में जागती आँखें

कम से कम एक रात सो जाएँ

चाँद मद्धम है आसमाँ चुप है

नींद की गोद में जहाँ चुप है

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दिल मेरा करता है , कभी तुझको मैं सजाऊँ ,
कभी बिंदिया कभी , काजल तेरा हो जाऊँ !

कभी चूड़ी की खनक , मैं तेरी बन जाऊँ ,
तो कभी लाली बन , तेरे होठों का हो जाऊँ !

कभी पायल बन के , छम छम मैं रिझाऊँ ,
तो कभी बन के सिंन्दूर , माँग में खो जाऊँ !

बन के मेहंदी कभी , तुझसे मैं लिपट जाऊँ ,
तो कभी हार बन , तेरे सीने में सो जाऊँ !

बन के कानों की बाली , मैं तेरी रिम झिम गाऊँ ,
तो कभी नथिनी बन , तेरी साँसों का हो जाऊँ !

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मेरे महबूब , ज़ुल्फ़ों की , मुझको हवा दे दे ,
मेरे इश्क़ की , मुझको तू , कोई दवा दे दे !

तरसाया तूने , बरसों मुझे , इश्क़ की ख़ातिर ,
अब खु़़़दा , मुझको भी , ऐसी अदा दे दे !

जो हुआ घायल , नज़र से , पहली बार तेरी ,
दिल उसी का , होगा यहाँ , ये क़ायदा दे दे !

कुछ भी नहीं , रिश्ता तेरा , मेरी मुहब्बत से ,
कुछ ना सही , थोड़ी सी , मुझको जफ़ा दे दे !

तेरी सूरत रहे , मरके भी , आँखों में मेरी ,
ऐ ख़ुदा , मुझको तू , ऐसी वफ़ा दे दे !

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हँसना हँसाना ये कोशिश है मेरी, सबको खुश रखना चाहत है मेरी, कोई याद करे या न करे, हर किसी को याद करना आदत है मेरी आज फिर सुबह खिलखिलाई है, हुआ है फिर एक नया सवेरा।
चहचहा रहे हैं परिंदे और कलियों ने फिर आज रंग बिखेरा।
तू आज फिर एक बार मुस्कुरा दे, तो हो जाये मेरा ये दिन पूरा।

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आप की याद आती रही रात भर

चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर

रात भर दर्द की शम्अ जलती रही

ग़म की लौ थरथराती रही रात भर

बाँसुरी की सुरीली सुहानी सदा

याद बन बन के आती रही रात भर

याद के चाँद दिल में उतरते रहे

चाँदनी जगमगाती रही रात भर

कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा

कोई आवाज़ आती रही रात भर

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तसवीर बनाता हूँ, तसवीर नहीं बनती,
एक ख्वाब सा देखा है, ताबीर नहीं बनती,

बेदर्द मुहब्बत का, इतना सा है अफ़साना
नज़रों से मिली नज़रें, मैं हो गया दीवाना
अब दिल के बहलने की, तदबीर नहीं बनती,

दम भर के लिये मेरी, दुनिया में चले आओ
तरसी हुई आँखों को, फिर शक्ल दिखा जाओ
मुझसे तो मेरी बिगड़ी, तकदीर नहीं बनती,

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સખીરી, કેમ ઉકેલું લિપિ જળની
તરંગ લિસોટે પડી છાપ તો
ઘટના પળ બે પળની
સખીરી, કેમ ઉકેલું લિપિ જળની

પરપોટાનું પોત, પવનનાં પગલાં
તરતા નર્યા સપાટી ઉપર જી  રે
સ્પર્શે ઊગે સ્પર્શે ડૂબે
નહીં રે તળને લેણદેણ કે જાણ લગીરે
પરગટ પારાવાર ને નીંભર
ટેવ પડી ટળવળની
સખીરી, કેમ ઉકેલું લિપિ જળની

સુસવાટાનો નાદ સાંભળી, ખળખળતું
એકાન્ત ટકોરા મારે લીલા
જળરાશિનું નામ હવેથી પ્રગટ રહીને
કહેવાશે અટકળિયા ચીલા
ભાવગત આ અક્ષરિયત ને
છળમય ભાષા તળની
સખીરી, કેમ ઉકેલું લિપિ જળની

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ઉંચકી સુગંધ એક ઊભું ગુલાબ
એની વેદનાની વાતોનું શું?
કાંટાંથી છોલાતી લાગણી ને સપનાંઓ
ઉંઘ છતાં જાગવાનું શું?

સુવાસે પડઘાતું આખું આકાશ
છતાં ખાલીપો ખખડે ચોપાસ.
ઉપવનના વાયરાની લે છે કોઇ નોંધ?
કોણ વિણે છે એકલી સુવાસ?
વાયરો કહે તેમ ઉડવાનું આમ તેમ
વાયરાનું ઠેકાણું શું? – ઉંચકી સુગંધ……

ધારોકે ફૂલ કોઇ ચૂંટે ને સાચવે,
ને આપે ને સુંઘે તો સારું.
ધારો કે એક’દીની જિંદગીમાં મળવાનું,
થોડું રખાય તો ય સારું.
પણ ઉપવનમાં ઝુરવાની હોય જો સજા,
તો મળવાના ખ્વાબોનું શું ? – ઉંચકી સુગંધ

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एक सच का फ़ासला है , तेरे मेरे दरमियाँ ,
झूठ का बिखरा सिला है , तेरे मेरे दरमियाँ !

वक़्त भी भूला कहीं और , याद मुझको भी नहीं ,
ना बचा कुछ भी भला है , तेरे मेरे दरमियाँ !

चाँदनी तपती हुई और , ओस भी झुलसी हुई ,
पल ना अब कोई खिला है , तेरे मेरे दरमियाँ !

चाँद भी अब सुर्ख़ है और , आसमां धुँधला हुआ ,
इक जफा का सिलसिला है , तेरे मेरे दरमियाँ !

ये हवा ख़ामोश है और , साँस भी ग़ुम सी ज़रा ,
लम्हा इक फिर से जला है , तेरे मेरे दरमियाँ !

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तेरी आँखों को जब देखा कमल कहने को जी चाहा
मैं शायर तो नहीं ग़ज़ल कहने को जी चाहा

तेरा नाज़ुक बदन छू कर हवाएं गीत गाती हैं
बहारें देख कर तुझको नया जादू जगाती हैं
तेरे होंठों को कलियों का बदल कहने को जी चाहा
मैं शायर तो नहीं…

इजाज़त हो तो आँखों में छुपा लूं ये हंसी जलवा
तेरे रुखसार पे कर लें मेरे लब प्यार का सजदा
तुझे चाहत के ख़्वाबों का महल कहने को जी चाहा
मैं शायर तो नहीं

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