Hey, I am on Matrubharti! मै कवि भरत सिह रावत भोपाल

एक श्रृँगार का गीत आपकी नज़र
गीत

कह रहा है भ्रमर बनके मन वावरा,
प्रीत के कुछ सुमन अब खिला जाईए,,
मन के मंदिर का स्थान सूना पड़ा,
प्रेम की बनके मूरत समा जाईए,,

चाँदनी जब गगन में चमकने लगे,
याद आता है तब मुझको मुख आपका,,
मन के कोने से आवाज आती है तब,
मेरा दुख आपका , मेरा सुख आपका,,
मन मरुस्थल मेरा, है बिछाए नयन,
प्रेंम की आप गंगा बहा जाईए,,

जाने लम्वित है कब से प्रणय याचिका,
मै लजाता रहा और कह ना सका,,
वेदना झेल कर मौन साधे रहा,
था नयन में समन्दर जो बह ना सका,,
आज विश्वास है, ये मेरी आस है,
प्यास अधरो की मेरी मिटा जाईए,,

वेदना के जो मनके मिले हैं मुझे,
प्रेंम धागे में उनको पिरोता रहा,,
मेरे अधरों की मुस्कान खोई नहीं,
जब हृदय में विकट दर्द होता रहा,,
गीत मेरे बने प्रीत की इक डगर,
साथ चल कर तनिक गुनगुना जाईए,,

रूप ऐंसा दिया ईश ने आपको,
ब्रम्हचारी का मन डगमगाने लगे,,
कर दो अधरों से तुम अपनी जादूगरी,
एक मुर्दे में भी जान आने लगे,,
कामिनी, यामिनी, सुनलो गजगामिनी,
दामिनी बनके जौहर दिखा जाईए,,

शब्द "रावत"ने गीतों में ढाले हैं जो,
आपके रूप का मात्र आभास है,,
अपना घूंघट हटा कर तनिक देख लो,
चक्षुओं में भरी प्यास ही प्यास है,,
गीत की जीत हो, प्रीत ही प्रीत हो,
रीत मनमीत ऐंसी चला जाईए,,
मन के मंदिर का स्थान सूना पड़ा,
प्रेंम की बनके मूरत समा जाईए।।
रचनाकार
भरत सिंह रावत
भोपाल
7999473420
9993685955
सर्वाधिकार सुरक्षित

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क्रांती की फसल उगाता करता हूं।

जब जयचंदो के मन में कुछ अरमान मचलने लगते हैं।
जब जब गरीब की बस्ती पर बुलडोजर चलने लगते हैं।।
जब आंदोलन करते किसान पर गोली दागी जाती है।
जब किसी दरिंदे की चंगुल में कोई अभागी जाती है।।
जब आंख मींचकर के सत्ता गूंगी बहरी हो जाती है।
खादी के मन में लालच की खाई गहरी हो जाती है।।
तब शांति धरा की शांति छोड़ एक युग परिवर्तन लाता हूं।
मैं कलम धार को तेज बना क्रांती की फसल उगाता हूं।।

जब वन्देमातरम जैसे पावन नारे खलने लगते हैं।
जब आस्तीन के बिषधर अपना जहर उगलने लगते हैं।‌।
जब देशद्रोहियों की फांसी पर रोष दिखाई देता है।
जब दिल्ली का सिंहासन भी ख़ामोश दिखाई देता है।।
जब भारत भू पर ही दुश्मन के झंडे पाए जाते हैं।
जब काश्मीर में सैना पर, पत्थर बरसाए जाते हैं।‌।
जब राजनीति के आगे मैं असहाय स्वयं को पाता हूं।
मैं कलम धार को तेज बना क्रांती की फसल उगाता हूं।।
क्रमशः।
रचनाकार
भरत सिंह रावत

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महाराष्ट्र के हालात पर
भले है आग ठंडी फिर भी जल जाने का खतरा है।
बदलते दौर में उनके बदल जाने का खतरा है।।
अभी चाचा भतीजे की जुगलबंदी नहीं टूटी।
तुम्हारे दिल की सब उम्मीद ढल जाने का खतरा है।।
चचा का बार खाली जाएगा। लगता नहीं मुमकिन।
अंधेरे में भी उसके तीर चल जाने का खतरा है।।
बनी संजय की दृष्टि है महाभारत के इस रण पर।
अभी धृतराष्ट्र की भी दाल गल जाने का खतरा है।।
अटल जिनको समझते हो उन्हें फिर जांच लो रावत।
सुनो उनके सुबह होते ही टल जाने का खतरा है।।
रचनाकार
भरत सिंह रावत भोपाल
7999473420
9993685955

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गीत

मैं तो अंगार का एक कलमकार हूं, मुझको श्रृंगार भाता रहा रातभर।
उसकी नज़रों में थी जाने कैसी कशिश, धीरे धीरे समाता रहा रातभर।

मैं अकेला पथिक जा रहा था कहीं, राह में मिल गई मुझको वो हमसफ़र।
धीरे धीरे अंधेरा भी घिरने लगा, और सताने लगा था जमाने का डर।।
मेरी हस्ती ने थी कि मैं सूरज बनूं, जुगनू बन टिमटिमाता रहा रातभर।
उसकी नज़रों में थी जाने कैसी कशिश, धीरे धीरे समाता रहा रातभर।।

दूरियां धीरे धीरे निलंबित हुई, उस नदी में उमंगे सी भरने लगीं।
कितनी खुश हो गई जब समंदर मिला, अश्क भर वो नज़र में विचरने लगी।।
देख कर उसकी खुद्दारियां जाने क्यों, मैं ग़ज़ल गुनगुनाता रहा रातभर।
उसकी नज़रों में थी जाने कैसी कशिश, धीरे धीरे समाता रहा रातभर।।

रात ढलती रही साथ चलता रहा,वो बदलती रही मैं बदलता रहा।
तम भरी रात का हो गया यूं असर,वो मचलती रही मैं मचलता रहा।
उसने अधरो से मुझको छुआ इस तरहां, मैं अधर थरथराता यह रातभर।।
उसकी नज़रों में थी जाने कैसी कशिश, धीरे धीरे समाता रहा रातभर।।

देखती वो रही, देखता मैं रहा, उसने कुछ ना कहा मैं भी खामोश था।
रात भर बात नज़रों से होती रही, वो भी मदहोश थी मैं भी मदहोश था।।
मन प्रफुल्लित हुआ ज्यों बगीचा कोई, गंध अपनी लुटाता रहा रातभर।
उसकी नज़रों में थी जाने कैसी कशिश, धीरे धीरे समाता रहा रातभर।।

वीरगाथाएं मुझसे विलग हो गईं, और सुमन प्रेम का मन में खिलने लगा।
शब्द ढलने लगे सब मिरे प्रेम में, नेह सागर सा मुझको भी मिलने लगा।।
वो भी रावत को हर पल सताती रही, मैं भी उसको सताता रहा रात भर।
उसकी नज़रों में थी जाने कैसी कशिश, धीरे धीरे समाता रहा रातभर।।

रचनाकार
भरत सिंह रावत भोपाल
7999473420
9993685955
सर्वाधिकार सुरक्षित

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फिर गांडीव जैसा धनुआ उठाने वाला,
अर्जुन सा लक्ष्यभेदी तीर हमें चाहिए।
देश को प्रधान मान जान भी लुटा सकें जो,
तात्या टोपे जैसी शमसीर हमें चाहिए।।
दुर्बल सी कदकाठी हाथ में उठाए लाठी,
फिर गांधी जैसा वो फकीर हमें चाहिए।
अश्व को विदारे असवार को भी मारे,
महाराणा फिर शूरवीर हमें चाहिए।।
भरत सिंह रावत भोपाल

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राष्ट्र की स्वाधीनता पुकारती है बार बार,
पन्ना धाय बाली वो कहानी हमें चाहिए।
दुश्मनों को आए होश फैसले जो लेवे ठोस,
जोश हो पटैल जैसा पानी हमें चाहिए।।
देशद्रोहियों के लिए काल सा सबाल बने,
भगतसिंह बाली वो जवानी हमें चाहिए।
ठान ले जो ठान तो कृपाण हाथ लेके चले,
बेटियों में झांसी बाली रानी हमें चाहिए।।
भरत सिंह रावत भोपाल
7999473420

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'ग़ज़ल'

हमें दिल से बुलाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।
हमेशा याद आते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।।

झुलसती धूप में भी जिनके नंगे पांव होते हैं।
पसीने से नहाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।।

भरी बरसात में जो हम पे पर्दा तान देते हैं।
वो खुद ही भींग जाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।।

हमेशा चाहते हैं सिर्फ वो दो जून की रोटी।
नहीं ज्यादा कमाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।।

कंपाती सर्दियों में भी मिलेंगे चंद कपड़ों में।
हमेशा कपकपाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।।

भरी नोटों से थैली घर किसी की छूट जाए तो।
उसे बापिस दिलाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।।

अचानक हो कहीं पर जब कभी भी बंद हड़तालें।
तो भूखे लौट जाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।।

किसी सरकार ने अब तक नहीं पूछा है आकर के।
कि कैसे घर चलाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।।

बड़े खुद्दार हैं रावत नहीं लेते हैं फोकट में।
सदा मेहनत की खाते हैं वो रिक्शा खींचने वाले।।

रचनाकार
भरत सिंह रावत
भोपाल
7999473420
9993685955

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न मैं मंदिर में जाता हूं, न मैं मस्जिद में जाता हूं। परिंदों की तरहां हूं हर कहीं भी बैठ जाता हूं।।
जहां मज़हब की दीवारें हो ना हो कौम के झगड़े।
जहां इंसानियत हो मैं वहां पर सर झुकाता हूं।।
भरत सिंह रावत भोपाल
7999473420
9993685955

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ग़ज़ल

ज़माने में जरूरत पर इबादत लोग करते हैं।
यहां इंसान क्या रब से शिकायत लोग करते हैं।।

बड़ी मतलब की दुनिया है समझ में आ गया यारों।
बिना मतलब किसी पर कब इनायत लोग करते हैं।।

किसी को कामयाबी हद से ज्यादा गर मिली यारों।
न जाने दिल ही दिल में क्यों, अदाबत लोग करते हैं।।

तमन्ना दिल में रखते हैं, जो अपने बेईमानी की।
दिखावे के लिए अक्सर शराफ़त लोग करते हैं।।

गुरूर इंसान का यारों हमेशा नाश करता है।
सहन होता नहीं है तब बगावत लोग करते हैं।।

जो कहते हैं मसाईल कौम के सुलझाएंगे वो ही।
इन्ही कौमों के झगड़ो पर , सियासत लोग करते हैं।।

अजब ही दौर है, सच्चों को नाकामी मिली हर दम।
मगर इस दौर में झूठे हुकूमत लोग करते हैं।।

कलम रावत की करती है उन्हें हर वक्त ही सजदा।
वतन की आबरू पर जो शहादत लोग करते हैं।।

रचनाकार
भरत सिंह रावत
भोपाल
7999473420
9993685955

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गीत

आधुनिकता से परे, कुछ मीत तुमको दे रहा हूँ।
मन के पृष्ठों पर लिखा ,इक गीत तुमको दे रहा हूँ।।

हृदय के पट खोल तुमने ,चक्षुओं से जो कहा था।
मेरे नयनों ने पढा़ सब, किंतु मैं बेवस रहा था।।
अब हृदय से हार कर मैं, जीत तुमको दे रहा हूँ।
मन के पृष्ठों पर लिखा इक ,गीत तुमको दे रहा हूँ।।

नेह का दीपक जला कर, जिंदगी के तम को हर दो।
मन की अभिलाषा तुम्हारी, प्रणय का अनुबंध कर दो।।
लो करो स्वीकार अपनी ,प्रीत तुमको दे रहा हूँ।।
मन के पृष्ठों पर लिखा इक ,गीत तुमको दे रहा हूँ।।

लग रही हो आज तुम ज्यों, वेदना सहती धरा हो।
मेघ से आशा लगाए ,सुलगती सी निर्झरा हो।।
बनके सावन की झड़ी मै ,शीत तुमको दे रहा हूँ।
मन के पृष्ठों पर लिखा इक गीत तुमको दे रहा हूँ।।

मन की आशाओं को जी लो, तोड़ कर तटबंध सारे।
आओ बन सरिता हृदय में, सिंधु भी तुमको पुकारे।।
विलग ना होंगे कभी, वह रीत तुमको दे रहा हूँ।
मन के पृष्ठों पर लिखा, इक गीत तुमको दे रहा हूँ।।

याचिका ये प्रणय की ,अबिलम्ब तुम स्वीकार कर लो।
तुम सुगंधित पुष्प बन ,इस मन भ्रमर से प्यार कर लो।।
आज रावत मैं मधुर ,संगीत तुमको दे रहा हूँ।।
मन के पृष्ठों पर लिखा ,इक गीत तुमको दे रहा हूँ।।

रचनाकार
भरत सिंह रावत
भोपाल
7999473420
9993685955

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