माँमस् मैरिज - प्यार की उमंग - 8

माँमस् मैरिज - प्यार की उमंग

अध्याय - 8

" ऐ चुप! ऐसा नहीं कहते। नवीन ने सुन लिया तो?" शालिनी ने सौम्या को डांटते हुये कहा।

नवीन ने सौम्या की कहीं बात सुन ली थी। उसने गैस सिलेंडर अन्दर किचन में जाकर बदल दिया और खाली वाला गैस सिलेंडर उठाकर पुनः साईकिल पर रख दिया।

शेष रूपये टेबल पर रख वह जाने लगा।

"अरे कहां चल दिये नवीन! नाश्ता तो कर लो।" शालिनी समझ चूकी थी की नवीन को सौम्या की बातें चूभ गई है।

जब उसने टेबल पर रखे शेष रूपये रखे हुये देखे तब उसे यकीन हो गया की नवीन को बुरा लगा है

क्योंकि पुर्व में नवीन कोई भी वस्तु खरीदकर लाने के उपरांत शेष रूपये अपना अधिकार समझ कर रख लिया करता था।

शालिनी ने पैसे नवीन को देने चाहे, मगर नवीन ने लेने से मना कर दिया।

" रख लो भई! तुम्हारी मजदूरी के पैसे है।" सौम्या ने अगला व्यंग कसा।

"सौम्या जी! यह मेरे भैया-भाभी का घर है। याने की मेरा घर है। अपने घर के सदस्यों से कैसी मजदूरी लेना। कभी अपने घर गैस सिलेंडर लगे तो बुलावाईयेगा। वहां से अपनी मजदूरी जरूर ले लुगां।" कहते हुये नवीन सिर्फ एक गिलास पानी पीकर वहां से निकल गया। गैस गोदाम से सिलेंडर लाकर देने में उसे ड्यूटी जाने को विलंब हो गया था।

शालिनी ने सौम्या के नवीन के प्रति बर्ताव पर उसे डांटा किन्तु सौम्या को विशेष फर्क नहीं पड़ा।

नवीन आज पहली बार बिना कुछ खाये-पीये अपनी भाभी के यहां से गया था।

शाम को राजाराम असावा अपनी पत्नी दुर्गा देवी असावा के साथ गणेशराम चतुर्वेदी के घर आये। दोनों पति-पत्नी के विवाह की बत्तीसवीं सालगिरह का निमंत्रण देने। गणेशराम चतुर्वेदी ने अपने समधी के निमंत्रण पर परिवार सहित आने का वचन दे दिया। गणेशराम चतुर्वेदी वहां वे नवीन से भी मिले। नवीन ने दोनों को चरण स्पर्श कर प्रणाम किया। दुर्गा देवी ने नवीन को हेय दृष्टि से देखा। क्योंकि राजाराम असावा इस नवीन से ही सौम्या के विवाह की बातें घर में किया करते है। राजाराम असावा ने नवीन से बड़ी ही आत्मीयता से बात की।

राजाराम असावा के विवाह की सालगिरह के दिन सुबह-सुबह उन्होंने नवीन को फोन कर घर आने को कहा। उन्होंने ये भी कहा कि घर आकर बाहर लाॅन में आयोजित पार्टी के कुछ जरूरी इंतजामों का निरिक्षण कर कमी-पेशी दुरूस्त कर ले। अपने बड़े भैया का ससुराल है यह जानकर उसने वहां आने की हां मी भर दी।

सौम्या घर पर ही थी। नवीन असावा हाउस के बाहर गार्डन में आयोजित होने वाली पार्टी की व्यवस्थाओं में लग गया। आते-जाते समय सौम्या और नवीन की आंखे आपस में टकरा जाती। लेकिन दोनों एक-दूसरे के विरोधी होने के नाते परस्पर उपेक्षा करने से बाज नहीं आते।

असावा जी ने उस दिन नवीन के चाय-नाश्ता और भोजन की जिम्मेदारी सौम्या पर सौंपी थी। असावा दम्पति सालगिरह वाले दिन देवी मां के मंदिर जा सर्वप्रथम वहां भिक्षुक कों भोजन करवाते है। तत्पश्चात घर आकर स्वंय भोजन करते।

सौम्या छत की बालकनी से नवीन को चिढ़ाने का कोई अवसर नहीं छोड़ रही थी। दोपहर का समय हो चूका था किन्तु सौम्या ने नवीन को चाय तक नहीं पिलाई थी। उसने घर के नौकर-चाकरों को भी नवीन को चाय-नाश्ता देने से मना कर दिया था। सौम्या छत पर ज्यूस पी रही थी। उसे तो नवीन को चिढ़ाना था। ताकी वह यह सब व्यवस्थाओं को बीच में छोड़कर भाग जाये। दरअसल सौम्या ने अपने माता-पिता की सालगिरह का सारा उत्तरदायित्व स्वयं मांगा था किन्तु राजाराम असावा ने यह जिम्मेदारी नवीन को सौंप दी थी जिससे सौम्या को बहुत जलन हुई थी। वह उसी का बदला नवीन से ले रही थी। नवीन भुख के मारे बेहाल था। और यह क्या? नवीन बाहर लाॅन में कहीं नहीं था। सौम्या को यकीन हो गया की नवीन भाग खड़ा हुआ है। तब ही असावा दम्पति मंदिर से घर लौट आये। शालिनी और संजीव भी दूसरी कार में थे।

सभी इंतजाम व्यवस्थित देखकर असावा जी प्रसन्न थे। सौम्या नीचे दौड़ पड़ी। उसे जल्दी से जल्दी नवीन की गैरजिम्मेदाराना हरकत की सूचना अपने पिता को देनी थी। लेकिन यह क्या? जैसे ही वह नीचे आई उसने अपने पिता का हाथ नवीन के कन्धों पर शाबाशी देते हुये देखा। नवीन चौपाटी से नाश्ता कर लौट आया था। नवीन ने शाम को परिवार सहित आने का बोलकर असावा जी से विदा ली।

संजीव और शालिनी बेटे विहान के साथ घर के अन्दर चले गये। असावा दम्पति भी अपने शेष कार्य पुर्ण करने में व्यस्त हो गये। सौम्या अपनी पराजय पर भड़क रही थी। उसने रात की पार्टी मे नवीन को सबक सिखाने की सोची।

असावा जी को जब पता चला कि नवीन यहां से भुखा गया है तब वे सौम्या पर बहुत गुस्सा हुये। दुर्गा देवी ने हमेशा की तरह सौम्या का पक्ष लेकर मामला शांत करवाया।

राजाराम असावा ने सौम्या को बताया कि नवीन बाकी युवकों की तरह नहीं है। वह सभी से अलग है। उसे धन-दौलत से लगाव नहीं है। उसे रिश्तों की परवाह करनी आती है। अपनत्व के वशीभूत वह कुछ भी कर सकता है। धन-बल से उससे कोई भी कार्य करवाया नहीं जा सकता।

सौम्या ने यहां अपने पिता का विरोध किया। उसने तर्क दिया कि दुनिया में ऐसा कोई शख़्स नहीं है जिसे पैसों से खरिदा न जा सके। मगर असावा जी ने अपने अनुभव के बल पर सौम्या का विरोध किया और कहा कि दुनियां में कुछ लोग ऐसे भी है जिन्हें किसी किमत पर नहीं खरिदा जा सकता। और नवीन उन चंद कुछ लोगों में से एक है। दोनों बाप-बेटी के बीच शर्त लगी। शर्त यह थी कि अगर असावा जी शर्त जीत जाते है तब सौम्या को नवीन से शादी करने के लिए हां कहनी पडे़गी और अगर सौम्या शर्त जीती तब नवीन के अलावा वो जिससे कहेगी असावा जी को सौम्या की शादी खुशी-खुशी करनी होगी। आज शाम की पार्टी शुरू होने के पुर्व ही सौम्या धन के प्रलोभन से नवीन को ललचायेगी, उसने यह तय गया।

नवीन पार्टी शुरू होने से पुर्व अंतिम तैयारियों का जायजा लेने असावा हाउस आया। केटरिंग, म्युजिक सिस्टम, सजावट आदि की तैयारियों से संतुष्ट होकर वह अपने घर जाने लगा। तब ही असावा हाउस से एक नौकर भागता हुआ नवीन के पास आया। उसने बताया कि राजाराम असावा उन्हें अन्दर बुला रहे है।

नवीन बाहर लाॅन से सीधे असावा हाउस के अन्दर आ गया। बड़ा सा हाॅल मेहमानों से भरा था। नवीन को असावा जी कहीं नहीं दिखे। उसने एक नौकर से असावा जी के विषय में पुछा। नौकर चंदन ने बताया असावा जी अपने कमरे में है। पारिवारिक सदस्य अपने-अपने कमरे में शाम की पार्टी की तैयारियों में व्यस्त थे। नवीन हाॅल से होते हुये ऊपर की ओर जाती सीढ़ियों पर चढ़ाई करते हुये असावा जी के कमरे बाहर खडा हो गया। जब बार-बार द्वार पर दस्तक देने पर भी दरवाजा अन्दर से नहीं खुला तब नवीन जबरन अन्दर प्रवेश कर गया। अन्दर पहूंचकर वह हैरानी से बेड पर एक सूटकेस में रखे रूपयों को देखने लगा। असावा जी और सौम्या उसी कमरे में छिपकर यह नजारा देख रहे थे। नवीन ने देखा कुछ रूपयों के बंडल नीचे फर्श पर यहां-वहां गिरे पड़े और शेष रूपये सूटकेस में अस्त-व्यस्त रखे हुये है। नवीन ने नीचे पड़े रूपये उठा लिये। सौम्या यह देखकर खुश होने लगी। उसे अपनी शर्त जीतने का गुरूर होता जा रहा था। अब बस नवीन यदि इन रूपयों को अपनी जेब में रख ले तो सौम्या शर्त जीत गई समझो। मगर यह क्या? नवीन ने उन रूपयों को जिन्हें उसने नीचे फर्श से उठाया था, उन्हें नवीन ने सूटकेस में व्यवस्थित जमा दिये और बाहर निकल आया।

सौम्या को अपनी हार नज़र आने लगी। वह एक अन्य दरवाजे से बाहर निकलकर नवीन के सामने आ गई। उसके हाथ में वही सूटकेस था।

"नवीन ये लो! इसे लेकर चले जाओ।" सौम्या बोली।

"क्या है ये?" नवीन ने प्रश्न किया।

"ये तुम्हारी मजदूरी है। तुमने ही तो कहा था कि जब तुम मेरे यहां कुछ काम करने आओगे तब मजदूरी अवश्य लोगे। तो ले लो! ये तुम्हारी मजदूरी के रूपये है। पुरे पचास लाख रूपये है। ले लो। शर्माओ मत। मैं किसी से भी नहीं कहूंगी। और इन्हें तुम्हें लौटाने की भी जरूरत नहीं है।" सौम्या ने कहा। उसके होठों पर शरारती मुस्कान तैर रही थी।

नवीन ने उससे सुटकैस ले लिया। और नीचे हाॅल में बैठी दुर्गा देवी के हाथों में सौंपकर वह बाहर निकल आया।

सौम्या भी कहां मानने वाली थी। बाहर लाॅन में दौड़कर आई सौम्या ने नवीन को धमकी दी। यदि वह रूपये नवीन वहां नहीं ले गया तो सौम्या उस पर रूपये चोरी करने का झुठा केस लगा लगवाकर हवालात भिजवा देगी। क्योंकि उन रूपयों में नवीन के हाथों के निशान आ चुके है। नवीन सामान्य होकर मोबाइल पर व्यस्त हो गया। इससे पहले की सौम्या नवीन से कोई और जोर जबरदस्ती करती सौम्या अपने मोबाइल पर आये एक वीडियों को देखकर भयभीत हो गई। यह वही वीडियों था जो अभी-अभी नवीन ने उसे भेजा था। जिसमें वह नवीन को रूपये चोरी करने के झूठ केस में फंसाने की धमकी दे रही थी।

नवीन हंसते हुये वहां से निकल गया। सौम्या खिंसयानी बिल्ली खंबा लोचने वाली स्थिति में थी। राजाराम असावा वहां आ गये। सौम्या के कन्धे पर हाथ रखकर वे बोले- "देख लिया सौम्या तुने। कुछ लोग है जिन्हें किसी भी कीमत पर खरिदा नहीं जा सकता।"

सौम्या अपनी हार से दुःखी थी। राजाराम असावा ने उसे प्यार से समझाया--" बेटी! मैं शर्त जीत गया हूं इसका अर्थ ये नहीं है कि तुझे मेरी पसंद के लड़के से ही शादी करनी होगी। तु अब भी तेरे पसंद के लड़के से ही शादी करने को स्वतंत्र है।" सौम्या चौंकी।

"इतनी हैरत से मत देख पगली। तुझे क्या लगता है कि एक छोटी सी शर्त तुझसे जीत लेने के कारण मैं तेरी जिन्दगी का इतना महत्वपूर्ण फैसला लेने का अधिकार तुझसे छीन लूंगा। नहीं। तेरी पसंद ही मेरी पसंद है।" राजाराम असावा ने सौम्या को गले से लगा लिया।

अभी पार्टी शुरू होने में समय था। राजाराम असावा अपनी बेटी को कार में बैठाकर घुमाने बाहर ले गये।

उन्होंने नेहरू पार्क के पास कार रोकी। वे दोनों पार्क में टहलने लगे। एक स्थान पर कुछ लोग जमा थे।

राजाराम असावा उन्हीं लोगों के क्रियाकलाप देखने कुछ दुरी पर खड़े हो गये। ये आमराई की चौपाल का नजारा था। जिसमें शहर के बड़े-बड़े शासकीय पदों से सेवानिवृत्त व्यक्तियों का समूह समाजसेवा में सक्रिय था। गणेशराम चतुर्वेदी आमराई की चौपाल का संचालन कर रहे थे । उनके पास शेखर नगर बस्ती के कुछ लोगों बस्ती में पीने के पानी की किल्लत की समस्या लेकर पहूंचे थे। उनका कहना था की नगरपालिका इंदौर में शिकायत किये तीन दिन हो गये किन्तु आज दिनांक तक बस्ती में पानी की आपूर्ति नहीं की हो सकी है। इतना ही नहीं बस्ती का एक मात्र हेडपंम भी खराब हुआ पड़ा है। बस्ती वाले पानी के लिए बहुत परेशान हो रहे है।

गणेशराम चतुर्वेदी ने अपने मोबाइल फोन से क्षेत्र के एमएलए को फोन लगाया-

"गुरुजी प्रणाम।" गणेशराम चतुर्वेदी का फोन उठाते ही विधायक महोदय बोले।

"प्रणाम भई। खुश रहो। बेटा वो शेखर नगर बस्ती में पानी की सप्लाई बंद पड़ी है। शिकायत होने पर भी कार्रवाई नहीं की गई है। तुम जरा वहां पानी का संकट समाप्त करवा दो।" गणेशरामचतुर्वेदी ने कहा।

"हो जायेगा गुरूजी। मैं फिलहाल पानी का टेंकर भिजवा देता हूं। और सप्लाई शुरू करवाने के लिए कर्मचारियों को भिजवा देता हूं।" एमएलए साहब ने दूसरी ओर से कहा कहा।

गणेशराम चतुर्वेदी ने अपना मोबाइल फोन लाऊड स्पीकर मोड पर रखकर सभी बस्ती वालों को यह सुनाय।

सौम्या अपने पिता के साथ यह सब दुर से देख रही थी। पार्क में बहुत से लोग यहां-वहां घुम रहे थे। गणेशराम चतुर्वेदी का ध्यान असावा जीपर नहीं गया।

एक अन्य प्रकरण में एक वृद्ध विधवा मां अपने दसवीं अनुत्तीर्ण बेटे को वहां लेकर पहूंची-

"गुरूजी ये मेरा इकलौता बेटा रघु है। मेहनत मजदूरी नहीं करता। कहता है मैं नौकरी करूगां। अब नौकरी कैसे मिलेगी? इसे जरा समझाईये।" सेंवती बाई ने कहा।

"रघु! तुम्हें नौकरी करना है ये अच्छी बात है। मगर नौकरी के लिए खुब पढ़ाई-लिखाई की आवश्यकता होती है। और नौकरी कितनी भी बड़ी क्यों न हो? नौकरी करने वाला आदमी हमेशा नौकर ही रहता है। कभी मालिक नहीं बन सकता। फल-सब्जी बेचने वाले आज के युग में नौकरीपेशा व्यक्तियों से ज्यादा कमाते है। तुम भी अपना ठेला खरिदों। सब्जियां बेचों। काम कोई भी हो उसे पुरी निष्ठा और लगन से करोगे तो आज नहीं कल लोग तुम्हारे यहां नौकरी करने आयेंगे। अपना कर्तव्य निभाते जाओ, अधिकार दौड़े दौड़े तुम्हारे पीछे आयेगें।"

सौम्या की आभास हुआ जैसे की गणेशराम चतुर्वेदी के आसपास चारों ओर से प्रकाश निकल रहा हो। जैसे की कोई पुण्यात्मा प्रवचन के माध्यम से संसार को सद्गति पर ले जाने का प्रयास कर रही हो?

रघु का ह्रदय परिवर्तन हो चुका था। वह ठेले पर सब्जियां बेचने को तैयार हो गया। उसने गुरूजी के पैर छूये। गणेशराम चतुर्वेदी ने अपने जेब से पांच हजार रुपये निकालकर रघु को दिये। रघु ने गुरुजी का धन्यवाद ज्ञापित किया और जाने लगा।

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