बिन तेरे...! भाग 2

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..."आय लव्ह यू टू, शिवा..! पर क्या शादी करना ही सॉल्यूशन होगा..?"- राजीव सोच में डूब गया |
"और कोई रास्ता हो तो बताओ..? बस..! सोसायटी की नजरों में हमारा शादीशुदा होना जरूरी नहीं, राजीव..! बल्कि हमारे बेबी के फ्यूचर का भी तो सोचो | और क्या फ़र्क पड़ता..? हैं हमारे बीच जैसा अब तक रिश्ता हैं वैसाही रहेगा |"
"तो फिर ठीक हैं अगर तुम ईतनी कॉन्फिडेंट हो तो मुझे कोई ऐतराज नहीं | मैं कल ही ऑफिस जाकर बोस्टन जाने के लिए ना कह देता हुँ |"
"नो..! राजीव..! देखो हमने पहले से ये डिसाइड किया था कि चाहे कुछ भी हो जाय एकदूसरे के करिअर के बीच हमारा रिश्ता रुकावट नहीं बनेगा | हैं ना..?"
"हाँ..! पर तब की बात अलग थी, शिवा..! मैंने बोस्टन जाने के लिए हाँ कह दी थी क्योंकि तुम भी वहां आना चाहती थी | अपना करिअर बनाना चाहती थी | हमने तो वहींपर सेटल होने का सोच लिया था | पर अब तुम नहीं आ पाओगी और तुम्हारे बग़ैर जीना तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकता |" - राजीव ने शिवानी को बाहों में लिया |
"आय नो..! राजीव, हम दोनों एकदुसरे के बगैर नहीं रह सकते पर कंपनी तुम्हें बोस्टन भेज रही हैं और तुम जानते हो ऐसी अपॉर्च्युनिटी सबको नहीं मिलती | देखो..! तुम बस अपने करिअर पर फोकस करो | मैं सब संभाल लुँगी | और मॉम भी तो हैं मेरे साथ |"
"बट..! शिवा, तुम्हें यहां इस हालत में छोड़कर जाने को मन नहीं करेगा |"
"तुम मेरी फ़िकर करना छोड़ दो, राजीव..! हो जाएगा मॅनेज |"
बस कुछ ही दिनों में शिवानी और राजीव की कोर्ट मॅरेज हो गयी | और वो दिन भी नजदीक था जब राजीव को बोस्टन जाने के लिए रवाना होना था | राजीव जाने की तैयारियों में जुट गया | शिवानी अपनी प्रेग्नेंसी को संभालते - संभालते राजीव का हाथ भी बटा रहीं थी | राजीव की शॉपिंग और दिनभर ऑफिस का काम | शिवानी ने अपनेआपको ईतना बिझी कभी महसूस नहीं किया था | वो तीन महीने कैसे गुज़रे पता ही न चला | आखिर राजीव को बाय कहने का दिन आ ही गया | एयरपोर्ट पे राजीव और शिवानी ने ना चाहते हुए एकदूसरे को विदा किया | अजीबसा ख़ालीपन साथ लिए दोनों ज़ुदा हो गए | राजीवने अब बोस्टन सेटल होने का ख़याल छोड़ दिया था | सालभर में उसका इंडिया ट्रांसफर हो जाएगा ये राजीव के बॉस ने उसे प्रॉमिस किया था | एक साल तो यूँही गुज़र जाएगा | यहीं बात मन ही मन अपनेआप को समझाते हुए राजीव ने इंडिया छोड़ा |
व्हिडीओ चॅटींग के जरिए राजीव शिवानी के हालचाल पुछ भी लेता और उसे जी भर के देख भी लेता, शिवानी उसके बच्चे की माँ बनने वाली थी, ये ख़याल धीरे धीरे राजीव को सुकून दिलाने लगा था | अब उसकी अपनी फॅमिली होने जा रहीं थी | कोई उसका बेसब्री से इंतजार कर रहा था | दिन हो या रात राजीव जब चाहे शिवानी से बातें करते रहता | कभी कभी तो शिवानी के मॉम की प्यारभरी डाँट भी खानी पड़ती क्योंकि शिवानी को अब आराम की जरुरत थी |
कुछ ही दिनों में शिवानी ने एक प्यारे से बच्चे को जनम दिया | मॉम ने जब राजीव को कॉल किया,
"राजीव..! बेटे..! बधाई हो लड़का हुआ है |"
"दॅटस् ग्रेट न्यूज, मम्मी जी..! शिवानी कैसी है..?
"शिवानी की फ़िक्र मत करो वो ठीक हैं | बस अब तुम जल्दी से आ जाओ |"
"यस..मम्मी जी..! अभी तो बस कुछ महीने ही हुए हैं | पर शिवानी से दूर यहाँ आकर ऐसा लग रहा हैं जैसे सदियां बीत गयी हो | अब तो जल्दी आना ही होगा, पापा जो बन चुका हूँ |" - राजीव ख़ुशी से उछलकर बात कर रहा था और वहाँ उसके ऑफिस में सारे चौककर उसे घूर रहे थे | ऑफिस के शांत माहौल में बस राजीव की आवाज़ गूँज रहीं थी | सबने राजीव को बधाईयाँ दी | दूसरे ही पल उसके मोबाईल पर मॉम ने फोटोज़ भेज दिए | फोनपर बच्चे की और शिवानी की तस्वीरे देख उसकी आँखें नम हो गयी | अब जल्द से जल्द उसे बस इंडिया लौटना था | शिवानी को बाहों में लेना था,अपने बेटे के साथ खेलना था |
शिवानी का अंश इसीलिए बेटे का नाम, शिवांश रखा गया | राजीव व्हिडीओ कॉलिंग से ऑनलाइन नामकरण विधि देख खुश हो रहा था | दिन - महीने गुज़रते गए और शिवांश चार महीने का होते ही शिवानी ने जॉब जॉइन कर ली | दिनभर मॉम शिवांश को संभालती और शाम को शिवानी आकर उसे घर ले जाती | राजीव से फ़ोनपर बातें या व्हिडीओ कॉलिंग का सिलसिला सालभर तो जारी रहा पर धीरे-धीरे उसके कॉल्स आने कम होने लगे | कभी दो दिन बाद तो कभी चार दिन बाद उसका एक कॉल आता | ऐसे में कब दो साल बीत गए पता ही न चला | शिवानी भी अपने काम में ईतनी बिझी रहने लगी के शिवांश की देखभाल और ऑफिस के कामोंसे उसे फुरसत मिल पाना मुश्किल होने लगा | पर जब हफ्तेभर से ज्यादा दिन राजीव का कोई कॉल नहीं आया तब शिवानी बेचैन हो गयी |
"हैलो..! राजीव..?"
"हाय..!"
"कहाँ हो तुम..राजीव ? कॉल क्यूँ नहीं किया..?"
"क्या बस ईतना ही काम हैं मुझे..? की दिन रात तुमसे बातें करता बैठूँ..? कंपनी का सी ई ओ हूँ कोई क्लर्क नहीं |" - राजीव गुस्से में था |
"सी ई ओ..? तुम्हारा प्रमोशन हुआ ? और ये बात तुमने मुझसे...!!!! क्या बात हैं राजीव..? परेशान लग रहे हो | लगता हैं तुम्हारा मुड़ ऑफ हैं...मैं बाद में कॉल करती हूँ |" - शिवानी ने फोन काँट दिया | शिवानी के आँसू थमने का नाम न लेते गर राजीव का कॉल ना आता |
"आय एम सॉरी..शिवा..! क्या करूँ यार..? कुछ समझमें नहीं आ रहा | दो साल होने को आये और अब ये लोग मेरा ट्रांसफर इंडिया की बजाय लंडन कर रहे हैं | ऊपर से मुझे सी ई ओ बना दिया हैं | लंडन ऑफ़िस की जिम्मेदारी मुझपर डाल दी हैं | शिवा..! मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ | शिवांश को अपनी गोद में उठाकर उसके साथ खेलना चाहता हूँ | लगता हैं यहाँ रिजाइन दे कर सब छोड़ छाड़ कर वापस लौट आऊं अपने घर |" - राजीव की आवाज़ भारी हो रहीं थी | आंखें भर आयी थी |
"पागल मत बनो, राजीव | तुम सी ई ओ बन गए हो काँग्रॅट्स, जान..! ये तो खुशी की बात हैं | कोई बात नहीं लंडन ही सही, एक काम करती हूँ कुछ दिनों के लिए मैं और शिवांश वहाँ आ जाते हैं तुमसे मिलने तब तो ठीक हैं..?"
"सच..?"
"और नहीं तो क्या..? मैं कल ही टूरिस्ट वीजा के लिए बात करती हूँ | अब तो खुश हैं जनाब..?"
"नेक्स्ट मन्थ मुझे लंडन ऑफ़िस जॉइन करना हैं | तुम आओगी ना..?"
"हाँ..! बाबा..! चील करो अब | क्या रोतलू बने बैठे हो..?" - पलभर में शिवानी ने राजीव का मूड ठीक कर दिया और दोनों हँस पड़े |
दो महीने बाद शिवानी को टूरिस्ट वीजा मिल गया और उसने जाने की सारी प्लानिंग कर ली | वहाँ राजीव भी बेसब्री से उनके आने का इंतजार कर रहा था | खुशी उसके चेहरेपर झलक रहीं थी | मानो ऊपरवाले ने उसकी मुराद पूरी कर दी हो | वो मन ही मन भगवान को थैंक्स कहे जा रहा था | पर शायद अभी उनके मिलने का वक्त नहीं आया था | लंडन के लिए निकलने से दो दिन पहले शिवांश को टायफॉइड हो गया और उसे हॉस्पिटल में अॅडमिट करना पड़ा ऐसी हालत में उसे लेकर ट्रॅव्हल करना नामुमकिन था | शिवांश को मॉम के पास छोड़कर जाना शिवानी को ठीक नहीं लग रहा था | आखिरकार उसने लंडन जाना कॅन्सल कर दिया | ये सब सुनते ही राजीव निराशा के घेरे में डूबता चला गया |
शिवानी एक मिनट के लिए भी शिवांश से दूर नहीं हुई | दिन-रात उसके पास बैठी रहती | आख़िर शिवांश को हॉस्पिटल से डिस्चार्ज मिला पर अब भी कमजोरी की वजह से वह चल नहीं पाता | चेकअप के लिए डॉक्टर को घरपर बुलाना पड़ता था | डॉक्टर निशांत जो कि शिवानी के पड़ोस में ही रहने आये थे | मॉम की वजह से उनसे मुलाकात हो गयी और दिन रात कभी भी जरूरत हो तो निशांत शिवांश को देखने आने भी लगा | जल्द ही शिवानी की निशांत से दोस्ती भी हो गयी | बहोतही हेल्पफुल नेचर था डॉक्टर निशांत का | धीरे-धीरे शिवांश की तबियत भी ठीक होने लगी | और ज़िन्दगी फिरसे पटरी पर आने लगी |
"हे... माय बॉय..! कैसा हैं मेरा राजा बेटा..?" - राजीव शिवांश से व्हिडीओ चैट कर रहा था | और शिवांश अपने सात समंदर दूर बैठे पापा से बात करने की कोशिश कर रहा था | उसके हावभाव, अपने पापा के चेहरे को छूने की जद्दोजहद देख राजीव का दिल भर आया | शिवानी ने राजीव को भरोसा दिलाया कि, जैसेही ऑफिस के काम से फुरसत मिलेगी वो फिरसे कोशिश करेगी राजीव के पास लंडन जाने की | शिवानी का भी प्रमोशन हुआ था और ऑफिस की जिम्मेदारियाँ बढ़ती जा रही थी | आख़िर ये सच्चाई दोनोंने मान ली की, मिलने की ये ज़िद दोनों के बीच और भी दूरियाँ पैदा कर रही हैं | ईससे तो बेहतर होगा वो अपने अपने करिअर पर ध्यान दे |
शिवांश जैसे जैसे बड़ा होते गया राजीव के व्हिडीओ कॉल्स बढ़ते गए | शिवांश को भी अपने पापा से बातें करना बेहद अच्छा लगता | बाप बेटे में फासला तो था पर कभी ना टुटनेवाली बॉन्डिंग हो गयी थी | शिवांश अब पाँच साल का हो गया था | डॉक्टर निशांतका फॅमिली फ्रेंड जैसे घरपर आना जाना रहता था | निशांत के साथ घूमना फिरना, खेलना कहीं न कहीं शिवांश अपने अंदर पापा की कमी के अहसास को भर देता | शिवानी को भी उसके रहते सेफ फील होता | निशांत के मन में शिवानी के लिए प्यार उसकी बातों से और आंखों से साफ साफ झलकता था | पर शिवानी के दिल में राजीव के सिवा किसी और के लिए कोई जगह नहीं थी |
वहाँ राजीव खामोश सा अपनी आधी - अधूरी, अकेलेपन से भरी जिंदगी जीए जा रहा था | किसी के साथ घुलना मिलना बातें करना तो दूर वो ऑफिस के बाद अपार्टमेंट आते ही अपने आप को घर की चार दीवारों में कैद करके रखता | और सी डी प्लेअर पर उसका फेवरेट गाना रातभर बजते रहता | वही सुनते सुनते पलकों पर सूखे आँसू लिए उसकी रात गुजरती |


~~~तेरे बिन मैं यूँ कैसे जिया, कैसे जिया तेरे बिन
तेरे बिन मैं यूँ कैसे जिया, कैसे जिया तेरे बिन
लेकर यादें तेरी रातें मेरी कटी, लेकर यादें तेरी रातें मेरी कटी
मुझसे बातें तेरी करती है चाँदनी, तन्हा है तुझ बिन रातें मेरी
दिन मेरे दिन के जैसे नहीं, तन्हा बदन तन्हा है रूह
नम मेरी आंखें रहेँ, आजा मेरे अब रूबरू,जीना नहीं बिन तेरे


                                            .........to be continue

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