Hey, I am on Matrubharti!

मैं नहीं चाहता था
मारना
अपना ही मन
अपने अरमान
अपने ख़्वाब

इसलिए मैंने
दबे पांव बढ़कर
चुपचाप उन सभी
को कत्ल कर दिया
जिनके कदम
मेरी राहों को छू रहे थे
और जिनकी नज़रें
कहीं मेरी मंज़िल की
ओर झुंकी थीं

:- भुवन पांडे

#मारना

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ठीक-हो-जाओ ...

काश कि मेरे पास
होता एक जादुई चिराग़

जिसे छू कर घिसकर
यह कहते ही 'ठीक-हो-जाओ'
तो वह उसे पहले सा
दुरुस्त कर देता
ठीक कर देता

तब मैं
वह चिराग़ लिए
छू देता, घिस देता सभी कुछ
जो बिगड़ गया है

छू देता वह चिराग़
घिस देता उसे मैं
उन सभी दिलों पर
जो टूटे हुए बिखरे पड़े हैं
और बोल देता - 'ठीक-हो-जाओ'
और तब वो टूटे दिल
जुड़ जाते फिर से
ठीक हो जाते फिर से
और भर आशा और प्यार
के तरानों से
सभी रिश्ते -
ठीक हो जाते
मुकम्मल हो जाते

:- भुवन पांडे

#ठीक -हो-जाओ

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तू खूब बरस ...

कुछ बूंदों से
जी भरता नहीं
तू बरस बरस
तू खूब बरस

सूखा ये तन
सूखा कण कण
तर बर कर दे
तू ये तन मन

बेरुख रूखा
ये सारा मंज़र
तू सरस हरस
तू खूब बरस

झनक खनक से
जी भरता नहीं
तू खूब कड़क
तू खूब गरज

छुटपुट बदरी से
जी भरता नहीं
टोली मेघों की ले
तू खूब धमक

खोए सोए
जी लगता नहीं
तू खूब दमक
तू खूब चमक

तू चमक दमक
तू गरज कड़क
तू सरस हरस
तू खूब बरस

:- भुवन पांडे

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मैं मरा था ...

चलते फिरते हुए
सांस लेते हुए भी
कितनी ही बार
मरा हूं मैं !

जब भी
किसी ने पुकारा
आस लिए
और
मैंने सुना अनसुना सा
कर दिया था
तब मैंने कहीं
अपने ही आप को
मार दिया था

जब भी
लोलुप लालसा लिए
मैंने अपनी
जेबों को भरा था
तब मेरा ही
कुछ हिस्सा खाली हुआ
और मरा था

जब भी
किसी के हक़ की
लड़ाई में
मैं दूर कहीं
पीछे चुपचाप
हाथ बांधे खड़ा था
तब मेरा मैं वहीं कहीं
मरा पड़ा था

जब भी
किसी ने विश्वास भरी
नज़रों से मुझे
अपने मन में भरा था
और मैंने पीठ में उसके
खंजर धरा था
तब वो नहीं
बल्कि मेरा ही कुछ हिस्सा
फ़िर से मरा था

जब भी मैं
मुश्किलों में घिरा था
और कुछ कदम चलकर ही
मैं हिम्मत हार
हताशा में
बीच राह खड़ा था
तब भी मैं मरा था

यूं ही
चलते फिरते हुए
सांस लेते हुए भी
कितनी ही बार
मैं मरा था ...

:- भुवन पांडे

#मृत

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मैं ...

मैं खुद से ही
अलग हो गया हूं

ना जाने कब से
दुनिया के ही आइने में
देखने लगा हूं खुद को

खो गया हूं मैं अब
जाने कहां
भीड़ में दुनिया की

समझ नहीं आता
कि मेरे भीतर भर गई है
ये दुनिया सारी
या कि
मैं ही हिस्सा हो गया हूं
बिखर गया हूं
कतरा कतरा
तमाम दुनिया में

:- भुवन पांडे

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ज़िन्दगी ...

कौन कहता है
ज़िन्दगी नहीं देती
दूसरा मौका

ज़िन्दगी तो
बहती हुई नदी
की तरह बढ़ती है
लांघते हुए -
पर्वत पहाड़
गहरे खड्ड
पत्थर चट्टानें

कितने ही रास्ते
बदलती है ये
कितने ही समय के
थपेड़े सहती है ये

और जो बूंदें
नहीं छोड़ती बहना निरंतर
वो असीम संभावनाओं
के सागर से भर लेती हैं
अपना दामन

:- भुवन पांडे

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ज़मीनें
मकान
गाड़ियां
पैसा ...

और ना जाने
कितना ही सामान
भरे लादे
ज़हन में
फिरता है आदमी

इनके फितूर में
फूला रहता है
उसका सीना
और
इन सब
बेजान सामान को
चिपकाए
अपने सीने से
कितने ही
दिल के रिश्तों से
दूर हो जाता है
और
सारे खोखले
सामान की भीड़ में
खो देता है
खुद ही को कहीं

:- भुवन पांडे

#सामान

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झेन का रास्ता
गुजरता है
भीतर से भीतर तक

जब बाहर के
सारे शोर में
खोने लगती हैं
हमारी भीतर की
सारी आवाज़ें

तब ही झेन की ध्वनि
कहीं भीतर से
झंकृत करती है
मन के सुरम्य तार

और जुड़ने लगते हैं
एक चेतन संसार से
समस्त संसार की चेतनाएं

भीतर से भीतर तक ...

:- भुवन पांडे

#झेन

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आसपास सब था धुंधला धुआं धुआं
तुम आए तो सब उजला उजला हुआ
तुम्हारा पास आना है एक दुआ
सारा समां तुम्हारे आने से खुशनुमा हुआ

तुमने जो मुझे आहिस्ता से छुआ
हया से तन ये छुई मुई सा हुआ
नज़रों का नज़रों से जब मिलन हुआ
ये मन खिल कर ज़रा और युवा हुआ

:- भुवन पांडे

#युवा

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कितनी खुशी
मिलती है हमें
जब हम
दूसरे को गलत साबित
करने में सफल होते हैं

तब लगता है
जैसे कोई किला
फतह कर लिया हो
और हमारा अहम तब
फूल कर
गुब्बारा हो जाता है

पर ज़रा सी कोई
बात चुभी नहीं कि
यह हवाई गुब्बारा
फूट पड़ता है
और फुस्स से सारी
अहमी हवा
काफूर हो जाती है

:- भुवन पांडे

#गलत

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