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  • #काव्योत्सव

    किताबें -मौन सी

    होती है मौन -सी किताबें पर
    कितना कुछ कह देती हैं।
    बिना कुछ मांगे कभी मुश्किल आसान कर देती हैं
    तो कुछ जिज्ञासा को शांत करने का जरिया होती हैं।
    कुछ किताबें ,ख़ामोश सी इंतज़ार करती हैं अपने पाठकों तक पहुँचने का
    कुछ करती हैं ,इंतज़ार उन्हें खोले जाने का
    कुछ कुम्भकरण सी नींद सोती रहती हैं।
    तो कुछ उदास सी दराज़ के किसी कोने में जीवन जीती रहती है।
    धीरे- धीरे धूल फाँंकती हुई , बारिश की नमी के थपेडो़ंं को छुपाती हुई दर्द अपना बयां करती हैं।
    कुछ होती हैं जोंक सी जो बस चिपक जाती है पाठक से अपने
    जब तक अनवरत रूप से पढ़ न ली जाये पीछा नहीं छोड़ती।
    कुछ होती हैं सनातन शाश्वत सत्य सी जो बस कालजयी होकर इतिहास के पन्ने रंग जाती हैं।
    अनिश्चितताओं से भरे सफ़र में एक ढ़ाल सी
    जीवन को एक नया रूप उद्देश्य दे जाती हैं।
    कुछ होती हैं मुस्कुराती हुई पाठकों को गुदगुदाती हुई
    हंसी के फ़व्वारें समेटे हुई कितना कुछ कह जाती हैं।
    कुछ किताबें हमारी संस्कृति की धरोहर तो कुछ महान आत्माओं की विजय पताकाओं को दर्शाती अपनी यादों में उन्हें जिन्दा रखती हैं।
    प्रेरणा की प्रतीक
    आत्मविश्वास से परिपूर्ण कर जाती हैं।
    कुछ कक्षा में बच्चों को सुलाती हुई तो कुछ माँ की लोरियों में लीन होती सी
    कुछ छुईमुई सी मुरझाई हुई फटी हुई अपनी जिल्द को जैसे मरीज़ कोई पट्टियों में बंधा हो डबडबाई आँखों से निहारती हैं।
    होती हैं मौन -सी किताबें पर
    कितना कुछ कह देती हैं।
    कुछ पहली बारिश की फुहारों सी तर कर जाती हैं
    माटी की सौंधी सुगंध का एहसास कराती हैं।
    सूखे हुए गुलाब, उनकी आह अपने में शामिल किये
    तो कहीं किसी के आसुँओं के निशान समेटे रहती हैं।

    किताबें मौन सी कितना कुछ कह जाती है।

    मौलिक एवं स्वरचित
    अंजलि व्यास

  • #काव्योत्सव -2

    तुम......याने
    मेरे आने वाले कल का जीने का बहाना........

    तुम...याने
    मुझ मे से मेरा निकलना
    और मुझमे तेरा समाना ...........

    तू...याने.........
    पसंदीदा गलियों में
    घूमने का बहाना.....

    तू.....याने
    मेरी आँखों में समाया एक नाम.........

    तू....याने
    मेरी यात्रा की मंजिल..........

    तू.....याने
    मेरी हथेलियों की अदृश्य रेखा ........

    तू.....याने
    ठण्ड की गुलाबी धूप का पर्याय.........

    तू....याने
    मेरे अस्तित्व की
    परछाई ........

    तू.....याने
    कविता का दूसरा नाम.......

    तू...याने........
    मेरा समानार्थी....

    तू........ याने
    मेरे अकेलेपन का साथ ....

    तू.....याने ......

    मैं .......
    ........
    हर्षा ठक्कर ,भुज कच्छ ।

  • #काव्योत्सव

    कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम हैं कहना ...!


    कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम हैं कहना ,

    ग़र कोई कुछ बोले तो चुप तुम भी मत रहना 

    पर कब क्या बोलना हैं , और कब मौन रहना 

    ये तो तुम्हीं को तय है करना 

    कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम हैं कहना | 

     जिन्हें न कभी देखा , जाना या परखा 

    उन अनदेखे , अनजाने और समाज के ठेकेदारों  के लिए  

     क्यों तुम्हे हैं , सब कुछ सहना?  ,

    रहे हरफ़नमौला और चले उन राहों पर 

    जिन पर हमें हैं , चलना 

     कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम हैं कहना   ......|

    सबके अपने दुःख, अपनी तकलीफें ,अपने रहस्य है 

    पर मुख़ पर मौन हैं बसता 

    औरों के जलते घर देख सबको यही लगता 
    मैं अकेला नहीं घर- घर का यह तो सिनेमा 

    बड़े बजुर्ग कह गए सारे 

    पीऱ पराई कोई क्या जाने 

    जिस तन गुजरे वही जाने 

    फिर क्यों लोगों का सोचना 

    कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम हैं कहना   ...|     

         

    ये तो जग की रीत पुरानी 

    जिसने ग़ैरों की धुन पर बीन बजाई  

    हरदम मुँह की खाईं ,

    सीता भी  यहाँ तो पवित्र न जानी 

    जब एक धोबी की बात राम ने मानी   

    भगवान के अवतार थे पर 

    वनवास  था झेला 

    फिर क्यों संसार की बातो में क्यों

    रोये तू दिन-रैना 

    कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम हैं कहना  ...  |

         

    ग़र जो लोगों की सुन हार जो तुमने मानी 

    अपने मन की न सुन ग़ैरों की जो गाँठ बाँधी

    तो उनको तू कुछ न कह पायेगा 

    पर तुम्हारा यह अमूल्य जीवन युही बीत जायेगा 

    जाल में आकर ग़ैरों के 

    तू क्यों जलाये अपना बसा  बसेरा 

    क्यों खोये मन का  चैना

    कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम हैं कहना  ..|

    जिस पल तू जागा 

    होगा नया सवेरा 

    मज़ाक उड़ेगा , लोग हसेंगे 

    पर तभी तो उठकर फिर से संभलेगा 

    बात है तुझमे कुछ खास 

    बस इसलिए तो तुझपर होते कटाक्ष 

    बस तू कर्म अपना करता जा 

    कर्तव्य पथ पर कदम बढ़ाता जा 

    क्युकी कुछ तो लोग कहेंगे 

    लोगों का काम है कहना |

    दूर से खुशहाल हैं किसी का रेन -बसेरा 

    पर हैं उतना ही गहरा  घना अँधेरा 

    सबका हैं, ये नसीब अपना- अपना 

    कुछ तो लोग कहेंगे 

    लोगों का काम हैं कहना ।



    अंजलि व्यास

                            

  • #काव्योत्सव

    " याद आता है ,गुजरा बचपन हमारा।"

    प्यारा और सुहाना वो बचपन था ,हरदम बस ख्वाबों का ही एक मेला था ,

    बचपन था ऐसा जिसमे मानो सबकुछ मेरा था।
    माँ-पापा का दुलार,दादी - नानी का प्यार ,

    रोनी सी सूरत बनाकर बचकर निकल जाते थें करके गलतियाँ हज़ार।
    मासूम़ सी सूरत बन जाती थी विश्वास की मूरत ,

    जुबां से निकले हर शब्द पर कहतें 

    बच्चें मन के कितने सच्चे ।
    पल में कट्टी,पल में दोस्ती,

    लंबी दुश्मनी किसी से न होती।

    करते स्कूल में स्कूल-बैग्स की अदला बदली ,

    जिसका टिफिन चट कर जाते सारा 

    फिर वो पीछे शोर मचाता 

    धमा-चौकड़ी ऐसी की टीचर्स का भी सर दर्द कर जाये 

    जिस दिन स्कूल की छुट्टी ,सब शिक्षक शांति मनाये 

    याद आता है गुजरा बचपन हमारा ।

    ज़रा-ज़रा सी बात पे रोना,फिर बात मनवाकर मुस्कुरा देना ,

    और नानी से रात में घंटों परियों की कहानी सुनना 

    और चुपके से निंदिया रानी का आ जाना ।
    खेल में मस्ती,पढ़ाई में झपकी,

    स्कूल न जाने के बहाने सारे , याद आते हैं अब वो गुजरे ज़माने 

    पापा से पॉकेट मनी माँगना , 

    पसंद आई कोई चीज और न मिले 

    तो बीच सड़क ही पैर पसार लेना ,

    याद आता है गुजरा बचपन हमारा ।
    वो इतवार का बेसब्री से इंतजार करना और देर तक सोना,

    लाख़ उठाने पर भी फिर से सोना

    गुड्डे -गुड्डी का वो ब्याह रचाना

    रसोई के छोटे -छोटे खिलौनों से खेलना 

    झूठ -मुठ की चाय और खाना बनाना 

    टीचर -टीचर खेलकर बाकी दोस्तों पर झूठी धौंस जमाना 

    घर-घर , लंगड़ी न जाने कितने ही खेलों का पुलिंदा 

    आज याद आता है गुजरा बचपन हमारा 
    छुट्टियों में नानी के घर जाने का शोर,

    दिवाली में मामा से मिले पटाखों का शोर 

    और एक दिन भी न पढ़ने का होश,

    याद आता है ,गुजरा बचपन हमारा ।
    चाचा चौधरी की काॅमिक्स , और दिवाली की छुट्टी 



    इन सबके आगे भूख़ प्यास भी न लगती,

    एक दिन में ही होमवर्क हो जाता सारा 

    और झूमते रहते दिन सारा 

    आसमान में हवाई जहाज जाता देख खुशी में खूब ताली बजाना,

    एक अलग ही मज़ा था दूसरों के बगीचे से अमरूद चुराकर खाना।

    मंदिर के पीछे छुपकर गुंदे खाना 

    त्योहारों के दिन आईस्क्रीम खाया करते थें,

    ,सब पॉकेटमनी खर्च कर दिया करते थें।

    पैर छूने के बहाने सबसे पैसे माँगा करते थे और 

    दिवाली पर मिले सारे पैसे गिना करते थे,

    किसी को हाथ तक लगाने नहीं देते थे

    सर्दी-खाँसी,बुखार से ज्यादा कुछ होता नहीं था,

    खेलते ,गिरते और फिर उठते थें पर कुछ टूटता नहीं था।

    किसी के भी घर चले जाया करते थे,

    खा-पीकर मजे करते थें,

    और आज का वक्त है जो फिक्र से है भरा है,

    इतनी व्यस्तता हो गई है कि अपनों से मिलने का वक्त नही है।

    बचपन का दौर हमारे आज से बिल्कुल न मेल खाता 

    बस में नहीं फिर से बचपन में लौट जाता,

    और बेफिक्र होकर फिर से कागज की कश्ती बनाकर ,

    नदियाँ से पार लगाना

    इसीलिए शायद याद आता है ,गुजरा बचपन हमारा।

    अंजलि व्यास

  •  #काव्योत्सव

    "इतने सारे रावण कहाँ से आते हैं????"

    हर साल रावण जलाएँ जाते हैं 

    हर साल मिटायें जाते हैं

    फिर भी रोज इतने सारे रावण कहाँ से आते हैं???.....

    वो रावण तो राम के हाथों मोक्ष का दिवाना था 

    पर यहाँ तो कभी भी किसी गली में , कभी किसी नुक्कड़ पर  कभी सुनसान सी राहों में रोज़ नए रावण मिल जाते हैं ,

    कभी "निर्भया" तो कभी एसिड अटैक की शिकार "सोनाली मुख़र्जी "लक्ष्मी अग्रवाल "झुँझ जाती हैं इन रावणों से  तो

    कभी किसी रावण के हाथों किसी पेड़ से लटका कर मार दी जाती हैं |

    और भी कम पडे तो हमारे नेता कहते हैं  "बढ़ावा दोगे तो यहीं  होगा ना "|

    जो ख़ुद बेनक़ाब हो गए वो इन रावणों कि गवाही को आगे आते हैं |

    "अमृतसर "हादसें में हुए नरसंहार से बचते -बचाते जो भाग जाते हैं ,

    ऐसे पत्थर दिल और भगौड़े नेताओं को हम चुनकर हमारा रक्षक बनाते हैं|

    कभी -कभी सच में तरस आता है, की इन रावणों की

    करनी पर वो हर साल होता बदनाम हैँ

    ग़लत मार्ग चुनकर भी उसने तो मोक्ष था पाया  

    उसने सीता अपहरण किया

    पर संयम कभी न खोया अपना पर इनका तो कहना ही क्या ...??

    खुद के पापों को छुपाने एक औरत पर ही लांछन लगाते हर सीमा ,हर मर्यादा लांघ जाते

    फिर भी शान से अपनी तथाकथित मर्दानगी दिखाते

    ये रावण तो जिते -जी नारकीय कृत्य कर असुरों को भी पीछे छोड़ चले 


    फ़र्क़ बस इतना हैं के वो रावण बदनाम हैं 

    ये सारे रावण बेलगाम हैं 

    वो रावण हर साल जलता है पर ये सारे आज़ाद हैं 

    क्या सिर्फ रावण के पूतले भर फुकने और चौराहों पर मोमबत्तियाँ जलाने भर से रावण मिट जायेगा  

    रावण तो आपमें हम सबमे है

    पर जैसे इसे हर साल अनदेखा कर शराफत का नकाब ओढ़े फ़िरते हैं  

    रावण के पुतले बनाते हैं ,जलाते हैं ,पर अपने अंदर के रावण को क्यों छुपाते हैं ??

    मैं पूछती हूँ आपसे,और इस समाज से ??

    किसने हक़ दिया इन्हें रावण को जलाने का ??

    जब इनमे ही है उस रावण की प्रतिछाप

    पुतले फुंकने से रावण कभी मरेंगे नहीं

    जब तक अपने अंदर के रावण को हम जलाएंगे नहीं

    हर साल रावण जलाएँ जाते हैं 

    हर साल मिटायें जाते हैं

    फिर भी रोज इतने सारे रावण कहाँ से आते हैं???????

    अंजलि व्यास

  • #काव्योत्सव

    मुझे माफ़ कर दे माँ


    तूने मुझे नौ महीने कोख़ में रखा  

    पर मैं तुझे नौ दिन भी अपने घर में नहीं रख सका  

    मुझे माफ़ कर दे माँ .।

    मेरी किलकारियाँ तेरी नींद में खलल डालती  

    मेरा रोना भर तुझे मेरी हर जरूरत का एहसास करा जाता था  

    मेरा शिशुरूप हो या बचपन सब में तुझे अपना अक्स नजर आता  

    पर मैं तेरे बचपन से भरे बुढ़ापे का एहसास न कर पाया  

    मैं तेरी झुर्रियों से भरे चेहरे की थकान , तेरी तन्हाई तेरे अकेलेपन को समझ न पाया  

    मुझे माफ़ कर दे माँ ........।

    ऊँगली पकड़ तूने चलना सिखाया  

    तुतली मेरी बोली को तूने दिल में बसाया   

    पर तू जब भी कुछ कहती  

    तो तुम्हें झिड़क दिया  

    तेरे शब्दों को कभी समझ न पाया  

    मुझे माफ़ कर दे माँ .......।

    अपने मन को मार हमेशा कभी खिलौनें तो कभी किताबें 

    कभी कपड़ें तो कभी हर ख़्वाब तूने मेरा अपनाना  

     मुश्किलें हजार सही पर हमेशा मेरा साथ निभाया  

    पापा का साया सर से उठ गया  

    तो तूने अपने आँचल में छुपाया  

    सारे अपने सपनों को मेरे सुपर्द कर दिया  

    पर मैं तेरा साथ न निभा पाया 

    मुझे माफ़ कर दे माँ .....।


    मुझे अपने पैरों पर खड़ा कर तूने हर फर्ज बखूबी निभाया  

    बेटी ,बहु ,पत्नी सब तेरे रूप थे पर तूने पहला माँ का धर्म निभाया  

    अनगिनत जगरातें किये मेरे भविष्य को तूने सवार  

    बुढ़ापे की लाठी समझ  सर्वस्व मुझ पर समर्पित कर दिया 
    तू माँ ही नहीं सबसे अच्छी माँ बन गई पर  

    मैं तेरा बेटा न बन पाया  

    तू तो सुमाता बन गई  

    पर ये पूत कभी सपूत नहीं बन पाया  

    बुढ़ापे में तुझे पराश्रित कर दिया  

    मुझे माफ़ कर दे माँ ....।

    तू साथ नहीं है आज मेरे  

    पर हर वक्त तू आस पास रहती है  

    तेरी परछाई जैसे कहती है  

    बेटा मेरा कल तेरा आज है  

    आज मेरी तरह तू भी लाचार है  

    पूत तेरा सपूत न बन पाया  

    शायद मेरा यही गुण मेरे बेटे ने भी आजमाया  

    मुझे माफ़ कर दे माँ.......????

    मुझे माफ़ कर दे माँ....???

    मुझे माफ़ कर दे माँ........। ??



    अंजलि व्यास

  • #काव्योत्सव

    तलाख ,डाइवोर्स,छुट्टाछेड़ा


    तुम्हारे लिए बस ये एक नाम था

    पर जब ये जिंदगी की हकीकत बन सामने आया तो बिखर सी गयी थी मैं

    सासे थम सी गई थी अपने आप में ही सिमट कर रह गई थी

    सोचती रह गई के सात जन्मों का यह बन्धन क्यों साथ मेरा निभा न सका|

    पहले विश्वास टूटा

    फिर खुद को टूटता देखा

    आसुओं का सैलाब सा उमडा था जैसे दिल को किसी ने मेरे अपने पैरों तले रौंदा था|

    समझ न पाई क्या कसूर था मेरा क्यों टूटा विश्वास मेरा

    क्यों खोया विश्वास अपना अभी तो रिश्तें को नीव को रोपा ही था मैंने

    फिर क्यों कलियाँ ये मुरझा गई

    सहते -सहते थक सी गई थी पर तुमने कभी मुझसे इंसानियत भी न निभाई|

    तुम्हें अपना समझ तुम्हारे जीवन में थी आई

    पर तुमने थी हैवानियत ही दिखाई, प्यार से जुड़े रिश्ते की तुमने राहें ही जुदा कर दी

    भरोसे की जगह मतिभृम को दे दी

    समझ न पाई क्यों बीच मझदार में छोड़ इस बंधन की गाँठ को तुमने एक सूत्र में बंधने नहीं दिया|

    लोगों की उंगलिया कभी न रुकेगी

    अनगिनत निगाहें सदा घूरेंगी तानों और झूठे दिलासों से दुखी करेंगी

    जैसे मेरा वजूद बचाना अपराध था मेरा


    सब सहकर भी रिश्ते की मर्यादा निभाना पाप था मेरा

    कुछ भी समझ न पाई ...

    माँ -बाबा की बेटियाँ हैं हम भी

    नाजो से पलि पापा की परियां हैं हम भी

    किसी के कलेजे का टुकड़ा और घर आँगन की बाग़िया हैं हम भी

    कब तक दहेज़ क नाम पर यही जुल्मो सितम ढाते रहोगे

    कब तक पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और संस्कारों के नाम पर शोषण करते रहोगे

    कब तक अपनी हवस की खातिर यूँ ही नारी जाती की अस्मत पर आंच आने ही दोगे

    कब तक...... आखिर कब तक ....!!!!!

    क्यों नहीं कोसती कभी तुम्हे आत्मा तुम्हारी

    या मर गई है आत्मा भी तुम्हारी

    क्यों नहीं समझती एक औरत को औरत कभी

    तुम्हारी माँ-बहिन बेटी भी तो औरत ही है फिर क्यों अब तक ये भेदभाव जारी है

    या किसी को खिलौना समझ खेलना बन गई है अब आदत तुम्हारी


    अंजलि व्यास