कहानी की कहानी की कहानी - 13 - ज़मीन के नीचे

वो औरत इतना कहकर मुस्कुराते हुए चली गई। मैं भीतर से अपमान में जल रहा था पर मैं कुछ नहीं कह पाया। सुबह हो चुकी थी। छोटी सरकार चुपचाप अपने बिस्तर पर बैठी थीं और मैं नीचे जमीन पर बिस्तर के सहारे टिक कर सर पे हाथ धरे बैठा था। तभी अहाते से रानी साहब ने कलेवा ले जाने के लिए आवाज़ दी। मैं उठा और अहाते में जाकर खड़ा हो गया। अहाता खाली पड़ा था। शायद बड़े सरकार अभी भी बाहर थे। कुछ देर बाद रसोई से रानी साहब निकलकर आईं। उनके हाथ में दो थालियाँ थीं। कुछ ही घंटों में मानो उनकी उम्र दस बरस और बढ़ गई थी। बाल बिखरे हुए थे। देह पसीने से भरी थी और धोती का पल्लू कमर से बँधा था। बिलकुल निढाल लग रही थीं। थकान से चेहरे की झुर्रियाँ दोगुनी हो गयी थीं। जो बेशक़ीमती फर उनकी हैसियत की पहचान था और हमेशा उनके ऊपर रहता था, वो अब गायब था।

काम करने की आदत नहीं थी और अचानक ही किले की सारी ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर आन पड़ी थी। फिर भी एक पहर की रसोई का उनपर ऐसा असर होना थोड़ी चिंता की बात थी।  पर न मैं इस हालत में था की उनसे कुछ पूछ पाता और न वो इस स्थिति में लग रही थीं कि कुछ बता ही पातीं। मैंने जोहार की और उनसे थालियाँ ले लीं। मैं वापस छोटी सरकार के कमरे में जाने की और मुड़ा तो पीछे से रानी साहब ने कहा,

"हम समझते हैं मुरली कि तेरे ऊपर का बीत रही है। जउने दिन से इहाँ कदम रखा है तूने, न जाने इस किले ने का का दिखा दिया है तुझे। तेरी तबियत भी ठीक न चल रही। कुछ दिन ऐसा कर शैली के साथ उसी के कमरे में रह, दरी दसना उठा ले जा और रात में वहीं जमीन पर सो जाया कर। कल रात की अनहोनी से शैली बड़ी डरी हुई है। बरसात आई है, तेरा कमरा ठंडा भी रहेगा.....परदे नहीं हैं न। जा अभी कलेवा कर ले और दोपहर ढल ऊपर वाले तल्ले पर आ जियो। कमरे में कुछ साफ़ सफाई करनी है।

पहले तो पूनमिया किए दिया करती थी। अब इस उम्र में हमारा झुकना न हो पाता।"

"जो हुकुम हो रानी साहब।"

मैंने जोहार की और कमरे में आ गया। छोटी सरकार जस की तस मेज़ से सटे बैठी थीं। न कागज़ सँभाल रही थीं, न ही कुछ लिख ही रही थीं। खिड़की खुली थी और तेज़ हवा से दवात गिर गया था जिसमें से स्याही बहकर धीरे धीरे उनके सारे कागज़ों पर फ़ैल रही थी। छोटी सरकार बैठी बैठी ज़मीन को ताक रही थीं। मेज़ से बहती स्याही अगले ही पल उनके सफेद फ्रॉक पर गिर जाती कि मैंने झट से थालियाँ नीचे रखीं और दौड़कर उन्हें गोद में उठा लिया।

सारी की सारी लाल स्याही मेज़ से बहकर ज़मीन पर फ़ैल गई थी। मैंने छोटी सरकार को बिस्तर पर बिठाया और मेज़ पर जाकर उनके कागज़ों को बचाने की कोशिश करने लगा। आश्चर्य की बात थी कि किसी भी कागज़ को कोई नुकसान नहीं पहुँचा था। पूरी मेज़ पर लाल स्याही फ़ैल गयी थी जो धीरे धीरे ज़मीन पर  टपक रही थी। पर सरकार के कहानी लिखे कागज बिलकुल सही सलामत थे। बल्कि उनके नीचे से बहती स्याही से नीचे के सारे कोरे कागज़ भीग कर बिल्कुल लाल हो गए थे। स्याही मेज़ से छोटी छोटी बूँदों में टपक कर नीचे गिर रही थी.....मैंने हाथ के एक झटके से स्याही को मेज़ से बहाया। स्याही बिलकुल गाढ़ी थी और उसका रंग गहरा लाल था। मेरी आँखों के सामने मरती हुई पूनम का खून से सना चेहरा घूम गया।

मैं चकरा गया। मेरा सर इतनी ज़ोर से फड़का कि मैं लड़खड़ाकर नीचे गिर गया। मैंने अपना हाथ सर पर रखा तो वो मुझे भीगा हुआ महसूस हुआ। मैंने अपने हाथ देखे तो वो बिल्कुल लाल हो चुके थे.....बिल्कुल सुर्ख लाल.....और चिपचिपा.....मैं चीख पड़ा। रानी साहब दौड़ती हुई कमरे में आईं,
"क्या हुआ क्या हुआ? शैली, मुरली, क्या हुआ? ये मेज़...."

मैं लगातार चीखे जा रहा था। मेरी साँसें थम चुकी थीं...
"खून, सरकार, खून, खून! वो आ गए हैं सरकार, ये उन्हीं का ख़ून है, वो हमका नहीं छोड़ेगी सरकार, वो आ गए हैं, किसी को नहीं छोड़ेंगे सरकार! बाउजी बाउजी......"

मेरे गाल पर एक तेज झटका आया और मेरी आँखों के आगे से रोशनी चली गई। न जाने कब तक मैं बेहोश रहा। जब मेरी आँखें खुलीं तो मैं अपने कमरे में दरी पर लेटा था। मेरे हाथ साफ़ थे और मेरे सिरहाने एक मिट्टी के कटोरे में पानी था। मैंने उठकर उसमें अपना चेहरा देखा तो मेरा चेहरा भी साफ था। खिड़की से अहाते में जलते दिए देख मैं समझ गया की सांझा घिर आई थी। मैं निढाल होकर फिर लेट गया। मेरा दायाँ कान दर्द के मारे फट रहा था। मैंने हाथ लगाया तो खून निकल आया। मेरा दायाँ जबड़ा भी हिला हुआ था। तभी दरवाज़ा खुला और रानी साहब अन्दर आईं।

मैं उठने लगा।
"लेटा रह रे, लेटा रह। अभी उठेगा तो पवन देबता भी फूँक मारकर बहाये ले जाएँगे।"
रानी साहब ने हाथ में ली थाली नीचे रखी और दूसरे हाथ में लिए लोटे से भीगा गमछा निकाल कर मेरे दाएँ गाल पर रख दिया। गमछा रखते ही मुझे ऐसा लगा मानो किसी ने सैकड़ों सुइयाँ चुभो दीं हों मुझे। मैं छटपटा गया।
"तनी झेल ले रे। सेंक लगाई है, कुछ देर में आराम हो जाएगा। ये भी जाने कभौं कभौं बौराए जाते हैं। इतना तेज मारने की क्या ज़रूरत थी। पर तू भी चीखे जा रहा था, रुकने का नाम नहीं ले रहा था। नसें इतनी तनी थीं कि लग रहा था कि तेरी जान निकल जाएगी। लेटा रह, सेंक लगा।"

अब मुझे समझ आया की ये तेज़ दर्द बड़े सरकार के थप्पड़ का था। मैं चुपचाप सेंक लगाता रहा। मुझे अंदाज़ा नहीं थे कि हुक्के के धुएँ से खोखले पड़े उस शरीर में इतनी ताकत थी। मेरा मुँह खुल भी नहीं रहा था। मैंने किसी तरह हाथ उठाकर रानी साहब की जोहार की।
"हाँ हाँ रे, अभी आराम कर। ई थोड़ी दूध भिगाई रोटी है, हो सके तो खा लियो। आँख से देखत रहे वरना वो चटोरी सल्ली सूँघन भर का भी न छोड़ेगी। अभी तो शैली के साथ लगी पड़ी है। तनी बल आ जाए तो शैली के कमरे में चला जाए, समझा? बाहर तूफ़ान आया हुआ है। बच्ची है, डर जाएगी।"

रानी साहब ये कहकर चली गईं। मैं कुछ देर तक लेटे लेटे सेंकता रहा। रानी साहब जैसी ममता मैंने आज तक अपने जीवन में कभी महसूस नहीं की। बल्कि मैंने ममता ही कभी महसूस नहीं की। बाउजी कोशिश बहुत करते थे। पर थे सांझ ढले मर्द ही। अक्सर चिढ़ जाते थे। कभी हाथ नहीं उठाया पर दिनोंदिन के लिए चुप्पी साध लेते थे। पूरा पूरा महीना बीत जाता था और हम दोनों में कोई बातचीत नहीं होती थी। बाउजी बाहर गाँव के मामलों में लगे रहते थे और मैं गंगा किनारे पड़ा रहता था।

नन्हे से गाँव में मेरी उम्र का कोई नहीं था। मैं बहुत अकेला था। इतना कि मुझे कभी समझ ही नहीं आया कि किसी के साथ, किसी के प्यार का मतलब क्या होता है। पर अब मैं भर गया था। उस सूने किले के सारे खूनी इतिहास में छोटी सरकार के साथ बिताए पलों और रानी साहब के प्यार भरे हाथ के लिए मेरे दिल में अलग जगह है।

मैं काफी देर तक लेटा रहा। दर्द कुछ कम हुआ तो बाहर हो रही तेज़ बारिश की धीमी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। साथ ही बूँदों के टपकने की एक और हलकी आवाज़ आ रही थी। शायद कमरे की दीवार में सीलन थी। सीलन की वजह से लकड़ियों से आती वो खुशबू और तेज़ हो गई थी। कमरे में साँस लेना मुश्किल हो रहा था। मैंने आसपास नज़रें दौड़ाईं तो अहाते की रोशनी में मुझे खिड़की के पास सीलन दिखाई दी जिससे पानी भीतर आ रहा था और कुछ ही देर में दरी भीग जाती। मैं हड़बड़ी में उठा। पर कमजोरी के मारे मेरे कदम लडख़ड़ाए।

मैं नीचे गिरा और सीलन से सड़ चुकी लकड़ियाँ मेरा भार न सह सकीं और फट्टे टूट गए। एक राख का गुबार निकला। मैंने अपने हाथ नीचे रखकर उठने की कोशिश की तो मेरा दायाँ हाथ किसी और के हाथ से टकराया.....जमीन के कुछ एक हाथ नीचे....जमीन के नीचे.....मेरा हाथ, किसी के हाथ से टकराया।  


 

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Minakshi Singh

Minakshi Singh 2 months ago