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  • #काव्योत्सव २.० #प्रेरणा

    दरख़्त की सूखी छालों को
    ना कमजोरी समझ लेना,
    ये तो है वक़्त का चक्कर
    बस इतना समझ लेना।
    उसके झड़ते हुए पत्ते
    उसकी टूटी हुई शाखें
    गुलिस्ता भी जानता है
    उसकी शोहरत समझ लेना।

    चमन के फ़ूल ये सारे
    बगीचे की सारी कलियां
    जानते हैं परिंदे भी
    जानती भी है ये नदियां
    गमों की, की नहीं परवाह
    जिसने पूरे जीवन में
    रहा देता सदा खुशियां
    मेहरबानी समझ लेना।

    आज भी है खड़ा सख़्ती से
    ढूंढता है अपनी ताकत
    पूछता है जड़ों से वो
    दोगी ना साथ तुम मेरा,
    जमीं को साथ लेकर फ़िर
    जो बोली वो जड़ें उससे
    सवारूंगी फ़िर से तुझको
    मेरी ममता समझ लेना।


    उपरोक्त कविता का तात्पर्य है कि कोई भी कितना भी बड़ा हो जाए, कितने ही लोग उस पर निर्भर हो और वो भी एक लंबे समय तक अपनी जिम्मदारियों का निर्वाह करते हुए अपने जीवन को समर्पित कर दे।
    किंतु जब उसको आगे बढ़ने के लिए कभी हौसले की आवश्कता होती है तो उसको जन्म देकर पालने वाली मां सदैव ही उसके सामने प्रेरणा बनकर प्रकट होती है, चाहे वो प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष।

  • #काव्योत्सव2 #प्रेरणा


    जिंदगी तुझसे शिकायत नहीं

    तूने जो दिया वो कम तो नहीं

    हो मुक्कमल अधूरे ख़्वाब मेरे

    मेहनत,लगन से किनारा नहीं