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और जनता हार जायेगी

written by:  vivekanand rai
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5.0

वे दिन बीत गए जब संसदीय जनतंत्र और कल्या्णकारी राज्य् एक-दूसरे के लिए कार्य करते थे। हालांकि दोनों औद्योगिक पूँजी के ही उत्पारद हैं। अब संसदीय जनतंत्र पूँजीवादी जनतंत्र में तब्दीमल हो चुका है, इसलिए उसकी प्रक्रिया और परिणति पर कोई दुविधा बेमानी है। फिर भी औचित्यं के लिए कुछ नाटक तो करने ही पड़ते हैं । इसके तहत फिलहाल राज्यई प्रायोजित बहस इस गणित पर कराई जा रही है कि आगामी आमचुनाव में किस दल, गठबंधन और नेता की जीत होगी और किसकी सरकार बनेगी। दरअसल, विचार और बहस इस पर होनी चाहिए कि आगामी लोकसभा और सरकार कितनी संप्रभु और जनपक्षधर होगी। इस कोण से चिंतन और चर्चा का कारण यह है कि भूमंडलीकृत भारत में जितने लोकसभा चुनाव हुए हैं और उनकी कोख से जितनी भी भारत सरकारें बनी हैं, उनकी संप्रभुता में निरंतर गिरावट हुई है। ऐसा इसलिए हुआ है कि भयावह अंतरराष्ट्री य दबावतंत्र देश पर काबिज़ करा दिया गया है और सरकारें उनकी मन-माफ़िक चल रही है। इस स्थिति‍ में ज़ाहिर है कि सोलहवाँ लोकसभा चुनाव भी पहले की तरह भीषण दबावतंत्र के साए में होगा। अब सिर्फ़ यह पहचानने की ज़रूरत है कि इस दबावतंत्र में कौन-कौन सी शक्िण दयाँ और घटक भागीदार हैं। यदि शिखर से धरातल तक दबावतंत्र में भागीदारी की सूची बनाई जाए तो नामावली काफ़ी विस्तृतत होगी, इसलिए कुछ महत्व पूर्ण शक्िावतयों और घटकों को रेखांकित करना ही सामयिक और प्रासंगिक है।

Mirza Hafiz Baig  30 Jan 2017  

दुनिया, देश, समाज के बारे मे सच्चाई । हर एक से इसे पढने की अपील करता हूं ।