माँमस् मैरिज - प्यार की उमंग - 2

माँमस् मैरिज - प्यार की उमंग

अध्याय - 2

मनोज ने गहरी सांस लेकर कहा-"देखो भई! मैं तो इतना ही कह सकता हूं की तुम्हारी मां मुझसे शादी करने के बाद मेरे परिवार का हिस्सा होगी। तुम दोनों को मैं अपनी बेटी ही पहले ही मान चूका हूं। अगर मेरे बेटे को तुम्हारी मां के रूप में उसकी मां मिल जाये और दो बड़ी बहने भी, तो इससे ज्यादा खुशी की बड़ी बात मेरे लिए क्या होगी?"

दोनों बहनें ध्यान से मनोज की बातें सुन रही थी। इतने में तनु ने मसखरी की- "इतने में हम नहीं मानने वाले।"

"तो आखिर तुम ही बता दो की मैं ऐसा करूं की तुम्हें और तुम्हारीमाँम को विश्वास हो जाये की मैं तुम्हारीमाँम को हमेशा खुश रखूंगा।" मनोज भी मसखरी पर उतर आया था।

तनु ने कहा- "देखिये मनोज जी! हम तो चलो आपकी बातों पर विश्वास कर भी ले लेकिनमाँम को विश्वास आप कैसे दिलायेगें? उन्हें कैसे भरोसा होगा कि आप उन्हें कभी धोखा नहीं देंगे?

" हां हां मैं भी तो वही तो पुछा रहा हूं तुमसे! मुझे क्या करना चाहिए इसके लिए?" मनोज ने अधीर होकर कहा।

तभी मनोज की केबिन में डोर बेल बजती है और प्यून चाय-नाश्ता रख कर चला जाता है।

अब बबिता की बारी थी- "मनोज जी! आपको ज्यादा कुछ नहीं करना है बस हम लोग जैसा कहते जाये, आपको वैसा-वैसा करना है।"

"और अगर आप हमारे कहे अनुसार चलते रहे तो यकीन मानिए आपकी औरमाँम की शादी पक्की।" तनु ने चाय की चुस्कियां लेते हुये कहा।

"ठीक है भई। तुम लोग जैसा कहोगी मैं वैसा ही करूंगा। मगर ये तो बताओ मुझे करना क्या होगा?" मनोज ने झुंझलाकर पुछा।

तनु ने मनोज के कान में अपने विचार बताये। मनोज चौक पढ़ा और यह सब नहीं कर सकने की असमर्थता दिखाने का ढोंग करने लगा। बबिता ने मनोज को हिम्मत बंधाई और योजना का पुरा विवरण सुनाकर वे दोनों वहा से चली गईं।

मनोज के हृदय में सीमा के लिए भावनाएं जाग चूकी थी। बिस्तर पर लेटे रात के दस बज चुके थे। मनोज का बेटा श्लोक अपने कमरे में सो चूका था। नींद थी के मनोज की आंखों से ओझल थी। उसने तनु को फोन लगाया-

"हैलो तनु! तुमने मुझे ये सब जो करने को कहा है वह सब अब इस उम्र अच्छा लगेगा क्या? मनोज ने पुछा।

"क्यों नहीं! प्यार करने की कोई उम्र नहीं होती मनोज जी। लोग क्या कहेंगे? इसमें न पढ़िये। हमें जो अच्छा लगे वही करना चाहिए।" तनु ने दुसरी तरफ फोन लाइन पर कहा।

"लेकिनsss?" मनोज संशय में आगे कुछ बोल पाता इससे पहले ही तनु बोल पड़ी-

"लेकिन-वेकिन कुछ नहीं! अगर आप सचमुचमाँम से प्यार करते हो और उनसे शादी करना चाहते हो तो ये सब आपको करना ही पड़ेगा। कल सन्डे है। आप ठीक ग्यारह बजे हमारे दिये हुये पते पर आ जाना। हम भीमाँम को लेकर आते है गुड नाइट" इतना कहकर तनु ने फोन रख दिया।

तनु और बबिता जान चुकी थी की मनोज उनकीमाँम पर लट्टू हो चुके है। तब ही तो वो दोनों मनोज से मसखरी करना नहीं भूलती।

रविवार की आरामदायक सुबह मनोज संज-संवर कर घर से बाहर सीमा से मिलने जाने ही वाले थे कि तभी उनके बेटे श्लोक ने पीछे से टोका- "पापा कहां जा रहे है? मनोज हड़बड़ी में बोला- "अरे! श्लोक बेटा। जल्दी उठ गये? कुछ नहीं जरा काम था। वही पुरा करनेमाँल पर जा रहा हूं।"

"मगर पापा आज सन्डे है और सन्डे को हमारामाँल बंद रहता है?" मनोज के चेहरे पर हैरानी के भाव उभर आये। श्लोक ने आगे कहा-

"और आपने प्रामिश किया था की सन्डे को मुझे और मेरे दोस्तों को पिकनिक पर ले जायेंगे।"

मनोज आगे ज्यादा कुछ न बोल सका। उसे अपना वादा याद आया था। श्लोक को गले लगाकर उसने उसे तैयारी करने को कह दिया। श्लोक ने प्रसन्न होकर मनोज के गाल पर एक चुंबन दिया। उसके बाद वह अपने दोस्तों को पिकनिक पर साथ चलने के लिए रेडी हो जाने के लिए फोन करने में व्यस्त हो गया।

मनोज ने कुछ निश्चय कर तनु को फोन लगाकर अपने न आ सकने की क्षमा मांग ली। तनु क्रोधित हो गई। उसने फोन पर ही मनोज को डांट पिलाई। तनु की नाराजगी इसलिए भी बढ़ गई थी क्योंकि उसकी मां को उन दोनों बहनों ने बहुत प्रयास कर सिर्फ एक बार मनोज से मिलने को राजी किया था। और समय की पाबंद सीमा रेस्टोरेंट पहूंच चूकी थी मनोज से मिलने के लिए। बबिता और तनु भी घर से निकल पड़े। सीमा को घर वापिस ले आने के लिए। रेस्टोरेंट की एक कार्नर की टेबल पर सीमा के मन में कुछ न कुछ कोतूहल बनकर उठ रहा था। वह मन ही मन ही कुछ विचार कर रही थी- "मैं तो साफ-साफ मनोज जी को इस शादी के लिए इंकार कर दूंगी। कह दूंगी आपको मेरी बड़ी बेटी से विवाह करना है तो कहिये, मुझे अपनी शादी में कोई दिलचस्पी नहीं है। छींss छींssछींss मैं भी क्या सोच रही हूं। मुझे तो मनोज जी को साफ-साफ यह कह देना चाहिए कि वह अब हमसे कोई संबंध न रखे। और आज के बाद मुझसे भी मिलने की कोई जरूरत नहीं है। तनु और बबिता तो पागल है। बचपना दिखा रही है। हूंsss अपनी मां की शादी करवाना चाहती है।" इतना विचार कर मंद-मंद हंसने लगी। तभी उसे सामने से तनु और बबिता आती हूई दिखी।

"अरे तुम लोग? क्या हुआ?" सीमा बोल पड़ी।

"चलिए मां घर चलते है" बबिता बोली।

"मगर क्यो? मनोज जी तो अभी आये ही नहीं?"

सीमा ने कहा।

"वो नहीं आयेगेंमाँम" तनु ने चिढ़ते हुये जवाब दिया। सीमा समझ गई थी की कुछ गड़बड़ हो गई है।

सीमा के चेहरे के भाव पढ़ते हुये बबिता ने उसे समझाया कि आवश्यक काम आ जाने के कारण मनोज जी यहां नहीं आ सके।

"यदि हम यहां इतने अच्छे रेस्टोरेंट में अगर आ ही गये है तो घर क्यों जाये। लेस्ट सेलीब्रेट!" तनु मुड बदलकर बोली।

बबिता ने सीमा को बताया कि मनोज अपने बेटे की इच्छा पुरी करने के कारण यहां नहीं आ सके। सीमा को बरबस ही अपने पति संजय की याद आ गई। संजय भी बेटे के लिए लालायित रहता था। उसे हर कीमत पर सीमा से बेटा ही चाहिए था। इसी कारण कई मर्तबा उसकी और सीमा की अच्छी खासी बहस भी हो जाया करती थी। बेटे के मोह के कारण ही अरूण ने सीमा को छोड़कर दुसरे शहर जाकर राधा नाम की एक अन्य स्त्री से शादी कर ली थी। संयोग से राधा को भी दो बेटियां ही हुई। जिसके कारण अरूण और राधा के विवाह संबंध में कड़वाहट भर गई थी। तनु ने सीमा को यादों के झरोखे से बाहर आने के लिए झंकझोरा। तीनों ने वही रेस्टोरेंट पर दोपहर का भोजन किया और घर लौट आयीं।

मनोज ने सीमा को फोन लगाकर उससे नहीं मिलने आ सकने के लिए क्षमा मांगनी चाही लेकिन सीमा ने मनोज को हिम्मत जुटाकर अब से कोई संबंध न रखने की हिदायत दे डाली। साथ ही तनु और बबिता से भी दुरी बनाये रखने का कह दिया। सीमा फोन पर जब मनोज को डांट रही थी तब तनु और बबिता ने देख लिया। उन्हें लगा कि उनकीमाँम ने कुछ ज्यादा ही मनोज जी को खरी-खोटी सुना दि थी।

मनोज अपनेमाँल के कार्यालय में सीमा से फोन पर हुई बातों से मायूस होकर कुछ सोच ही रहा था की उसके दफ्तर की डोर बेल बजी।

"अरे सुषमा भाभी आप! काजल बेटी भी आई है। आईये-आईये! बैठिये। क्या लेंगी आप?" मनोज ने आग्रह पूर्वक कहा।

"नहीं-नहीं भाईसाहब! हमें कुछ नहीं चाहिए।" सुषमा ने कहा।

"ऐसे कैसे आप इंदौर से पचास किलोमीटर दुर चोरल गांव से आयीं है। कुछ तो लेना पड़ेगा।" कहकर मनोज ने प्यून को चाय-नाश्ता लाने को कहा।

"बहुत दिन हो गये थे। सोचा इंदौर चलकर आपसे मिल आये। काजल बेटी को भी शहर से कुछ कपड़े और जेवर खरिदने थे सो दोनों काम करने इंदौर आ गये।" सुषमा ने कहा।

"अच्छा किया जो आ गये। यहां सब अपनी ही दुकाने है। जो चाहिये काजल बेटी को दिलवा देते है।" कहकर मनोज ने प्यून से कहा- " जाओ राजेश को बुला लाओं।"

राजेश , मनोज केमाँल की सभी दुकानों का लेखा-जोखा का हिसाब-किताब देखता है। युवा और अविवाहित, टैलेंटेड नौजवान है राजेश। पांच सालों से मनोज के यहां मेनेजर की जाॅब कर रहा है। अनाथाश्रम में पले-बढ़े राजेश ने स्वयं के बल पर एमबीए तक की पढ़ाई की। मनोज ने एक जाॅब इन्टरव्यूह में राजेश की काबिलियत पहचानकर उसे अपने यहां काम पर रख लिया। अपने कार्य के प्रति उसकी कर्त्तव्यनिष्ठा से मनोज क्या उसके यहां काम करने वाले सभी लोग प्रभावित है। राजेश , मनोज के केबिन में प्रवेश करता है। पास ही रखी कुर्सी पर मनोज के आग्रह पर बैठ जाता है। वह आंखे बचाकर काजल को भी निहार लेता है। काजल भी राजेश के दीदार करती है। मनोज , राजेश से कहता है कि वह काजल को अपने साथ ले जाकरमाँल से कुछ खरिद्दारी करवा लाये। राजेश की जैसे मन की बात मनोज ने अपने मुंह से कह दी थी। काजल के साथ कुछ समय व्यतीत करने का अवसर वह बहुत समय से ठूंढ रहा था। काजल और राजेश एक साथ केबिन से बाहर चले गए।

"भाभी, तो फिर क्या सोचा आपने, राजेश और काजल की शादी के विषय में?" मनोज सीधे मुद्दे पर आकर बोला।

"भाईसाहब! मुझे कोई एतराज नहीं है। काजल की खुशी में ही मेरी खुशी है।" सुषमा ने अधूरे मन से कहा।

"तो फिर दिक्कत क्या है। राजेश, काजल को पसंद करता है और काजल राजेश को। अच्छा-सा कोई मुहर्रत देखकर दोनों की शादी कर देते है।" मनोज ने उत्साहित होकर कहा।

"भाईसाहब, आप सही कह रहे है लेकिन काजल मुझे छोड़कर शहर आने को तैयार नहीं है। कहती है कि पापा के स्वर्गीय हो जाने के बाद काका-बाबा वैसे ही उनकी संपत्ति पर नज़र गड़ाये बैठे है। उस पर यदि वह भी शादी कर शहर आ गई तो मेरा ख्याल कौन रखेगा?" सुषमा ने अपनी चिंता जताई।

"आप ठीक कह रही है भाभी। रूपये - पैसों की लालच में आदमी आज हद से ज्यादा नीचे गिर गया है। मगर इनसे बच कर भी आदमी जाये तो जाये कहा? आज हर तरफ झुठे, बेईमान और मक्कार लोग भरे पड़े है। मगर जीना तो पड़ता है न भाभी। मैं जानता हूं राजेश जैसा स्वाभिमानी युवक घरजमाई बनने को कभी राजी नहीं होगा फिर भी एक बार मैं आपके लिए राजेश से बात करूंगा।" मनोज ने सुषमा जी को धीरज बंधाया।

"आप सचमुच काजल के पापा के सच्चे दोस्त है। वे भी मुझसे कहा करते थे, कि मनोज और मैं एक-दूसरे की मन की बात जान लिया करते है। देखीए आज वो हमारे साथ नहीं है फिर भी आपने हमारे मन की बात जान ली।" सुषमा खुश थी। उसने सोचा कि हो सकता है कि मनोज के समझाने पर राजेश, काजल से शादी करने के बाद उनके साथ चोरल गांव में ही रहे, घरजमाई बनकर।

मनोज ने राजेश के साथ काजल की शादी करने का प्रस्ताव काजल के पिता गंगाराम मकवाना को दिया था। गंगाराम राजी भी हो गये थे। इसी बीच गंगाराम को सेतालिस वर्ष की आयु में हार्ट अटैक आया और वे चल बसे। दो भाई-भौजाई और उनके बच्चें जो कि अब समझदार हो चुके थे, के साथ पत्नी सुषमा, बेटी काजल और कुछ चल-अचल संपत्ति छोड़ गये थे। तीनों भाईयों में सम्पति का बंटवारा हो चुका था। गंगाराम ने अपनी मेहनत और दुध के व्यवसाय से अपनी स्वयं की संपत्ति में अपने दोनों भाईयों से अधिक वृद्धि कर ली थी। मनोज ने शहर मे जोमाँल बनाया उसमे तीन दुकानें भी खरीदी जिसे किराये पर दे दिया। सुषमा उन्हीं दुकानों का किराया लेने शहर आया करती थी। गंगाराम और सुषमा की काजल एक लोती बेटी थी। काजल ने अपनी अशिक्षित मां सुषमा को पढ़ना-लिखना सीखा दिया था जिसके की वह अपने दुध का व्यवसाय और खेती-बाड़ी का हिसाब-किताब स्वयं देख सके। गंगाराम के भाई-भौजाई और उनके बच्चों ने सुषमा के अशिक्षित होने का पुर्व में बेजा फायदा उठाया था। लेकिन जब से काजल ने व्यापार में देखरेख बढ़ाई थी तब से भाई-भौजाई के कमीशन को पैसे मिलना बंद हो गये थे। जिससे उनके मनोरथ पुरे नहीं हो रहे थे। उन्होंने तो सुषमा को काजल के विवाह के लिए लड़के भी दिखाये किन्तु इसके पीछे भी भाई-भौजाई की स्वार्थ सिद्धी को जानकर उनके बताये रिश्तों को सुषमा ने सिरे से खारिज कर किया, जिसमें काजल की भी सहमती सम्मिलित थी।

राजेश और काजल शहर के मेघदूत उपवन में एक पेड़ की छांव में बैठकर कर अपने-अपने ह्रदय की भावना व्यक्त कर रहे थे।

"माँल में कपड़े खरिदने का बोलकर तुम मुझे गार्डन ले आयी। तुम्हारी माँ को पता चलेगा तो नाराज नहीं होगीं?" राजेश ने पुछा।

"मैंने मां से पहले ही कह दिया था की वोमाँल से सीधे मनोज चाचू के घर चली जाये, मैं कुछ देर बाद वहीं आ जाऊंगी।" काजल ने शर्माते हुये कहा।

"वाह! मतलब सब पहले से तय था, भई मजा आ गया। तुम वाकई बहुत होशियार हो"। कहकर राजेश ने काजल को गले लगा लिया।

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