एक थी सीता (विश्वकथाएँ)

एक थी सीता (विश्वकथाएँ)

कलियुग1

एक थी सीता7

सागर-कन्याएँ14

विराट16

मकड़ी का तार23

शठ पत्नी26

अनन्त प्रेम29

कलियुग

डेविड स्टेटन

इत्तफाक की बात कि दक्ष के एक और पुत्री थी - विजया। वह सुन्दर नहीं थी। बुद्धिमान तो थी, पर काफी बुद्धिमान नहीं। किसी पुरुष ने उसकी कामना नहीं की, इसलिए वह बिन ब्याही रह गयी। वह प्रौढ़ा कुमारी अपनी ब्याहता बहन सती के पास आती-जाती रहती थी, सिर्फ स्पर्शसुख प्राप्त करने के लिए। आदत से भी कुँवारी ही थी - अपने पिता दक्ष और शिव से चिढ़ी हुई भी रहती थी क्योंकि वे सती को अतिरिक्त स्नेह देते थे। उसका कोई खयाल नहीं करते थे।

यह दुखी आत्मा अक्सर सती से यही कहती थी - प्यारी बहन, मैं तेरी जगह होती तो मैं..., और कहते-कहते सपने लेने लगती - जैसा सपना वह इस वक्त भी ले रही थी। शैया पर पसरकर खर्राटे लेते हुए। बायें नथुने के बिल से जैसे ईर्ष्या का विषैला सर्प भीतर रेंग रहा था, अपनी लौ जैसी जीभ चमकाता हुआ... जैसे कोई गुफावासी चिराग लेकर गर्भाशय की तरह की साँसों की खोह में चुपचाप उतर गया हो... वहाँ जाकर विषैले अण्डे देने और कपट रचना करने के लिए वह सन्तुष्ट भी कि देवी ने स्वप्न में उसे सर्प प्रतीक दिखाया था।

दक्ष ने एक और बड़े यज्ञ का आयोजन किया था, सिर्फ इसलिए कि शिव को आमन्त्रित नहीं करना था, दक्ष ने पुत्री सती को भी नहीं बुलाया था। अगर सती अपनी इच्छा से यज्ञ में आ जाए तो दक्ष को शिव का अपमान कर सकने का दोहरा सुख प्राप्त होता-दक्ष ने यही सोचा। वैसे ऊपरी तौर से दक्ष ने यह दूसरा यज्ञ ब्रह्माण्ड और जीव सृष्टि के उपकार के लिए आयोजित किया था। इस यज्ञ में उन्होंने अपनी सारी बची हुई सम्पदा व्यय कर दी थी। आठ हजार आठ सौ ऋषि और साठ हजार ब्राह्मण-पुरोहित मन्त्रोच्चार के लिए आमन्त्रित थे। देव प्रजापालक द्वार रक्षक बने हुए थे। अग्निदेव हजारों यज्ञवेदियों में प्रज्वलित थे। व्यवस्था में कोई कमी नहीं थी।

यहाँ तक कि पर्वतों को बुलाया गया था, नदियों से आग्रह किया गया था, मेघों को आमन्त्रित किया गया था। देवता, पक्षी, वन्य पशु, शक्ति, वृक्ष, तृणों तक को निमन्त्रित किया गया। कोई पूछता कि शिव को नहीं बुलाया गया तो सीधा उत्तर मिलता - ‘वह भिखारी है, यज्ञ में उसका क्या काम!’

और दक्ष प्रजापति ऊपर से जोड़ देते ‘मुझे भी खेद है पर क्या किया जाए।’

सृष्टि के देवताओं ने यह सुना तो दक्ष को सान्त्वना दी कि खेद क्यों करते हैं और वे अपने-अपने कक्ष में चले गये। अब तक अलग-अलग कक्षों का एक नगर ही बस गया था... और उन ऋषियों की प्रतीक्षा थी जो कहीं आते-जाते नहीं थे, पर इस यज्ञ में सम्मिलित हो रहे थे। धीरे-धीरे पर सतर्कता से बात फैल गयी कि शिव आमन्त्रित नहीं हैं... सभी को भय था और सब जानते और भीतर ही भीतर मानते भी थे कि शिव अपवित्र और अपात्र हैं!

दक्ष ने कहा - ‘शिव कपाल लेकर भिक्षा वृत्ति करते हैं... और वह भी खाली ही रहता है। मेरी पुत्री सती को भी वह अपने रंग में रँग सके, मुझे यही दुख है!’

दक्ष को मालूम था कि विजया अपनी बहन सती को कितना प्यार करती है, इसलिए उन्होंने विजया को कुछ भी नहीं बताया था। पर अपनी मासूम अबोधता में विजया, जिसके भीतर ईर्ष्या का सर्प कुण्डली मारकर बैठा हुआ था, निकल पड़ी। उसने जलते चूल्हों से ऊष्मा पाकर स्थली पार की, यज्ञ स्थल के पीछे चल रहे अन्य प्रबन्धों के कक्ष-स्थल को पार किया-जहाँ से गुप्त पथ सीधे हिमालय को जाता था - उन कार्यालयों, संचयघरों और भाण्डार-गृहों से होता हुआ जो विश्वभर की आवश्यकताओं के डिपार्टमेण्टल स्टोर-से लग रहे थे। उन कोषभण्डारों की तो बात ही छोड़िए, जिनसे धन की नालियाँ हर कक्ष को बह रही थीं।

जैसे-जैसे विजया ऊपर चली, सृष्टि के बाजार का एक-एक स्तर उजागर होता गया - सृष्टि का समस्त दैवी-अहंकार जैसे बिक्री के लिए सजा हुआ था और देवता लोग सेल्सगर्ल्स की तरह अपनी गपशप में मशगूल थे - खरीदारों से बेखबर। मन्त्रोच्चार ऐसे चल रहा था जैसे दूकानों पर पूछताछ चलती है। एक ने पूछा, दूसरे ने जवाब दिया - जैसे हवाभरा ट्यूब इधर से उधर उछाला जा रहा हो। इधर मन्त्रोच्चार की रसीद कटी उधर सामान मिल गया पर सब उधार, क्योंकि श्रद्धावान उधारी पर ही रहते हैं, उनके पास अपना क्या होता है...

हिमालय की चोटी पर वह ऐन्द्रजालिक पथ एक सुन्दर जँगले के पास समाप्त हो गया, जिसके आगे सम्राट हिमावत और सम्राज्ञी मेनका का श्वेत-धवल महल चमक रहा था, जिसकी दूसरी मंजिल पर बैठी सती ‘हरे शर्बत’ की चुस्कियाँ ले रही थी।

दोनों बहनें एक-दूसरे को देखकर किलक उठीं।

‘तुम कितनी सुन्दर लग रही हो!’ विजया ने कहा।...

नीचे जंगलों में पेड़ और घास लगातार हिल रही थी, अदृश्य वन्य पशु निरन्तर नीचे की ओर भाग रहे थे। एक नदी दौड़ती हुई आयी, रुकी और नीचे भाग गयी-चट्टानों को एकदम सूखा छोड़कर।

यह सब देखते हुए सती बोली - ‘यह सब मेरी समझ में नहीं आ रहा है। कई दिनों से यह देख रही हूँ... वन्य पशु, पक्षी और नदियाँ न जाने कहाँ जा रही हैं! पहले तो कभी ऐसा नहीं देखा! लगता है सब कहीं चले जाएँगे और हम बिलकुल अकेले रह जाएँगे! ...शर्बत और लोगी?’ सती यही औपचारिकता बरतती थी। क्योंकि विजया को वह भी पसन्द नहीं करती थी।

यह सुनकर विजया पिघल-सी गयी। वह सब बता देना चाहती थी, क्योंकि वह सती को मूर्ख ही समझ रही थी, कि उसे यह भी नहीं मालूम कि क्या हो रहा है। बोल ही पड़ी - क्यों, यह सब यज्ञ में जा रहे हैं, और इतना कहते ही उसने अपना मुँह दबा लिया - बड़ी गलती हो गयी, मुझे यही ध्यान रहा कि पिताजी ने तुम दोनों को भी निमन्त्रित किया है - आखिर वे तुम दोनों को इतना चाहते हैं... पर बहन, विश्वास करो, जानबूझकर उन्होंने तुम लोगों को नहीं छोड़ा होगा। तब तक - जब तक कि कोई कारण न हो। उन्होंने सभी को बुलाया है, इतना तो मुझे निश्चित पता है।

सती ने बहुत संयम बरता, फिर भी आँखों में एक कौंध-सी आ ही गयी।

विजया के भीतर वही विषैला सर्प अब अपने अण्डे को से रहा था, और एक क्षण बाद ही विषैला सँपोला बाहर निकल आया - ‘सुना है कि शिव अशुद्ध हैं। मैं विश्वास नहीं करती, शायद और लोग भी न करें!’ इतना कहकर उसके भीतर की औरत प्रसन्न होने लगी।

सती को जैसे काठ मार गया। वह धधकने लगी। विजया सब देख-समझ रही थी। उसे पता था कि शिव मानस सरोवर पर ध्यान-मग्न बैठे होंगे और सती बिफर रही है। इस समय कोई बीच में पड़नेवाला भी नहीं है। औरत जब विकराल रूप धारण करती है तब उसका कुछ भी भरोसा नहीं होता।

विजया ने धीरे से घी डाला - ‘शायद कपाल के भिक्षा पात्र को लेकर ही बातें उठी थीं... इसलिए नहीं बुलाया गया शायद...’

सती समझ गयी थी। यह वही बेहूदा भिक्षा पात्र था, जिसे छोड़ देने की जिद उसने कई बार शिव से की थी और आज वह भिक्षापात्र ही उन्हें बहिष्कृत कर देने का कारण बन गया था। यह स्थिति बिलकुल वैसी ही थी जैसे कोई आदमी रोज सुबह शेव बनाने की बात नहीं मानता।

अब शिव को भी दण्ड मिल ही जाना चाहिए और हमारा अपमान करने का फल पिता को मिले - यह सोचकर सती ने तय किया कि वह आत्मदाह कर लेगी...

सती ने चिता की तैयारी शुरू की तो विजया घबरा उठी, पर वह अपने को सँभाले रही।

सती ने सोचा - अकेली, बहिष्कृत और अपमानित होकर जीना व्यर्थ है। पिताश्री मेरे विवाह को पसन्द नहीं कर पाये। ऐसी एकाकी स्त्री और कहाँ जा सकती है? ...और सती ने नौकरों को बुलाया, उन्हें आज्ञाएँ दीं, चिता को ठीक करने का हुक्म दिया, आत्मदाह के समय कैसे बाजे बजाये जाएँ, यह तय किया और कुछ घण्टे श्रृंगार करने में लगाये। फिर दौड़कर वह चिता पर चढ़ गयी और खुद ही अग्नि प्रज्वलित कर ली। (सती उसी के नाम पर होती रहीं)

बाजे धीरे-धीरे, बाद तक बजते रहे। सारा सामान पहले से ही बाहर निकाल कर रख दिया गया था। वह चाहती थी कि उसकी अनुपस्थिति पूरी तरह महसूस की जाए। और दूरस्थ एक अनजान तट पर ऊष्म अँधेरे में बन्दरगाह-सा चमक रहा था... कार्थेज जलता हुआ नजर आ रहा था -

जब मैं महानिद्रा में सो जाऊँ

तो मेरी गलतियाँ

तुम्हारे दिल में न चुभें

मुझे याद करना,

पर - आह, मेरे भाग्य पर न रोना...

मुझे याद करना... मुझे याद करना... पर मेरे भाग्य पर न रोना...

सती चली गयी। विजया खामोश रही। कोई कितना ही भावनाहीन क्यों न हो, पर मेरे खयाल से इतना अश्रुविगलित विदागीत अब तक नहीं लिखा गया है, सिवा जे.सी. क्रीगर के उस गीत के... जो पत्थरों तक के आँसू निचोड़ ले। और वही हुआ।

यह लम्बी दास्तान है। शिव अति दुष्ट व्यक्ति हैं। वे एक ही वक्त में दो जगहों पर भी रह सकते हैं, और थे। हालाँकि सती से पिण्ड छूटने पर वे खुश ही हुए, पर उन्होंने चिता के पास ऊपर-नीचे कूद-कूदकर नाचना शुरू किया, क्योंकि लपटों की वजह से वे सती के पास नहीं पहुँच पा रहे थे।

‘तुम नीची योनि में जन्म लोगी!’ शिव चिल्लाये।

‘ईश्वर को धन्यवाद। मैं इस देवत्व से भर पायी!’ सती ने जाते-जाते कहा, वह अभी बहुत दूर नहीं जा पायी थी।

चिता ठण्डी पड़ी तो विजया को अपनी भूल समझ में आयी - यह मैंने क्या किया? और चूँकि उसके पास मन्त्रसिद्धि थी, अतः उसने चिता से राख उठा-उठाकर सती का पूरा शरीर ज्यों का त्यों निर्मित कर लिया। वह केवल उसमें जीवन नहीं डाल पायी। फिर शव के पास बैठकर विजया ने विलाप शुरू किया, नौकरों-सेवकों के लाभ के लिए उसने छाती भी पीटी। बेचारे नौकर यह कभी समझ ही नहीं पाते कि उन्हें कब क्या करना चाहिए, हम लोग मिसाल पेश करने के लिए न हों, तो नौकर-चाकर बड़ी मुसीबत में फँस जाएँ!

शिव ने विलाप सुना तो फिर आये। नन्दी बैल को पास ही छोड़ दिया... वे सती के शव के पास गये, बोले - सो गयी! यह सो क्यों गयी? ...और जैसा कि कभी आकस्मिक भय में एकाएक होता है, उनके अण्डकोष ऊपर को खिंचे और इच्छा जाग्रत हुई... विजया ने उन्हें पूरी घटना सुनायी।

दक्ष को शिक्षा देने के लिए शिव ने अपना वीरभद्र (रौद्र) रूप धारण किया और दक्ष की यज्ञशाला में घुसकर महा विध्वंस मचा दिया। देवता भागने लगे। वे विष्णु के शरीर में छिप गये। विष्णु, जो युवा शक्ति के प्रतीक हैं। विष्णु ने वीरभद्र का मुकाबला किया... पर विष्णु को पता था कि शिव अमर हैं, इसलिए विष्णु ने अक्ल से काम लिया और खिसक लिये। दक्ष तो हवा हो गये थे, उनका पता नहीं था, उनका सारा धन मिट्टी में मिल गया था, और उन्होंने देखा था कि धन नष्ट होते ही कोई उनकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा था, अब उनका नाम फैशनेबल नहीं रह गया था, इसलिए वे अदृश्य हो गये। किसी को नहीं मालूम कि फिर उनका क्या हुआ। गरीब कहाँ दिखाई पड़ता है किसी को!

विध्वंस कर लेने के बाद शिव शान्त हुए तो उन्होंने सती के शव को सामने पाया, देखकर निर्वाक् रह गये।

(पर शिव का भरोसा?) देवताओं ने मौका पाकर फौरन कामदेव को आदेश दिया कि वे शिव में शव के साथ कामक्रीड़ा करने की इच्छा पैदा करें। कामदेव ने जो हमेशा कामकौतुक की विलक्षणताओं पर मुस्करा देते हैं, फौरन पाँच कामशर छोड़े...

...शिव ने सती का शव बाँहों में उठा लिया और दूसरी बार तीव्र अभिलाषा से भर उठे, पहली बार अभिलाषा तब जगी जब सती मर गयी थी और फिर जब सती मरी नहीं थी। सती की ढीली बाँहें इधर-उधर लटक रही थीं... उनके पीछे और नीचे टकराती हुई। शिव की आँखों से आग और तेजाब के आँसू बह रहे थे।

देवता दहल गये - अगर आग और तेजाब के ये आँसू इसी तरह गिरते रहे तो स्वर्ग की दूसरी मंजिल और धरती जल जाएगी और हम सूअरों की तरह भुन जाएँगे। सो उन्होंने शनि से विनती की कि शनि देवता शिव के इस क्रोध को अपने प्याले में ग्रहण करें।

सती का शव अनश्वर है, इसलिए हमें उनके अंगों का विच्छेद कर देना चाहिए! देवताओं ने राय की।

शनि का पात्र बहुत छोटा था, उसमें शिव के अग्निअश्रु नहीं समा सके। वे आँसू धरती के सागरों में गिरे और वैतरणी में चले गये।

(और जैसा कि देवताओं ने चाहा था) सती के अंग टूट-टूटकर गिर गये। योनि एक जगह गिरी, वक्ष दूसरी जगह, आँखें तीसरी जगह... और इस तरह सती का पूरा शरीर बिखर गया। शिव एक बार फिर जोगी हो गये... अपनी खाली बाँहें देखकर और इधर-उधर ब्रह्मा के साथ घूमते रहे...

एक वर्ष बाद वे दिगम्बरों के समाज में पहुँचे। शिव वहाँ भिक्षाटन करते, पर दिगम्बरों की पत्नियाँ उनके प्रति आसक्त हो गयीं...

अपनी पत्नियों का यह हाल देखकर दिगम्बर देवताओं ने शाप दिया - इस व्यक्ति का लिंगम् धरती पर गिर जाए!

लिंगम् धरती पर गिर गया। प्रेम तत्काल नपुंसक हो गया - पर देवताओं ने यह नहीं चाहा था। उन्होंने शिव से प्रार्थना की कि वे लिंगम् को धारण करें।

अगर नश्वर और अनश्वर मेरे लिंगम् की पूजा करना स्वीकार करें, तो मैं इसे धारण करूँगा अन्यथा नहीं! शिव ने कहा।

वे यह स्वीकार नहीं कर पाये, यद्यपि प्रजनन का वह एक मात्र माध्यम था, इसलिए वह वहीं बर्फ में पड़ा रहा... और शिव ने दुख की अन्तिम श्रृंखला पार की और उस पार चले गये।

और तब धरती पर 3,600 वर्षों के लिए शान्ति और अत्याकुल युग का अवतरण हुआ - जोकि शायद इस युग तक चलता, अगर तारक नाम का आत्मसंयमी कट्टर राक्षस पैदा न हुआ होता। क्योंकि उसका आत्मनिषेध देवताओं के लिए खतरा बन गया। जरूरत थी दुनिया को पवित्र रखने की, दूसरे शब्दों में अपने लिए सुरक्षित रखने की।

भविष्यवाणी यह थी कि तारक का वध एक सात दिवसीय शिशु द्वारा किया जा सकता है, जो शिव और देवी के सम्मिलन से होगा, जो एक वन में जन्म लेगा और कार्तिकेय नाम से जाना जाएगा। कार्तिकेय यानी मंगलग्रह अर्थात् युद्ध का देवता - वह ग्रह जो सब देशों को दिशा देता है।

और इसलिए जरूरी हुआ कि यह ‘काम-दी’ फिर दोहरायी जाए। एक बार फिर दक्ष प्रजापति देवी के पास गये। एक बार फिर कामदेव ने शरसन्धान किया। एक बार फिर उस महायोगी का ध्यान भंग किया गया, जो कि आज के जमाने में कर सकना जरा ज्यादा मुश्किल है, बनिस्बत पुराने जमाने के।

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एक थी सीता

टॉमस मान

टॉमस मान 1875 में जर्मनी में पैदा हुए और 1955 में स्विट्जरलैण्ड में उनकी मृत्यु हो गयी। उनके साहित्य पर 1929 का नोबेल पुरस्कार दिया गया। उन्होंने उपन्यास, कहानियाँ और निबन्ध लिखे हैं, यहाँ उनकी एक भारतीय दन्तकथा का संक्षिप्त रूपान्तर दिया जा रहा है।

कर्म से ग्वाले, क्षत्रिय कुल के सुमन्त्र की सुगठांगी सुन्दरी सीता और उसके दोनों पतियों (अगर पति कहना ही अपरिहार्य हो तो) की कहानी ऐसी है कि श्रोता से श्रेष्ठ मानसिक बल व माया के विविध रूपों की प्रतिक्रिया में अविचलित रहने की माँग करती है।

स्मृति के अन्तर्गत आनेवाले एक काल में जगद्धात्री के वक्ष पर अन्तरंग मैत्री के कोमल बन्धनों में दो नवयुवक रहा करते थे। भवभूति का बेटा श्रीदामा कुल से ब्राह्मण, कर्म से वणिक और आयु में अपने सखा गर्ग के बेटे नन्द से तीन वर्ष बड़ा था। यादववंशी, अठारह वर्षीय नन्द कुलीन नहीं था, किन्तु व्यवसाय ही करता था। श्रीदामा के लिए ब्राह्मणमार्गी संस्कारों को तजना कर्म बदलने के बावजूद कठिन था, अतः वह अध्ययन, गाम्भीर्य, सुसंस्कृत भाष्य से अलंकृत था, जबकि नन्द को, शूद्र न होते हुए भी इन वस्तुओं से कुछ ज्यादा लगाव नहीं था। दोनों के शरीर भी इसी भाँति विभिन्न थे। नन्द श्यामकाय महाबली था, श्रीदामा ओज मण्डित मुखश्री व चन्द्रवर्ण से विभूषित था, किन्तु कृशकाय था। कोशल भूमि के गोपुरम् ग्राम में दोनों रहते थे और दोनों की आमूल विभिन्नता ही अभिन्न मित्रता का मूल थी-ऐतद् वैतद् के सिद्धान्तानुसार सहचारिता एकानुभूति को जन्म देती है, एकानुभूति अन्तर की ओर ध्यान आकर्षित करती है, अन्तर से तुलना उद्भूत होती है, तुलना असहजतापूर्ण विचार उपजाती है, असहजता अचरज की ओर ले जाती है, अचरज शंसा का मार्ग प्रशस्त करता है और शंसा से अन्ततः हम परस्पर विनिमय के उद्योग द्वारा संयुक्त हो जाते हैं। दोनों मित्रों में दारुण भिन्नता के कारण वैसी नोक-झोंक होती रहती थी जो ऐसी मैत्री का भावमय अलंकार होती है।

नन्द को व्यावसायिक दृष्टि से एक योजना बतानी पड़ी, जिसमें उसने अपने परम बन्धु श्रीदामा को भी संग ले लिया, कि यात्रा आनन्दमयी रहे। तदनुसार दोनों मित्र यमुना के तट पर बसे इन्द्रप्रस्थ के उत्तर की ओर कुरुक्षेत्र के निकट पहुँचे। गन्तव्य से कुछ इधर ही माँ काली के एक निवास स्थान के निकट, दोनों मित्रों ने विश्राम-हेतु पड़ाव डाला। स्नान व भोजन से निवृत्त होकर एक मीठी-सी, विद्या-सम्बन्धी झड़प की और वृक्षों के झुरमुट में, अपराह्न वेला में आकाश का सौन्दर्य निहारते लेट गये। नन्द के बदन से उठती सरसों के तेल की महक से मच्छर इत्यादि भुनभुनाने लगे तो दोनों मन्द-मन्द मुसकराते उठकर बैठ गये। तत्काल झुरमुट के पार नन्द की दृष्टि गयी। और सीता के अवतरण का कारण जुटा... जो उस समय स्नान स्थली के तीर पर खड़ी जल को शीश नवाये धारा में उतरने को थी। अर्धवसना युवती की सर्वांगश्रेष्ठ, सुकुमार सुन्दरता के आलोक से चौंधियाकर दोनों विस्मित रह गये। निश्चल व निर्वाक् रहकर उस प्राणमयी रूपयष्टि का प्रभाव-पान करने लगे। दोनों के लिए इस अवलोकन-क्रिया से मुक्त होना तब तक असम्भव रहा जब तक सुन्दरी सीता नहाकर, बदन पोंछकर, अपनी चोली व साड़ी पहनकर चली नहीं गयी, तब तक दोनों ने उसकी स्नान-लीनता में व्याघात पड़ने की शंका से पत्ता तक नहीं खड़कने दिया। यहाँ तक कि उस बीच किसी नभचर, किसी वायु का कलरव तक नहीं सुना! ...नन्द ने यह उद्घाटित किया कि वह उस अनिन्द्य रूपांगना को जानता था। भीष्म ग्राम के सुमन्त्र की बेटी थी वह और उसने उसे अपनी बाँहों पर उठाकर सूर्यस्पर्शी भी कराया था - पिछले वसन्त में, जब एक उत्सव में वह यहाँ आया था। सीता के प्रभाव में रमी-रमी चर्चाएँ करते नन्द और श्रीदामा पूर्व-योजनानुसार, तीन दिन बाद मिलने का स्थान व समय निश्चित करके अलग-अलग हो गये। विलगने से पूर्व श्रीदामा ने प्रवाहित होकर कहा-सौन्दर्य का अपनी छवि के प्रति कर्तव्य भी होता है। इस कर्तव्य को पूरा करके वह एक ऐसी ईहा जगाता है जो उसकी आत्मा तक पहुँचने का मार्ग दर्शाती है ...मैं भी, बन्धु, उस रूप को देखकर तुम्हारी ही तरह प्रभावित हूँ। यह उन्मादावस्था इस दर्शन का कार्य है...

तीन दिन बाद निश्चित स्थान व समय पर जब श्रीदामा नहीं पहुँचा तो नन्द विकल हो उठा। अन्त में जब वह आया तो नन्द यह देखकर बिंध गया कि उसके मित्र के मुखमण्डल पर विषाद और निराशा के घटाटोप बादल हैं। उसने भोजन के लिए क्षमा चाही और बताया कि वह अस्वस्थ रहा है। नन्द ने उसकी बाँह पकड़ी व अकुलाकर पूछा - मेरे भाई, तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?

श्रीदामा ने आत्मस्वीकार किया और कहा कि वह सुन्दरी सीता की अदमनीय कामना से जूझ रहा है और संसार में कहीं कुछ भी रुचिकर नहीं दीख रहा। अतः उसका रोग मृत्युपर्यन्त है। नन्द, मेरे लिए चिता तैयार कर दो! तिल-तिल जलकर मरने से अच्छा होगा कि मैं अपने प्राणों की आहुति दे दूँ।

नन्द ने आँखों में आँसू भरकर कहा, तो मैं भी चिता में तुम्हारे साथ ही पड़ जाऊँगा। क्योंकि तुम्हारे बिना मेरा जीवन अपूर्ण है। देखते हो मेरी यह बलिष्ठ देह केवल आहार के बल पर नहीं पनपी। तुम्हारे ओजस्वी मानस की गरिमा भी उसके अन्तःसंचार का आधार है।

श्रीदामा ने कहा कि क्योंकि नन्द ने भी उसके साथ ही इस रूपसुधा के पान का श्रेय बाँटा था। अतः वह जैसा चाहे कर सकता है। चाहे तो दोनों के लिए चिता तैयार कर सकता है।

सुनकर नन्द ने कहा - मित्र, मैं समझ गया, तुम तीव्र संवेदनशील व कुशाग्र मस्तिष्क के हो। अतः तुम प्रेम का शिकार होकर रह गये। आज्ञा दो तो मैं मृत्यु की बजाय तुम्हारी प्रेम की इच्छा पूरी करने के लिए उद्योग करूँ। सीता सुन्दरी से तुम्हारे विवाह के लिए बात चलाऊँ। मुझे विश्वास है कि वह तुम जैसे विद्वान व कुलीन युवक को पाकर धन्य होगी।

कर सकोगे ऐसा नन्द प्रिय? श्रीदामा ने क्षीण आभा व सन्देह से पूछा।

क्यों नहीं दाऊ जी?

और नन्द ने कर दिखाया।

सीता से न केवल श्रीदामा का तुरन्त विधिवत् विवाह हो गया, अपितु वह ऐसे पति को पाकर मुग्ध भी रह गयी जिसका सर्वांग विद्वत्ता के ओज से प्रद्युमित था। पति-पत्नी के दिन-रात आलोक, नाद और विस्मृति के पुष्पों से सजे-ढँके रहने लगे। घोर ग्रीष्म के बाद वर्षा आयी। और वह भी जाने को हुई, जब श्रीदामा की माता ने सीता को एक बार पीहर हो आने की आज्ञा दी, वह छह मास गुजरते-न-गुजरते, अब अपने गर्भ में श्रीदामा के विवाह का फल धारण कर चुकी थी।

2

अभिन्न नन्द गाड़ी हाँक रहा था। पीछे दम्पती मौन व मग्न थे। नन्द धुन में था। वह ऊँचे स्वर में एक गीत अलापता, बीच में गुनगुनाहट पर उतर आता और अन्त में उसकी बुदबुदाहट भर सुनाई देती। तब वह पीछे घूमकर देखता, दोनों को अपनी ओर देखता पाता। यह क्रम मौन मात्र में परिवर्तित हो गया और तीनों की साँसें भर सुनाई देती रहीं। कई बार तीनों ने एक-दूसरे-तीसरे को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दृष्टि से देखा, तब जाकर उन्हें चेत हुआ कि वे रास्ता भटक गये हैं और वाहन एक विरल स्थल पर बन्द मार्ग के सामने खड़ा है। नन्द ने साहस जुटाकर राह बदली। देर हो चुकी थी, फिर भी रास्ता उसने ढूँढ़ निकाला। मार्ग पर जब माँ दुर्गा का मन्दिर पड़ा तो श्रीदामा ने कहा - नन्द, जरा रोकना! मैं देवी के दर्शन करके तुरन्त आता हूँ।

अन्धकार में, जिसमें तीनों में से कोई भी एक-दूसरे की स्तब्धमति को देख नहीं पा रहा था, श्रीदामा उतरा और मन्दिर के अन्दर चला गया। मन्दिर में, देवी के सान्निध्य में आते ही उसे चहुँओर जीवित वासनाओं के नाना बिम्ब-प्रतिबिम्ब दिखे! संसार उसे तृष्णा, ऐष्णा और काम व लोभ और अविश्वास आदि का आगार प्रतीत होने लगा...

बड़ी देर तक जब श्रीदामा नहीं आये तो सीता ने नन्द से कहा, नन्द प्रिय, जाओ और ध्यान में भूले अपने कोमल सखा को अपनी बलिष्ठ भुजाओं से चेताओ कि विलम्ब हो रहा है, अन्धकार सता रहा है।

नन्द ‘शिरोधार्य’ कहकर वाहन से उतरा और मन्दिर में चला गया, किन्तु वह भी न लौटा।

विचलित होकर स्वयं सीता जब मन्दिर में गयी तो देवी की मूर्ति के सामने का दृश्य देखकर चीत्कार कर उठी...धरती पर पति श्रीदामा और नन्द के शीश कन्धों से अलग पड़े थे, सर्वत्र रक्त फैला था और उस ओर पड़ी एक तलवार चमक रही थी।

हे देवी, तूने मुझे लुट जाने दिया! दिग्गज मस्तिष्क वाले मेरे आदरणीय पति का, जो रातों में मेरा आलिंगन करते थे, जिन्होंने मुझमें काम ज्वार जगाया था और जिन्हें मैंने कौमार्य भेंट किया था, तूने अपनी देख-रेख में प्राणान्त हो जाने दिया और नन्द, जिसने उनके लिए मुझे माँगा था... उसकी बलिष्ठ बाँहें और छाती पर गुदे वो चिह्न, जिन्हें मैं अब छू नहीं सकती। किन्तु देवी, मैं मुक्त हुई, रक्त और मृत्यु ने मित्रता व मर्यादा के वे बन्धन तो हटा लिये जो मेरे और उसके बीच नित भड़कती व बढ़ती हुई इच्छा के आड़े आते थे... मैं यह भेद नहीं छिपा सकती अब कि नन्द ने ईर्ष्यावश मेरे पति का सर उड़ा दिया होगा और फिर पश्चात्ताप में अपना भी अन्त कर लिया होगा। पर यहाँ तलवार एक है और वह नन्द के हाथ में है... कैसे सम्भव हुआ होगा... मैं अभागी बची रह गयी!

नाना विलाप करती सीता बाहर दौड़ गयी और एक वृक्ष के साथ फन्दा बनाकर अपना गला उसमें डालने जा रही थी, कि तत्काल आकाशवाणी हुई और माँ ने उसे आज्ञा दी-ठहर! मूर्खे, मुझसे कह। मुझे सुन!

सीता ने माँ दुर्गा के सामने क्षमा-याचनापूर्वक स्वीकार किया कि उसने नन्द की इच्छा की थी, किन्तु स्पर्श नहीं। और उसकी यह इच्छा पति पर एक रात अर्धचेतावस्था में उसने उद्घाटित कर दी थी। उसी दिन से उसके पति का हृदय बिंध गया था। सर्वनाश की जड़ में यह गुत्थी थी।

माँ ने उसकी भर्त्सना की और वचन माँगा कि अगर वह भविष्य में कभी भी वैवाहिक पावनता को लांछित नहीं होने देगी तो वह उन दोनों निर्दोष पुरुषों को जीवनदान देकर उसका जीवन सुखमय बना सकती है। सीता ने वचन दिया। माँ ने कहा - जा, दोनों के कन्धों पर यथास्थान उनके सिर रख दे उन्हें पूर्ववत् जीवन मिल जाएगा। किन्तु वचन भंग न हो।

माँ की आज्ञा शिरोधार्य कर सीता मन्दिर में लौटी और यथाविधि दोनों कन्धों पर सिर रखकर अपने संसार के लौटने की प्रतीक्षा करने लगी। जब दोनों में प्राण संचार हुए तो वह अपनी भूल पर स्तब्ध रह गयी। उसने श्रीदामा की कृश देह पर नन्द का और नन्द की महाबली देह पर श्रीदामा का सिर रख दिया था। यह क्या हो गया? अब वह पति माने तो किसे? श्रीदामा मस्तिष्क धारी नन्द की देह के आलिंगन में उसे समाना था, या श्रीदामा की देह वाले नन्द के सिर का वरण करना था? विवाद - इतना बढ़ा, भ्रम इतना उपजा कि फैसला करने के लिए एक पंच की आवश्यकता पड़ गयी। क्षमा करो! वह रोती हुई चीखी - देवी, यह मुझसे क्या हो गया?

नन्द की देह पर प्राणित श्रीदामा के मस्तिष्क-सम्पन्न मुख से सुझाव आया कि धनुष्कोटि के ऋषि कामदमन के पास चला जाए! जैसा वह कहें, मान्य होना चाहिए। शेष दोनों सहमत हो गये।

वाहन तक आए तो समस्या उठी कौन हाँकेगा? धनुष्कोटि की राह और ऋषि कामदमन का पता तो श्रीदामा के मस्तिष्क को ही मालूम था। अतः नन्द के सरवाली श्रीदामा की देह के साथ सीता अन्दर बैठ गयी और नन्द की देह के साथ श्रीदामा कोचवान बने।

पूरी बात सुनकर ऋषि कामदमन ने कहा - देह गौण है, आत्मा का विचार व अस्तित्व मस्तिष्क में होता है और मस्तिष्क की प्रक्रिया व यन्त्र सिर में होते हैं। इस प्रकार नन्द की देह पर मण्डित श्रीदामा ही सीता के पति होने चाहिए।

निर्णय होते ही सीता उमगकर श्रीदामा की उस देह में अवगुण्ठित हो गयी। जिसकी बाँहों की इच्छा ने उसके हृदय में, अतीत में, अदम्य लालसाओं का संचार किया था। वह परम प्रसन्न थी, और परम-प्रसन्न था श्रीदामा भी, जिसने नन्द के प्रति कृतज्ञता अभिव्यक्त की - तुम्हारी देह पाकर मैं तुम्हारा आभार अनुभव करता हूँ। मेरे पास अब मानसिक व दैहिक, दोनों ही तरह की शक्तियाँ हैं। मित्र, न्याय तुम्हारे पक्ष में नहीं रहा। मुझे खेद है... अपनी मित्रता वापस न माँगना।

नन्द खिन्न तो था, किन्तु मस्तिष्क से चूँकि गहरा नहीं था, अतः न्याय को उसने सहज रूप में ही लिया। एकान्त में कहीं जाकर उसने संन्यास धारण कर लिया।

पति-पत्नी जब अपने सामान्य जीवन में लौटे तो सीता की खुशी का पारावार न था। उसके गर्भ में ‘नन्द’ का बीज पनप रहा था। यथासमय उसने एक पुत्र रत्न को जन्म दिया, जिसका नाम उसके ससुर व सास ने समाधि रखा।

समाधि का जन्म हालाँकि बहुरंगी उत्सवों के अभिनन्दन के साथ हुआ था, फिर भी कुछ काल पश्चात उसकी दृष्टि के विकार का तथ्य सामने आया। उसे दूर की वस्तुएँ साफ नहीं दिखाई देती थीं और यह दोष तीव्रता से विकसित होता गया।

दिन बीतते रहे। श्रीदामा का मस्तिष्क भी सक्रिय रहा। उसकी विद्वत्ता अपनी जगह रही। परिणाम यह हुआ कि देह से अधिक उद्यम न करने के कारण वह क्रमशः दुबला होने लगा।

समाधि जब चार वर्ष का हुआ तो उसकी दृष्टि पिता की देह की भाँति ही उतनी क्षीण हो गयी कि लोग उसे ‘अन्धक’ कहने लगे।

सीता का ज्वार अब, शुरू-शुरू के दिनों की भाँति ही, नन्द-देह-सम्पन्न पति श्रीदामा के सहवास से निरन्तर अतृप्त रहने लगा। एक ओर यह ग्लानि, दूसरी ओर पुत्र की विकलांगता सीता सुन्दरी के दिन अब घोर दुख में बीतने लगे।

एक दिन श्रीदामा ने पाया कि उसकी पत्नी व पुत्र अन्तर्धान हो गये हैं।

लम्बी यात्रा, विविध रास्तों व ढेरों अनुभवों के बाद सीता जब गोमती नदी के तट पर बसे उस आश्रम में पहुँची जहाँ नन्द साधु-जीवन व्यतीत कर रहा था तो उसे यह देखकर अगाध हर्ष हुआ कि नन्द की श्रीदामा-देह रूपान्तरित होकर अत्यन्त बलिष्ठ व नितान्त नन्दमयी हो उठी है।

‘नन्द, मेरे प्रिय!’ उसने हर्ष-चीत्कार किया और उसकी ओर लपकी।

मेरी प्रतीक्षिता, मेरी प्रिये! नन्द ने उसे बाँहों में लेते हुए कहा - मैं जानता था तुम मेरे बिना न रह सकोगी, तुम्हारे गर्भ में मेरा बीज था। कैसी है मेरी सन्तान?

सीता ने अन्धक की ओर संकेत किया और उसके पहलू की गन्ध में डूबी-डूबी उसे नन्हे जीव की व्यथा-कथा बताने लगी।

जो भी है, जैसा भी है, मेरा रक्त-मांस है मुझे स्वीकार है, अन्धक को दुलार करते हुए नन्द बोला।

अन्धक को एक तो कम दिखता था, दूसरे उसे खेलने को खिलौने दे दिये गये। वह उधर पड़ा रहा, जबकि सीता अपने प्रिय की शैया में पड़ी सुख की अनुभूति में सीत्कार छोड़ती रही।

कहानी के अनुसार यही कहना है कि प्रेमी युगल का यह सुख-सम्मिलन एक दिन और एक रात ही और चल सका! पौ फटने से पहले ही श्रीदामा का आगमन हुआ। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसकी ईर्ष्या व विकृति सामान्य स्तर की नहीं थी!

सीता ने साभिवादन झुककर कहा - श्रीदामा, मेरे आदणीय पति, तुम्हारा स्वागत करना चाहिए था, पर विश्वास जानो, तुम्हारा यहाँ आना स्वागतयोग्य व वांछित नहीं है। क्योंकि हममें से दो जहाँ भी रहेंगे, तीसरे का अभाव सताता ही रहेगा।

मैं तुम दोनों को क्षमा करता हूँ! श्रीदामा बोला - नन्द, कोई भी प्राणी ऐसा न्याय होने पर यही करता जैसा तुमने किया है... मैं सब तजकर एक ओर हो भी सकता हूँ, पर तुम्हीं कहो, हममें से कौन, कब तक, कितना सुखी अनुभव कर सकेगा?

काश, ऐसा होता! सीता ने कहा!

तुमने उचित ही कहा है, भ्राता! नन्द ने कहा - हम दोनों ही इसके बिना अपूर्ण रहे। हम दोनों ने ही इसका सम्भोग किया, पर मैंने तुम्हारी और तुमने मेरी चेतना में। और यह भी हम दोनों में से किसी चेतना का अभाव सह नहीं सकेगी। सम्भवतः मैंने जो विधि-भंग किया है, उसका भी दोष प्रकारान्तर से हम दोनों को लगेगा, क्योंकि हम दोनों मिलकर ही पूर्ण बनते हैं। यह रहीं तुम्हारी वे बाँहें, जिन्हें मैंने खूब बलिष्ठ कर लिया है, और यह रहा वह ‘मैं’ जिसे तुमने कभी अपने लिए चिता बनाने का आदेश दिया था... माँ के चरणों में मैंने भी तब अपना बलिदान अर्पित कर दिया था जब तुमने किया था। मैंने विश्वासघात तुम्हारी उसी देह के माध्यम से किया है, जिसका पुत्र समाधि है और जिसका पिता मैं अनिवार्यतः हूँ। मानसिक रूप से मैं सदैव यह अधिकार तुम्हारा समझूँगा।

अन्धक है कहाँ?

ठीक समय पर ही हमने उसका जिक्र किया। सीता ने कहा - प्रश्न यह है कि उसके लिए रहे कौन? क्या मैं उसके लिए रहूँ? क्या उसे अनाथ जीवन जीने दूँ? सतियों के दृष्टान्त का अनुगमन करूँ? मेरे बिना उसका जीवन सम्भवतः सम्मानित रह सकेगा। पुरुषों की सद्भावनाएँ उस पर बरसेंगी। अतः मैं, सीता, सुमन्त्र की पुत्री, माँग करती हूँ कि चिता मेरे लिए भी तैयार की जाए।

कदापि नहीं! श्रीदामा ने कहा - मैं तुम्हारे अभिमान और उच्च विचारों की अभ्यर्थना करता हूँ देवि, किन्तु तुम विधवा नहीं हो सकतीं। मुझमें व नन्द में से एक भी जीवित रहेगा तो तुम्हें वैधव्य नहीं लगेगा। इसके लिए नन्द को भी प्राण होम करने होंगे। हम दोनों को एक-दूसरे को मारना होगा। वे दो तलवारें हैं...

लाओ, मैं तैयार हूँ... नन्द बोला।

सिर्फ तलवारें ‘दूसरी’ हैं, हम दोनों एक हैं। हम दोनों स्वयं को मारेंगे। हमें सीता को नहीं पाना। हमें ऐहिक वार करने और सहने का दोहरा कर्तव्य निभाना है।

मुझे प्रसन्नता होगी। पर तुम्हें अपने वार से मेरा हृदय बेधना होगा, देह नहीं! अन्यथा सीता प्रेम के अभाव में रह जाएगी।

सीता इस व्यवस्था से सन्तुष्ट हुई। विधिपूर्ण हुई। दोनों जीवों की चिता पर जो समाधि बनी, उसमें सीता ने अपना स्थान पाया। इस समाधि का नाम भक्तों ने ‘अन्धक’ रखा।

सीता की सन्तान इसी धरती पर पली व बढ़ी। वह अन्धक ही कहलायी। उसे महासती की सन्तान कहलाने का सौभाग्य भी मिला, लोगों ने इसी कारण उसके व्यक्तित्व को निर्दोष व सौन्दर्यमय माना। रूप व शक्ति में वह गन्धर्व समझा गया।

दृष्टि की कमजोरी की वजह से वह बहुत दूर तक नहीं देख पाता था। निकट देखता व आत्मकेन्द्रित रहता। इससे उसका अपने मानस से सीधा व पर्याप्त सम्बन्ध रहा। उसने, इन्हीं गुणों के कारण गहन विद्यार्जन किया। बीस वर्ष की आयु में जब वह महाराजा बनारस का गुरु नियुक्त हुआ तो लोग उसे बारजे पर बैठा देखते : दिव्य मुद्रा व आकर्षक सादी भूषा से मण्डित पुस्तक को करीब से देखता हुआ।

***

सागर-कन्याएँ

ख़लील जिब्रान

सूर्योदय (पूर्व) के समीपस्थ द्वीपों को सागर की गहनतम गहराई आवृत किये हैं। लम्बे सुनहले बालों वाली सागर-कन्याओं से घिरा एक युवक का मृत शरीर मोतियों पर पड़ा था। संगीतमय माधुर्य के साथ आपस में वार्तालाप करती हुई वे कन्याएँ अपनी नीलाभ पैनी दृष्टि से टकटकी लगाकर उस लाश को देख रही थीं। गहराइयों द्वारा सुने गये तथा लहरों द्वारा सागर-तट पर सम्प्रेषित यह वार्तालाप मन्द वायु द्वारा मुझ तक पहुँचा।

उन सागर-कन्याओं में से एक ने कहा, “यह वही मानव है जिसका प्रवेश उस दिन हमारे सागर-संसार में हुआ था और उसके प्रवेश-काल में हमारी जलधि ज्वारोद्वेलित थी।”

दूसरी बोली, “जलधि ज्वारोद्वेलित नहीं थी। दृढ़तापूर्वक अपने को सुर-सन्तान कहनेवाला मानव लौह-युद्ध कर रहा था और इस लौह-युद्ध के फलस्वरूप उसका लहू इस हद तक प्रवाहित हुआ कि सागर के जल का रंग लोहित हो गया। यह व्यक्ति मानव-युद्ध का शिकार है।”

पूर्ण साहस के साथ तीसरी ने कहा, “युद्ध के विषय में मुझे कुछ नहीं मालूम, परन्तु मुझे इतना मालूम है कि भूमि को विजित करने के बाद मानव की प्रवृत्ति आक्रामक हो गयी और अब वह सागर-विजय हेतु दृढ़प्रतिज्ञ है। अपने विलक्षण विषय-चिन्तन के कारण उसका सागर पर पहुँचना हुआ। उसकी इस लोलुपता से हमारे प्रचण्ड समुद्र-देवता वरुण कुपित हो गये। वरुण के क्रोध को शान्त करने के लिए (अर्थात् उन्हें प्रसन्न करने के लिए) मनुष्यों ने उन्हें उपहारों एवं वसिरानों का अहर्य देना प्रारम्भ कर दिया, और हमारे बीच आज जो यह मृत-शरीर है, हमारे महान तथा उग्र वरुण देवता को मानव द्वारा समर्पित सद्यः उपहार है।”

चौथी ने दृढ़तापूर्वक स्वीकारा, “हमारे वरुण देवता कितने महान हैं, परन्तु उनका हृदय कितना कठोर है। मगर मैं सागर-सम्राज्ञी होती तो ऐसे उपहार को अस्वीकार कर देती... अब आओ, हम लोगों को इस भुगतान (बन्दी का उद्धार मूल्य) का परीक्षण करना चाहिए। हम लोग भी सम्भवतः अपने को मानव-वंश के सदृश प्रकाशित कर सकती हैं।”

सागर-कन्याएँ मृतक युवक के निकट गयीं। उन्होंने उसकी जेबें तलाशीं और ऊपरी जेब में एक पत्र मिला। अपनी सहेलियों को सुनाती हुई एक सागर-कन्या ने पत्र को पढ़ा :

“मेरे प्रिय,

मध्य रात्रि का आगमन पुनः हुआ है, मेरे प्रवाहित आँसुओं के अतिरिक्त मुझ में धैर्य का सर्वथा अभाव है। युद्ध से रक्त-रंजित भूमि से तुम्हारी वापसी की जो मुझे आशा है, यही मेरी खुशी का कारण है। अपनी जुदाई के समय तुम्हारे व्यक्त शब्दोद्गार को मैं भूल नहीं सकता हूँ - प्रत्येक व्यक्ति को अपने आँसुओं का ही एक आलम्बन है जिसका प्रत्यर्पण किसी न किसी दिन अवश्य होता है।

“मेरे प्रिय, मुझे नहीं मालूम कि मुझे क्या कहना चाहिए, परन्तु मुझे इसका ज्ञान है कि मेरी आत्मा इस चर्म-चीरक (शरीर) में स्वतः निस्सरण करती है... मेरी आत्मा विघटन से पीड़ित होते हुए भी, प्रेम से आश्वासित हुई है जो प्रेम-पीड़ा को आनन्द और क्लेश को सुख प्रदान करता है और यही प्रेम हमारे दो हृदयों को एकीभूत करता है। जब हम लोगों ने उस दिन का चिन्तन किया, जिस दिन सर्वशक्तिमान सर्वेश्वर के सशक्त श्वास से हम दोनों के हृदय एकाकार हुए थे, तभी युद्ध की विकराल ज्वाला प्रज्वलित हुई और इस युद्ध-ज्वाला को और भी प्रज्वलित, नेताओं ने अपने वक्तव्य (भाषण) की आहुति देकर की और तुमने अपना कर्तव्य समझकर उस युद्ध का अनुगमन किया।

“यह कैसा कर्तव्य है कि दो प्रेमियों को पृथक् करता है, स्त्रियों के अहिवात को वैधव्य में परिवर्तित कर देता है तथा बच्चों को यतीम बनाता है? यह कैसी देशभक्ति है कि युद्धों को उत्तेजित करती है और तुच्छ वस्तुओं की प्राप्ति के लिए राज्यों का विनाश करती है? यह कैसा कर्तव्य है कि आततायियों के यश हेतु निरीह व्यक्तियों को मरण-वरण हेतु आमन्त्रित करता है जिन निरीह व्यक्तियों पर न समर्थ और न वंशागत आभिजात्यों की कृपा-दृष्टि ही पड़ती है। अगर कर्तव्य राष्ट्रों की सन्धि को भंग करता है तथा देशभक्ति प्रजा को शान्तिमय जीवन में विघ्न डालती है, तब हम यह कहेंगे कि - ‘कर्तव्य और देशभक्ति को शान्ति मिले।’

“नहीं, नहीं, मेरे प्रिय! मेरे शब्दों का खयाल मत करो! अपने देश के प्रति बहादुर और वफादार बनो... प्रेम में अन्धा बनकर तथा जादुई और एकाकीपन से विकसित होकर मेरी (कुमारी) बातों पर ध्यान मत दो... अगर मेरे इस जीवन में तुम्हें प्राप्त करने में प्रेम असमर्थ रहेगा, तब पुनर्जन्म में हम लोगों को प्रेम निश्चित रूप से प्राप्त होगा।

तुम्हारा सदैव”

सागर-कन्याओं ने पत्र पढ़कर उसे उस मृतक युवक की जेबी में पुनः रख दिया। मौन-स्तब्ध होकर सव्यथा वे सभी कन्याएँ तैरती हुई उस स्थान से दूर चली गयीं और एकत्रित हुईं। उनमें से एक ने कहा, “वरुण देवता के संगदिल से कहीं अधिक प्रस्तर मानव का हृदय है।”

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विराट

स्टीफेन ज़्विग

स्टीफेन ज़्विग जर्मनी के प्रख्यात लेखकों में से हैं। उनकी रचनात्मक उपलब्धियों ने उन्हें विश्व के महान लेखकों की श्रेणी में पहुँचा दिया है। यह उनकी ‘विराट-दी अनडाइंग ब्रदर’ कहानी का संक्षिप्त रूपान्तर है। यह विराट की कहानी है, जिसे उस समय की जनता ने बहुत सम्मान दिया था। लेकिन अब उसका नाम न तो विजेताओं के इतिहास में मिलता है और न सन्त या ऋषियों की सूची में। लोगों को उसकी याद तक नहीं है।

बहुत पहले की बात है। तब महान गौतम बुद्ध भी धरती पर नहीं आये थे और न उनका महान सन्देश ही किसी ने सुना था। उन पुराने दिनों में राजपूताना के बीरवाघ राज्य में एक विमल और सच्चरित्र व्यक्ति रहता था। उसका नाम था विराट। वह तलवार-बहादुर के रूप में विख्यात था। वह विकट योद्धा था, पर प्रकृति से बहुत शान्त। उसे किसी ने गुस्से में चीखते या बिगड़ते नहीं देखा था। वह अतिशय राजभक्त भी था और पंचनदियों के प्रदेश में अपनी न्यायबुद्धि के लिए भी प्रख्यात था। विद्वान उसके घर के पास से गुजरते तो सम्मान में माथा झुकाते थे और बच्चे उसकी भोली चमकदार आँखों को देखकर खुश होते।

एक दिन बीरवाघ के महाराजा पर विपत्ति पड़ी। महाराजा का साला, जो आधे राज्य का राज्यपाल भी था, बिगड़ खड़ा हुआ। उसकी नीयत बिगड़ गयी। वह स्वयं महाराजा बनने का सपना देखने लगा। उसने विद्रोह कर दिया। उसने कूटनीति से महाराजा के विश्वासपात्र योद्धाओं और सेनापति को भी अपनी ओर मिला लिया और विद्रोह का झण्डा बुलन्द कर दिया।

ऐसी विकट परिस्थिति में महाराजा को अपने अनन्यभक्त विराट का ध्यान आया। विराट फौरन हाजिर हुआ और महाराजा ने दुश्मनों-विद्रोहियों को कुचल देने के लिए विराट को सेनापति नियुक्त किया। विराट ने राजभक्ति की शपथ ली और दुश्मनों को नेस्तनाबूद कर देने की प्रतिज्ञा करके उसने बची-खुची फौज को लेकर कूच किया।

विद्रोही सेनाएँ राजधानी से कुछ दूर नदी पार डेरा डाले हुए थीं। उनकी निर्माण-टुकड़ियाँ जंगलों से पेड़ काट रही थीं। ताकि नदी पर पुल बनाया जा सके और राजधानी पर शीघ्र-से-शीघ्र आक्रमण करके राज्य को जीता जा सके। विराट को उस भीषण बीहड़ प्रदेश का भूगोल पता था। वह शिकार के लिए इन जंगलों में आता रहा था। उसे मालूम था कि एक जगह नदी बहुत सँकरी और उथली है। उसने यही तय किया कि रात के अँधेरे में वहीं से नदी पार करके वह विद्रोहियों पर आक्रमण करेगा।

बीरवाघ राज्य की एक विशिष्टता थी-उसके राज्यचिह्न थे दो जीवित बकुल पक्षी! प्रजा का विश्वास था कि जब तक यह बकुल पक्षियों का जोड़ा राज्य में है तब तक कोई विघ्नबाधा नहीं आ सकती। और यह भी कि बकुल पक्षी जिसके आधिपत्य में हैं - वही राजा है!

विद्रोहियों ने राज्य चिह्न के जीवित प्रतीक उन बकुल पक्षियों को भी हस्तगत कर लिया था इसलिए प्रजा भी विद्रोहियों का विरोध नहीं कर रही थी। ऐसी विषम परिस्थिति में विराट ने रात के अँधेरे में ही नदी पार करके आकस्मिक हमला किया और भीषण मारकाट मच गयी।

विराट स्वयं सबसे आगे था। उसके भक्त सैनिकों ने विद्रोहियों के शिविरों में रक्त की नदियाँ बहा दीं। विराट युद्ध करता हुआ उस तम्बू तक पहुँचा, जहाँ बकुल पक्षी रखे गये थे। अन्ततः उसने वहाँ के सारे रक्षक योद्धाओं को मार गिराया और जीवित राज्यचिह्न बकुलों पर अधिकार करके विजय का उद्घोष कर दिया।

जब सुबह हुई और सूरज निकला तो विराट उन शवों को देखने निकला जो रात में मार गिराए गये थे। चारों तरफ अंग-भंग, क्षत-विक्षत सैनिक पड़े थे। उन्हें देखकर विराट के मन में करुणा भी जागी। वे मुण्ड जैसे अब भी खुली आँखों से उसे देख रहे थे। वह मृत पर खुली आँखों का यह दृश्य देखकर भीतर से काँप उठा। मृत योद्धाओं की पलकें बन्द करता हुआ जब वह एक कटे मुण्ड के पास पहुँचा तो उसे पहचानकर दहल उठा - वह विराट के अपने भाई का मुण्ड था जो बकुल पक्षियोंवाले तम्बू के द्वार पर पड़ा था और मृत खुली आँखों से उसे ताक रहा था।

विराट को यह पता नहीं था कि उसका भाई विद्रोहियों के साथ हो गया था। अपनी ही तलवार से उसने यह वध किया है-यह सोचकर वह बेहद उदास हो गया। मृत भाई की आँखें उसने बन्द कर दीं और अपने विजयी सैनिकों को आदेश दिया कि दुश्मन के मृत योद्धाओं की विधिवत अन्त्येष्टि की जाए ताकि पुनर्जन्म के लिए उनकी आत्माएँ पवित्र हो सकें।

विजयी सैनिकों को आश्चर्य हुआ कि उनके सेनापति विराट विद्रोही और षड्यन्त्र करनेवाले सैनिकों की आत्माओं की इतनी चिन्ता कर रहे हैं। वे विराट की करुणा का कारण नहीं समझ पाये।

महाराजा को जब विजय की सूचना मिली तो वे खुद ही सेनापति विराट का स्वागत करने चल पड़े। वे चाहते थे कि विराट को स्थायी रूप से सेनाधिपति बना दिया जाए। जब वे शाही शान से उस जगह पहुँचे, जहाँ लौटते हुए विराट रुकनेवाले थे, तो मिलते ही महाराजा ने अपनी इच्छा प्रकट की कि विराट सेनाधिपति का पद स्वीकार करें।

“महाराज! मैं एक विनती करना चाहता हूँ!” विराट ने कहा।

“विनती? तुम जो इच्छा करोगे, वह तुम्हें मिलेगा... यह मेरा वचन है!” महाराजा ने विराट के इच्छा प्रकट करने के पहले ही वचन दे दिया था।

तब विराट ने करबद्ध होकर कहा, “महाराज! मेरी यह विजयिनी तलवार शस्त्रागार में रख दी जाए, क्योंकि मैंने प्रण किया है कि अब कभी तलवार नहीं उठाऊँगा, क्योंकि इस तलवार से मैंने अपने सगे भाई की हत्या की है... मेरी यह इच्छा स्वीकार की जाए!”

विराट की यह इच्छा सुनकर महाराजा बड़े चकित हुए। पर वह वचन दे चुके थे, अतः बोले, “ठीक है, तुम तलवार मत उठाना, पर सेनाधिपति का पद स्वीकार करो... क्योंकि तुम्हारे शौर्य से यह राज्य जगमगाता रहे और किसी का साहस इस राज्य की ओर देखने का न हो!”

इस पर विराट ने कहा, “महाराज! यह तलवार शक्ति का प्रतीक है और शक्ति सच्चाई की विरोधी है। जो भी तलवार से मारता है, वह स्वयं अपराधी है। मेरी इच्छा नहीं है कि मैं अपने पद से लोगों में भय पैदा करूँ, अतः मैं शक्ति और पद से दूर रहना चाहूँगा।”

महाराजा चिन्ता में पड़ गये। फिर बहुत सोचकर बोले, “मैं सोच नहीं सकता कि तुम्हारे जैसे सच्चरित्र और राजभक्त सेवक के बिना मैं कैसे राज्य चला सकूँगा। तुम न्यायप्रिय हो, अतः तुम राज्य के महा न्यायाधीश का पद ग्रहण करो ताकि मेरे राज्य में न्याय का राज हो!”

विराट ने यह पद स्वीकार किया। और बीरवाघ राज्य में सत्य और न्याय का डंका बजने लगा। विराट की न्यायप्रियता और करुणा की कहानियाँ देश-देशान्तर में फैलने लगीं। विराट अपराधी की आत्मा में पैठकर न्याय करता था। मृत्युदण्ड उसने बन्द कर दिया, क्योंकि विराट की दृष्टि में मृत्युदण्ड देने का अधिकारी वही हो सकता था जो जीवन भी दे सकता हो। अपराधी उसकी अदालत से दण्ड ग्रहण कर भी प्रसन्न हो जाते थे। कभी किसी ने उसके निर्णय पर संशय नहीं किया।

एक दिन विराट की अदालत में पास के जंगली राज्य से एक युवक हत्यारा लाया गया। उसने ग्यारह हत्याएँ की थीं क्योंकि वह एक लड़की से प्रेम करता था। लड़की के पिता ने उसका विवाह किसी और से कर दिया था। यह बर्दाश्त न कर पाने के कारण युवक ने लड़की के घरवालों और उसके पति के घरवालों को मार डाला था।

बहुत सोच-विचार कर विराट ने निर्णय किया - “इस युवक को मृत्युदण्ड तो नहीं दिया जाएगा क्योंकि वह ईश्वर के अधीन है पर इसे कारागार में पाँच वर्ष बन्दी रखा जाए और हर महीने सत्तर कोड़े इसको लगाये जाएँ!”

यह निर्णय सुनकर हत्यारा युवक हिकारत से चीख उठा - “तुम्हें क्या हक है कि मेरी जवानी को यों बर्बाद करो! मुझे अन्धे कारागार में रखो... देना है तो मृत्युदण्ड दो, नहीं तो मुझे यों जीते जी मृत के समान कर देने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है! यह यातना मृत्यु से भी जघन्य है!”

वह युवक तो चीखता हुआ चला गया पर विराट का मन विचलित हो उठा। वह युवक के कथन पर रात भर विचार करता रहा। बहुत उद्विग्न भी हुआ। उसे अपने न्याय पर शंका होने लगी। दूसरी रात वह कारागार गया। उस युवक की अन्ध कोठरी में पहुँचा और उसकी यातना का आत्मानुभव करने के लिए उसने युवक से कहा कि तुम मेरे कपड़े पहनकर निकल जाओ। एक महीना मैं तुम्हारा दण्ड भुगतूँगा ताकि मैं इस यातना का साक्षात्कार कर सकूँ, जो न्याय के नाम पर दी जाती है और जान सकूँ कि कहीं यह न्याय अन्याय तो नहीं है! पर एक महीने बाद तुम लौट जरूर आना... यह वचन देकर तुम जा सकते हो!

वह युवक वचन देकर कारागार से निकल गया। विराट कैदी के कपड़े पहनकर अन्धकोठरी में रह गया। दूसरे ही दिन कारागार के अधिकारी आये, उन्होंने विराट को ही कैदी समझकर सत्तर कोड़ों का मासिक दण्ड पूरा किया। विराट कोड़े खाकर बेहोश हो गया और जब उस अन्धकोठरी में वह कई घण्टों बाद होश में आया तो उसने अनुभव किया कि उस अँधेरे, सन्नाटे, एकाकीपन और शरीर में हो रहे दर्द को लेकर वह जी नहीं पाएगा। एकाएक विराट बहुत घबराने लगा कि यदि उस युवक ने वचन भंग किया और उसे स्वयं ही पाँच वर्ष यह यातना भोगनी पड़ी तो यह मृत्यु से भी बड़ी यातना होगी। वह छटपटाने लगा। वह मुक्त होने के लिए अकुलाने लगा। पर अट्ठाईस दिन अभी और बाकी थे।

और जब तीसवें दिन विराट ने आँखें खोलीं तो उसे अन्धकोठरी की ओर आते हुए कदमों की आहट सुनाई दी। फिर लौहकपाट खुले और रोशनी की चमक आयी। और तब विराट ने आँखों पर जोर डालकर देखा - महाराजा सामने खड़े थे। महाराजा ने कहा - विराट! तुम जो सत्य का प्रयोग कर रहे हो, उसकी सूचना मुझे मिली! तुम महान हो! तुम न्याय ही नहीं देते रहे, बल्कि न्याय के न्याय की खोज-बीन भी करते रहे... तुम सत्पुरुष हो और यह राज्य तुम्हारे जैसा सत्पुरुष पाकर धन्य हुआ है!”

“महाराज,” विराट विनीतभाव से बोला, “अब मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि जो न्याय देने का दम्भ करता है वह न्याय ही सबसे बड़ा अन्याय है! मेरे न्याय के अन्याय से पीड़ित तमाम कैदी यहाँ पड़े यातना भुगत रहे हैं... महाराज, मुझे इस पद से मुक्त किया जाए। मैं अब न्याय के अन्याय को समझ सका हूँ। दण्ड देना केवल भगवान का काम है, हमारा नहीं। मैं अब इस पाप से अपने जीवन को दूर रखना चाहता हूँ... मुझे मुक्त करें!”

“ठीक है, यदि तुम यही चाहते हो तो यही सही!” महाराजा ने कहा, “पर मैं तुमसे सहमत नहीं हूँ!”

“महाराज!” विराट बोला, “मुझे शक्ति और पद मत दीजिए। शक्ति से क्रिया जन्म लेती है। यानी शक्ति सम्पन्न होने के नाते मैं जो भी कहता हूँ वह तत्काल कार्य रूप में बदल जाता है। वह कार्य दुखों और यातना का कारण बन जाता है, जो मेरी शक्ति के बाहर है। अतः मैं केवल निष्क्रिय बनकर रहना चाहता हूँ ताकि मेरी कोई क्रिया पाप का कारण न बने और मेरी आत्मा भौतिक सन्ताप से मुक्त रह सके। अब मैं अपने आप में अकेला होकर अपने घर पर रहूँगा। आप आज्ञा दें!”

महाराजा ने आज्ञा दी और विराट अपनी पत्नी-पुत्रों के पास जाकर विदेह की भाँति रहने लगा। निष्क्रिय और अनासक्त। विराट ने अनुभव किया कि आनन्द का यही रूप हो सकता है। कई वर्षों तक वह विदेह की तरह अपने घर-परिवार में रहता रहा। वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि राय देना आज्ञा देने से बेहतर है। और निर्णय देने से बेहतर है ध्यान में मग्न रहना। छः वर्षों के बाद सहसा उसकी यह शान्ति भंग हुई जब एक दिन उसने अपने घर में मारकूट की आवाज सुनी। देखा कि उसके लड़के एक नौकर को पीट रहे हैं। विराट बहुत दुखी हुआ, क्योंकि उसकी दृष्टि में यह अत्याचार था। उसने अपने लड़कों को रोका और सेवक को मुक्त कर दिया।

लड़कों ने विरोध किया कि इस तरह सब सेवक कामचोर हो जाएँगे और एक दिन इस हवेली में एक भी सेवक नहीं रहेगा। विराट ने सेवक को तो मुक्त करा दिया पर पुत्रों की आँखों में विरोध की आग देखकर रात भर मनन करता रहा। फिर उसने पोथियों को खोला और अपना सही कर्तव्य उनकी शिक्षा की मदद से निर्धारित करना चाहा। और वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि स्वतन्त्रता ही आदमी की सबसे बड़ी और सबसे सच्ची कामना है, अतः किसी को भी परतन्त्र रखना पाप है। परतन्त्रता विचारों और इच्छाओं की भी होती है... यानी हमें यह अधिकार नहीं है कि हम दूसरे व्यक्ति को अपनी इच्छाओं या विचारों का दास बनाएँ!

और इस नतीजे पर पहुँचते ही विराट ने तय किया कि वह अब इच्छाओं और विचारों का अत्याचार भी किसी पर नहीं करेगा... अतः घर-परिवार त्यागकर वह वन में रहेगा ताकि उसकी आत्मा परम पवित्र रह सके, इस पाप से भी मुक्त... कि किसी की इच्छाओं को दबाने का अप्रत्यक्ष पाप भी उसे न लगे!

और विराट दूसरे दिन प्रातःकाल घर छोड़कर जंगल की ओर चला गया। वन में उसने अपनी कुटिया बनायी। धीरे-धीरे जंगल के पशु-पक्षी उसके मित्र हो गये। चिड़ियों ने उसके छप्पर में घोंसले बना लिये, एक बन्दर उसका सहचर हो गया। वह प्रकृति के साथ एकाकार हो गया। धीरे-धीरे विराट के पापमुक्त वनवास की चर्चा गाँवों में फैलने लगी। नदी पार से ग्रामीण उसके दर्शन करने आते। और तब महाराजा को भी पता चला कि विराट कहाँ है। वे नदी के रास्ते नाव पर विराट से मिलने आये और बोले, “मैं केवल यह देखने आया हूँ कि एक सत्पुरुष-ऋषि कैसे रहता है! दर्शन से पुण्य मिलता है! मैं तुमसे कुछ शिक्षा लेने आया हूँ!”

सुनकर विराट ने कहा, “महाराज, मैंने यही सीखा है कि लोगों के साथ रहने की आदत को कैसे भूला जाए... ताकि मैं पापमुक्त रह सकूँ। एकाकी व्यक्ति केवल स्वयं को शिक्षा दे सकता है और किसी को नहीं। मैं अब इस दुनिया के मोह से मुक्त हो गया हूँ। न मुझे कुछ किसी को देना है न लेना है। अब मेरे पास कुछ भी ऐसा नहीं है जो मैं किसी को दे सकूँ... क्योंकि मैं एकाकी हूँ अतः महाराज मेरे पास आपका आना व्यर्थ है!”

यह सुनकर महाराज चले गये। पर वे प्रसन्न थे कि एक ज्ञानी ऋषि उनके राज्य में रहता है जो मोहमुक्त है, पापमुक्त है और प्रभावमुक्त है!

कई वर्ष बीत गये। एक दिन विराट जंगल में घूम रहा था कि एक मृतदेह उसे दिखाई दी। वह एक पुरुष का शव था। विराट ने सोचा इसका दाहकर्म कर दिया जाए ताकि इसकी आत्मा पुनर्जन्म के लिए पवित्र हो सके। अतः उसने चिता बनायी पर अब तक विराट स्वयं इतना दुर्बल हो चुका था कि उस शव को उठाकर वह चिता पर नहीं रख सका। कुछ लोगों की मदद लेने के लिए वह नदी पार करके गाँव में गया। गाँव के लोग विराट को वहाँ आया देख धन्य हो गये। वे उसकी चरणरज लेने लगे और श्रद्धा व्यक्त करने लगे। और कुछ लोगों को लेकर जब वे चलने लगे तो उन्होंने देखा - एक कच्चे घर के दरवाजे पर बैठी औरत उसे घृणा से देख रही थी। वह उसकी आँखों की घृणा का कारण नहीं समझ पाया तो उसके पास गया और पूछा, “माता! आपकी आँखों में मेरे लिए इतनी घृणा क्यों है? मैंने तो आपको कभी देखा तक नहीं... कष्ट तो क्या पहुँचाया होगा... फिर यह घृणा...”

वह औरत बिफर उठी - “तुमने मेरा सर्वनाश किया है! तुमने अपना उदाहरण दुनिया के सामने रखा कि आदमी कैसे पापमुक्त हो सकता है, कैसे निष्क्रिय हो सकता है... और तुम्हारे उदाहरण से प्रभावित होकर मेरा पति भी शान्ति की खोज में घर छोड़कर चला गया... उसके जाने से मेरे जीवन में घोर अँधेरा छा गया। मैं टुकड़े-टुकड़े के लिए मोहताज हो गयी। भूख और गरीबी से मेरे तीन बच्चे मर गये... मेरा सर्वनाश हो गया! मैं तुम्हें घृणा से नहीं देखूँगी तो क्या श्रद्धा से देखूँगी!”

विराट का चेहरा काला पड़ गया। वह धीरे से पर आहत स्वर से बोला, “ओह! मुझे नहीं मालूम था कि मेरा उदाहरण भी किसी को चालित कर सकता है! मैं तो समझता था कि जो कुछ भी कर रहा हूँ वह मैं सिर्फ अपने लिए कर रहा हूँ... माँ, तुमने मुझे आज एक और पक्ष दिखाया है... मैं बहुत दुखी हूँ।”

और यह कहकर विराट वहाँ से चला गया। उसने सोचा - सच्चाई शायद पापमुक्त होने में नहीं, कर्म का दंश भोगने में है कि अभी तक वह एक वृत्त में घूमता रहा है जो कहीं नहीं पहुँचाता, जिसकी अपनी परिधि है... निष्क्रियता भी एक क्रिया है। अतः निष्क्रिय रहकर भी पाप से परे नहीं रहा जा सकता। अपनी इच्छाओं को मारकर भी व्यक्ति दूसरे की इच्छाओं के लिए उदाहरण बन जाता है। वह स्वयं चालित न होकर भी दूसरों को चालित करता है... अतः स्वतन्त्र आदमी भी स्वतन्त्र नहीं है, क्योंकि अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, वह दूसरे के लिए परतन्त्रता का जाल बुनता है। किसी के दुख का कारण बन जाता है... इसलिए स्वतन्त्र वही है जो कर्म के अधीन है... जो अपनी इच्छाओं को, अपने कर्तव्य और दायित्व को कर्म के हवाले कर देता है... कर्म के छोरों पर रहना उचित नहीं है। हम कर्म के मध्य में ही जी सकते हैं...

यह सोचकर विराट महाराजा के पास गया और उसने अपना अन्तर्द्वन्द्व प्रकट करके इच्छा की कि उसे कोई मामूली काम दे दिया जाए। एक सत्पुरुष और सर्वज्ञानी का यह रूप देखकर महाराजा बहुत खिन्न हुआ और उसने विराट को अपने जंगली कुत्तों की रखवाली का काम सौंप दिया।

और उस दिन से विराट - जो राज्य भर में सेनाधिपति, महान्यायाधीश, सत्पुरुष, ज्ञानी, ऋषि, पापमुक्त के रूप में जाना जाता था - जंगली कुत्तों के रखवाले के रूप में सामान्य जीवन जीने लगा। विराट ने अपना कार्य हमेशा ईमानदारी और दक्षता से किया। धीरे-धीरे महल, राजधानी और राज्य के लोग विराट को भूल गये। महाराजा का भी देहान्त हुआ। जो नया राजा हुआ, वह विराट को जानता तक नहीं था।

कई वर्ष बाद विराट की मृत्यु हुई... उसे मामूली सेवक की तरह श्मशान में जला दिया गया। कोई रोने नहीं आया। किसी ने उसकी मृत्यु पर शोकगीत नहीं लिखा। श्रद्धांजलि अर्पित नहीं की। सिर्फ वे जंगली कुत्ते दो-चार दिन उसके वियोग में रोते रहे। और इस तरह विराट ने एक सत्य हमें दिया, पर जिसका नाम कहीं विजेताओं के इतिहास में नहीं लिखा गया... न ऋषियों या धर्म-प्रवर्त्तकों की सूची में शामिल किया गया।

***

मकड़ी का तार

अंकुतागावा

जापानी साहित्य के मध्यकाल में जो युद्ध-साहित्य लिखा गया उस पर बौद्ध दर्शन का विशेष प्रभाव पड़ा है। अंकुतागावा (1892-1927) भी बौद्ध दर्शन से विशेष प्रभावित थे, इसका प्रमाण उनकी यह कहानी है। जापानी लेखकों में अंकुतागावा की रचनाओं का अनुवाद सबसे अधिक हुआ है।

एक दिन बुद्ध स्वर्ग के पद्म सरोवर के किनारे अकेले भ्रमण कर रहे थे।

सरोवर में खिलनेवाले पद्म मोतियों-से सफेद थे और उनका सुनहरी पराग उड़-उड़कर आसपास की सारी हवा को मादक सुगन्ध से भर रहा था।

स्वर्ग में सवेरा हो चुका था।

अन्त में बुद्ध सरोवर के किनारे शान्त खड़े हो गये और सरोवर को ढँकनेवाले पत्तों के बीच से अचानक वह नीचे का दृश्य देखने लगे।

नरक की जमीन स्वर्ग के पद्म सरोवर के एकदम नीचे थी, अतः अनन्त अन्धकार की ओर ले जानेवाली त्रिपथगा नदी तथा सूची पर्वत की बेधक चोटियाँ शुभ्र जल में से स्पष्ट दिखाई दे रही थीं।

तब उनकी नजर कन्दत नामक आदमी पर पड़ी जो अन्य पापियों के साथ नरक के तल में यातना भोग रहा था।

यह कन्दत बहुत बड़ा डाकू था जिसने बहुत-से बुरे काम किये थे, हत्याएँ की थीं और घरों में आग लगायी थी, लेकिन उसने एक अच्छा कर्म भी किया था। एक बार जब वह घने जंगल में से गुजर रहा था तो उसने मार्ग के साथ-साथ एक मकड़ी को रेंगते हुए देखा। पाँव को जल्दी से उठाकर वह उसे कुचलने ही वाला था, जब अचानक उसे ध्यान आया-नहीं, नहीं भले ही यह बहुत छोटी है, फिर भी इसकी भी आत्मा है। इसे बिना सोचे-समझे मार डालना शर्म की ही बात होगी, और उसने मकड़ी की जान बख्श दी।

नीचे नरक की ओर देखते हुए बुद्ध को ध्यान हो आया कि कैसे इस कन्दत ने मकड़ी की जान बख्श दी थी। और उस पुण्य के बदले में, उन्होंने सोचा, यदि सम्भव हुआ तो उसे वह नरक से छुटकारा दिलवाएँगे, सौभाग्यवश, जब उन्होंने इधर-उधर देखा तो उन्हें स्वर्ग की एक मकड़ी नजर आ गयी जो पद्म-पत्रों पर सुन्दर, रजत तार बुन रही थी।

बुद्ध ने खामोशी से उस तार को अपने हाथ में उठा लिया। फिर मोतियों-से सफेद पद्मों के बीच से उन्होंने उसे नीचे की ओर छोड़ दिया-सीधे नरक के तल की ओर।

नरक के तल पर कन्दत अन्य पापियों के साथ रक्त-सरोवर में डूब-उतरा रहा था। हर तरफ गहन अन्धकार था और जब कभी भी उस अन्धकार में से उभरने वाली किसी चीज की झलक दिखाई देती तो वह केवल भयावह सूची पर्वत की चोटियों की चमक ही होती। कब्र की-सी खामोशी हर तरफ छायी हुई थी। बस कभी-कभार पापियों की आहों की अस्पष्ट ध्वनि जरूर सुनाई दे जाती थी। इसका कारण यह था कि यहाँ आनेवाले पापी नरक की अनेक यातनाएँ भोग चुके थे और इस कदर टूट चुके थे कि उनमें जोर से चीखने की ताकत तक नहीं रह गयी थी।

अतः कन्दत भले ही वह बहुत बड़ा डाकू था - रक्त के कारण दम घुटता महसूस कर रहा था और किसी मरते हुए मेढक की तरह सरोवर में संघर्ष करने के सिवा कुछ नहीं कर सकता था।

लेकिन उसका समय आ गया। इस दिन, जब कन्दत ने भाग्यवश अपना सिर ऊपर उठाया और उसने रक्त सरोवर के ऊपर के आसमान की ओर देखा तो नीली ऊँचाइयों से उसे एक रजत मकड़ी का तार अपनी ओर आता दिखाई दिया जो उस निस्तब्ध अन्धकार में हलके-हलके चमक रहा था - जैसे उसे आदमी की आँखों से डर लग रहा हो।

जब उसने उसे देखा तो उसके हाथ खुशी से स्वयं ही ताली बजा उठे, अगर वह इस तार को पकड़कर उसके साथ-साथ ऊपर चढ़ता जाए तो वह निश्चित रूप से नरक से छूट जाएगा, बल्कि अगर सब ठीक-ठाक रहा, तो सम्भव है वह स्वर्ग में ही जा पहुँचे। तब उसे सूची पर्वत पर कभी नहीं घसीटा जाएगा।

न ही कभी रक्त सरोवर में डुबोया जाएगा।

जैसे ही उसके दिमाग में ये विचार आये, उसने तार को दोनों हाथों से पकड़ लिया और अपनी पूरी सामर्थ्य के अनुसार ऊपर की ओर बढ़ने लगा। क्योंकि वह एक बहुत बड़ा डाकू था, इसलिए ऐसे कामों में तो वह माहिर था। पर कौन जाने नरक स्वर्ग से कितने मील दूर है। वह संघर्ष कर रहा था, लेकिन नरक से निकल पाना आसान नहीं था, थोड़ा-सा चढ़ पाने के बाद वह पूरी तरह शिथिल पड़ गया। अब उसके लिए एक इंच भी ऊपर चढ़ पाना सम्भव नहीं था।

अब चूँकि वह और कुछ नहीं कर सकता था, इसलिए वह थकान मिटाने के लिए रुक गया, और तार से लटके-लटके ही उसने अपने नीचे की ओर दूर तक नजर दौड़ायी। अब चूँकि उसने अपनी समस्त सामर्थ्य से चढ़ाई की थी, इसलिए वह यह देखकर हैरान हुआ कि वह रक्त-सरोवर, जिसमें वह अब तक रहा था, अन्धकार के गह्वर में छुप गया था। और भयावह सूची पर्वत उसके नीचे धीरे-धीरे चमचमा रहा था। अगर वह उसी गति से ऊपर चढ़ता गया तो नरक से छूटना उससे भी ज्यादा आसान हो जाएगा, जितना उसने सोचा था।

अपने हाथ को मकड़ी के तार में उलझाये-उलझाये ही कन्दत हँसने लगा और ऐसे स्वर में चिल्लाने लगा, जैसे स्वर में यहाँ आने के बाद वह कभी नहीं बोला था - सफलता। सफलता।

परन्तु अचानक उसने देखा कि नीचे तार पर अनेकानेक पापी बड़ी उत्सुकता लिये उसके पीछे-पीछे चढ़े आ रहे थे - ऊपर और ऊपर चींटियों के छोटे-मोटे जुलूस की तरह।

जब कन्दत ने ऐसा देखा तो एकक्षण के लिए तो वह आँखें ही झपकाता रह गया और उसका बड़ा-सा मुँह आश्चर्य और भय से मूर्खों की तरह खुला का खुला लटका रह गया।

यह कैसे मुमकिन था कि वह मकड़ी का तार जो उसके अकेले के भार से ही टूटता-सा लगता था, इतने सारे लोगों के भार को झेल रहा था?

अगर यह तार हवा में बीच से ही टूट गया तो यहाँ तक पहुँचने में लगा श्रम तो व्यर्थ जाएगा ही, वह स्वयं भी सीधा मुँह के बल नरक में जा गिरेगा!

लेकिन इस बीच सैकड़ों हजारों पापी अन्धकारमय रक्त-सरोवर में से निकल-निकलकर उस पतले, चमकीले तार पर पूरी शक्ति से चढ़ते चले आ रहे थे। अगर वह जल्दी ही कुछ नहीं करता तो तार निश्चित रूप से दो टुकड़े हो जाएगा और गिर पड़ेगा। इसलिए कन्दत ऊँचे स्वर में चिल्ला उठा - ओ पापियो! यह मकड़ी का तार मेरा है। इस पर चढ़ने की इजाजत तुम्हें किसने दी? उतरो। नीचे उतरो!

बस उसी क्षण वह तार, जिसमें टूटने के आसार अब तक तो दिखाई दिये नहीं थे, वहीं से टूट गया, जहाँ से कन्दत ने उसे थाम रखा था, और इसके पूर्व कि वह चिल्ला भी पाता, किसी लट्टू की तरह चक्कर खाता हुआ वह अँधेरे में मुँह के बल जा गिरा।

कुछ देर बाद, स्वर्ग की मकड़ी का पतला और चमकीला टूटा हुआ तार ही चन्द्र-तारकविहीन आकाश में लटक रहा था।

स्वर्ग के पद्म सरोवर के किनारे पर खड़े-खड़े बुद्ध ने, जो हुआ था, सब देखा था और जब कन्दत रक्त-सरोवर के तल में किसी पत्थर की तरह डूब गया तो उदास मुख लिये वह फिर घूमने लगे।

निस्सन्देह कन्दत का दयाहीन हृदय - जो केवल उसे ही बचा सकता था - और नरक में उसका पुनः पतन बुद्ध की आँखों को अत्यन्त करुण लगा। किन्तु स्वर्ग के पद्मसरोवर के पद्मों को ऐसी चीजों की परवाह नहीं थी। मोतियों-से श्वेत फूल बुद्ध के पाँवों के निकट झूम रहे थे। उनके झूमने से उसका सुनहरी पराग उड़-उड़कर समस्त वायु को सुगन्धित बनाये दे रहा था। स्वर्ग में लगभग दोपहर हो चुकी थी।

***

शठ पत्नी

डॉन जुआन मैनुअल

प्रिंस डॉन जुआन मैनुअल (1282-1349) को स्पेनिश गद्य का जनक और प्रथम कथाकार माना जाता है। डॉन जुआन ने अपनी कहानियों के लिए ‘पंचतन्त्र’, ‘ईसप’, ‘अलिफ लैला’ आदि से काफी मदद ली है। ‘एल कोंदे ल्यूकानोर’ उसका विख्यात कथा संग्रह है।

बहुत साल पहले की बात है, एक गाँव में एक मूर रहता था, जिसका एक बेटा था। यह युवक भी अपने पिता की तरह योग्य था, लेकिन वे गरीब थे। उसी गाँव में एक और मूर रहता था; वह भी काफी योग्य था, लेकिन अमीर भी था। उसकी एक बेटी थी, वह बड़ी ही अशिष्ट और गरममिजाज थी।

एक दिन युवक अपने पिता के पास पहुँचा और कहने लगा, चूँकि वह अपनी जिन्दगी इस तरह गरीबी में नहीं गुजारना चाहता, इसलिए वह किसी अमीर औरत से शादी करना बेहतर समझता है। पिता मान गया। तब युवक ने पिता से कहा कि वह अमीर मूर की गर्ममिजाज बेटी से शादी करना चाहता है। जब पिता ने यह सुना, तो उसे बड़ी हैरानी हुई और बोला, “नहीं, यह नहीं हो सकता, क्योंकि कोई भी अक्लमन्द आदमी, भले ही वह कितना गरीब क्यों न हो, उससे शादी नहीं करना चाहेगा!” लेकिन लड़के का इरादा मजबूत था।

पिता उस भले, अमीर आदमी से मिलने गया और उसने उसे वह सारी बातें बता दीं, जो उसके और बेटे के बीच हुई थीं और उसने गुजारिश की कि चूँकि उसके लड़के में इतना साहस है कि वह अमीर आदमी की बेटी से शादी कर सके, इसलिए उसे भी मंजूरी देनी चाहिए। जब अमीर आदमी ने यह बात सुनी, तो वह बोल उठा, “हे भगवान्! मैंने अगर ऐसा किया, तो मेरी दोस्ती झूठी साबित हो जाएगी! तुम्हारा बेटा तो इतना अच्छा है! मैं नहीं चाहूँगा कि उसे कोई दुख हो, या वह मर ही जाए! पर अगर तुम्हारा लड़का चाहता है, तो मैं उसे उसको दे दूँगा।”

शादी हो गयी और दुलहिन अपने पति के घर आ पहुँची। मूरों में यह रिवाज है कि दूल्हे-दुलहिनों के लिए रात का खाना तैयार करके उसे सजाकर रख दिया जाता है और उन्हें दूसरे दिन तक के लिए घर में अकेला छोड़ दिया जाता है। यही किया गया। लेकिन दूल्हे और दुलहिन के माता-पिता को इस बात की बड़ी चिन्ता थी कि वे अगले दिन या तो दूल्हे को मरा हुआ पाएँगे या जख्मी।

दूल्हा-दुलहिन अकेले थे। वे मेज पर बैठ गये। लेकिन इससे पहले कि दुलहिन कुछ कहती, दूल्हे ने अपने कुत्ते को ढूँढ़ा और गुस्से से चिल्लाया, “ऐ कुत्ते, हमारे लिए पानी लाओ!”

पर कुत्ते ने वैसा नहीं किया। युवक को और गुस्सा आने लगा। अब उसने और भी कठोर आवाज में कुत्ते को पानी लाने का आदेश दिया। लेकिन कुत्ता अब भी नहीं हिला। अब युवक तमतमाकर मेज से उठा। उसने अपनी तलवार निकाली और उसकी ओर लपका। आखिर युवक ने उसे पकड़ लिया और उसका सिर काट दिया।

इस प्रकार, गुस्से से भरकर और खून से लथपथ वह मेज पर लौटा। अब उसे एक बिल्ली नजर आ गयी। उसने बिल्ली को आदेश दिया कि वह उसके लिए पानी लेकर आए। जब वह नहीं लायी, तो वह उठा, उसने बिल्ली को टाँग से पकड़ा और उसे दीवार पर दे मारा।

और तब पहले से भी ज्यादा गुस्से से भरकर वह मेज पर लौटा। तब उसने अपने आसपास सिर घुमाकर देखा, अब उसे अपना घोड़ा नजर आ गया-उसका अकेला घोड़ा! गुस्से से चिल्लाकर उसने उसे पानी लाने का हुक्म दिया।

लेकिन घोड़ा नहीं हिला। युवक ने उसका भी सिर काट डाला।

और वह गुस्से से तमतमाता, उबलता और खून से लथपथ मेज पर लौट आया। और कसम खाने लगा कि उसके घर में हजारों घोड़े हों और आदमी और औरतें हों, जो उसका आज्ञापालन नहीं करते, तो वह उन सबको मार डालेगा। तब वह बैठ गया। उसने अपनी पत्नी को बड़ी कड़ी नजर से देखा और तीखी आवाज में, तलवार ऊँची करके बोला, “उठो और मेरे लिए पानी लाओ!”

पत्नी ने सोचा कि अगर उसने उसका कहा नहीं माना, तो वह उसके टुकड़े कर देगा, वह तेजी से उठी और पानी ले आयी।

“भगवान का शुकर है कि तुमने वैसा ही किया जैसा मैंने कहा,” वह बोला, “नहीं तो मैंने तुम्हारे साथ भी वही कर दिया होता, जो दूसरों के साथ किया!”

बाद में उसने कहा कि वह उसे खाने को कुछ दे और उसने फौरन कहा माना... और वह जब भी कुछ कहता, इतनी तीखी आवाज में और तलवार ऊँची करके कहता कि पत्नी को लगता कि वह अभी उसका सिर धड़ से अलग कर देगा।

दूसरे दिन सवेरे, जब माता-पिता और सम्बन्धी लोग द्वार पर आये और उन्हें कोई आवाज सुनाई नहीं दी, तो उन्होंने सोच लिया कि दूल्हा या तो मारा गया है, या जख्मी होकर पड़ा है।

जब दुलहिन ने उन्हें द्वार पर देखा, तो वह पंजों के बल चलकर बाहर आ गयी और डर से अधमरी हुई कहने लगी, “पागलो, गद्दारो! यहाँ क्या कर रहे हो? तुम्हारी यहाँ कुछ भी बोलने की हिम्मत कैसे हो रही है! चुप! नहीं तो हम सब मारे जाएँगे!”

यह सुनकर वे सभी उस युवक की प्रशंसा करने लगे, जिसने इतनी गर्ममिजाज औरत को सीधा करके रख दिया था।

कुछ दिन बाद की बात है। एक दिन युवक के ससुर ने वैसा ही करना चाहा, जैसा दामाद ने किया था और उसने उसी दिन एक मुर्गे को मार डाला; पर उसकी बीवी बोल उठी, “जनाव कापुरुष जी, अब इससे कुछ नहीं होगा। अब तुम सैकड़ों घोड़े मार डालो, चाहे हजारों, अब सब बेकार है... हम-तुम तो एक-दूसरे को अच्छी तरह पहचान-जान चुके हैं...”

***

अनन्त प्रेम

मार्गराइट

नैवेयर की रानी मार्गराइट का रचनाकाल सोलहवीं शताब्दी का मध्य माना गया है। अपने मित्रों के बीच कहानियाँ सुनने-सुनाने का उसे बहुत शौक था। उसके कहानी-संग्रह ‘हेप्टामेरॉन’ को ‘फ्रेंच डेकामेरॉन’ कहा जाता है।

अन्तुआ के सामन्त के जमाने की बात है। उनके घर में पॉलीन नाम की एक दासी थी। सामन्त का एक मामूली, पर बहुत बुद्धिमान कारकुन उस दासी को दिल से प्यार करता था। सभी उसके प्यार को लेकर ताज्जुब करते थे। सामन्त की बीवी सोचती थी कि पॉलीन जैसी सुन्दर दासी किसी धनी-मानी से ब्याह करके जिन्दगी बना सकती है। इसलिए वह नहीं चाहती थी कि पॉलीन एक गरीब कारकुन से शादी करे। उन्होंने दोनों को हिदायत दी कि वे एक-दूसरे से बोलना-चालना बन्द कर दें। मिलना-जुलना बन्द होने पर वह उसी के खयालों में और भी डूबी रहने लगी। वे दोनों यही सोचते रहे कि वक्त बदलेगा और वे एक-दूसरे के हो जाएँगे।

पर होनी यह हुई कि तभी लड़ाई छिड़ गयी। वह नौजवान कारकुन युद्धबन्दी बना लिया गया। वहीं पर सामन्त की सेना का एक और फौजी भी बन्दी था। दोनों में खूब घुटने लगी, क्योंकि दोनों ही अपने-अपने प्यार के मारे हुए थे। वे एक-दूसरे को अपनी प्रेमकथाएँ सुनाते। यह जानते हुए भी कि वह नौजवान पॉलीन को बेहद चाहता है, उसके दोस्त ने यही कहा कि उसे अब पॉलीन को भूल जाना चाहिए।

इस पर नौजवान ने कहा कि मैं सामन्त की ओर से युद्ध में लड़ा हूँ। वापस जाकर मैं उनकी कृपा से पॉलीन को माँगूँगा। यदि वह मुझे नहीं मिली, तो मैं साधु हो जाऊँगा। दोस्त को उसकी इस बात पर भरोसा नहीं हुआ। दस महीने बाद वे दोनों छूटकर आये, तो नौजवान ने पॉलीन से विवाह की इच्छा प्रकट की। इसे सामन्त और सामन्त की बीवी ने तो माना ही नहीं, उन दोनों के माँ-बाप ने भी मंजूर नहीं किया।

और कोई चारा न देखकर और पूरी तरह निराश होकर नौजवान ने सामन्त की बीवी से प्रार्थना की कि उसे पॉलीन से बस आखिरी बार मिल लेने दिया जाए। यह प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी। मुकर्रर वक्त पर पॉलीन उससे मिली, तो नौजवान ने कहा, “पॉलीन मेरे भाग्य में तुम्हारी निकटता पाना, प्यार पाना, नहीं बदा है। मालिक-मालकिन ने सख्त पाबन्दियाँ लगा दी हैं। वे चाहते हैं कि हम दोनों अलग-अलग जगहों पर शादी करें और ऐसों से करें, जिससे हम दोनों खुश रह सकें। पर पॉलीन! उन्हें कौन बताए कि धन ही सबकुछ नहीं होता! अब मुश्किल यह है कि मैं यहाँ रहते पाबन्दियों के कारण तुम्हें देख भी नहीं सकता। और तुम्हें देखे बगैर मैं यहाँ रह भी नहीं सकता, क्योंकि मेरे प्यार ने सबकुछ तुम्हीं से पाया है... ऐसी हालत में मैं न जी सकता हूँ, न मर सकता हूँ... बहुत सोचकर मैंने तय किया है कि मैं साधु हो जाऊँगा, ताकि मैं ईश्वर को भी उतना ही प्यार कर सकूँ, जितना कि मैंने तुम्हें किया है! तुम भी ईश्वर से मेरे लिए यही प्रार्थना करना कि मेरे मन में तुम्हें देखने, तुमसे बोलने की इच्छा की आहट तक न आए... यही लिखा है मेरे भाग्य में कि मैं तुम्हारे बगैर रहूँ... अच्छा, अलविदा...”

आखिर वह नौजवान दूसरे दिन मठ में चला गया। पादरी ने उसे धार्मिक कार्यों में लगा दिया। ईश्वर के कामों में लगे हुए भी वह पॉलीन को नहीं भुला पाया और छुप-छुपाकर ऐसे गीत लिखता रहा, जो पॉलीन के लिए होते हुए भी ईश्वरीय प्रेम में डूबे हुए थे।

एक बार सामन्त की बीवी के साथ जब पॉलीन भी गिरजे गयी, तो उसने देखा - उसका प्रेमी पादरी के पीछे पूजा का सामान लेकर खड़ा है। इस भेस में उसे देखकर पॉलीन की आँखों में आँसू उमड़ आये। आखिर वह अपने को नहीं रोक पायी। उसे अपनी ओर सिर्फ एक क्षण के लिए आकर्षित करने को वह झूठमूठ खाँसी... पर उसका प्रेमी वैसे ही जमीन में नजरें गड़ाये खड़ा रहा... हालाँकि उसका वह प्रेमी गिरजे की घण्टियों से ज्यादा उसकी खाँसी की आवाज को पहचानता था।

पूजा खत्म हुई। तब तक उसके प्रेमी का संयम टूट चुका था और उसने उचटती हुई नजर पॉलीन पर डाली थी। पॉलीन को वह नजर छेदती चली गयी। उसे लगा कि उसने धर्मसमाज के कपड़े भले ही पहन लिये हों, पर उसका हृदय अब भी उसी तरह धड़कता है। वह भीतर-ही-भीतर बुरी तरह अकुला उठी।

आखिर एक वर्ष प्रतीक्षा करने के बाद भी वह इस वियोग को नहीं सह पायी। एक दिन उसने अपनी मालकिन से कहा कि वह मठ जा रही है। उसे इजाजत मिल गयी। वह मठ में कई महीने पहले ही एक बार जाकर धर्मगुरु की इजाजत ले आयी थी कि वह ‘नन’ हो जाएगी। उसने धर्मगुरु के पास सीधे जाकर दीक्षा ले ली। जब वह गिरजे की वेदी के पास अपने प्रेमी से मिली, तो बोली, “मैंने भी मठ की यह पोशाक तभी पहन ली होती, जब तुमने ग्रहण की थी, पर तब सब लोग हम पर कलंक लगाते कि हमने धर्म की आड़ ली है। अब इतना वक्त गुजर गया है कि कोई कुछ नहीं कह पाएगा। मुझे नहीं मालूम कि मठ की इस जिन्दगी में क्या है। मुझे सिर्फ इतना पता है कि तुमने यह जीवन अंगीकार किया है। इसमें सुख है कि दुख - यह तुम जानो। जिस सर्वशक्तिमान ने हमें वहाँ प्यार दिया है, वही यहाँ का प्यार भी देगा...”

दोनों की आँखों में प्रेम के आँसू छलछला आये थे। प्रेमी नौजवान ने इतना ही कहा, “अब मैं तुम्हें देख भी पाऊँगा और तुम्हारी आवाज भी सुन पाऊँगा। और कितना अच्छा है कि हम दोनों अब एक को प्यार करेंगे - अपनी अन्तरात्मा से।”

जैसा कि माग्दलेन से ईश्वर ने कहा था - तुम्हारे सब पाप माफ हैं, क्योंकि तुमने बहुत प्यार किया है! वैसा ही प्रेमी नौजवान और पॉलीन के साथ भी हुआ।

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