होने से न होने तक - 50

होने से न होने तक

50.

न जाने कितनी संस्थाओं से जुड़े हैं यह अध्यक्षा और प्रबंधक । एक की चॉद पर दूसरे का रजिस्टर भरता है। इस विद्यालय की अध्यक्षता भी तो इनके समाज सेवा के खाते में ही भरी जाती है। वाह रे सोशल वर्क। समाज सेवा की इन्ही गिन्तियों के चलते न जाने कितनी सरकारी समीतियों की माननीया सदस्या बनी बैठी हैं। सुना है पद्यश्री बटोरने के चक्कर में हैं। एड़ी चोटी का जुगाड़ कर रही हैं। मिल भी जाएगी किसी दिन। हैं तो वे मिसेज़ शामकुमार संघी...पद्यश्री नीना संघी...बड़ी भारी चाइल्ड वैल्फेयर वर्कर। यश और आण्टी के साथ एक बार उनके घर गए थे। ठिठुरते जाड़े में एक बारह तेरह साल का बच्चा एक जर्जर सा स्वेटर पहने नंगे पैर चाय नाश्ता पहुंचा रहा था। कभी कभी बड़ी वितृष्णा होती है इन जैसे समाज सेवियों को देख कर। पर क्या करुंगी इस क्रोध को पाल पोस कर। केतकी कहती थी हमें अपना गुस्सा ज़ि़दा रखना सीखना चाहिए।...पर फायदा ?जो क्रोध प्रतिशोध का कोई रास्ता न निकाल सके...अपने आस पास और समाज में कोई बेहतर बदलाव न ला सके वह एकदम वेस्ट इमोशन है। सोचती हूं अपने को क्या करना है। बेवजह ही इतना सोच कर अपना दिमाग ख़राब करती रहती हूं। वैसे ही कोई कम क्लेष है। पर हर तरफ से ऑखें बंद कर लेना इतना आसान है क्या? गॉधी जी ने कहा था कि बुरा मत देखो,बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो। पर ऑख, कान और ज़ुबान बंद कर लेने से जो कुछ हो रहा है वह अघटित तो नहीं हो जाता। वह घटता भी है और मन की ऑखों से दिखता भी है...फिर मन में टीस तो उठेगी ही और दिमाग में गुस्सा भी भरेगा ही।

हर समय महसूस होता रहता है जैसे कि कुछ बहुत ही अपना पराए हाथों में चला गया-छल और बल से। यह कालेज तो पूरी तरह से हमारा था। यह पराए लोग इसके मालिक कैसे बन बैठे। मन में हूक उठती है जैसे कुछ छिन गया हो। पर हम सब कर ही क्या सकते हैं...हम तो इस फैक्ट्री में एक पुर्ज़ा मात्र ही तो हैं...एक जीवित पुर्ज़ा...ऐसा पुर्ज़ा जिसे कभी भी...किसी भी तरीके से किसी से भी रिप्लेस किया जा सकता है। इतने पुर्ज़े हट गए इस फैक्ट्री में से पर यह तो चल रही है। अपने अंतरंग साथियों मे से तो बस मैं और मानसी ही रह गयी हैं...समय के श्राप से ग्रस्त। मानसी भी तो मुझसे कई साल पहले रिटायर हो जाऐंगी फिर कैसे रहूंगी यहॉ। पर इतना क्या सोचना। इतने लोगों के जाने पर भी आख़िर रही रहे हैं। वैसे ही रहेंगे। दुख और अकेलापन ही तो है, थोड़ा और ज़्यादा सही।

कालेज के मेन गेट से अन्दर आ कर डिग्री सैक्शन की तरफ बढ़ने लगी तो अनायास निगाहें प्रिंसिपल रूम की तरफ को मुड़ गयी थीं। मेज़ के उस पार रखी लैदर की बड़ी सी कुर्सी इस समय ख़ाली पड़ी है। लगता है दमयन्ती अरोरा अभी नहीं आयी हैं या फिर कहीं गयी होंगी।

रोज़ ही तो आते हैं यहॉ। हर दिन इसी रास्ते से तो गुज़रना होता है और हर बार न चाहते हुए भी नज़रे उस कमरे की तरफ को मुड़ जाती हैं। हमेशा ही उस कमरे को देख कर मन में ख़ालीपन भरने लगता है।...फिर आज तो न जाने कैसा लग रहा है जैसे सब एकबारगी नए सिरे से फिर से उजड़ गया हो...जैसे बरसों बाद किसी बहुत पहले वीरान हो गयी जगह से गुज़र रहे हों। सोच कर अजब लगता है। बरसों बाद की तरह बहुत कुछ बीत जाने वाला,दिल और दिमाग को मथने वाला यह अहसास। मैं तो रोज़ ही आती हूं यहॉ। रोज़ इसी रास्ते से जाती भी हूं। बस कल ही तो नहीं आयी थी। अड़तालिस घण्टों में ही लग रहा है जैसे आज बरसों बाद यहॉ आयी हूं। जैसे मैं तो यहॉ से पूरी तरह उखड़ चुकी हॅू...इस कालेज से,यहॉ की आबो हवा से, यहॉ बीतने वाले काल के इस खंण्ड से।

सामने बने डिग्री विभाग से पहले दाहिने हाथ को बना बड़ा सा पवैलियन जिसे चारों तरफ से कवर कर के मेक शिफ्ट आडिटोरियम बना दिया गया है। दीपा दी के कहने पर राम सहाय जी ने इसे कवर करवाया था। तब से कालेज में हर सैक्शन के छोटे मोटे कार्यक्रम इसी में मना लिए जाते हैं। अब हर कार्यक्रम के लिए उतनी दूर मेन आडिटोरियम तक की दौड़ नहीं करनी होती। चारों तरफ कल के फंक्शन के अवशेष अभी भी बिखरे हुए हैं। आड़ी तिरछी पड़ी हुयी कुर्सियॅा,बन्दनवारों से टूट कर गिरी हुयी फूलों की लड़ियॉ। आगे की कुर्सियों के सामने पड़ी हुयी मेज़ें और उनके नीचे बिछे हुए गलीचे। रैपिंग पेपर्स के कुछ टुकड़े भी इधर उधर बिखरे हुए हैं। शायद स्टूडैन्ट्स ने टीचर्स को गिफ्ट दी होंगी जिन्हें यहीं पर खोल कर देखा गया है।

मेरा मन एकदम से उचाट होने लग गया था। लगा था आज मैं कुछ काम नही कर पाऊॅगी। मुझसे नही पढ़ाया जाएगा अभी कुछ दिन। लगा था जैसे मन प्राण सब शिथिल होने लगे हों और मैं अन्दर की तरफ बढ़ने के बजाय बाहर की तरफ पलट ली थी। सोचा था कम से कम दस पंद्रह दिन की छुट्टी ले लूंगी। मानसी अपनी बेटी की डिलीवरी के लिए यू.एस. गयी हुयी हैं। अब कुछ ही दिनों में लौटने वाली होंगी। जब आएॅगी तभी आऊॅगी मैं भी। दमयन्ती अरोरा से अपनी छुट्टी की बात करना बहुत ज़रूरी है और मैं प्रिंसिपल रूम के बाहर आ कर खड़ी हो गयी थी। जिस जगह मैं खड़ी हूं वह बराम्दे के अन्त में एक तिरछा कोना है, थोड़ा धुंधलके में सिमटा हुआ। वहॉ खड़े हो कर मैं दमयन्ती अरोरा के प्रिंसिपल रूम में लौटने का इंतज़ार करने लगी थी।

धूप के बड़े बड़े खंडों में पसरा एडमिस्ट्रेटिव ब्लाक का बड़ा सा बराम्दा, बहुत उॅची सीलिंग, दूर दूर पर बने थमले और उन थमलां के नीचे परछांई की तिरछी रेखाए। दूर पर साईंस का एक ब्लाक और बन रहा है। इसके अलावा कामर्स फैकल्टी की बिल्डिंग में एक मंज़िल और बनायी जा रही है। बड़े स्तर पर कन्स्ट्रक्शन वर्क चल रहा है। कैसी स्पंदनयुक्त सस्ंथा थी यह,ज़िदा धड़कनों मे धड़कती हुयी। दमयन्ती,मिसेज़ चौधरी और गुप्ता ने तो इसे इमारतों मे बदल कर रख दिया।

अंधेरे की उन रेखाओं के बीच बीच में धूप के बड़े बड़े चमकते टुकड़े। तभी बराम्दे के अंत में दमयन्ती अरोरा,मिसेज़ चौधरी और गुप्ता दिखे थे। शायद वे लोग राउॅण्ड ले कर लौट रहे हैं। धूप के उन झिलमिलाते खंडों पर बनती और आगे बढ़ती उनकी बहुत लंबी दानवीय सी परछॉईयॉ और उनके आगे बढ़ते कदम...जैसे पैरों से रौंदे जाते यादों के बिम्ब।

अचानक कालेज में अपना पहला दिन ऑखों के आगे घूमने लगता है जब मैं यहॉ नौकरी करने के लिये पहले दिन आयी थी और मंत्र बिद्ध सी काफी लंबे क्षणों के लिए प्रिंसिपल आफिस के बाहर इसी जगह खड़े हो कर इस कारिडॅार को निहारती रही थी। बॉए हाथ को बने कमरे के भीतर लैदर की बड़ी सी कुर्सी पर बैठी कोमल सी दीपा दी,जैसे पूरी दिखायी ही न दे रही हों। उस याद से ऑखों में पानी भरने लगता है।

इस एडमिस्ट्रेटिव ब्लाक के पीछे बॉए हाथ को आर्ट्स फैकल्टी की बड़ी सी बिल्डिंग बनी हुयी है जिसे मुख्य भवन ने छिपा कर रखा हुआ है। मैं उसी कोने में चुपचाप खड़ी रही थी। तभी माला गुप्ता और नीना आते हुए दिखे थे। मुझे देख कर दोनों रुक गए थे,‘‘अरे अम्बिका दी आप कल आयी क्यों नहीं थीं ?’’नीना ने पूछा था।

‘‘बहुत ही बढ़िया प्रोग्राम हुआ था। फ्रैशर्स नें वैस्टर्न और इण्डियन म्यूज़िक के फ्यूशन पर दोनों तरह के डॉस का प्रोग्राम दिया था। बहुत ही अच्छा किया,एकदम प्रोफेशनल परफैक्शन के साथ।’’माला ने बताया था।

‘‘पर दीदी आप क्यों नहीं आयी थीं?’’नीना ने अपना सवाल दोहराया था।

मैंने उसकी तरफ देखा था। जवाब मुॅह तक आया था तभी लगा था कि क्या करुंगी उसे बता कर। यह दोनो तो दीपा दी को जानती तक नहीं। कालेज में दोनो ही पिछले साल ही तो आयी हैं। इन दोनो को कुछ पता नही। मतलब पिछले दिन स्टाफ में उस बारे मे कोई बात भी नहीं हुयी क्या। शायद वैसा कोई प्रसंग ही नहीं आया होगा। या फंक्शन की हबड़ तबड़ मे साथ बैठना ही नहीं हुआ होगा। तब भी।

वह दोनो फिर से फ्यूशन डॉस की बात करने लगी थीं। मुझे अजीब लगा था सोच कर। यहॉ विद्यालय के मंच पर पाश्चात्य और भारतीय संगीत पर नाचते थिरकते बच्चे और वहॉ दीपा दी की देह को अग्नि दी जा रही थी। वही समय तो रहा होगा।

मुझे वहॉ खड़े देख कर कुछ और लोग भी रुक गये थे,‘‘अम्बिका क्या हुआ था दीपा दी को ? अभी कुछ दिन पहले ही तो एक शादी में मिली थीं। एकदम ठीक लग रही थीं।’’ रूपाली बत्रा ने कहा था।

‘‘तुम गयी थीं उनके घर?’’ अंजलि ने पूछा था।

‘‘हमने भी सोचा था कि शाम को जॉए उनके घर। पर वहॉ हमें कोई तो पहचानता नहीं। क्या करते जा कर? किससे मिलते वहॉ।’’ रूपाली ने जैसे सफाई दी थी।

‘‘वैसे भी दीपा दी ने शादी तो की नही थी।’’ किसी और ने टिप्पणी की थी।

‘‘वह तो अपने भाई के साथ रहती थीं।’’ रुपाली ने बात पूरी की थी।

दमयन्ती अरोरा को कमरे में जाते देख कर मैं सब को छोड़ कर उधर की तरफ बढ़ ली थी। कमरे में कंधे पर कैमरा और झोला लटकाए फोटोग्राफर खड़ा है। सामने की मेज़ पर कल के कार्यक्रम की बहुत सारी तस्वीरें फैली हुयी हैं।

मुझे देख कर दमयन्ती अरोरा ने मुझे बैठने का इशारा किया था, ‘‘बैठो अम्बिका।’’ उन्होने बहुत ही कोमल स्वर में कहा था फिर दूसरे ही क्षण फोटोग्राफर की तरफ देखा था, ‘‘मिस्टर सेठ प्लीज़ आप फिर आ जाईएगा। अभी थोड़ी व्यस्त हूं।’’ और उन्होंने सामने फैली सारी तस्वीरें एक गठ्ठर में समेट कर एक किनारे को रख दी थीं। वे कुछ क्षण तक गर्दन एक तरफ को डाले सोचती रहीं थीं जैसे कुछ समझ न पा रही हों कि अपनी बात कहॉ से शुरु करें। फिर उन्होने मेरी तरफ देखा था,‘‘दीपा दी को क्या हो गया था अम्बिका?’’ उनके स्वर में दुख है।

मेरा बात करने का मन नही करता पर जवाब तो देना ही है। मुझे लगा था मेरे सीने से उठ कर ऑसू का एक बगूला जैसे गले में अटक गया हो। पर मैंने अपने आप को पूरी तरह से संभाल लिया था,‘‘पता नहीं। सुबह नाश्ता कर के लेट गयी थीं। फिर उठी ही नहीं।’’ सीधा सा सपाट स्वर। उसमें कोई उतार चढ़ाव नहीं। मैने उनकी तरफ देखा था। मन में आया था कि यह जो मेरे सामने बैठी हैं इनसे मेरा कोई रिश्ता नहीं। इनसे दीपा दी का भी कोई रिश्ता नहीं था। इन से अपनी वेदना बॉट कर मैं दीपा दी की याद का अपमान नही कर सकती।

‘‘क्रिमेशन कल किया गया ? आलमोस्ट चौबीस घण्टे बाद ?’’

‘‘हॉ उनकी बहन ने रुकने के लिए कहा था। उनके पहुचने का इंतज़ार किया गया।’’

गर्दन नीचे की तरफ डाले हुए दमयन्ती अरोरा बहुत देर से चुप हैं। मैं भी चुपचाप बैठी हूं। तभी उन्होंने मेरी तरफ देखा था। लगा था उनके स्वर में ऑसू तैर गए थे, जैसे माफी मॉग रही हों,‘‘मैं कल टीचर्स डे का फंक्शन नहीं कराना चाहती थी अम्बिका। दीपा दी की डैथ की ख़बर हमे चार तारीख को कालेज बंद होने से पहले मिल गयी थी।’’ वे जैसे सफाई दे रही हों,‘‘पर मैनेजमैंण्ट ने छुट्टी करने की परमिशन ही नही दी। कह दिया गया कि केवल एक्टिव स्टाफ के निधन पर ही छुट्ट्ी की जा सकती है। कह दिया गया कि कोई भी कार्यक्रम टाला या कैंसिल नही किया जाएगा।’’वे थोड़ी देर के लिए चुप हो गयी थीं...बोलीं तो उनके स्वर में स्पष्ट रोष है,‘‘दीपा दी कोई साधारण स्टाफ नही थीं। फिर भी...फिर भी।’’ उन्होने अपने सिर को हताशा में हिलाया था। बाऐं हाथ की तरफ मेज़ पर बने शैल्फ से उन्होने अपना क्लैस्प पर्स उठाया था। उसे खोल कर उसमें से रूमाल निकाला था और अपनी आंखों की कोरों पर रूके हुए ऑसू वहीं सुखा लिए थे,‘‘छुट्ट्ी की कौन कहे...मैं तो दो मिनट का मौन भी नही करा सकी। अड़तिस साल रहीं वे यहॉ...बाईस साल प्रिंसिपल रहीं। वह भी इस सैक्शन की पहली प्रिंसिपल...और कालेज में एक कान्डोलैन्स तक नहीं।’’

मैं चुप ही रही थी। वैसे भी मैं कह ही क्या सकती थी।

Sumati Saxena Lal.

Sumati1944@gmail.com

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