शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी- (भाग-1)

दूर, झुरमुट के बीच में जो खण्डहर दिखाई दे रहा है न, असल में वो खन्डहर नहीं है. पुरानी हवेली है. लेकिन लोग उसे खण्डहर ही कहते हैं. हवेली यानि बड़ा सा घर. बड़ा सा बंगला. बहुत पुराना बंगला. लेकिन हमें इसे हवेली ही कहना है. आज फ़्लैट्स, मल्टी स्टोरीज़, अधिक से अधिक डूप्लैक्स के ज़माने में इतने बड़े स्वतंत्र बंगले को हवेली ही कहा जाना चाहिये. और फिर कहा जाना चाहिये या नहीं इस बहस में हमें पड़ना ही नहीं है. पड़ने की ज़रूरत भी नहीं है. चूंकि इस खंडहर यानि हवेली में रहने वाले इसे हमेशा से हवेली कहते आये हैं सो हमें भी हवेली ही कहना होगा, बिना किसी विवाद के.
तो साब ये जो खंडहर सी हवेली दिखाई दे रही है न, असल में ये खंडहर नहीं है. ये तो बस दूर से ऐसी दिखाई देती है. पास जाने पर इसके एक हिस्से में जीवन के लक्षण भी दिखाई देते हैं. लेकिन केवल बाहर सूखते कपड़ों तक. या फिर अखबार फ़ेंकते हॉकर तक. कभी-कभी एक छोटी वैन भी यहां आती है. असल में ये हवेली आम रिहायशी इलाके से इतना अलग हट के है, कि यहां कब क्या हो रहा, कौन आ-जा रहा कुछ पता ही नहीं चलता. बस भांय-भांय करता खंडहर ही दिखाई देता है. अपने इसी खंडहरपने के कारण इस हवेली का उपयोग केवल बच्चों को डराने, औरतों में दहशत फैलाने के लिये होता है. पूरे इलाके, अजी इलाके क्या पूरे शहर में इसे भुतहा हवेली के नाम से जाना जाता है. अब आप कहेंगे पूरे शहर में? ऐसा कैसे सम्भव है? तो हम कहेंगे कि साब, ये शहर है ही कितना बड़ा? इस हवेली के पूरब की ओर चार किलोमीटर, पश्चिम की ओर भी चार ही मान लीजिये, उत्तर की ओर तो दो किलोमीटर भी काफ़ी होगा और दक्षिण तो पक्का ढ़ाई किलोमीटर पर खत्म है. अब इत्ते नाप जोख वाले शहर को आप बड़ा कहेंगे क्या? अब तो आप इसे शायद कस्बा ही कह दें . लेकिन ये कस्बे से ऊपर की चीज़ है साब. बड़ी-बड़ी फ़ैक्टरियां हैं, बड़ा सा रेल्वे जंक्शन है, मार्केट तो बहुत ही बड़ा है. लभगभ आधा शहर केवल मार्केट में तब्दील हो चुका है. तीन इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, डिग्री कॉलेज, पीजी कॉलेज सब तो है इतने ही दायरे में सो एक छोटा शहर कहलाने की हैसियत तो रखता है भाई.
हां तो बात हवेली की हो रही थी. वैसे यदि यहां के लोगों की चर्चा नहीं की, तो आप कई जगह सवाल कर सकते हैं, आप कोई सवाल न करें, इसके लिये जरूरी है यहां के लोगों को जानना. अब लोगों का क्या कहें साब. अधशहर के लोगों की जैसी मानसिकता होती है वैसी ही है. आपके माथे पर बल क्यों पड़ गये? ओहो….. आप ’अधशहर’ में अटके हैं न? अरे भाई ये मैने अधकचरे की तर्ज़ पर ईज़ाद किया है. नया शब्द है, धीरे-धीरे चलन में आ जायेगा. वैसे भी छोटे शहरों में कोई भी नया शब्द बड़ी जल्दी चलन में आ जाता है. ठीक उसी तरह जैसे कोई भी बात तेज़ी से एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंच जाती है. और कोई राज़फ़ाश करने वाली बात हुई, ऐसी बात जिसे किसी ने न बताने की हिदायत के साथ किसी के कान में बताया हो, उसे तो पर लग जाते हैं. पूरब से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक, ऐसी तेज़ी से पहुंचती है, कि राज़ बताने वाला पहला व्यक्ति अवाक हो जाता है इस त्वरित फ़ैलाइश पर. और मन ही मन खुश भी कि अपने उद्देश्य में कितनी जल्दी सफल हुआ वो. अरे भई अब फ़ैलाइश पर भृकुटि न सिकोड़िये. मेरी आदत तो आप भी जान ही गये होंगे न? ये फिर वही है, नया प्रयोग. आजमाइश की तर्ज़ पर फैलाइश बनाया है भाई. आखिर शब्दकोष को समृद्ध करने की ज़िम्मेदारी भी तो हम और आप पर ही है न. लो जी… बात कर रहे थे लोगों की, और कहने लगे कुछ और. विषयान्तर की बड़ी बुरी लत है मुझे. अब क्या करें? होती है साब सबको कोई न कोई लत. हमें भी है विषयान्तर की. हमने आपसे तो नहीं कहा न कि सिगरेट क्यों पीते हैं? शराब क्यों पीते हैं? तम्बाकू क्यों खाते हैं? पिच्च से जहां-तहां क्यों थूकते हैं? अजी हमने तो मुंह में तम्बाकू भर के आसमान की ओर होंठों का गमला सा बना के गों-गों करके बात करने पर भी आपसे ये नहीं कहा कि मुंह को पीकदान क्यों बनाये हैं? तो हमारी लत पर आप क्यों कहेंगे कि हम विषयान्तर बहुत करते हैं? और कहें भी तो क्या! बुरी आदतें भी कभी सुधरती हैं? वैसे विषयान्तर करना उत्ती बुरी आदत नहीं है, जितनी शराब पी के अपनी पत्नी को पीटना, सहमे हुए बच्चों को धकियाना, गाली-गलौच करना.
लोगों का वर्णन फिर रह जाये उससे पहले झट से सुन ही लीजिये. यहां के लोग तीन की तेरह करने वाले लोग हैं. आप एक कहेंगे, लोग ग्यारह बनायेंगे. कभी-कभी लगता है कि ऐसी स्पीड से बैंक में रखा पैसा बढ़ता तो वारे-न्यारे हो जाते अपन के. किसी अलाने ने यदि बताया कि फलां लड़की रोज़ बहुत देर से लौटती है घर, तो पक्का मानिये कि अब सुनने वाला फलाने, उस लड़की का पूरा चरित्र चित्रण पेश कर देगा, अगले के सामने , वो भी उसके पूरे खानदान सहित. फलाने से सुने गये चरित्र चित्रण को कुछ और रहस्यमयी बनायेगा सुनने वाला अगला. और फिर ये खबर पूरे शहर में उसी तेज़ी से पहुंच जायेगी जैसी अभी मैने बतायी थी. तो साब जितना छोटा शहर है, उतनी ही छोटी मानसिकता के लोग हैं यहां. हर अगले व्यक्ति के लिये उल्टा सोचने वाले, हर बात में नुक्स निकालने वाले, हर काम को ग़लत और व्यक्ति को नाज़ायाज ठहराने वाले. ऐसे उड़न छू शहर में हवेली की कितनी कहानियां गढी गयी होंगीं आप समझ सकते हैं न? उस पर भी तब, जबकि हवेली का कोई व्यक्ति दिखाई ही न देता हो. लोगों ने तमाम अनदेखे , काल्पनिक चरित्र गढ़ लिये हैं. कोई कहता इस हवेली में भूतों का डेरा है, तो कोई कहता यहां धंधा करवाया जाता है. ’धंधा’ तो समझे न आप? अरे वही जिसे बोलते हुए लोग एक आंख दबा के बोलते हैं. अब समझे न आप? कोई कहता नशीले पदार्थ बेचने का अड्डा बन गयी है ये हवेली तो कोई सारी बातों को नकार देता.
हवेली के बारे में इतनी अफ़वाहें और कहानियां गढ़ ली गयी थीं, कि अब उसका कोई खरीददार भी नहीं मिलता था. मालिकों ने उसे यूं ही खंडहर होने के लिये छोड़ दिया था शायद. सोचा होगा, कि इतनी बड़ी हवेली को तुड़वाने में ही लाखों खर्च हो जायेंगे, सो बेहतर है अपने आप ही खत्म हो. जैसे किसी बेसहारे बूढ़े को अपने आप मरने के लिये छोड़ दिया जाता है.
हवेली को ले के जिज्ञासा तो मेरे मन में भी उठती थी, लेकिन मैं उसे दबा देता था कि फ़िजूल टाइम खोटी नईं करने का. इत्ता टाइम न है अपन के पास कि हवेली की चिंता करते बैठे रहें. वैसे भी अलाने, फलाने, ढ़िमाके सब कुछ न कुछ बता ही जाते थे. अपनी पैनी निग़ाहें भी रक्खे ही थे तो अपन को कायको परेशान होना? है कि नईं? वैसे इन सबकी पैनी निगाहें हवेली के मामले में भोथरी ही साबित हो रही थीं. सो इनकी खिसियाहट भी जायज़ थी.
गरमी की उस भीषण तपती दोपहर में, जबकि पूरे इलाके में सन्नाटा पसरा था, हर घर के खिड़की दरवाज़े लू-लपट से बचने के लिये सख्ती से बन्द थे, ऐसी झुलसती दोपहर में , लू के थपेड़ों से बेपरवाह एक गेरुआ वस्त्रधारी युवा, जिसे साधु कहना चाहिये, क्योंकि हमारे देश में हर गेरुआ वस्त्रधारी को साधु ही कहा जाता है, सड़क किनारे लगे हैंड पम्प से पानी लेने आया. अब आप कहेंगे कि जब सबके दरवाज़े-खिड़कियां बन्द थे, तो मुझे कैसे पता चला उस साधु का वहां आना? तो भैया, ये तो आप भी जानते हैं कि हर मोहल्ले में चंद खोजी तत्व होते ही हैं. ऐसे खोजी तत्व, जो गुम्म-सुम्म दोपहर में भी बन्द खिड़की की पतली दरार में से बाहर की टोह लेते रहते हैं. ऐसे तत्वों को पूरा अन्देशा होता है कि ग़लत काम करने वाले इस सन्नाटे का फ़ायदा जरूर उठायेंगे. सो उनकी टोही नज़रें गरम हवा से बहने वाले आंसुओं की परवाह किये बिना, अपनी दोपहर की नींद हराम कर, बाहर लगी रहतीं हैं.
तो साब, उस साधु ने इत्मीनान से हैंड पम्प चलाया, रात भर पानी उगलने वाले इस हैंड पम्प को दोपहर में ही कुछ राहत मिलती है. कारण, एक तो कड़ी लू-धूप उस पर दोपहर में पानी का जल स्तर बहुत नीचे चला जाना. खैर.. हम बात साधु की कर रहे थे तो उस साधु दिखने वाले युवक ने अपने पीले रंग के प्लास्टिक के बड़े से डिब्बे में पानी भरा और धीरे-धीरे हवेली की ओर जा के झुरमुट में गुम हो गया. गप्पू की अम्मा, जो आज खाना खा के ज़रा देर आराम करने का मन बनाये थीं, हैंड पम्प की चीं-चां, चीं-चां सुन के उठ बैठीं. दौड़ के खिड़की की झिरी पर पहुंचीं, तो कुछ दिखाई न दिया, तुरत-फुरत उन्होंने खिड़की खोल डाली, तो सामने के मैदान से जो पगडंडी हवेली की तरफ़ गयी है, उस पर पीला डब्बा लिये साधु की पीठ दिखाई दी उन्हें. हें!! जे साधु कहां से आया??? मन्दिर में न तो भागवत चल रही न ही कोई और अनुष्ठान! फिर?? और अगर मन्दिर में ही आया होता तो यहां हैंड पम्प पर पानी लेने क्यों आता? वहां तो ट्यूब वेल है सो इफ़रात पानी है. उस पर भी ये कि पानी ले के साधु हवेली की तरफ़ क्यों जा रहा? साधु तो साधु है हवेली वालों का नौकर तो है नहीं जो उनके लिये पानी ढोये!! तमाम सवाल गप्पू की अम्मा के ज़ेहन में तैरने लगे. खुराफ़ाती दिमाग़ पता नहीं कितनी कहानियां गढ गया. घड़ी देखी, अभी तो केवल साढे तीन बजे हैं. पड़ोसिनों की मजलिस तो छह बजे के बाद जुटती है , मन्दिर के चबूतरे पर. अब क्या हो? कैसे कटें ये ढाई घंटे? आराम हराम हो गया गप्पू की अम्मा का.
किसी प्रकार घड़ी ने छह बजाये. गप्पू की अम्मा फुर्ती से पड़ोस में पहुंची. फिर अगले घर में फिर उसके भी अगले घर में. आज वे मजलिस जुटने का इन्तज़ार नहीं कर सकती थीं. थोड़ी ही देर में पूरे मोहल्ले में साधु की चर्चा हो रही थी. जाते हुए साधु का केवल पिछवाड़ा देखने वाली गप्पू की अम्मा ने जो नमक मिर्च लगा के बताया सो बताया, अगले सुनने वाले और अगलों तक इस बात को खूब मसालेदार बना के पेश कर रहे थे. चबूतरे पर मजलिस जुटने के बाद तय किया गया कि कैसे भी पता लगाना होगा कि ये साधु हवेली में ही रहता है क्या? क्या करता है? कहां से आया? हवेली में आखिर कैसे रहने लगा?
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