माँमस् मैरिज - प्यार की उमंग - 10

माँमस् मैरिज - प्यार की उमंग

अध्याय - 10

मां का रौद्र रूप मैंने उस दिन पहली बार ही देखा था। रत्ना ने पलंग पर सोई हुई मां का गला दबाने की जैसे ही कोशीश की, मां ने उसे लात मारकर दुर फेंक दिया। जिस मान-सम्मान के पीछे मां , रत्ना की कहीं सभी बातें सुनकर सहती रही, ध्येर्य का बांध उस दिन टुट ही गया। मां उसे पीटते हुये बाहर सड़क पर ले आई। उन्होंने रहवासियों को बताया कि आज मेरी बहु ने मुझे गला दबाकर मारने की कोशिश की। मां ने खुद पुलिस बुलवाई और अपनी बहु रत्ना के विरुद्ध रिपोर्ट लिखवाई। चालाक रत्ना ने पुलिस स्टेशन पर हाथ पैर जोड़कर मां से माफी मांग ली। मां ने उसे माफ कर दिया। घर आकर उसी रात रत्ना ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। सुसाइड नोट पर उसने मेरे और मां के विरूद्ध बयान लिखे। वह लेटर श्लोक के हाथ लग गया।

श्लोक ने उस लेटर को पढ़कर मुंह में दबा लिया और चबाकर खा गया। पुलिस को रत्ना के कमरे से कोई लेटर नहीं मिला। रत्ना के माता-पिता और उसके बेरोजगार भाई को रत्ना की मौत की खबर मिली। उन्होंने हमारे विरूद्ध पुलिस स्टेशन में उनकी बेटी से मारपीट दहेज मांगने का झूठा कैस बहुत पहले ही लगा दिया था। पुलिस हम दोनों मां-बेटों को पुलिस स्टेशन ले गई। हाई-प्रोफाइल मामला होने के कारण पुलिस पर इस प्रकरण को शीघ्र सुलझाने का दबाव था। पुरे दो दिन हम पुलिस स्टेशन में रहे। चूंकि श्लोक हमारे बिना नहीं रह सकता था सो उसे भी हमारे साथ ही लाॅकअप में दो दिन गुजारने पड़े। दो दिन बाद हमारी जमानत हो गई। पुलिस इन्सपेक्टर अदिति राव का मुझे फोन आया। ये केस वहीं देख रहीं थी। उन्होंने हमा दोनों पक्षों को बाहर एक रेस्टोरेंट में बुलाकर समझौते की बात कही। हम भी यही चाहते थे। श्लोक को अपने पास रखने और सभी प्रकरण से मुक्त करने के एवज में रत्ना के परिवार वालों ने हमसे दो करोड़ रूपये की मांग की। मां रूपये देने को राजी हो गई। दो करोड़ रुपये लेकर वे लोग जबलपुर चले गये। इन्सपेक्टर अदिति राव ने प्रकरण बंद कर दिया। उन्होंने रत्ना के परिवार को मुझे और मेरे परिवार को कभी परेशान न करने की सख्त हिदायत देकर उन्हें जबलपुर जाने दिया।"

कहते-कहते मनोज चुप हो गया। अपनी पुरी बात मनोज कह चूका। मनोज की आंखे भर आई थी।

अपनी हथेली पर मनोज की आंखो से गिरे आंसू को संभालती सीमा ने मनोज को हृदय से लगा लिया। मनोज की आंखो से झर-झर आंसुओं की धारा बहने लगी। बोझिल हृदय आँसुओं के बह जाने से हल्का हो गया था। सीमा की आंखे भी नम हो गई। एक-दूसरे से लिपटकर आंखो से बहते हुये आंसुओं ने उन दोनों के भावी रिश्तें को ओर भी घनिष्ठ बना दिया।

कुछ सामान्य होने पर सीमा ने काॅफी की जगह चाय बनाई। मनोज और सीमा ने सायं की चाय साथ में पी।

"मनोज! चलिए न बाहर कितना अच्छा मौसम हो रहा है। मौसम की पहली बुन्दा-बांदी शुरू हो गई है।"

घर की बालकनी में खड़ी सीमा ने मनोज से कहा।

"अरे लेकिन इस तरह अचानक?" मनोज चौका।

"हां अचानक! चलिये न!" सीमा ने कहा।

सीमा की जिद के आगे मनोज ने घुटने टेक दिये। वे दोनों घर से बाहर निकले। मनोज अपनी कार की तरफ बढ़ने लगा। तभी सीमा ने उसे टोका। सीमा ने बगल में खड़ी मोटरसाइकिल से चलने का इशारा किया। मनोज को मोटरसाइकिल चलाये बहुत दिन हो गये थे। आज सीमा के लिए उसने फिर मोटरसाइकिल फिर से चलाई। सीमा ने मनोज का मोबाईल भी बंद कर जब्त कर लिया ताकी उन दोनों को कोई परेशान न करे। श्लोक की जिम्मेदारी मनोज ने घर के भरोसेमंद बुजुर्ग जोड़े (पति-पत्नी) श्रवण और शांताबाई को सौंप दी। और दोनों लांग ड्राइव पर निकल पड़े।

सीमा ने बबिता को विलंब से घर आने का बोल दिया।

धुप लुप्त होकर जा चूकी थी। हल्की बुन्दा-बांदी ने मौसम को सुहाना कर दिया था। अक्सर कार से ड्राइव करने वाले मनोज को बहुत दिनों के बाद मोटरसाइकिल चलाकर सुखद अनुभूति हो रही थी। सीमा मोटरसाइकिल पर मनोज के पीछे सटकर बैठी थी। आसमान से गिरती पानी की बुन्दों ने सड़क का मुंह धो दिया था। प्रेमी युगल ने पहली बरसात में स्वयं को समर्पित कर दिया था। सड़क किनारे भुट्टे (मक्क) बेचती एक महिला की दुकान पर मनोज ने मोटरसाइकिल रोकी। मनोज ने दो भुट्टे सेंकने का महिला दुकानदार से कहा।

"दो नहीं एक!" सीमा ने मनोज को टोका।

"क्यों एक क्यों?" मनोज ने आश्चर्य प्रकट किया।

सीमा ने शरारती आंखो से मनोज को कुछ इशारा किया। पास ही एक अन्य भुट्टे की दुकान पर एक प्रेमी युगल एक ही भुट्टे को बारी-बारी से खा रहे थे। मनोज समझ गया। सीमा और मनोज भी उस भुट्टे को बारी-बारी से खाने लगे। सीमा निर्भीक थी। वह मनोज की आंखो में अपने लिए प्यार ही प्यार देखकर शर्मा रही थी। मनोज की आंखो से आंखे मिलाकर नटखट सीमा राहगीरों से बेपरवाह होकर मनोज को टक-टिकी लगाये निहार रही थी। मनोज कभी-कभी असहज हो जाता। लेकिन सीमा के प्रोत्साहन से उसे बल मिलता। सीमा के सुर्ख लाल रंग की लिपस्टिक से सने होठ भुट्टे को लपक रहे थे। अपनी बारी आने पर मनोज सीमा के अधरों के द्वारा बनाये गये लिपस्टिक के चिन्ह को अपने अधरों से ढांकते हुये भुट्टे का कोर खा रहा था। भुट्टे का आनंद लेकर वे लोग आगे चल दिये।

मनोज और सीमा ने ढाबे पर खाना खाया और रात होते-होते घर लौट आये।

"देखो! आर्यन तुम एक अच्छे लड़के हो! तुम्हें तो कोई भी लड़की मिल जायेगी। प्लीज मेरा पीछा करना छोड़ दो।" सड़क किनारे मोटरसाइकिल के पास खड़े आर्यन से बबिता ने कहा।

"तुम सही कह रही हो, बबिता! मुझे कोई भी लड़की मिल सकती है। जो मुझे ढेर सारा प्यार भी करेगी। लेकिन मुझे कोई ओर लड़की नहीं चाहिये। मुझे तो बस तुम्हें अपना बनाना है।" आर्यन ने अपनी दृढ़ता दिखाई।

बबिता बहुत दिनों से देख रही थी जब से उसने एक निजी विद्यालय में टीचिंग की जाॅब शुरू की है तब से आर्यन हर रोज अपनी बाइक लेकर उसके स्कूल के चक्कर काटा करता है। बबिता की अन्य महिला स्टाॅफ ने भी गौर किया था की आर्यन, बबीता के इर्द-गिर्द ही घुमा करता है। उन्होंने बबीता से आर्यन के विरूद्ध पुलिस में शिकायत करने को कहा। लेकिन बदनामी के डर से बबीता ने इस प्रकरण को स्वयं अपने हिसाब से सम्पन्न करने की ठानी। कहां तो बबिता किसी युवक के ह्रदय में स्थान बनाने को लालायित रहती थी, और आज एक स्मार्ट नवयुवक उसके प्यार में पागल था किन्तु आर्यन का प्रेम प्रस्ताव उसने ठुकरा दिया था। अपने लिये आते वैवाहिक रिश्तों के प्रस्ताव की असफलता से परेशान होकर बबीता ने जीवन भर विवाह न करने का संकल्प ले लिया था। अपने संकल्प से उसने न तो तनु को अवगत कराया और नहीं मां सीमा को बताया। उसकी योजना थी की सर्वप्रथम उसकी मां सीमा और मनोज का विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हो जाये, उसके बाद वह अपनी दृढ़ ईच्छा शक्ति से सभी को अवगत करा देगी। तनु और रवि की शादी तो वैसे भी हो ही जायेगी।

समय व्यतीत करने और डिप्रेशन स्वयं पर हावी न हो इसलिए उसने एक निजी विद्यालय में छोटे बच्चों को टीचिंग देना शुरू कर दिया।

लेकिन उसी दौरान आर्यन ने उसके निजी जीवन में हस्तक्षेप कर भारी उथल-पुथल मचा दी। आर्यन किसी भी मुल्य पर बबिता को पाना चाहता था। लेकिन बबिता किसी तरह स्वयं को संभालते हुये आर्यन की अपेक्षा कर रही थी। जब समझाने पर भी आर्यन नहीं माना तब बबीता ने उसके सम्मुख शादी करने का प्रस्ताव रख दिया। जो उसकी एक योजना का हिस्सा थी। उसे भरोसा था कि आर्यन आधुनिक युग का लड़का है शादी के चक्कर में इतना जल्दी नहीं पड़ना चाहेगा। शादी का नाम सुनकर वह बबिता को भूल जायेगा। आर्यन स्तब्ध था। उसे यकीन नहीं था कि बबिता सीधे बात विवाह तक ले जायेगी? बबिता से बिना कुछ कहे आर्यन वहां से चला गया। कुछ दिनों तक वह विद्यालय के आसपास दिखाई भी नहीं दिया। जब आर्यन लौटकर नहीं आया तब बबीता को आभास हो गया की आर्यन भी शेष लड़को की तरह है। आर्यन ने बबिता को अन्य लड़कीयों की तरह इस्तेमाल करने वाली कोई चीज समझ लिया था। आर्यन के दोबारा न लौटने पर उसी खुशी तो थी लेकिन आर्यन के प्रति आकर्षित हो जाने के वह कुछ-कुछ दुःखी भी थी।

एक दिन अपने स्कूल के बच्चों को बबीता और अन्य स्टाॅफ पिकनिक पर ले गया। शहर के रीजनल पार्क पर बच्चें मस्ती-मजाक में व्यस्त हो गये। टीचर्स भी बच्चों के साथ आनन्द ले रहे थे। तभी बबिता की नज़र आर्यन पर पड़ी। आर्यन अपने दोस्तों के हंस-हंस कर बात कर रहा। उसने एक गर्लफ्रेंड के कंधे पर हाथ रखा हुआ था।

बबीता से यह सब देखकर रहा नहीं गया। वह आर्यन की तरफ देख ही रही थी की आर्यन ने भी बबिता को देख लिये। उसके चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी। आर्यन दबे पैर उसके पास आया। इससे पहले की आर्यन कुछ कह पाता बबिता ने जोरदार तमाचा आर्यन के गाल पर दे मारा। वह मुड़कर जाने लगी।

" रूको बबिता!" आर्यन बोल पड़ा।

बबिता के पैर थम गये।

"अगर तुमने मुझ पर हाथ उठाया है तो जरूर मुझसे कोई बहुत बड़ी गल़ती हो गई होगी? मैं नहीं जानता कि मैंने क्या किया है। तुमसे बस इतना कहना चाहता हूं। मुझे कुछ वक्त दो। मैं सबकुछ ठीक कर दूंगा।"आर्यन गम्भीर था।

बबीता उसके पास से जा चुकी थी। उसने अपने आंसु पोछें और बच्चों को खेल खिलाने में व्यस्त हो गयी।

अगले दिन रविवार था। सीमा ने बबीता को बाजार से सब्जियां खरिदने भेज दिया था। तनु और सीमा घर की साफ-सफाई से निपटे ही थे की उनके घर की डोर बेल बज उठी। सीमा स्नान करने चली गई। तनु ने दरवाजा खोला। यह आर्यन ही था जो अपने पुरे परिवार के साथ सीमा के घर आया था। तनु ने सभी का वेलकम किये। और मां को आवाज लगाई।

सीमा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। आर्यन अपने पुरे परिवार के साथ बबिता का हाथ मांगने आया था। माता-पिता, भैया-भाभी, दादा-दादी, बहन सिमरन और भतीजे विशेष को एकसाथ बबिता के घर लाकर आर्यन ने तीनों मां-बेटीयों को चौंका दिया।

सिसोदिया परिवार की आगवानी और चाय-नाश्ते के उपरांत परिवार के बढ़े दीनानाथ सिसोदिया ने सीमा से बबिता को बाहर बुलाने को कहा। सीमा स्कूटी से लौटी ही थी की अपने मकान के आगे दो कारें देखकर आश्चर्य की मुद्रा लिए घर में प्रवेश करती है। आर्यन और उसके परिवार को देखकर वह हतप्रद थी। तनु ने तुरंत बबिता के कान में बताया कि उसकी शादी प्रस्ताव आया है। बबिता संकोच वश वहां से चलकर अन्दर वाले कमरे में जाने लगी। तब ही आर्यन की भाभी सुनिता और बहन सिमरन, बबिता के इर्द-गिर्द खड़े हो गए। दीनानाथ सिसोदिया ने बबिता को आर्यन के लिए उचित ठहराया। सीमा और तनु बहुत प्रसन्न थे। मगर बबिता बैचेन थी। ये सब अचानक कैसे हो गया? ये सपना है या वास्तविकता? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर तलाशती बबीता के मन-मस्तिष्क पर आर्यन का राज हो चूका था। बैठक हाॅल में आर्यन की शरारती हंसी बबीता को बार-बार विचलित कर रही थी। मानो आर्यन हंसी में यह कह रहा था कि बबीता को पाने के लिए परिवार को तैयार करने में समय लगना था, वही समय जो आर्यन बबीता से मांग रहा था। जब उसके परिवार के सभी लोग इस शादी के लिए तैयार हो गए तब वह आ गया बबीता का हाथ मांगने।

आर्यन अन्य लड़को की तरह नहीं है यह जानकर बबीता को आत्मीय सुख मिला। उसके भरे-पूरे परिवार ने उसे स्वीकार करने की ईच्छा जताई थी। इससे अधिक बबीता के लिये अच्छी बात नहीं हो सकती थी। किन्तु बबिता अपने संकल्प के आगे विवश थी। उसने आर्यन को विवाह के लिए साफ-साफ इंकार कर दिया। जब यही बात दीनानाथ सिसोदिया को पता चली तब बजाये बबिता पर गुस्सा दिखाने के वे उसकी प्रशंसा करने पर विवश हो गये। अन्य कोई लड़की होती तो धनाढ्य परिवार की बहु बनने के लिए तुरंत हां कर देती। किन्तु बबिता ने अपने सिद्धान्तों के साथ समझौता नहीं किया। इससे उसके दृढ़ निश्चयी स्वभाव का पता चलता है। दीनानाथ सिसोदिया ने आर्यन से कहा कि यदि उसे बबिता से विवाह करना है तो अपने प्यार से उसे जीतना होगा। इसके लिए उसे जो भी वैधानिक रास्ता अपनाया पड़े, उस रास्ते पर चले और हर संभव प्रयास करे बबिता का दिल जीतने का । अपने दादाजी दीनानाथ सिसोदिया के प्रोत्साहन ने आर्यन को बहुत हिम्मत दी। बबिता के हृदय में जगह बनाने के लिए वह निकल पड़ा।

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