माँमस् मैरिज - प्यार की उमंग - 11

माँमस् मैरिज - प्यार की उमंग

अध्याय - 11

सीमा और तनु के समझाने से भी नहीं समझने वाली बबिता अपने स्कूल में व्यस्त हो गई। आर्यन इतना तो अवश्य मान चूका था कि बबिता भी उसे पसंद करती है। लेकिन उसके सांवले रंग और मोटी काया के कारण उसके वैवाहिक संबंध बनते-बनते बिगाड़ गये। युवकों ने उसे सिरे से खारिज कर दिया था। किन्तु मां सीमा के विभिन्न प्रयासों और स्वयं की दृढ़ इच्छाशक्ति शक्ति के बल उसने न केवल अपने शरीर को छरहरी काया में परिवर्तित किया अपितु रूप-सौन्दर्य को सुन्दर बनाने में भी चमत्कारी कामयाबी हासिल कर ली।

बबिता को आर्यन के प्यार पर संदेह था। उसे यकीन था की लगभग उसी के ही आयु वर्ग का आर्यन उसकी सुन्दरता पर मोहित है। वह आज की बबिता के प्यार में पागल है। कल की बबिता से वह भी दुसरे लड़को की भांति नफरत ही करेगा?

कुछ दिनों के बाद आर्यन बबिता से उसके घर आकर मिला। तनु और सीमा भी घर पर ही थी। उसके हाथ में एक लिफाफा था। बबीता ने वह लिफाफा खोला। उसमें बबीता की पुरानी तस्वीरे थी जिसमें वही पुरानी वाली बबीता थी। जिसमें वह सांवली और मोटी दिखाई दे रही थी।

"बबिता! मुझे तुम हर रूप और रंग में स्वीकार हो। तुम अगर आज भी कल वाली बबीता होती मैं तुम्हें तब भी उतना ही करता जितना कि आज करता हूं।" इतना कहकर आर्यन वहां से चला गया।

बबीता उन फोटो को देखना भी नहीं चाहती थी। लेकिन आर्यन की बातें सुन कर उसे प्रसन्नता हुई। उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी। तनु और सीमा भी खुश थे यह सब देखकर। उन्हें भरोसा होने लगा की धीरे-धीरे आर्यन बबीता के दिल में जगह बना ही लेगा।

आर्यन को उसके बड़े भाई ने अपने ऑफिस के एक महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी देकर हांगकांग रवाना कर दिया। आर्यन ने बबिता को फोन पर बताना चाहा कि वह कुछ दिनों के लिए विदेश जाने रहा है लेकिन कुछ कामकाज में वह इतना व्यस्त हो गया की वह बबिता को फोन तक नहीं लगा सका। आर्यन के व्हाहटसप मैसेज और जबरन आने वाले उसके फोन काॅल्स की बबिता आदी हो चूकी थी। पुरे दो दिन तक आर्यन ने न कोई काॅल किया था और न हीं व्हाहटसप मैसेज। उसका व्हाहटसप भी लास्ट सीन दो दिन पुर्व का बता रहा था। बबीता बेचैन हो उठी। उसका बहुत मन था कि वह खुद आर्यन को फोन लगाकर पुछ लेवे। लेकिन यहां उसका ईगो आड़े आ रहा था। घर के कामकाज में उसका मन नहीं लग रहा था। चाय में चीनी की जग नमक और आटा गुंधते समय आटे में नमक के स्थान पर चीनी मिला रही थी। सीमा ने उसे प्यार से समझाकर आराम करने की सलाह दी। लेकिन हटीली बबिता स्कूल जाने के तैयार होने लगी।

तब ही दरवाजे पर आर्यन की किशोरीवय बहन सिमरन और उसका छः वर्ष का छोटा भतीजा विहान खड़े थे।

" बबीता भाभी प्लीज आर्यन भैया से शादी के लिए मान जाईये न!" सिमरन ने अपनो हाथों का गुलदस्ता बबिता की ओर देते हुए कहा। बबिता कुछ कह पाती इससे पहले छुः वर्षीय विहान भी गुलाब के फुल की एक कली बबिता को देते हुए अपनी तुतलाती आवाज में बोला- " बबीता चाची! हमारे आर्यन चाचू बहुत अच्छे है। आप उनसे शादी कर लिजिये। आपको हमारे घर में कोई तकलीफ नहीं होगी। और हां, आपको कोई कुछ कहेगा तो मुझे बोलियेगा। मैं दादाजी से बोलकर उसको खुब डांट लगाऊंगा।"

बबिता बुआ और भतीजे के निःस्वार्थ प्रेम पर मोहित हो थी। सीमा और तनु भी यह सब देखकर आनंदित हो गये।

"अच्छा जल्दी चल विहान। हमें घर जल्दी लौटना है।" सिमरन ने विहान का हाथ पकड़ा और वे दोनों बाहर खड़ी कार में बैठकर चले गये।

स्कूल में बबिता से आर्यन के भैया-भाभी मिलने आये और उन्होंने भी बबिता को आर्यन से विवाह करने की सलाह दी। बबीता के अन्तर मन के द्वन्द्व में वह आर्यन के प्रति विजयी होना चाहती थी। जब शाम को उसके घर पर आर्यन के दादा और दादी भी यही निवेदन लेकर आये तब उनके सम्मुख विवाह की हां करने के सिवाये बबिता के पास अन्य कोई उपाय नहीं था।

दीनानाथ सिसोदिया ने बबिता को यह भी कहा की यदि अब भी उसकी विवाह हेतु न है तो वे यहां से बैरंग लौट जायेंगे। और उन्होंने बबीता को यह भी भरोसा दिलाया कि उसकी अंतिम बार नहीं कहने का सिसोदिया परिवार पुरा सम्मान करेगा। तथा आइन्दा से उससे इस संबंध में सिसोदिया परिवार का कोई भी सदस्य बात नहीं करेगा। आर्यन को भी वे समझा लेंगे।

बबिता का हृदय साफ हो चुका था। उसके मन की सभी दुविधाएं समाप्त हो चुकी थी। दीनानाथ सिसोदिया ने शगुन के रूप में कुछ रूपये बबिता की हाथ में देकर आर्यन और बबिता का विवाह पक्का कर दिया।

पहली बार बबिता का फोन जब आर्यन के पास आया तब आर्यन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

"कहां चले गये थे तुम मुझे बिना बताये? पता है मुझे कैसे-कैसे ख्याल आ रहे थे तुम्हारे बारे में?" बबिता ने फोन पर आर्यन को डांटते हुये कहा।

"अब आगे से तुमसे पुछकर जाऊँगा मेरी जान!" आर्यन रोमांटिक होकर बोला।

आर्यन की बात सुनकर बबिता मारे हया के दबे होठों से मुस्कुरा उठी।

बबिता और आर्यन की शादी के पहले सीमा और मनोज की शादी होना तय किया गया।

आर्यन को कुछ दिनों के लिए बबीता से दूर कर बबीता के दिल में आर्यन के लिए प्यार जगाने, (विदेश भेजने) और अपने बहुत अच्छे व्यापारिक मित्र आर्यन के बड़े भाई सोमेश सिसोदिया से आर्यन और बबिता के विवाह का समर्थन करने वाले कोई ओर नहीं बल्कि मनोज ही है, यह जानकर सीमा को पूर्णतः विश्वास हो गया की जितनी चिन्ता बबीता और तनु की उसे है उतनी चिन्ता मनोज को भी है।

एक दिन सुबह-सुबह सीमा को फोन आया। फोन सुनकर वह स्तब्ध खड़ी रह गई। तनु और बबिता ने उसे सोफे पर बिठाया। सीमा मौन थी। जब बहुत पूछने पर भी उसने कुछ नहीं बताया तब बबीता ने जिस नम्बर पर फोन आया था उसी नम्बर पर फोन पुर्नडायल कर बात की। तीनों के पैर के नीचे की जमीन खीसक गई। उन्हें पता चला कि सीमा का वह पति जो उसे छोड़कर चला गया था वह इंदौर के केंसर हाॅस्पीटल में मृत्यु शैय्या पर पल-पल मौत की प्रतिक्षा कर रह है। मरने से पहले अरूण सीमा और दोनों बेटीयों से मिलना चाहता है। दोनों बेटीयां अरूण से मिलना नहीं चाहती थी। सीमा के सामने बहुत बड़ा संकट आकर खड़ा हो गया था। मनोज अपने व्यापार के काम से दिल्ली गये हुये है। मनोज को परेशान करना सीमा को उचित नहीं लगा। आखिरकार एक भारतीय नारी का नारीत्व जागृत हो चुका था। वह अकेली ही हाॅस्पीटल गई और अरूण को अपने साथ घर ले आई। अरूण की स्थिति चिंताजनक थी। उसकी दो सर्जरी हो चूकी थी। आंत का केंसर था। अरूण सूखकर कांटा हो हो चूका था। डाक्टर्स ने साफ-साफ कह दिया था कि अब जितने भी दिन अरूण निकाल सके, उसकी सेवा की जाये। अरूण का बचना मुश्किल था। तनु और बबिता जब भी अरूण के सामने आती, अरूण हाथ जोड़कर उनसे माफी मांगने का प्रयास करता। अपनी धीमी आवाज में वह दोनों बेटियों से बात करने की कोशिश करता। अरूण के आखिरी दिनों में तनु और बबिता का दिल भी पिघल ही गया। दोनों अपने जन्मदाता पिता के गले लगकर फूट-फूट कर रोई।

अरूण का अन्तिम समय नजदीक था। मनोज जब उनसे मिलने सीमा के घर आये तब अरूण ने स्वयं सीमा का हाथ मनोज के हाथों में देकर दुनिया से विदा ली।

राधा को अरूण की मौत की खबर मिली तो वह अपनी दोनों नाबालिग बेटियों को लेकर सीमा के घर आ गई। चूंकि सर्वप्रथम अरूण का दाह-संस्कार करना पहले जरूरी था इसलिए क्रोधित बबिता और तनु ने राधा से कुछ नहीं कहा।

दोनों बेटियों ने पिता अरूण को मुखाग्नि दी। बबीता ने राधा की दोनों बेटियों सपना-संगीता के हाथों जलती हुई मशाल देकर पिता को मुखाग्नि देने की औपचारिकता पुरी करवायी।

मरण शैय्या पर अरूण को छोड़कर मायके चली जाने राधा पर सभी क्रोधित थे।

"जहां इतने दिनों तक साथ दिया वहां आगे भी दे देती। पापा को हाॅस्पीटल में अकेला छोड़कर यूं भागना तो नहीं था?" तनु अपनी सौतेली मां पर चीख रही थी।

"और अब आई हो इस घर पर अपना अधिकार जताने!" बबिता भी गुस्से में थी।

"एक महिने में ही आप लोग अरूण के केंसर से घबरा गये। सोचिये मैंने पांच साल निकाले है अरूण के केंसर के साथ।" राधा के इन वाक्यों ने वातावरण को शांत कर दिया। राधा ने आगे कहा-

"घर में जो भी रूपया-पैसा और गहने थे सब इनके इलाज में खर्च कर दिये। यहां तक कि अपने गले का मंगलसूत्र भी बेच दिया। एक मकान था वह भी कर्ज तले बिक गया। बस नहीं बेचा तो अपना ये शरीर।"

राधा का गला भर आया था। मगर उसका बोलना अभी भी जारी था।

"दोनों बेटीयों को लेकर आखिर कहां जाती? मायके में जब तक मां-बाप जिंदा होते है मायका तभी तक बेटीयों का सगा होता है। मां-बाप के मरते ही भैया-भाभी मुंह पर दरवाजा बंद कर देते है।" राधा की अश्रु धार बह निकली।

सीमा ने राधा को कन्धे का सहारा दिया।

सीमा ने सपना और संगीता के भविष्य के लिए उन तीनों को वहीं रहने की अनुमति दे दी।

राधा के विचारों में कुछ पक रहा था। यह मनोज ने सुचित कर लिया था। क्योंकि मनोज को रिझाने का कोई भी अवसर राधा नहीं छोड़ रही थी।

मनोज से उसकेमाँल में मिलने जाना, मनोज को फोन पर मैसेज करना, घर आने पर जानबूझकर मनोज से टकराने की कोशिश वह निरंतर कर रही थी। राधा की यौवनावस्था चरम पर थी। उस पर रूप-लावण्य की अधिकता की वर्षा हो रही थी। राधा किसी भी तरह मनोज को अपना सर्वस्व समर्पण करना चाहती थी।

राधा के व्यवहार से तंग आकर मनोज ने एक दिन उसके गाल पर तमाचा रसीद कर दिया। सीमा और उसकी दोनों बेटियां भी मनोज के घर आ चुकी थी। मनोज ने राधा की हरकतें सबके सामने बयां कर दी।

स्वयं मनोज ने सीमा को पुर्व सुचना देकर योजनाबद्ध तरीके से राधा के कुकृत्य को सार्वजनिक कर दिया।

"राधा, तुम इतना नीचे गिर सकती हो मैंने कभी सोचा भी नहीं था।" सीमा ने कहा।

"हां मैं नीच हूं। मुझे सब मिलकर भला-बुरा कहो। लेकिन मैंने यह सब क्यों किया वो तो सुन लो?" राधा की आंखों से बहते पश्चाताप के आंसु बहुत कुछ कह रहे थे।

" सीमा दीदी तुम, मनोज जी से शादी कर ऐशो-आराम के साथ रहने चली जाती। तनु और बबिता भी अच्छे घर विवाह के बाद चली जाती। मुझे अपनी कोई चिंता नहीं थी। मगर मेरी ये दो फूल जैसी बच्चियों का क्या होता? इनका भविष्य भी तनु और बबिता जैसा हो यही सोचकर मैंने मनोज जी से नजदीकियां बढ़ाने का फैसला किया। जानती हूं यह गलत था लेकिन अपनी बेटीयों के भविष्य के आगे मैं मजबूर हो गयी थी। आप सभी मुझे माफ करे।" राधा के आसूंओं में एक मां का सच्चा प्रेम झलक रहा था जो वह अपनी बेटियों से करती थी।

सीमा ने उसे माफ कर दिया। जल्द ही सबकुछ सामान्य हो गया। राधा ने सपना-संगीता का शहर की एक अच्छी स्कूल में एडमिशन करवा दिया। वह खुद भी एक निजी ऑफिस में नौकरी करने लगी।

शुरूआत में मनोज भट्ट का श्लोक बेटा सीमा को पसंद नहीं करता था। उसे यह आभास हो चुका था की उसके पिता के प्यार का एक ओर हिस्सेदार उसकी सौतेली मां सीमा के रूप में उसके घर आने वाला था। इसीलिए श्लोक सीमा से सीधे मुंह बात नहीं करता था। सीमा ने श्लोक को उसकी मां की तरह अनुभव कराने के लिए हर संभव प्रयास किये। श्लोक था थो आखिर बच्चा ही! सीमा के स्नेही व्यवहार ने आखिरकार उसे सीमा के करीब ला ही दिया। सीमा मनोज के बेटे को अपने ही बेटे के समान लाड-प्यार करने लगी। शनिवार-रविवार की स्कूल की छुट्टी के समय श्लोक सीमा के ही घर आकर रहता। सीमा उसे अपनी पास ही सुला लेती। तनु और बबिता भी ने भी नकचढ़े श्लोक को धीरे-धीरे अपना भाई स्वीकार कर ही लिया।

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