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हमेशा अलग सोचे अलग करे और अलग बनें...

कुछ दर्द ऐसा है
कुछ तड़प ऐसी है
कुछ रोग ऐसा है
कुछ तपिस ऐसी है
मैं चाह कर भी तो
तुझे भूल नहीं सकती।

तू वो नहीं है जो
मेरी आँखों का नूर है
तू वो नहीं है जिसका
छाया मुझ पर शुरूर है।
तू वो नहीं है जिस से
गुजरते मेरे दिन रात
तू वो नहीं जिससे
होती है प्यार की बरसात।

तू वो नहीं है जिससे
मेरा सुख और चैन है
तू वो नहीं है जिसके लिए
ये दिल बेचैन है।

तू रात नहीं तू दिन नहीं
तू इस दिल की मालकिन नहीं
तू लहर नहीं तू श़हर नहीं
तू गहरा कोई भँवर नहीं।

फिर किस दुनिया से आया तू
और किस दुनिया का वासी है।
मैं तेरी नजर में कैसे आई
क्यूँ तेरे लिए दिल में उदासी है।।

तू चोर है या लुटेरा है
या है तू मनमोहन छलिया।
एक छवि तेरी मोहित कर दे
या तू है निर्मोहीं मेरा संइयाँ ।।

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एक कल्पना हो या ख्याल हो तुम
मेरे टूटे दिल का अरमान हो तुम
तुम मौन मूक अभिव्यक्ती हो या
या ईश्वर का वरदान हो तुम।

तुम नहीं हो वो जो दिखायी दे
तुम नहीं हो वो जो सुनाई दे
तुम समझ में आते भी तो नहीं
तुम नहीं हो वो जो छुआई दे।।

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नहीं चाहिए आसमान की बुलंदी
नहीं करनी पुरुषों की बराबरी
नहीं बनना ख्वाबों की रानी
नहीं कहलाना घर की हूँ मालकिनी

मैं औरत हूँ मुझे औरत ही रहने दो
मेरा आत्मसम्मान मेरे पास रहने दो
मजबूत हूँ या कमजोर हूँ फर्क नहीं पड़ता
बस शरीर नहीं हम यह समझने दो।

चेतना है आत्मा है इच्छा भी है
कुछ अलग करने की मंशा भी है
पहचान की अपनी लड़ाई लड़ते रहे
पुरुषों की दुनिया में खुद को बचाने की चिंता भी है

पुरुषों की कहाँ
ये दुनिया हमारी भी आधी थी
पुरुषों की तरह
हम भी आधी आबादी थीं
जाने कब कैसे क्या हो गया
हम बस एक शरीर बन गयीं
पुरुषों की जागीर बन गयीं

फ्रीडम फेमिनिस्ट का राग अलापती
खुद स्वतंत्र स्वच्छंद बताती
कह दो क्या सत्य है
क्या नारी सच में स्वतंत्र है???

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क्या क्या न सहा
क्या क्या न सुना
बस एक तुझे पाने को।
छोड़ दिया मैंने खुद को
बस एक तुझे रिझाने को।

हाथ भी जोड़ा
पाँव भी पकड़ा
बस एक तुझे मनाने को
नीचे खुद को गिरा दिया
बस एक तुझको पाने को।

मनाया बहुत
न माना तू
मुँह मोड़ा मुझे रुलाने को
खुद को मैंने मिटा दिया
बस सिर्फ तुझको पाने को।

मैं रोती रही
मैं बिलखती रही
तू चला नयी दुनिया बसाने को
मैंने भी कितने जतन किये
बस एक तुझको भुलाने को।

तू भूलता नहीं
मैं भूलती नहीं
तू रोग बना मुझे तड़पाने को
जिस अगन में मैं झुलस रही
वो लगी है मुझे मिटाने को।

एक बार जो कहता
मुझसे ऐ सनम
तैयार थी मैं दुनिया भुलाने को
तू ऐसे जुल्मी मौन रहा
कुछ बचा न दिल बहलाने को।

मर जाऊँ
या मिट जाऊँ मैं
तू बता है क्या फरमाने को
मैं चंचल चितवन चहक रही थी
तूने कैद किया मुझे मिटाने को।

प्रेम है या
है पागलपन
कोई नहीं है ए समझाने को
एक दर्द है जिससे तड़प रही
तू आजा दर्द बटाने को।


क्या गलती की
क्या गुनाह हुआ
क्यूँ छोड़ दिया मुरझाने को
मैं एक नन्ही सी कली ही थी
मसल दिया क्यूँ मिट्टी में मिलाने को।

ख्वाब नहीं थी
परछाई नहीं
चाहा था हकीकत बनाने को
मैं अपनी ही ज़ात से भटक गयी
बस एक सनम तुझे पाने को।।

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