कभी अलविदा न कहना - 19 in Hindi Love Stories by Dr. Vandana Gupta books and stories Free | कभी अलविदा न कहना - 19

कभी अलविदा न कहना - 19

कभी अलविदा न कहना

डॉ वन्दना गुप्ता

19

ये उन दिनों की बात है जब नौकरी के लिए भारी भरकम डिग्रियों का हुजूम नहीं चाहिए होता था और न ही गलाकाट प्रतिस्पर्धा का जमाना था। कोचिंग क्लासेज अस्तित्व में नहीं आयीं थीं और सामान्यतः पच्चीस वर्ष की उम्र के पहले ही डिग्री के साथ एक अच्छी नौकरी आपकी झोली में रहती थी। पैकेज का नहीं सैलरी का जमाना था। नौकरी लगते ही घर वाले छोकरी की तलाश शुरू कर देते थे। प्रेम की पींगे बढ़ाने का अवसर बहुत कम को ही नसीब होता था। रुपहले पर्दे पर हीरो हिरोइन का प्रेम ही परवान चढ़ते देखते थे, जिसकी यादें हमेशा ही जिंदगी में सुनहरे ख्वाब सी सजी रहती थीं। खुद को और अपने साथी को उनकी जगह रखकर कल्पनाएं की जाती थीं। इसीलिए आज जो नज़ारा सामने था और जिस दृश्य को कोलाज बन स्मृतिपटल पर हमेशा के लिए अंकित हो जाना था, उसका एक हिस्सा मैं भी थी और यह बहुत बड़ी बात थी।

अनिता की सोच बहुत व्यवहारिक थी। वह हमेशा से कहती थी कि यदि अपने कार्यक्षेत्र में अपनी पसन्द का लड़का मिल रहा है, जो हमारे योग्य जीवनसाथी है, सजातीय भी है तो हम अपने पेरेंट्स की मदद ही कर रहे हैं, इसमें गलत कुछ भी नहीं है। मैं उसकी इस बात से सहमत न होते हुए भी नकार भी नहीं पाती थी। यह अरेंज मैरिज और लव मैरिज के बीच की कोई स्थिति थी, जिसे सेल्फ अरेंज मैरिज का नाम दिया जा सकता है। जब प्यार होता है तो वह किसी भी बंधन को नहीं मानता है। उम्र, जाति, धर्म, रूप, रंग सबसे परे होता है। अनिता आज अपने प्यार का इजहार करने जा रही थी, और दिल मेरा धड़क रहा था। यह प्यार कुछ अलग तरह का था... योजनाबद्ध प्यार... यदि व्यक्ति विवाह के मानकों पर खरा उतर रहा है तो प्यार करो, मतलब प्यार हुआ नहीं था, किया जा रहा था।

खैर..... केक कटा और बंटा भी.. बर्थडे विश भी किया गया। जैसा कि अनिता ने प्लान किया था, मैंने और रेखा ने एक पीले गुलाब के साथ जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए निखिल सर को उपहार दिए... उसके बाद अनिता ने एक लाल गुलाब के साथ एक क्रिस्प चॉकलेट, एक ग्रीटिंग कार्ड और एक विशेष उपहार देकर उन्हें सरप्राइज दिया फिर विजय के साथ सुनील ने भी विश किया। अनिता थोड़ी मॉडर्न सोसाइटी को बिलोंग करती थी, उसी ने हमें बताया था कि पीला गुलाब दोस्ती का और लाल गुलाब प्यार का प्रतीक होता है। क्रिस्प चॉकलेट भी प्रेम प्रदर्शित करने के लिए दी जाती है... और सबसे खास बात उसने ग्रीटिंग कार्ड चयन करने और उसपर संदेश लिखने में की थी। जब तक कार्ड नहीं खुलता वह राज ही रहना था। इस समय मेरा सारा ध्यान निखिल सर पर केंद्रित था, कि वे क्या प्रतिक्रिया देंगे। वे इतने मंत्रमुग्ध थे कि उन्होंने शायद सिर्फ गुलाब देखा, उसका रंग नहीं.. चॉकलेट का रैपर भी तुरन्त खोल कर उसके टुकड़े कर हम सबको बांट दिए। चॉकलेट के साथ ही एक पल के लिए लगा कि अनिता के दिल के भी टुकड़े कर दिए हों... किन्तु तभी उन्होंने अपने हाथ से अनिता को केक खिलाया.. उसके चेहरे का रंग फिर से खिल गया।

'बार बार दिन ये आए...

बार बार दिल ये गाए...

तुम जियो हज़ारों साल...

ये मेरी है आरज़ू...

हैप्पी बर्थडे टू यू.......'

सुनील का गाना मैं पहली बार नहीं सुन रही थी। मेरे अलावा सभी उसकी गायकी की तारीफ कर रहे थे और मैं कल्पना कर रही थी कि दो दिन बाद मेरा जन्मदिन मनाया जा रहा है और सुनील मेरे लिए गा रहा है। उसने मुझे एक गुलदस्ता दिया है, लाल गुलाबों का... चॉकलेट भी है और है ढेर सारा प्यार उसकी आँखों में सिर्फ मेरे लिए.... मैं केक काट रही हूँ, चॉकलेट केक और वह मुझे निहार रहा है.....!

"ये विशु भी न बहुत धुनी है... कहाँ खो गयी फिर से....  ये लो आज तुम्हें भी एडवांस में जन्मदिन की बधाई.... एक केक और है तुम्हारी पसन्द का फ्लेवर... चॉकलेट केक....." रेखा मुझे यथार्थ में ले आयी।

"तुम्हें कैसे पता कि मेरा जन्मदिन........."अनिता ने अंकुश का ग्रीटिंग कार्ड सामने रखा और मैं चुप रह गयी।

"यही तो सरप्राइज था तुम्हारे लिए, इसीलिए तुम्हें आज घर जाने से रोका था।"

"ये केक कब लाए और क्या सुनील भी इसीलिए......."

"हम कैंडल्स लाना नहीं भूले थे, विजय ये दूसरा केक लेने गया था और सुनील ने बस जान बूझकर नहीं छोड़ी है, वह तो अनायास ही शामिल हो गया... हाँ तुम्हें चॉकलेट केक पसन्द है यह उसी ने बताया है।"

मैं फिर सोचने लगी कि सुनील को कैसे पता कि मुझे चॉकलेट केक पसन्द है, हमारी कभी बात नहीं हुई इस बारे में... मतलब कि वह भी मेरी पसन्द-नापसन्द को जानने में रुचि रखता है... शायद अंशु ने बताया होगा... शायद इन दोनों ने मिलकर कुछ प्लान भी किया होगा मेरे जन्मदिन के लिए... हो न हो... वह भी मुझे.... और अब तो ईश्वर का संकेत भी मिल ही गया है.....! यह सब सोचकर मैं मन ही मन मुस्कुराने लगी। लाल गुलाब की रंगत मेरे चेहरे पर खिल गयी थी।

"जन्मदिन मुबारक हो..." विजय ने पीला गुलाब उठाकर मुझे देते हुए कहा।

"मेरी तरफ से भी शुभकामनाएं....." सुनील के हाथ में भी पीला गुलाब देख मेरा मन बुझने लगा। फिर सोचा कि इन्हें क्या पता होगा गुलाब के रंग के बारे में... वह तो अनिता ने सिर्फ मुझे और रेखा को बताया है। निखिल सर ने भी उनके हाथ का लाल गुलाब मेरी ओर बढ़ाया ही था कि अचानक रेखा ने उसे झपट लिया... तोड़ कर उसकी पंखुरियाँ ऊपर उछाल दी और बोली.. "हम सबकी तरफ से जन्मदिन की अग्रिम बधाई विशु..... इस गुलाब की खुशबू की तरह खुशियां तुम्हारी जिंदगी में बिखरती रहें।" मैं समझ गयी थी कि अनिता ने मेरी जिंदगी में इस तरह से खुशियाँ बिखेरकर उसके अपने मन की खुशी को बिखरने से बचा लिया था। वह नहीं चाहती थी कि निखिल सर मुझे लाल गुलाब दें, चाहे अनजाने में ही, रेखा भी इस बात को समझ गयी थी और हम आँखों आँखों में इशारे कर खुश थे। विजय ने नोटिस किया और वह गुनगुनाने लगा.... 'आँखों ही आँखों में इशारा हो गया....' वहाँ उपस्थित छः जोड़ी आँखों में अनेक प्रश्न थे जिनके उत्तर तलाशे जाने थे।

अचानक ही विजय ने अंकुश का ग्रीटिंग कार्ड उठा लिया। मेरी धुकधुकी बढ़ गयी, मानो चोरी करती हुई पकड़ा गयी हूँ।

"इस पर भेजने वाले का नाम तो लिखा ही नहीं है।"

"अभी लिख देती हूँ..." रेखा ने कार्ड लिया और नीचे लिख दिया...

-शुभकामनाओं सहित

रेखा और अनिता।

"जल्दी जल्दी में भूल गए... और जन्मदिन भी तो दो दिन बाद है... शायद इसीलिए भूले।"

मैंने राहत की सांस ली कि अंकुश के प्रकरण का पटाक्षेप हो गया है। मुझे नहीं पता था कि मेरी जिंदगी कंप्लीकेशन्स के बिना अधूरी है। एक अच्छी बात यह थी कि हर जटिलता थोड़ा विचलित करती और जाते हुए कुछ पॉजिटिव रिजल्ट देकर जाती थी।

"सुनील एक गाना सुना दो... बहुत प्यारी आवाज़ है तुम्हारी...." निखिल ने अनुरोध किया... "हाँ हाँ बर्थडे बॉय की बात तुम टाल नहीं सकते सुनील.." अनिता ने भी समर्थन किया।

"बताइए कौन सा गाना सुनना चाहते हैं?" सुनील ने मेरी ओर देखा।

"निखिल! आप बताओ कौन सा गाना सुनना और सुनाना चाहेंगे?" अनिता के प्रश्न पर उन्होंने थोड़ी देर सोचा.. उनकी फरमाइश पर सुनील ने गाना शुरू किया....

"है अपना दिल तो आवारा... न जाने किस पे आएगा....." निखिल सर भी साथ में गाने लगे थे, मानो अनिता को संकेत दे रहे हों कि मेरा दिल अभी तुम पर आया नहीं है। गाना खत्म होते ही अनिता ने गाना शुरू कर दिया....

"हमने तो दिल को आपके कदमों में रख दिया...

इस दिल का क्या करेंगे ये अब आप सोचिए...."

गानों में ही दिल का हाल सुनाया जा रहा था। रेखा को भी गायन का शौक था, विजय का इशारा मिलते ही वे दोनों शुरू हो गए....

'तेरे मेरे सपने... अब एक रंग हैं..." कुल मिलाकर संगीतमयी माहौल में एक दूसरे की नब्ज टटोली जा रही थी और सपने देखे जा रहे थे।

सुनील और मैं जैसे वहाँ होकर भी वहाँ नहीं थे। मैं अजीब सी कशमकश में थी।  गाना खत्म होते ही रेखा को कुछ याद आया... "विजु! आँखे बंद करो... " अगले ही पल विजय की कलाई पर सुंदर सी रिस्ट वॉच थी।

"मुझे अभी गिफ्ट क्यों दी जा रही है? मेरा जन्मदिन नहीं है।"

"इसलिए कि दस दिन बाद मैं लम्बी छुट्टी में घर जा रही हूँ, इस घड़ी की टिक टिक में मेरे दिल की धक धक महसूस करते रहना..." रेखा ने बिछड़ने की बात कही और माहौल गमगीन हो गया।

"ओहो... बढ़िया है... हमें कोई तोहफा नहीं मिलेगा क्या?" निखिल की बात सुन अनिता अंदर गयी और एक सुंदर सी डायरी और पेन लेकर आयी... "ये आपके लिए.. मन की बात डायरी में लिखते रहिएगा।"

"थैंक यू अन्नू..." अचानक निखिल सर थोड़े संजीदा हो गए। मुझे वह हमेशा से ही कुछ विचित्र लगते रहे हैं। मैंने एक बार रेखा से कहा भी था कि मुझे वे अनिता के लिए सीरियस नहीं लगते हैं,वे उसे बढ़ावा दे रहे हैं, कहीं बाद में उसका दिल न तोड़ दें।

"ऐसा होता तो विजय ने मुझे बता दिया होता.. तू चिंता मत कर सब ठीक होगा।" रेखा की बात से मुझे तसल्ली हो गयी थी। आज जब फैसले की घड़ी नज़दीक थी, अनिता से ज्यादा मैं उत्सुक थी, थोड़ी घबराहट भी थी कि पता नहीं क्या होगा। इस पल मुझे मेरी और सुनील की नहीं, बस अनिता और निखिल की लव स्टोरी में इंटरेस्ट था... काश.... हम जिसे चाहते हैं, उसका दिल भी हमारे लिए ही धड़के....!

डिनर शुरू हो चुका था। समय तेज़ी से भाग रहा था। अजीब सी खामोशी थी... थोड़ी देर पहले जो चुहलबाज़ी हो रही थी, वह कहीं गुम हो गयी थी। शायद सब मन ही मन सोच रहे थे कि अब बात क्या और किस तरह से शुरू की जाए.... "आप लोगों के यहाँ मच्छर या कीड़े मकोड़े हैं क्या?" सुनील ने चुप्पी तोड़ी।

"मतलब?" विजय ने रेखा को एक कौर खिलाते हुए पूछा। रेखा और विजय पहली बार सार्वजनिक प्रेम प्रदर्शन नहीं कर रहे थे, किन्तु आज सुनील की उपस्थिति में मुझे यह सहज नहीं लग रहा था... न जाने क्यों..?

"मतलब ये कि सब खाने पर इतना फोकस हैं कि कुछ और नहीं चला जाए निवाले के साथ.... मुझे तो ऐसे खाना हज़म ही न हो... जहां तीन मैडम हों, एक प्रेमी जोड़ा हो वहाँ इतनी शांति... मुझे तो मनहूसियत लगती है.... और कुछ नहीं तो रेसिपी ही डिस्कस कर लो।"

"तुम्हें कुकिंग आती है?" अनिता चकित थी।

"हाँजी मुझे शौक है खाना बनाने और खाने का..."

"वाह... आपकी बीवी बहुत खुश रहेगी।"

मेरी और सुनील की नजरें टकरायीं... मैंने तुरन्त नज़रें झुका लीं। मैं एक अजीब सा सम्मोहन अनुभव कर रही थी। मटर पनीर, छोले, फ्रूट कस्टर्ड, भरवां भिंडी की तारीफ करते करते खाली बर्तन सिंक में पहुँच चुके थे।

निखिल ने अनिता का दिया हुआ ग्रीटिंग कार्ड उठा लिया था। प्रेम का संदेश देता हुआ सुंदर कार्ड था।

"अरे! तुमने इसमें मेरा नाम तो लिखा ही नहीं... सिर्फ नीचे अपना नाम लिखा है, मेरे लिए ही है या गलती से किसी और का कार्ड मुझे दे दिया......?"

अनिता ने कार्ड में कोई सम्बोधन नहीं लिखा था, यह मुझे अजीब लगा।

"यह कार्ड देखो...." अनिता ने अंकुश का कार्ड उठाया और बोली कि.... "विशु को उसके दोस्त अंकुश ने प्रपोज़ किया और यह बर्थडे कार्ड भेजा... ऊपर लिखा 'वैशाली' और नीचे रिक्त स्थान.... उसके जवाब की प्रत्याशा में... उसी तरह से मैंने भी कार्ड में नीचे अपना नाम लिखा है अब आप बता दीजिए क्या सम्बोधन दूँ, मैं रिक्त स्थान की पूर्ति कर दूँगी।" वह एक सांस में बोल गयी। थोड़ी देर पहले रेखा ने जिस बात को संभाला था, उतावलेपन में अन्नू ने जाहिर कर दिया। मैं अचंभित थी और सुनील भी हैरान परेशान दिखा, मैं उसके चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश कर रही थी। विजय ने भी रेखा को घूर कर देखा कि उसने झूठ क्यों बोला था। कुल मिलाकर बहुत ही विकट और असमंजस वाली स्थिति निर्मित हो गयी थी। मैं जिस बात से भाग रही थी, भूलना चाह रही थी, वह फिर सामने थी। मैं स्थितप्रज्ञ सी बैठी रही।

"देखो अन्नू! हम बहुत अच्छे दोस्त हैं और इससे ज्यादा मैंने कभी सोचा ही नहीं...।" कितनी आसानी से बोल दिया निखिल ने... मैं क्यों नहीं यही बात अंकुश से बोल दूँ... क्या इतना बोल पाऊँगी मैं.....?

"निखिल इतनी जल्दबाजी मत करो... छुट्टियाँ हो ही रही हैं, आराम से अनिता के प्रस्ताव पर विचार करना... हम सब तो यही समझ रहे थे कि तुम दोनों ही एक दूसरे को पसन्द करते हो, लेकिन......" विजय ने बात अधूरी छोड़ दी थी। वातावरण की रुमानियत का स्थान बोझिलता ने ले लिया था।

"ठीक है अन्नू... मुझे थोड़ा वक्त दो..." निखिल ने फिर उसे अधर में लटका दिया। उसने डायरी खोली और अनिता के आगे रखते हुए कहा कि "आप सभी इस पर कुछ लिखकर दो, अपनी दोस्ती की धरोहर के रूप में मैं इसे हमेशा अपने पास रखूँगा।"

"सिर्फ दोस्ती की...? वह तो हम लिख देंगे।" रेखा ने सांकेतिक रूप में कहा। अनिता ने डायरी ली... पेन खोला और लिखना शुरू किया....

"न जिद है न कोई गुरूर है हमें

बस तुम्हें पाने का सुरूर है हमें

इश्क गुनाह है तो गलती की हमने

सजा जो भी हो मंजूर है हमें......."

लिखने के बाद उसने डायरी रेखा की ओर बढ़ा दी... उसने भी अनिता की बात को आगे बढ़ाते हुए लिखा....

“पहली मोहब्बत के लिए दिल जिसे चुनता है...

वो अपना हो न हो, दिल पर राज हमेशा उसी का रहता है....”

डायरी अब विजय के हाथ में थी... "आज क्या दिन है... मतलब कोई त्यौहार या किसी की जयंती है क्या?" मैंने माहौल को हल्का करने के लिए कहा।

"और क्या? तुम्हें इसके अलावा लिखना ही क्या आता है।" रेखा ने उलाहना दिया।

"मैं सब समझ रहा हूँ, गलत बात है, आप मेरे पत्र पढ़ती हैं।"

"तुम्हारे पत्र में तो निबंध होता है, हमने तो अंकुश का पत्र भी पढा है।" अनिता फिर उसका जिक्र कर बैठी। इस बार मैंने सुनील के चेहरे पर जो भाव देखा, मुझे खुशी हुई। अंकुश का जिक्र उसे अच्छा नहीं लगा था और यह देखकर मुझे अच्छा लग रहा था। अनजाने में ही सही अनिता ने सुनील को एहसास करवा दिया था। अशोक उसका भाई था, लेकिन अंकुश को वह रकीब ही समझ रहा था।

"पहले भी जीते थे, मगर जबसे मिली है जिंदगी...

सीधी नहीं है दूर तलक, उलझी हुई है जिंदगी...."

विजय ने भी एक शेर लिखकर एक तीर से दो निशाने साध लिए।

अब डायरी मेरे हाथ में थी... यूँ तो बहुत शेर और कविताएँ याद रहती थीं हमेशा... अभी क्या लिखूं, कुछ समझ ही नहीं पा रही थी... गोल मोल न लिखते हुए मैंने सिंपल सी पंक्तियाँ लिखीं...

"अंजुरी में ढेरों फूल लिए, कामना करता है मन..

खुशी का संगीत बन जाए ये जन्मदिन....."

आखिर आज निखिल के साथ मेरा भी जन्मदिन मनाया जा रहा था और हम दोनों ही जिंदगी के दोराहे पर खड़े थे। मैं उत्सुक थी कि सुनील क्या लिखेगा.....

उसने मुझे एक गहरी नज़र से देखा और फिर लिखा...

"यादों के दो फूल तुम्हारे नेह द्वार पर मढ जाते हैं...

मीत तुम्हारे हृदय पत्र पर हम हस्ताक्षर कर जाते हैं..."

मैं एहसास कर पा रही थी कि अनिता और मेरी जिंदगी बदल रही थी निखिल उससे दूर जा रहा था और सुनील मेरे पास आ रहा था।

क्रमशः....20

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जगदीप सिंह मान दीप
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Pushpa Joshi

Pushpa Joshi 2 years ago

उपन्यास के सारे किरदार ,अपनी अलग विशेषता लिए हुए है।पाठक के मन पर अपनी छाप छोड़ देते ।सारे घटनाक्रम एक दूसरे से सही तरीके से जुड़े हैं, कहानी के मोढ़ भी रोचक है। पाठक के मन में यह उत्सुकता बरकरार रहती है कि आगे करता होगा।