कहानी ऐसे थोड़े न लिखी जाती है... - 1

कहानी ऐसे थोड़े न लिखी जाती है...

प्रियंका गुप्ता

भाग - १

कई दिनो से सोच रही हूँ, कोई कहानी लिखूँ। आप भी सोचेंगे, ये कहानी लिखने का आइडिया मेरे दिमाग़ में आया कहाँ से...? मैं ठहरी एक आम सी, सीधे-साधे ढंग से अपनी गृहस्थी चलाने वाली साधारण औरत...मैं भला कहानी लिखना क्या जानूँ...? बिल्कुल सही कहा आपने...। अरे, कहानी लिखने के लिए संवाद चाहिए, पात्र होते हैं, घटनाक्रम होता है...और क्या कहते हैं उसे...हाँ, कथानक...एक बढ़िया सी थीम की भी तो दरकार होती है...। पर यह बात नीलम समझना ही नहीं चाहती। जब फोन करेगी, एक ही बात,"माँ, कहानी लिखना शुरू कर दो...। इतनी अच्छी किस्सागो हो, बस अपनी बात को काग़ज़ पर उतार डालो...। तुम्हारा टाइम भी कटेगा और अगर छप गई तो नाम के साथ-साथ पैसा भी मिलेगा...सच्ची...।"

"थीम तो बता, किस पे लिखूँ...?" हार कर एक दिन मैने भी उसका वार उसी पर किया...। अब बताओ बच्चू, कहानी की थीम...।

"किसी पर भी लिख दो...। कहानियाँ ज़िन्दगी से ही उठाई जाती हैं...। बस देखो, सोचो और लिख डालो...। रीना ऐसे ही तो लिखती है...।"

तो इस तरह बात पकड़ में आई, ये कहानी का कीड़ा किधर से रेंगता नीलम के दिमाग़ पर चढ़ा जिसे वो आलसी मेरी तरफ़ फेंक रही...। रीना यानि कि नीलम की सहेली...बेस्ट फ़्रेण्ड...। शौकिया कहानी लिखते-लिखते छपने भी लगी...। उसके ससुराल में सब उसे हाथों-हाथ लेते हैं...। पति गर्व से छाती चौड़ी करके कहता है सबसे...भई, हमें तो भगवान ने नायाब तोहफ़ा दिया है...। ब्यूटी विद द ब्रेन...। है किसी की बीवी ऐसी...?

कहने को तो नीलम से आराम से कह दिया, किसी पर भी लिख डालो...पर सवाल तो जस-का-तस है न, किसपे लिखूँ...? इधर-उधर ढूँढूगी न, तो भी कोई ऐसा नहीं मिलेगा जिस पर कहानी लिख सकूँ...| तो क्या करूँ...निर्मल पर लिख डालूँ...? क्या...? आप निर्मल को नहीं जानते? ओह! शायद मैने ही कभी जिक्र न किया हो या सिर्फ़ नाम कह देने भर से आप को याद न आ रहा हो...।

अरे, मैं तो उसी निर्मल की बात कर रही हूँ जो मेरे ही मोहल्ले में रहता था...वो गली के नुक्कड़ वाला...पीला मकान...। याद आया...? वो बचपन में पतला-दुबला सा, शर्मीला-सा लड़का...। मुझसे एक-आध साल ही तो बड़ा रहा होगा शायद...। पैदाइशी साथ पले-बढ़े थे हम दोनो...। खेलते-कूदते, लड़ते-झगड़ते...। वो तो दिन भर मेरे यहाँ ही रहता था। लगता ही नहीं था कि किसी पड़ोसी की औलाद है...। मुझे याद नहीं पड़ता कि बचपन में दिन-दिन भर खेलते हुए वह कभी खाना खाने भी अपने यहाँ गया हो...। माँ भी कहाँ उसे जाने देती थी...। बेटे की आस ऊपरवाले ने पूरी नहीं की तो माँ तो उसी पर अपनी जान न्योछावर किए रहती थी...। माँ का, और निर्मल का भी, अगर बस चलता तो वह रात को सोने भी अपने घर न जाता...| कई बार खीझ कर चाची कह भी देती,”ऐसा करो जिज्जी, इसे तुम ही रख लो...| मेरा तो नाम का कोखजाया है...माँ तो तुम्ही हो...|”

माँ कभी चाची के ऐसे तानों का बुरा नहीं मानती थी...| उलटे हँस कर कह देती, “इतना जलती क्यों है री...? क्या कृष्ण की दो मैय्या नहीं थी...देवकी और यशोदा...? तो इस कृष्ण-कन्हैया की देवकी तू और यशोदा मैं...|”

माँ का निर्मल के लिए यही लाड़ ही वजह थी कि इतने कंज़रवेटिव से हमारे घर में मेरा और निर्मल का यूँ साथ-साथ रहना किसी को कभी बुरा नहीं लगा...। निर्मल माँ पर कई बार मुझसे ज़्यादा हक़ जमाने लगता। मुझे यह बात फूटी आँख न भाती थी...। यह भी कोई बात हुई...? माना, तुम मेरे अच्छे दोस्त हो, मेरे घर को अपना मानते हो, पर इसका मतलब यह थोड़े न कि मेरी माँ को तुम अपनी ही माँ मानने लगो...। वाह! तुम्हारी अपनी माँ तो तुम्हारी है ही, मेरी भी ले लो...। इसी बात का बदला एक दिन छत पर खेलते हुए अकेले में मैने निकाला था, उसे कस कर चिकोटी काट के...। पहले तो वह `उई’ करने के बावजूद अपने हाथ की चोटिल जगह को सहलाता हुआ अपनी आँखों में शरारत भरे कई पलों तक मुझे ताकता रहा और मैं उसे खा जाने वाली नज़रों से घूरती रही, फिर अचानक बिजली की तेज़ी से लपक उसने मेरे होंठो को चूम लिया...बिलकुल हल्के से...ऐसे कि, लगा, मानो हवा सहलाती-सी निकल गई हो...|

“जब मैं बड़ा हो जाऊँगा न, तब तुझसे ही शादी करूँगा...| तब मेरी माँ पर तू भी इतना ही हक़ जमा लेना...। मन करे तो इससे भी ज़्यादा...मैं तेरी तरह जल-खुखरा नहीं...।"

मैं शायद ग्यारह-बारह की रही हूँगी उस समय...। अजीब सा तो लगा था उसका मुझे यूँ चूमना, पर फिर भी कुछ नहीं हुआ था। उल्टे मैं और जल-भुन गई,"जा-जा...अपनी शक़्ल देख आइने में...। बड़ा आया मुझसे शादी करने वाला...।"

वह उसी तरह शरारत से मुस्कराता, मेरी चोटी खींचता वहाँ से चला गया था। उससे चिढ़ी होने के बावजूद मैने पता नहीं क्यों उसकी इस हरकत की शिकायत माँ से नहीं की थी। दूसरे दिन भी वह ऐसे मेरे घर आया जैसे कुछ हुआ ही न हो| उस समय आज की तरह ये कंप्यूटर-इन्टरनेट तो थे नहीं, न ये केबिल-शेबिल पर दिन भर चलने वाली अंगरेजी फ़िल्में थी, फिर ऐसा करना निर्मल ने कहाँ से सीखा, पता नहीं...|

वक़्त तो जैसे पंख लगा कर उड़ता है। पल-पल बीतते दिनों के साथ हम भी बड़े हो गए थे, बहुत कुछ बदल गया था, बाकी भी बदल ही रहा था...। किसी समय का पतला-दुबला, शर्मीला निर्मल कैसा गबरू जवान निकला था। पाँच फुट ग्यारह इंच लम्बा, चौड़ी छाती वाला...कितना अच्छा लगता था...। सफ़ेद कमीज़ और काली पैण्ट में तो जैसे गज़ब ढाता था...बिल्कुल फ़िल्मी हीरो...। कई बार गर्मी में जब वह कमीज़ उतार देता, तो मेरा मन जाने कैसा हो जाता...। उसके कसरती बदन पर कसी बनियाइन...उफ़! उस समय सिक्स-पैक एब्स तो नहीं जानती थी, पर बिल्कुल वैसा ही शरीर था उसका...। बहुत बार मेरा मन करता, उसके सीने से लग कर, उसकी गर्दन से लिपट देखूँ तो सही, कैसा लगता है...। पर हिम्मत कभी नहीं हुई...। कई बार अपने ऊपर लज्जा भी आती थी, यह सब सोचने पर...। ऐसा लगता, भगवान सीधा नर्क में डालेंगे मुझे ऐसे पापी विचार मन में लाने के लिए...। पर जब भी उसे यूँ, उस रूप में सामने पाती, यही विचार सिर उठाने लगते...। मुझे नहीं पता कि कभी वो मेरी मन की बात ताड़ भी पाया कि नहीं, पर कई बार उस की नज़र मुझे एक्स-रे लगने लगती थी...। सच्चाई जो भी रही हो, पर हमेशा की तरह अब भी वह वैसे ही रोज़ हमारे घर आता था। मेरी पढ़ाई तो बाऊजी ने बारहवीं के बाद छुड़वा दी थी, पर वह कॉलेज जाने लगा था। वहाँ से लौट कर सीधा मेरे यहाँ...। माँ उसकी पसंद की चीज़ें बना कर रखे रहती...। हाथ-मुँह धो वह नाश्ते की टेबिल की ओर जाते समय मेरी चोटी खींचना नहीं भूलता था...और कई बार माँ के किचन में रहने पर चुपके से मेरे कानों में फुसफुसा भी देता,"मेरी बात याद है न...मैं बड़ा हो गया हूँ...।"

ऐसे में मुझे जाने क्या हो जाता। पूरे शरीर में एक मीठी-सी सिहरन दौड़ जाती। हाथ-पाँव झनझनाने लगते। ऐसा लगता मेरे शरीर में जान ही न बची हो...। मैं जहाँ रहती, पाँव वहीं ज़मीन से चिपक-से जाते...। माँ उनका हाथ न बँटाने पर मुझे हज़ार गालियाँ देती, मेरी कामचोरी पर रोती पर मैं किस नशे में होती, मुझे खुद समझ न आता...। निर्मल भी अक्सर आग में घी डालने का काम करता,"हाँ काकी, काम कराया करो इससे...। बैठे-ठाले मुटिया गई तो कोई शादी भी नहीं करेगा इससे...। फिर तुम बेकार मुझे ही परेशान करोगी...।" उसकी द्विअर्थी बात का मतलब समझे बिना वो और बड़बड़ाती...पर मुझे तो माँ की बात सुनाई ही न देती, बस निर्मल की फुसफुसाहट...अब मैं बड़ा हो गया हूँ...। ऐसे में निर्मल नाश्ते की प्लेट में मुँह घुसाए मेरी स्थिति का आनन्द लेता मंद-मंद मुस्कराता रहता, पर उसकी आँखों की शरारती चमक, उसका यूँ मुस्कराना भी मेरे अन्दर रत्ती भर भी गुस्सा नहीं जगाता...उल्टे मेरा नशा और बढ़ जाता...।

ऐसा नहीं था कि सिर्फ़ मुझे सताने में ही उसे आनन्द आता था...। वो मेरा ध्यान भी बहुत रखता था...। मेरी छोटी-से-छोटी खुशी हो या ग़म, सब उसके लिए बड़े थे। मैं छींक भी देती तो ज़मीन-आसमान हिला डालता था...। उसे ऐसा बेहाल देख माँ अक्सर पल्लू मुँह में दबा हँसते हुए उसे ठुनकिया देती,"इसकी शादी के बाद तुम भी इसके साथ ही चले जाना क्योंकि तुम्हें तो लगता है, तुम्हारे सिवा इसका कोई ध्यान ही नहीं रखता...।" ऐसे में भी वो अपनी आदत से बाज नहीं आता था...तब नहीं क्या काकी, मुझे तो इसकी शादी के बाद इसके साथ रहना ही पड़ेगा...और फिर उसका मुझे देख कर वो मुस्कराना...। मैं भी जो चीज़ हाथ में आती, खींच कर उसे मार देती...दादा कोंडके कहीं का...।

कॉलेज ख़त्म करते ही निर्मल को एक बहुत अच्छी नौकरी मिल गई थी। उस ज़माने में कोई अगर पढ़ाई में टॉप करे तो बड़ी बात तो थी न...और ऐसे होनहार के लिए नौकरी की क्या कमी...? सो निर्मल को भी कमी नहीं रही...। बस दिक्कत थी तो इतनी कि आज की तरह ही तब भी अच्छी नौकरी बड़े शहरों में ही मिलती थी। निर्मल को भी घर से दूर ही जाना था...। सब की तरह ही मैं भी उसके लिए खुश तो थी, पर अन्दर...कहीं बहुत गहरे एक बेचैनी भी हो रही थी। साँस लेने की तरह निर्मल भी मेरी अनजानी-सी आदत बन गया था...। उसके बिना जीना...?

नौकरी पर जाने के एक दिन पहले वह कुछ और पल बिताने मेरे यहाँ आ गया था...फिर तो जाने कब छुट्टी मिलती, कब आ पाता...। माँ बहुत भावुक हो रही थी, सो उसे जीभर लाड़ लड़ा कर वे सीधे रसोई में घुस गई, इतने सारे पकवानों के अलावा उसकी पसन्द का मूँग का हलवा बनाने...बिल्कुल गर्म-गर्म...। किन भावनाओं में भरा निर्मल खमोश बैठा था तो मैं भी न जाने कितनी भरी-सी चुपचाप बैठी थी...। याद ही नहीं आ रहा था, क्या बोलूँ...। ऐसा लग रहा था, अभी तो न जाने कितनी बातें उससे करनी बाकी थी, अब कब कर पाऊँगी...? मेरे घर तो फोन भी नहीं था...। निर्मल भी कुछ देर मेरे कुछ बोलने का इंतज़ार करता रहा, फिर अचानक खड़ा हो गया। इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती, समझ पाती, उसने खींच कर मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और चूमना शुरू कर दिया| अब की बार उसके होंठ हवा का झोंका नहीं, बल्कि आग का गोला थे, जिसकी आँच में मैं पिघल रही थी...| मैं कस कर उसके गले से लिपटी थी...| अगर इन पलों के लिए भगवान मुझे नर्क में झोंकने वाले थे, तो शौक से झोंक दें...| सौ स्वर्ग उन पलों पर कुर्बान...|

न चाहते हुए भी बाकी सुखों की तरह मेरा वो स्वर्गिक-सुख भी ख़त्म हो ही गया। निर्मल ने ही खुद पर काबू पाया और फिर इतने सम्हाल कर, सहेज कर मुझे पलंग पर वापस बिठा दिया जैसे मैं शीशे का कोई नाजुक खिलौना होऊँ और अगर वो मुझे नहीं सम्हालेगा, तो मैं टूट कर बिखर जाऊँगी...। ज़मीन पर घुटने के बल बैठ उसने मेरा चेहरा अपने दोनो हाथों के बीच ले बस इतना ही कहा,"मेरी वो बात याद रखना...। बहुत जल्दी ही तुझे ब्याह कर अपने साथ ले जाऊँगा...। मेरा इंतज़ार करना..." और फिर इस बार उसने मेरे होंठ नहीं, माथा चूम लिया...। मुझे अवाक-सा देख उसके आँखों में वही शरारती चमक फिर लौट आई थी। जब तक माँ हलुआ और चाय ले कमरे में दाखिल हुई, वह जाने को मुड़ चुका था।

"अरे, ये खाता तो जा...और चाय..." माँ ने टोंका तो वह एक घूँट चाय पी कप मेरे हाथ में पकड़ा हलुआ की प्लेट ले ‘घर में खा लूँगा...’ कहता हुआ यह जा-वह जा...। जाते-जाते उसने अर्थ-पूर्ण नज़रों से मेरी और देखते हुए जिस तरह से अपनी हथेली से अपने होंठ पोंछे कि मेरी नज़र खुद-ब-खुद झुक गई...| मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया था| हमेशा ठंडी करके चाय पीने वाली मैं उस दिन गटागट हाथ में पकडे कप से चाय पी गई...| माँ ने देखा तो माथा पीट लिया, “अरे, तेरी चाय तो यह रखी है मेज पर...| वह तो निर्मल की जूठी चाय थी...। हे भगवान! अभी से इस लड़की के दिमाग का यह हाल है तो आगे तू ही पार लगाना...।" अब माँ को मैं कैसे बताती कि जानते हुए भी मैने निर्मल की जूठी चाय क्यों पी है...।

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