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एक नई सुबह होगी,
तू बस चलता जा
कलियों से फूल बन,
बस खिलता जा
मिट जाएंगे एक दिन
खुदवा खुद तुझे गिराने वाले
तू गिरके बस यूं ही पवन,
सम्भलता जा
मेहनत कर और,
कागज पर जज्बात बिखेर दे
नकली चेहरे से मिल,
और उन्हें पहचानता जा
कलम से तू भी,
तूफान ला सकता है
बस दर्द चीखकर,
लोगो को सुनाता जा
इश्क कर पन्नो से,
और कलम को माशूका बना
इन किताबो की दुनिया को बस,
ऐसे ही आजमाता जा
गिर गया तो दुबारा खड़ा हो,
और हार को जीत में,
तब्दील कराता जा
इन्ही कोशिश से अपनी,
मंजिल को पा लेगा एकदिन
बस यूँही अपनी तकदीर बनाता जा"

लेखक - पवन सिकरवार

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गांधी की पुण्यतिथि पर
नाथूराम गोडसे को नमन

लेकिन एक सवाल जरूर है
मेरे मन मे नाथूराम गोडसे से की

"पिटने वाला रोया नही ये देखकर
पीट रहा जो, वो अब भी डर जाता है
क्या तीन गोलियों में गांधी मर जाता है"

लेखक - पवन सिंह सिकरवार

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कविता - खिड़की

एक दिन मेने, अपनी खिड़की खोली
ठंडी हवाओं का शोर था
मेरी सामने वाली खिड़की में भी
चाँद सा एक चकोर था।
मै मुस्करा रहा था,
वो शरमा रही थी
मै अपने आप को सुलझा रहा था,
और वो अपने चेहरे पर आ रही
झुलफो को सुलझा रही थी
मेरा दिल भी अब इश्क़- ए- दिले चोर था
मेरी सामने वाली खिड़की में भी,
चांद से एक चकोर था

मै उसे देखता रहा
और वो नजरें फेरती रही
इश्क़ का महजब आंखों ही आंखों में तोलती रही
वो मेरी ईद और मै उसका दीवाली वाला माहौल था
मेरी सामने वाली खिड़की में भी,
चाँद सा एक चकोर था

आखिर में उसने हां कर दी,
जिंदगी की एक नई शुरुआत कर दी
अकेली जिंदगी में बहार कर दी,
मोहब्बत से मेरी मुलाकात कर दी।
अब वो मेरी दिल्ली और मै उसका इंदौर था
मेरी सामने वाली खिड़की में भी,
चाँद सा एक चकोर था।

By Author Pawan Singh
copyright reserved by
SIKHO-FOUNDATUON

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मै हु हिन्दुस्तानी,
जानी, पहचानी और मानी सारी बात तेरी
सभ्य बनाया तुमने लेकिन,
सबसे पुरानी सभ्यता मेरी
जो तुम समझो हमको,
हम अनपढ़ गंवार है
दुनिया हिलाने को देखो,
अब हम तैयार है
शांति की कविता है बाबू,
ये कोई दंगल नही है
शेर बनकर हम दुनिया को खा जाए,
लेकिन ये दुनिया है कोई जंगल नही है
क्योकि
मै हु हिंदुस्तानी,
जानी, पहचानी और मानी सारी बात तेरी
सभ्य बनाया तुमने लेकिन,
सबसे पुरानी सभ्यता मेरी

अब टाटा - अम्बानी से,
ये जलने लगे है
बॉलीवुड की कमाई के शोर,
इन्हें खलने लगे है
बड़े पर्दे की देखो हम,
पिक्चर बना रहे
ये लोग अपने हाँथ,
अब मसलने लगे है
ऐसे ही आगे हम,
बढ़ते ही जायेंगे
एशिया में नही,
पूरी दुनिया मे छाएंगे
नासा के साइंटिस्ट,
अब इसरो में आएंगे
पूरी दुनिया वाले,
एक दिन अपना तिरंगा फेरायेंगे
क्योकि
मै हु हिंदुस्तानी,
जानी, पहचानी और मानी सारी बात तेरी
सभ्य बनाया तुमने लेकिन,
सबसे पुरानी सभ्यता मेरी

हारने लगे हो तो,
नम्बर तुम गिनवा रहे
तीसरे नंबर की सेना हमारी,
कान तुम्हारे खुलवा रहे
लड़ने पर आ जाये तो,
अकेले हम सबपर भारी है
बाबू अपनी चोत्तीस करोड़ जनसँख्या है,
और तुम अब तक पड़ोस से मंगवा रहे
तुम अपनी धुलवा रहे, सुलगा रहे,
और जो तुम्हारी सर्जिकल स्ट्राइक में फाड़ी थी ना
उसको अब तक तुम सिलवा रहे
क्योकि
मै हु हिंदुस्तानी,
जानी, पहचानी और मानी सारी बात तेरी
सभ्य बनाया तुमने लेकिन,
सबसे पुरानी सभ्यता मेरी

दुनिया वालो हमने तुमको
संस्कृत से भाषा का ज्ञान दिया
ब्लैकहोल की गणना करके
अंतरिक्ष का विज्ञान दिया
जो चाल चल रहे हो ना
तुम हमसे बाबू
भूलो मत शतरंज का,
किसने आविष्कार किया
तुमने त्रिस्कार किया,
हमने स्वीकार किया
तुम तो बस छोटे रह गए,
लेकिन हमने अपना विस्तार किया
क्योकि
मै हु हिंदुस्तानी,
जानी, पहचानी और मानी सारी बात तेरी
सभ्य बनाया तुमने लेकिन,
सबसे पुरानी सभ्यता मेरी

लेखक - पवन सिंह सिकरवार

copyright reserved
by Sikho foundation

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"मुझे हराने के लिए देखो मेरी
किस्मत ही मेरे खिलाफ खड़ी है
जी रहा हु ऐसे जिंदगी मानो
मेरी लाश कब्र में पड़ी है"

"हिसाब किताब करदो मेरा
मुझे अब कुछ नही कहना तुमसे
बहुत रुलाया है ना मैने ?
दूर होकर अब खुश होना मुझसे"

"जिन्दगी तूने पटक दिया मुझे
लगता है तू लड़ने में ही राजी है
तूने अपनी चाल चल ली ना?
अब इस शतरंज में मेरी बाजी है'

लेखक - पवन सिंह सिकरवार
copyright reserved by Sikho foundation

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