शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी (भाग-4)

लग रहा था जैसे सारा पुण्य , आज उस बुज़ुर्ग महिला के खाते में जमा होने वाला है…. पाप और पुण्य का लेखा-जोखा रखने वाली महिलाओं का जत्था अतृप्त सा लौट रहा था.
अगले दिन फिर एक प्रौढ महिला के सिर पर हाथ रखा…
उसके अगले दिन फिर बुज़ुर्ग महिला के सिर पर….
लेकिन पांच दिन बाद एक युवा महिला के सिर पर हाथ पड़ा. उस युवा औरत का पति भी बाहर बरामदे में बैठा है. महाराज कमरे में बन्द हो गये हैं. ललितेश्वर महिला की मदद के लिये उपस्थित हैं. महाराज के कमरे में बंद होते ही पति निश्चिन्त हुआ है.
अगले दिन महाराज आंख मूंद के सिर पर हाथ रखेंगे ताकि पक्षपात की कोई गुन्जाइश न रहे. हाथ फिर उसी युवा महिला के सिर पर पड़ा. प्रभु की माया!!! पति आज दालान में है. कीर्तन खत्म होते ही महाराज कमरे में बन्द हो गये हैं, ये देखे बिना कि बाद तक कौन रुका, कौन गया. महाराज उबला/भुना ही खाते हैं. सो केवल टमाटर और आलू भूने जाते हैं. रोटियां सेंकीं जाती हैं. लम्बा काम नहीं है. काम खत्म होते ही ललितेश्वर सादर उस महिला को हवेली के द्वार तक छोड़ने आते हैं. ललितेश्वर कविता को बताते चल रहे हैं- “ महाराज एक जगह बहुत दिन नहीं टिकते. इस बार तो इस अन्जान हवेली में पता नहीं कैसे इतने दिन रुक गये. सब आप लोगों का सौभाग्य है. वे तो अपने रुकने तक की खबर किसी को नहीं होने देते. यहां तो समझो बहुत सार्वजनिक हो गये महाराज. कैसे तो अचानक इस हवेली पर नज़र पड़ी महाराज की और उन्हें ईश्वर का आदेश हुआ यहीं रुकने का….”
. कविता, वही आज की रसोईदारिन. दोनों पति-पत्नी हैं. सात साल हुए शादी को, अभी तक निस्संतान है. इलाज विलाज सब हुआ. कोई फ़ायदा नहीं. झड़वाया भी है. लेकिन अब तक गोद सूनी ही है. ऐसे पहुंचे हुए ईश्वर स्वरूप महाराज से अब इन दोनों को कुछ आस बंधी थी. सो महाराज की रसोई बना के कविता बहुत खुश थी. चाहती थी, आगे भी बनाती रहे. शायद महाराज की कृपा बरसे और उसे लोगों के ताने सुनने से राहत मिले.
सत्यम उर्फ़ सत्यानन्द महाराज की निगाह पहले दिन से ही इस खूबसूरत युवती पर थी. कैसा सुगठित शरीर है कविता का. लम्बी सी एक चोटी, माथे पर गोल बिन्दी और आंखों में काजल. अकेले में महाराज “सनम रे सनम रे…तू मेरा सनम हुआ रे… “ गुनगुना रहे थे. आंखों के सामने कविता की मूरत रहती. कल रात धुंएं से कैसा तो लाल मुंह हो गया था कविता का… दरवाज़े की झिरी से देख रहे थे बाल ब्रह्मचारी… कविता के सिर पर हाथ रखते हुए उनका मन हुआ था उसका गाल सहला दें…. ललितेश्वर ने कविता की पूरी वंशावली पता कर ली थी. उनकी परेशानियों और खुशियों के सबब भी मालूम थे उन्हें.
महाराज ने आज आंख खोल दी है. कविता और उसका पति कुछ पूछना जो चाहते थे. हाथ जोड़ के खड़े हैं दोनों. “महाराज कृपा हो जाये आपकी…हमारा सूना आंगन भर जाये महाराज….”
महाराज ने हाथ का दण्ड ऊपर उठा दिया है. ललितेश्वर इशारे को समझते हैं. लपकते हुए महाराज के पास पहुंचे. महाराज ने उनके कान में कुछ फुसफुसाया. ललितेश्वर ने घोषणा की- कल सुबह दस बजे आइये. महाराज बीजक यज्ञ करवायेंगे आप दोनों से. सात दिन तक. फल जरूर मिलेगा. यज्ञ के नियमानुसार इन सातों दिन महाराज की रसोई कविता ही पकायेगी. हवन सामग्री आज ही ले के रख लीजिये. शुद्ध घी भी लगेगा तीन किलो. लाल गुड़हल के फूल, दूब, गाय का गोबर, आम की लकड़ियां, सब ले के आना है. ( कर्मकांडी ब्राहमण परिवार में जन्म लेने का फ़ायदा आज मिल रहा था महाराज को) कविता खुश. उसे अभी से अपने पांव भारी लगने लगे. कभी कभी सोचती है कविता- ऐसा सुदर्शन युवक साधु क्यों हो गया होगा? फिर छोड़ देती है सोचना।

(जारी)

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