घुमक्कड़ी बंजारा मन की - 12

घुमक्कड़ी बंजारा मन की

(१२)

श्रीनगर

श्रीनगर के बारे में सोचते ही यह पंक्ति याद आती है..

"गर फ़िरदौस बररू-ए- ज़मीं अस्त हमीं अस्तो हमीं अस्तो हमीं अस्तो"

यानी अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है यहीं है यहीं है…यहाँ के gardens, सफ़ेद बर्फ से ढकी वादियाँ और गुलमर्ग, पहलगांव खूबसूरत नज़ारे यहीं बस जाने का न्योता देते हुए से लगते हैं 

सीधे सादे लोग जो कश्मीर की तरह ही खूबसूरत हैं.. पर फिर भी कुछ तो था जो लगा इस हसीं जगह को किसी की नजर लगी है, फूलों की घाटियाँ भी है, बर्फीली वादियाँ भी हैं, ट्यूलिप से मुस्कराते चेहरे भी हैं. धरती का यह स्वर्ग है... पर कुछ तो है जो इन बर्फीली फिजा में सुलग रहा है.

Spice jet विमान में दूसरी यात्रा. एक विशाल पंक्षी सा उड़ता यह सब यात्रियों को अपने में समेटे दूर ऊँचा उठता हुआ पर्वतों की चोटियों में बादलों में जैसे एक सपने का सा एहसास करवा देता है. बर्फ से ढकी चोटियाँ बादलो के समुन्द्र में बड़ी बड़ी लहरों सी दिखती है. नीचे दूर तक बादल ही बादल बस, और दिल की उड़ान.. जिसका कोई आदि नहीं अंत नहीं..... धीरे धीरे यह विशाल धातु पक्षी जमीन को छुने की कोशिश में है और दिख रहे हैं सरसों के पीले खेत.. गहरा हरा रंग. हल्का हरा रंग.. भूरी जमीन, छोटे छोटे मकान... रास्ते.. नदी और खिलोने जैसी गाड़ियां... और माइक पर गूंजती आवाज़.. हम जल्द ही श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरने वाले हैं.. अपनी पेटियां बांध ले.. हवाईबलाएँ निगरानी करती हुई दरवाज़े के पास खड़ी है, और बाहर का तापमान इस वक़्त ९ डिग्री हैं.... यह सूचना दी जा रही है 

दिल्ली में हम तापमान ३५ डिग्री के आस पास छोड़ कर आये थे.. कपडे गर्मी के थे.. इस लिए उतरते ही एहसास हुआ.. सर्द हवाओं का... और एहसास हुआ.. कि माहौल में गर्मी है तो बहुत तेज निगरानी की.. कुदरत पूरी तरह से अपने रंग में रंगी हुई है. रस्ते में खिले हुए फूल... झेलम नदी पर तैरते शिकारे हाउस बोट.... और सर से पांव तक ढकी कश्मीरी लडकियां... एक नजर में अपने होने के अस्तित्व से परिचित करवा देती है.... सामने बर्फ से ढकी चोटियों पर धूप और बादल कि आँख मिचोली जारी है. हवा सर्द है.. और दिल एक अजीब से एहसास से सरोबार कि यह जन्नत हमारी है.... मेरे देश की है.... और हर शहर, हर देश की तरह इस जगह की भी अपनी एक महक है.. वह अच्छी है या बुरी.. यह समझने में वक़्त का लगना लाजमी है... शायद शाकाहारी होने के कारण कुछ अजीब सी महक का एहसास तेजी से अनुभव हो रहा है.......

मन में खिलने लगे हैं "ट्यूलिप के फूल"

लगता है फिर से जैसे

महीना फागुन का

दस्तक देने लगा है

हवाओं में भी है

एक अजीब सी दीवानगी

और पलाश फिर से

दिल में दहकने लगा है

हो गयी ही रूह गुलमोहरी

लफ्ज़ बन के संदली कविता

कागज पर बिखरने लगा है............

श्रीनगर के ट्यूलिप गार्डन को देखते हुए यही लफ्ज़ दिल दिमाग में कोंध गए...

और साथ ही यह "देखा एक ख्व़ाब तो ये सिलसिले हुए, दूर तक निगाह में हैं गुल खिले हुए’"ज़मीं की जन्नत माने जाने वाले कश्मीर की ख़ूबसूरत वादियों में महकते यह ट्यूलिप के फूल जब अपना जादू बिखेर देते हैं तो सम्मोहित खड़े रह कर बस यही गाना याद आता है । लाल, पीले, गुलाबी, सफ़ेद और नीले रंगों के ये फूल एक बड़ा सा गुलदस्ते जैसे दिखाई देते हैं। जो अपनी अनोखी छटा से आपको मूक कर देते हैं.... श्रीनगर में एशिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन सिराज बाग़ चश्मशाही का indira gandhi मेमोरियल ट्यूलिप गार्डन है। ज़रा सोचिये कितना मनमोहक और लुभावना होगा वो दृश्य जब खूबसूरत डल लेक के किनारे ट्यूलिप के रंग बिरंगे फूलों का एक गुलदस्ता सजा होता है और आप बस उसको बिना कुछ कहे निहारते रह जाते हैं... यह garden कुल 90 एकड़ के बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। फूलों के मौसम में इस बगीचे में कम से कम 13 लाख ट्यूलिप बल्‍ब एक बार में खिलते हैं और शायद ही कोई होगा जो ट्यूलिप के फूलों को देखकर मोहित ना हो जाए.... पर्यटक तो यहाँ खूब दिखे पर साथ ही वहां के लोकल kashmiri भी परिवार के साथ उन फूलों से खिलखिलाते हुए दिखे.... ... वहां बनी "कहवा हट "भी ट्यूलिप के फूलों से ढकी आकर्षित कर रही थी| कहवा और बाकरखानी बेचता हुआ यह सुन्दर छोटी सी अपनी दूकान लगाए उतना ही रोचक था जितना यह खिल हुआ खिलते हुए चेहरों और फूलों का बगीचा लग रहा था, यहाँ से अगला पडाव हमारा गुलमर्ग था.

गुलमर्ग 

गुलमर्ग जब तक देखा नहीं था.. चित्रों में देखा हुआ सुन्दर होगा यही विचार था दिल में.. पर कोई जगह इत्तनी खूबसूरत हो सकती है.. यह वहां जा कर ही जाना जा सकता है........ चित्र से कहीं अधिक सुन्दर.. कहीं अधिक मनमोहक.. और अपनी सुन्दरता से मूक कर देने वाला........

उफ्फ्फ कोई जगह इतनी सुन्दर.. जैसे ईश्वर ने खुद इसको बैठ के बनाया है.. कश्‍मीर का एक खूबसूरत हिल स्‍टेशन है यह... इसकी सुंदरता के कारण इसे धरती का स्‍वर्ग भी कहा जाता है। यह देश के प्रमुख पर्यटक स्‍थलों में से एक हैं। फूलों के प्रदेश के नाम से मशहूर यह स्‍थान बारामूला जिले में स्थित है। यहां के हरे भरे ढलान बहुत सुन्दर हैं.. अप्रैल में हमारे जाने पके वक़्त भी यह बर्फ से ढके हुए थे. यह स्थान समुद्र तल से 2730 मी. की ऊंचाई पर है | आज यह सिर्फ पहाड़ों का शहर नहीं है, बल्कि यहां विश्‍व का सबसे बड़ा गोल्‍फ कोर्स और देश का प्रमुख स्‍की रिजॉर्ट है। गुलमर्ग का अर्थ है "फूलों की वादी"। जम्मू - कश्मीर के बारामूला जिले में लग - भग 2730 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गुलमर्ग, की खोज 1927 में अंग्रेजों ने की थी। यह पहले “गौरीमर्ग” के नाम से जाना जाता था, जो भगवान शिव की पत्नी "गौरी" का नाम है। फिर कश्मीर के अंतिम राजा, राजा युसूफ शाह चक ने इस स्थान की खूबसूरती और शांत वारावरण में मग्न होकर इसका नाम गौरीमर्ग से गुलमर्ग रख दिया। गुलमर्ग का सुहावना मौसम, शानदार परिदृश्य, फूलों से खिले बगीचे, देवदार के पेड, खूबसूरत झीले पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। गुलमर्ग अपनी हरियाली और सौम्य वातावरण के कारण आज एक पिकनिक और कैम्पिंग स्पॉट बन गया है जब हम वहां पहुंचे तो बारिश हो रही थी.. होटल का मुख्य द्वार बर्फ से ढका हुआ था....

मौसम ठंडा था पर बहुत सुहाना था.. रात हो चली थी.. और भूख जोरो की लगी थी.. गर्म मेगी ने जैसे उस वक़्त वरदान सा काम किया :) सुबह उठते ही बहार झाँका तो बारिश हो रही थी.. आज गोंडोला राईड पर जाना था... गोंडोला राईड जो कि केबल कार सिस्टम है, गुलमर्ग का प्रमुख आकर्षक स्थल है। यह दो पांच कि. मी लम्बी राईड है, गुलमर्ग से कौंगडोर और कौंगडोर से अफरात।

इस राईड में आप पूरे हिमालय पर्वत और गोंडोला गाँव को देख सकते हैं।

कौंगडोर का गोंडोला स्टेशन 3099 मीटर और अफरात 3979 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। गोंडोला राईड वहां घुमने का बहुत बढ़िया साधन है.. पर बारिश और ऊपर मौसम खराब होने के कारण उस वक़्त बहुत ऊपर जाने से से रोक रखा था.. पहले लेवल तक जाने के लिए भी हमें बहुत इन्तजार करना पड़ा.. इतने लोग इतनी उत्सुकता.. बारिश और ऊपर जाने पर बर्फबारी होने के आसार सब तरफ एक रोमांचक कोलहल में डूबे हुए थे | आखिर लम्बे इन्तजार के बाद पहले लेवल तक जाने की टिकट मिली... एक व्यक्ति के लिए चार सौ रूपये की टिकट है पर जो नजारा है...... वह ज़िन्दगी भर भूला नहीं जा सकता है... ऊपर पहुँचते ही पहली बार देखी. स्लेज पर जाते हुए डर भी था और एक बच्ची सी उत्सुकता भी... साथ ही वहां के लोकल घुमाने वाले स्लेज चलाने वालो के लिए एक स्नेह सहानुभूति की भावना भी थी कि कैसे इतने कठोर वातावरण में यह लोग अपने जीवन को चलाते हैं. खुद को अजीब लगा उनसे स्लेज पर बैठ कर स्लेज गाडी खिंचवाना... मोटे मोटे हाँ सब लोग और वह दुबले सुकड़े,, आखिर के खाते हैं आप... पूछने पर बताया कि चावल दिन में तीन चार बार.. पर पता नहीं कहाँ जाता है.. एक तो सर्दी बर्फ.. ऊपर से खीच के स्लेज गाडी को ऊपर तक ले जाना फिर फिसलते हुए संभाल कर लाना.. बेचारा खाया खाना भी कहाँ टिकेगा.. पर हर व्यक्ति अपने हालत में जीता है और जीविका के साधन तलाश ही लेता है.. यही जाना वहां देख कर तो…

फिर आया पडाव पहलगांम 

वहां से आये पहलगाम, रास्ते के नज़ारे लफ़्ज़ों से ब्यान नहीं हो सकते, सरसों अभी वहां पकी नहीं थी पीले रंग से ढकी धरती उस पर सेब के सफ़ेद फूलों से बगीचे. अखरोट के पेड़ पर नए पत्ते, कमाल सब अजूबा कुदरत का. एक दो जगह रुक कर कहवा पिया, बाकरखानी खायी और बादाम साथ के लिए खरीदे गए. पहलगाम का नाम याद आते ही अमरनाथ यात्रा दिल दिमाग में कौंध जाती है

.. पहलगाम को चरवाहों की घाटी के नाम से भी जाना जाता है। यहां की खूबसूरती ऐसी कि एक बार कोई आ जाए तो बार-बार आने का मन करता है।

यहां का प्राकृतिक सौन्दर्य बेहद दिलकश है | यहां के खूबसूरत नजारे के कारण सत्तर व अस्सी के दशकों में कई फिल्मों शूटिंग हुआ करती थी। उन दिनों में यह स्थल बॉलीवुड का सबसे लोकप्रिय शूटिंग स्थल हुआ करता था। यहां एक बॉबी हट है, जिसमें फिल्म बॉबी की शूटिंग हुई थी। इसके साथ यहां एक बेताब घाटी है, जहां सन्नी देओल की फिल्म बेताब की शूटिंग हुई थी। पहलगाम बहुत ही रोमांटिक और सकून भरी जगह है कलकल करती नदी का तेज प्रवाह और दूसरी तरफ देवदार के पेड़ों से ढकी पहाड़ियां जो कहीं कहीं बर्फ से ढकी थीं, पहाड़ी झरने कहीं जमी हुई और कहीं प्रवाह सब मिलकर एकदम रहस्यमय सुन्दर रोचक नजारा था |पहलगाम से आगे जहाँ कहीं भी जाना हो तो वहीँ की स्थानीय टेक्सियाँ लेनी पड़ती हैं. और होटल वाले वह इंतजाम कर देते हैं.... वहां घाटी में... उस सत्रह वर्ष के गाइड के आँखों में बातो में आज के कश्मीर की झलक थी... जो एक आजाद और सकून भरी ज़िन्दगी चाहते हैं.... आतंक और आतंक वादियों के प्रति घृणा है.. पर जीने को मजूबर है उन्ही हालात में... एक एक चीज वहां कि उसने बहुत रोचक ढंग से बताई.. बहुत सी बाते यहाँ लिखने में भी रूह कांप रही है मेरी.. जो उसने बताई... घाटी के ऊपर कारगिल के पहाड़ और उस से नीचे केसर और अखरोट के बगीचे. वाकई जन्नत इस अलग क्या होगी.... मौसम खराब होने के कारण हम सोनमर्ग और चंदनवाड़ी नहीं जा सके.. अफ़सोस रहेगा उस जगह को न देख पाने का.. वापसी में देखने में कई नज़ारे मिले... क्रिकेट बेट यहाँ पर मिली लकड़ी से खूब बढ़िया बनता है.. बहुत सी इसकी फेक्ट्रियां देखी और बहन के बेटे ने जो क्रिकेट खेलने का शौकीन है एक बेट लिया भी.. ले कर उसने बताया कि दिल्ली में यही बेट २००० रूपये का मिलेगा जो उसने यहाँ से छः सौ रूपये में लिया है.. यहाँ पर ऊनी वस्त्र और खूबसूरत साड़ियाँ भी ली हमने.. जो बहुत वाजिब दाम पर मिली.... बहुत कुछ है अभी बताने के लिए.. इस लिए अगले अंक का इन्तजार कीजियेगा :)पहलगाम के आसपास के मुख्य आकर्षण बेताब घाटी, चंदनवाड़ी और आरू घाटी हैं. ये सब लगभग १६ किलोमीटर एक अन्दर ही हैं |पहलगाम से ६/७ किलोमीटर की दूरी पर ही एक बहुत ही प्यारी घाटी है जिसको "बेताब घाटी "कहा जाता है नदी के साथ साथ बसी यह घाटी बेहद खूबसूरत लगी हिंदी फिल्म बेताब की शूटिंग यहीं पर हुई थी. ख़ास कर यह गाना ”जब हम जवाँ होंगे, जाने कहाँ होंगे” तो सभी को याद होगा ही. तब से ही यह बेताब घाटी कहलाने लगी जबकि इसका वास्तविक नाम हजन घाटी था..

श्रीनगर के बाग़ बगीचे 

श्रीनगर बाग़ बगीचों का गुलदस्ता है. सुन्दर बाग़ इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा देते हैं. यहाँ के हर बाग़ को देख कर यही लगा कि काश यही हमेशा के लिए बस सकते. सीढ़ीदार लॉन, झरने, फव्वारों और कई फूलों से भरे हुए ये बगीचे कश्मीर की खूबसूरती में चारचांद लगा देते हैं। . डलझील के किनारे शालीमार, चश्मे शाही और निशात नाम से जाने जानेवाले सभी बागीचे मुग़ल समय के बने हुए हैं इन सबके एक तरफ लम्बी चौड़ी डल झील है तो दूसरी तरफ पहाड़ियों की श्रंखला जहाँ से हमेशा बहने वाले झरनों निराला नजारा है शायद इसी कारण यहाँ पर बागीचे बनाए गए होंगे. यह सब मुगल गार्डन कहे जाते हैं जो कि एक खास तरह की मुगल शैली के बागीचे हैं, यह कई बड़े क्षेत्रफल में फैले होते हैं और ज्यादातार बागीचों में जन्नत के नक्शे को बयां किया जाता है। बागीचे में प्रवेश के लिए टिकट लेने पड़ते हैं. हर जगह लोकल और बाहर से आये लोग थे, जिस में मुझे तो गुजराती और बंगाली अधिक नजर आये. विदेशी पर्यटक भी दिखे पर बहुत अधिक नहीं पर जो भी थे सब बगीचों की सुन्दरता देख कर मन्त्रमुग्ध से थे.

चश्मा शाही बागीचे के बारे में पता चला कि एक प्रसिद्द कश्मीरी महिला संत ‘रूपा भवानी’ जिसका पारिवारिक नाम साहिबी था ने ही एक कुदरती जल स्रोत ढूंढा था. इसी वजह से नाम पड़ गया ‘चश्मे साहिबी’ जो बाद में चश्मे शाही कहलाया. वैसे योजनाबद्ध तरीके से यहाँ के बागीचे को कश्मीर के मुग़ल गवर्नर अली मरदान द्वारा बनवाये जाने का उल्लेख मिलता है. चश्में शाही के मुख्य जलकुंड में एक भवन निर्मित है जहाँ कल कल करते हुए ऊपर की पहाड़ियों से पानी गिरता है. यहाँ के झरने का पानी पीया जाता है और पीने वालों की खूब भीड़ थी यहाँ. कहा जाता है की इस जल से पेट की बेमारी दूर हो जाती है वैसे भी पहाड़ी झरने का जल हमेशा से अच्छा माना जाता है हम में से एक दो ने यह पानी बोतल में भी साथ के लिए ले लिया.

इस के बाद देखा शालीमार और निशात बाग़ शालीमार बाग़ को" प्यार का घर" भी कहा जाता है इस बाग का निर्माण सन 1619 में मुगल शासक जहांगीर ने अपनी पत्नी नूरजहां के लिए बनवाया था। और निशात का मतलब आनन्द का बगीचा. इसको 1633 में नूरजहां के बड़े भाई आसिफ खान ने बनवाया था। इस बाग़ की संरचना आयताकार है. शालीमार बाग़ के बाद यह कश्मीर के सबसे बड़े बागों में आता है. इसके साथ ही हमने बादाम वाड़ी. देखी. सब बागों में एक शानदार बात है कि आप बाग के जिस मर्जी हिस्से में चले जाओ डल झील आपकी आँखों में ही रहती है... वहां के गाइड ने इतनी रोचक बातें बतायी कि टैक्सी से किया गया एक घंटे का वादा बहुत कम लगने लगा.

यहाँ लगे चिनार के पेड़ बहुत ही खूबसूरत है निशात बाग़ तो इसी खूबसूरती के कारण जाना जाता है.. मुझे चिनार के पत्तो की खूबसूरती ने मोह लिया.

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अगले दिन से सुबह बादाम बाग जो की हरी पर्वत किले की तलहटी में है और जिसको कभी अकबर ने बनवाया था, यहाँ एक जगह बादाम की शक्ल में पत्थर को तराशा गया है और उस पर अल्लाह लिखा हुआ है| ऐसे ही शालीमार और निशात बाग़ के कई पेड़ों पर भी दिखा कि उसकी बनावट और कटाई "अल्लाह " शब्द के तर्ज़ पर की गयी है बादाम वाड़ी नाम देना इसको सही ही था क्यों कि यहाँ पर बताया कि लगबग १४०० सिर्फ बादाम के ही पेड़ हैं. इस वक़्त इस पर हरे बादाम बहुत छोटे लगे हुए थे.. कुछ तोड़ कर खाए मीठे और बहुत ही नाजुक थे.. इतने बादाम देख कर ही मन हरा भरा हो गया . यही पर खूबसूरत नक्काशी किए हुआ एक कुआँ भी देखा जो जी बहुत गहरा था और यह गोरियाँ चिड़िया भी दिखी जो अब दिल्ली में नहीं दिखती 

ऊपर दूर पहाड़ी पर एक किला दिख रहा था जिसको हरिपर्वत किला कहा जाता है..

इसके बाद गए "हजरत बल "यहाँ हजरत मुहम्मद की दाढ़ी के बाल को संभल कर रखा गया है और वोह साल में अलग अलग १० दिनों तक लोगों के देखने के लिए सामने लाया जाता है |इस दरगाह में औरतों को अंदर जाने की मनाही है. हिंदू लोग भी अंदर सिर ढक कर जा सकते हैं यह जगह मशहूर इसलिए है कि कश्मीर के मुस्लिम सम्प्रदाय के विश्वास के अनुसार यहाँ पर हज़रत मोहम्मद के दाढ़ी के पवित्र बाल को बड़े जतन से रक्खा गया है. आतंकवादियोंने इस दरगाह में प्रवेश कर पवित्र बाल को चुरा ले जाने का भी प्रयास किया था और उस समय हुई गोली बारी में लगभग दो दर्ज़न आतंकवादी मारे गए थे. बाद में भी छुटपुट घटनाएं होती रही हैं. यहाँ पर सुरक्षा बल के बहुत से सैनिक दिखे. महिला पुलिस भी बहुत थी शायद उस दिन जुम्मे की नमाज का दिन वीरवार था सख्ती अधिक थी यहाँ कबूतरों की भारी तादाद है

डल लेक

अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है। ये बात बचपन से सुनते आएं हैं कश्मीर के लिए । और कश्मीर का ताज है है डल झील। डल झील जिसने सदियों से यहां की परंपरा यहां की संस्कृति को सहेज कर रखा। डल झील जिस पर न जाने कितनी फिल्मों की शूटिंग हुई, जहाँ साठ सत्तर के दशक में बहुत से लोगों ने इस डल झील की नजर से ही श्रीनगर के सौन्दर्य को निहार कर अपनी नजरों में बसाया है .. जहाँ के कई गाने आज भी जुबान पर हैं | वह डल झील आज भी उतनी ही खूबसूरत है | | समुद्र तल से 1500 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद डल एक प्राकृतिक झील है और तकरीबन 50, 000 साल पुरानी है। बर्फ के गलने या बारिश की एक-एक बूंद इसमें आती है और अपने साफ़ जल से इसको भरती रहती है । इस झील में दो पिकनिक स्थान हैं। चार चिनार के नाम से जाने वाले इस धरती के टुकड़े को चार-चार चिनार के पेड़ होने से जाना जाता है। झील के दुसरे भाग में स्थित हरिपर्वत भी देखने लायक है |वहीँ से शंकराचार्य मंदिर भी दिखता है|डल झील के बीच में भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की स्मृति में नेहरू पार्क भी है।
कभी डल झील के साफ़ पानी के आईने में कुदरत खुद को निहार लेती थी पर आज लगातार बढ़ते हाउस बोट और ध्यान न देने से वहां का पानी काला होता जा रहा है यह बहुत ही दुःख का विषय है | पर यह भी सच है कि कश्मीर की सैर के लिए जाकर डल झील के हाउस बोट में न ठहरा जाये तो कश्मीर की सैर अधूरी रह जाती है। यहाँ के तैरते बाजार और वहां झील में ही सब्जी उगाने वाले लोगो के घर मन मोह लेते हैं | तरह तरह की पेड़ पौधो की झलक झील की सुंदरता को और निखार देती है। कमल के फूल, पानी में बहती कुमुदनी, झील की सुंदरता में चार चाँद लगा देती है। यहाँ आने वालों के लिए विभिन्न प्रकार के मनोरंजन के साधन जैसे शिकारे पर घूमना पानी पर सर्फिंग करना और मछली पकड़ना बहुत अच्छे लगते हैं |झील में तैरते हाउसबोट और शिकारे शांति, सुकून और मनमोहक खूबसूरत दिखते हैं.

हाउसबोट के नज़ारे

ये चाँद सा रोशन चेहरा, जुल्फों का रंग सुनहरा

ये झील सी नीली आँखें, कोई राज़ है इन में गहरा

तारीफ़ करूँ क्या उसकी, जिस ने तुम्हे बनाया...

श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतरते ही यह गाना बरबस दिल गाने लगता है... ( यह बात और है जब हम सब ने यह गाना हाउस बोट जाने के लिए शिकारे पर बैठ कर गाना शुरू किया तो शिकारे वाले ने कहा "अबी नहीं गाना.. जब आप शिकारे की सैर पर जायेंगे न तब गाये.. बहुत अच्छा लगेगा ) सुन कर मेरे होंठो पर मुस्कान आ गयी.. लगा हर आने वाला टूरिस्ट यह गाना जरुर गाता होगा तभी सहजता से इस शिकारे को चलाने वाले ने कह दिया. कश्मीर के लोग वाकई जितने सुन्दर है उतने ही दिल के भी सुन्दर मासूम. वहां के सुन्दर गुलाबी चेहरे और अधिकतर महिलायें हलके रंग के लम्बे गर्म कुरता जिस को हम सब भी फेरन के नाम से जानते हैं... उस में नजर आये.. बुरका नहीं था अधिक जैसा लगा था पर हर लड़की छोटी या बड़ी सर से पांव तक ढकी थी सर से पांव तक ढकी यह सुन्दरता जब पूर्ण रूप से गहनों में सिमट जाती होगी तो वाकई कयामत नजर आती होगी. उस पर पहने हुए गहने, बहुत कुछ कहते हैं यह कश्मीरी गहने.. कानों से लटकती लाल डोरी.. गुलाबी चेहरों का नूर और उस पर डाला हुआ फेरन जैसे एक जादू सा करता है | . वहां कि सुन्दरता गहनों में मुखर है और अपनी बात कहने कि ताकत रखती है... वैसे जो वहां आते जाते सूरतें दिखी वह अपने चेहरे के तेज से बता रही थी.. कि बंधी हुई नहीं है यहाँ सब.. हर बाग़ में कश्मीरी परिवार दिखा कुछ खाते हुए.. कुछ बतियाते हुए.. जरुरी नहीं था कि कोई मर्द साथ हो.. बस वो थी और उनकी बातें.. उत्सुकता से देखती नजरे.. इधर उधर.. कश्मीर का एक लोक गीत है जिस में हर लड़की के दिल की बात है... उसका भवार्थ यहाँ कुछ इस तरह से है.. बिलकुल कश्मीर के पहनावे और वहां के रहने वालियों के दिल सा सुन्दर...

कश्मीर के लोक गीत में एक लड़की चरखे को बहुत प्यार से अपने पास बैठने को कहती है और उस से अपने मन की बात कुछ इस तरह से कहती है...

मेरे सुख दुःख के साथी !

मेरे मित्र ! मेरे मरहम !

मेरे पास बैठ जाओ !

मैं तेरा धागा 

फूलों के पानी में भीगों कर बनाऊंगी

और पश्मीना के लंबे लंबे तार कातती रहूंगी 

देखो आहिस्ता आहिस्ता बोलना 

अगर मेरा महबूब आए -

तो उस से कहना --

मुझे इतना क्यों भुला दिया ?

फूलों सी जान को इस तरह नही रुलाते...

श्रीनगर का आखिरी दिन. जैसे जाने के नाम से दिल खींच रहा हो कोई.. और डल लेक के बीचो बीच नाम उसका ज़ूम ज़ूम.. वाकई "ज़ूम ज़ूम "बस दिल कहे यही रुक जा रे रुक जा यहीं पर कहीं जो बात इस जगह है वो कहीं भी नहीं | सही तो है श्रीनगर जाना और वहां से वापस आने में बहुत ही अलग एहसास है | जाते हुए बहुत से डर बहुत से सुझाव और बहुत से भ्रम है आपके साथ और वापस आते हुए आपके साथ वहां के लोगों का स्नेह.. भोलापन.. मासूमियत वहां के हवा में फैली चिनार की महक है. और भी बहुत कुछ.. जो आपके साथ ता उम्र रहने वाला है. यहां आकर आपको एक ही गाना याद आएगा ‘सोचो कि झीलों का शहर हो, लहरों पर अपना एक घर हो.. ’ पर वहीँ कुछ कडवे सच भी है इस देव भूमि के साथ जुड़े हुए..

आज का कश्मीर और वहां की सोच वहां जितने लोगों से बात हुई सभी अमन शान्ति चाहते हैं कोई भी लड़ाई आतंक नहीं चाहता. वहां का मुख्य जीवन पर्यटक से जुडा है जब जब वहां कुछ आशांति होती है तब तब वहां यह प्रभवित हो जाता है.. लोग उदास हो जाते हैं.. वो चाहते हैं कि लोग यहाँ आये घुमे और यहाँ की सुन्दरता से जुड़े इस तरह की फिर फिर वापस आना चाहे.. पर शायद न वहां पर आंतक फैलाते आतंकवादी को यह पसंद है न ही सरकार को और यही वजह है की कुदरती सुन्दरता तो वहां बिखरी है पर साथ ही साथ यहाँ कोई तरक्की नहीं हुई है वहां. सड़के कई जगह से बहुत खराब है. बाग़ हैं सुन्दर पर लोगों के चेहरे उदास हैं कई जगह बहुत अजीब लगी.. जैसा कि पहले जिक्र किया था कि पहलगाम के रास्ते में एक जगह है जहाँ बेट ही बेट बनते हैं जहां दुकानों के बाहर सचिन धोनी तो थे पर अधिकतर पाकिस्तानी प्लेयर नजर आते हैं बच्चे भी पाकिस्तान की हरी ड्रेस में खेलते दिखे| 

कश्मीरी पंडितों को जिस तरह से वहां से निकाल बाहर कर दिया गया वह आज भी वहां रहने वाले लोगों को ही चुभता है.. जो लोग अपने ही घर से बेघर है, वहां नहीं रह पाते वो कितना निराश होंगे सोचने वाली बात है | कोई नहीं सोचता इस बारे में शायद सिर्फ वहां के लोकल लोगों के अलवा | जो लोग वहां रह गए हैं शिकारे वाले ने बताया कि वह उन हिन्दू परिवारों का पूरा ध्यान रखते हैं | फिर सरकार क्यों नहीं सोचती है ?कश्मीरी पंडितो को अपने घर कश्मीर को छोड़े हुए कई वर्ष बीत गए लेकिन घर वापसी की रास्ता अभी भी कहीं गुम है । लगभग 7 लाख कश्मीरी परिवार भारत के विभिन्न हिस्सों व् रिफ्यूजी कैम्प में शरणार्थियो की तरह जीवन बिताने को मजबूर है। आतंकी इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि जब तक कश्मीरी पंडित कश्मीर में है, तब तक वह अपने इरादो में कामयाब नहीं हो पायेगें। इसलिए सबसे पहले इन्हें निशाना बनाया गया।

कश्मीरी पंडित थे तो घाटी मन्त्रों से गूंजती थी अजान के साथ साथ पर उन्ही के जब मुख्य सदस्यों को मारा गया तो उन्हें अपने जान बचाने के लिए अपनी जन्म भूमि को छोड़कर शरणार्थियो की तरह जीवन बिताने के लिए मजबूर होना पड़ा। कश्मीर के धरती पर जितना हक बाकी लोगो का है, उतना ही हक इन कश्मीरी पंडितों का भी है। राज्य व केन्द्र सरकार यह दावा तो करती है कि कश्मीर अब कश्मीरी पंडितो के लिए खुला है और वह चाहे तो घर वापसी कर सकते है, पर इसकी सच्चाई कितनी है, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। अगर यह घर वापसी कर भी ले, तो जाये कहां, क्योंकि उनका अधिकतर घर अब टूट चुके हैं और उनकी सुरक्षा कौन लेगा ?वहां पढ़े एक लेख के अनुसार जिन नौ परिवारो ने घर वापसी की थी, उनका अनुभव अच्छा नही रहा। उनका कहना है कि कश्मीर के अधिकारी उन्हें वहाँ फिर से बसने में हतोत्साहित करते हैं। . वे अपने गाँवों में फिर से घर बनाना चाहते हैं, लेकिन सरकार उनसे ज़मीन छीन रही है। इन सब के अनुभव यह बताते है कि कश्मीर में अभी भी कश्मीरी पंडितो के लिए हालात इस लायक नहीं हुए है कि वह अपनी घर वापसी की सोच सके।

कश्मीर की सुन्दरता इन लोगों के बिना अधूरी है | यहाँ मंदिर अब बहुत कम दिखायी दिए | लगातार आती आजान की आवाज़ ने सच ब्यान कर दिया और कुछ हैरानी वाली बात यह लगी कि गुरूद्वारे भी बहुत अधिक दिखे | श्रीनगर घूमते हुए बहुत से सच ब्यान हुए वहां रहने वाले मुस्लिम गाइड ने बताया कि वह अब अब अपना छोटा नाम रखना पसंद करते हैं | सर्दी में कारगिल की तरफ से आने वाले आतंकवादियों को अपने घर में दो कमरे देने पड़ते हैं और वो जो भी मांगे वह मांग अनुचित भी हो तो पूरी करनी पड़ती है.. सत्रह वर्ष के उस गाइड की आँखों में आतंक के प्रति नफरत और दर्द एक साथ दिखा | मैं वह उसकी आँखे भूल नहीं पा रही हूँ | कुदरत के हर सर्द गर्म को सहने वाले इंसान के जुल्म के आगे कितने बेबस हैं यह उसकी बातों से ब्यान हुआ | फिर भी श्रीनगर की यादे मधुर है | कोई कहे फिर से जाने को तीसरी बार भी मैं जाना चाहूंगी| और वहां के लोगो से खूब बतियाना चाहूंगी| वो मेरे देश से जुडा हुआ एक अटूट हिस्सा है जिसकी सुन्दरता के आगे शायद कभी आतंक हार जाएगा यही उम्मीद के साथ फिर अगली किसी यात्रा से आपसे बाते करुँगी..

लिखते हुए मीना कुमारी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही है..

फ़िर वही नहाई नहाई सी सुबह

वही बादल

दूर दूर तक घूमती फिरती वादी भी उसी शक्ल में

घूमते फिरते थे

ठहरे हुए से

कितनी चिडियां देखी

कितने कितने सारे फूल, पत्ते चुने पत्थर भी...

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