skew your eyes every thing will be clear

जिंदा दिखने की कोशिश करनी होती है ।
ओंठों आँखों से बातें कुछ कहनी होती है ।।
#ज़िंदा

युवा होने की कोई उम्र भारत में नहीं होती ।
कुँवारापन युवा होने की छोटी सी निशानी है
सुना है एक नेता और एक नायक के कारण ही ।
उम्र और अवस्था ने बड़ी यह रार ठानी है ।

#युवा

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दूर जाने की जिद छोड़ जाने की जिद ।
दे गया जख्म कुछ न बताने की जिद.।
पेंड़ की डाल को काट कर ले गया ।
उसको थी अपने आँसू सुखाने की जिद ।
मस्तियां बालपन की न विस्मृत हुई ।
तोतले उत्तरों को न मैं भूला अभी ।
अपनी बहनों के राखी के धागे बता ।
क्या कमी थी बता भूल क्या हो गयी ।
कैसे विश्वास हो कैसे अहसास हो ।
तेरी हम सबको हँसने हँसाने.की जिद ।
तेरे कंधों पर जाने का अरमान था ।
देखता तेरे बेटों में तुझको कभी ।
मुक्ति पथ पर तू निकला अकेले अरे ।
पत्थरों के हैं बुत देख ले हम सभी ।
अब कभी मूर्त होगा नही तू प्रिय ।
हमको भी है तेरे संग जाने की जिद ।

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1-उल्टा अर्थ बताते हम ,शब्द विलोम कहाते हम ।

दिन ही रात का उल्टा है ,सच का उल्टा झूठा है ।

रात गयी दिन आया है ,जीवन और मृत्यु माया है ।

दुःख -सुख अपने साथी हैं,न प्रेम - घृणा को भाती है।

धूप -छाँव तो होना है ,क्या सर्दी -गर्मी का रोना है ।

धरा और गगन हमारे हैं ,हम माता - पिता के प्यारे हैं।

वृद्ध सिखाता बालक को,जागरण भगाता सपने को ।

दूर -पास क्या होता है ,क्यों हँसता और रोता है ।

चलना, कभी न रुकना तुम ,हँसना,कभी न रोना तुम ।

बड़ा और छोटा होने से ,क्या डर पाने -खोने से ।

बुरा -भला न सोचो तुम ,ऊपर -नीचे न देखो तुम ।

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बाज आ अपनी शरारतों से
,कुछ खौफ कर उस नियतिका प्यारे ।
तेरी इन ओछी शरारतों ने .
दुनिया के लाखों हैं घर उजाड़े ।
सूप चमगादड़ों. का पीना
मछलियों के वस्त्र सीना ,
लाखों वर्षों से तू यहां है
बता दे कब सीखेगा प्यारे
धरा के जीवों के संग जीना ।
शरारती बन कर ए मानव
प्रकृति के संग जीना सीख प्यारे ।




#शरारती

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शक्तिमान भी कभी -कभी मजबूर होता है ।
सुई हो यान ,बनाने वाला सिर्फ मजदूर होता है ।
आज यही मजदूर रो रहा है ।
संभवतः अपने जीने का हेतु खो रहा है ।
#शक्तिमान

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अर्थ तंत्र में उलझकर जीवन चकनाचूर ।
बाँह फैलाया गाँव ने आओ सब मजबूर ।।
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मैं शाहजहां बोल रहा हूँ ।
हाँ वही जिसने ताजमहल तामीर कराया था ।
अपने प्यार की खातिर ।
तुम लोग जिसे देखकर आहें भरते हो ।
अजूबा कहते हो जिसे ।
मैंने मजदूरों के हाथ क्या काटे ।
जी भर गालियाँ सुनाई तुम लोगों ने ।
लेकिन ध्यान रखो ।
मैं मरा नहीं था कभी और मरूँगा भी नहीं ।
जबतक मजदूर इस धरती पर हैं ।
देखो आज मैं अपने हजार रूपों के साथ ,
खड़ा हूँ तुम्हारे पास पहचान सकते हो तो ।
पहचानों मुझे ।
और दो गालियाँ ।
नहीं दे सकते क्योंकि तुम मुझे जिस कपड़े से पहचानते थे
मैने उतार दिया है ।
और अब मैने हाथ काटना भी छोड़ दिया है ।
अब तो मैं सीधा सिर काटता हूँ सिर ।
भूख बनकर मार देता हूँ ।
मैं इन सब भागने वालों को रोक सकता था ।
क्योंकि इनके चेहरे आज भी मुझे मेरे बेडरूम में दिखते हैं
इनके होने का अहसास मैं अपने गार्डन में भी पाता हूँ ।
इनका अस्तित्व मैं घर के हर कोने में पाता हूँ ।
इनके दुधमुंहे बच्चों की किलकारियां जैसे कल की बात हो ।
लेकिन मैं इन्हें नहीं रोक रहा ।
क्योंकि इनकी नियति में दखल देने वाला कौन हूँ मैं ।
भागने दो ,थक कर गिरने दो ,मरने दो ।
इनको इनके किए की सजा मिलने दो ।
मैं वातानुकूलित कक्ष में अपने बच्चे संग खेल रहा हूँ ।
हाँ मैं शाहजहां बोल रहा हूँ ।
हाँ मैं शाहजहां बोल रहा हूँ ।

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खुद से खुद की बात करे जो,खुद से खुद को जाने ।
ऐसा योगी ध्यानी जन को जग क्यों न पहचाने ।।
#खुद

भाग्य प्रबल नहिं होत है कर्म प्रबल सुन राय ।
बिना युद्ध विजयी कहाँ जन कोऊ कहलाए ।।


#भाग्य