प्राचीन खजाना और डायनासोर का बच्चा - 5

प्राचीन खजाना
और
डायनासोर का बच्चा
भाग ५

--हजारों साल पूर्व--

"सुवर्ण के तेज़ से बचना और वास्तविकता के प्रकाश को अपनाकर चलना अन्यथा काल से तुम्हारा नाम जुड़ जाएगा।" एक बड़े से पेड़ के नीचे कुछ छात्रों को एक गुरुजी शिक्षा दे रहे है।

"गुरुजी, ये काल क्या है?" सबसे पीछे की पक्ती में बैठे एक शिष्य ने पूछा।

"पुत्र कपाली, यहां पर काल अपशुकन है। बुराई है। कभी कभी जो चीजें हमें दिखती है वह वास्तविक में नहीं होती। जिसमें अमानवीयता वास करती हो उससे जुड़ी चीजें हमेशा तुम्हें इस काल में फंसा देगी। तो इससे दूर रहना।" गुरुजी ने कहा।

"ठीक है, गुरुजी।" उस शिष्य कपाली ने उत्तर दिया।

कुछ देर बाद भोजन का समय हो गया तो सभी छात्र भोजन करने के लिए निकले। कपाली भी जाने के लिए उठा पर गुरुजी ने उसे रोक लिया और अपने साथ आने को कहा। कपाली उनके साथ चल पड़ा। गुरुजी आश्रम से थोड़ी दूर एक झरने के पास उसे ले गए और एक बड़े से पत्थर पे बैठकर कपाली को उनके सामने वाले दूसरे पत्थर पर बैठने को कहा। कपाली बैठ गया।

"कपाली, आज मैं तुम्हें एक बहुत ही जवाबदारी का कार्य सौंपने जा रहा हूं। आशा है की तुम मुझे निराश नहीं करोगे।" गुरुजी ने हस्ते चेहरे के साथ अपनी बात कपाली से कही।

"मैं वादा करता हूं, गुरुजी, आपको निराश होने का मौका ही नहीं दूंगा।" १० वर्ष के कपाली ने एक योद्धा के माफिक पूरे आत्मविश्वास से कहा और गुरुजी को खुश कर दिया।

"मुझे तुमसे यही आशा थी। लेकिन यह कार्य बहुत अलौकिक, अविश्वसनीय और कठिन है। तुम्हें मुझे वचन देने से पहले इस कार्य के बारे में पूछ लेना चाहिए था।" गुरुजी ने कहा।

"गुरुजी, आप ही कहते है की माता पिता और गुरु की वाणी देववाणी होती है और देववाणी से सभी का भला ही होता है तो फिर मैं क्यों प्रश्न करू।" कपाली ने फिर प्रशंसनीय उत्तर दिया।

"तुम में एक राजा बनने के सारे गुण है, पुत्र कपाली।" गुरुजी ने कहा।

"किन्तु मैं तो किसी भी राजा का पुत्र नहीं हूं, गुरुजी। मैं तो केवल इस छोटे से गांव का एक छोटे परिवार का छोटा सा बालक हूं।" कपाली ने मासूमियत से कहा। जिसे सुन गुरुजी हसने लगे।

"पुत्र कपाली, राजा बनने के लिए राजा का पुत्र होना आवश्यक नहीं है। और, राजा सिर्फ वो नहीं होता जिसका महल हो, सिंहासन हो, मुकट हो और बड़ा दरबार हो। राजा वो होता है जिसको देख मान और सम्मान से सिर अपने आप झुक जाए, जिसके आने पर लोग अपने दुख और पीड़ा भूल जाए और जिसके होने से हर भय दूर हो जाए। तुम भी राजा हो, कपाली। कब क्या हो जाए कोई नहीं जानता।" गुरुजी ने कहा। फिर वे पत्थर से उतरे और झरने के पास गए। झरने में थोड़ी दूर तक जाने के बाद वे आंखे बंध कर पानी में उतर गए। कपाली वहीं किनारे पर बैठ देख रहा था।

कुछ देर बार गुरुजी पानी से उपर आए लेकिन इस बार उनके दोनों हाथों में एक बहुत बड़ा अंडा था। यह अंडा कपाली जितना बड़ा था और जिसे देख कपाली के तो मानो होंश ही उड़ गए।

अंडा काफी अलग था। उसकी परत काफी चौड़ी थी। मजबूत थी। सोनेरी रंग का था मगर काफी पुराना लग रहा था। गुरुजी किनारे पर आकर अंडा कपाली के सामने रखते है।

"यह क्या है, गुरुजी?" कपाली पूछता है।

"यह सुवर्ण से बना हुआ अंडा है। जो मुझे यहां से थोड़ी दूर कपाट घाटी की एक गुफा से मिला है। वहां ढेर सारा खजाना था मगर मुझे इस अंडे को ही लाना पड़ा।" गुरुजी ने कहा।

"क्यों, गुरुजी?" कपाली ने पूछा।

"भला हम खजाने का क्या करेंगे। और वैसे भी हमें अपने जीवन निर्वाह के लिए जरूरी धन और भोजन मिल ही जाता है तो ज्यादा की लालच क्यों करे।" गुरुजी ने कहा।

"तो फिर आप यह सोने का अंडा क्यों लाए, गुरुजी?" कपाली ने पूछा।

"क्योंकि इस अंडे में एक जीवन है, एक जीव इसमें अपनी सांसें ले रहा है। तुम भी सुनो।" गुरुजी ने कपाली को नजदीक आने के लिए कहा। पहले तो कपाली डर रहा था पर फिर उसने अंडे पर अपने कान लगाए तो अंदर से किसी के सांस लेने की आवाज आई जो काफी गहरी और भारी थी।

"गुरुजी, इसमें कोनसा जानवर हो सकता है?" कपाली ने पूछा।

"वो मैं तुम्हें अभी नहीं कह सकता।" गुरुजी ने कहा।

"ठीक है, गुरुजी। अब बताए की मुझे क्या करना है?" कपाली ने पूछा।

"पुत्र कपाली, मुझे क्षमा कर देना की मैं तुम्हें इतनी कम आयु में ऐसा खतरनाक और कठिन कार्य सौंप रहा हूं मगर मेरे पास कोई और विकल्प नहीं है। तुम्हें इस अंडे का ख्याल रखना है और ध्यान रखना है की इसमें रहा जीव बाहर न आए। मुझे लगता है की यह जीव कई साल पुराना है मगर इसकी हम मनुष्यों के बीच रहने की अवधि समाप्त हो चुकी है। अगर यह जीव बाहर आया तो हो सकता है की संपूर्ण मानव जाति ही नष्ट हो जाए। तो, तुम्हें ये किसी भी हाल में नहीं होने देना है।" गुरुजी गंभीर होकर कहते है।

"ठीक है गुरुजी। लेकिन एक प्रश्न है मन में। मैं ही क्यों?" कपाली पूछता है।

"क्योंकि मुझे लगता है की मेरे आश्रम का एक शिष्य डाकुओं से जा मिला है और वे इस खजाने के पीछे अवश्य जाएंगे। और, मैं कल सुबह सूर्योदय होने से पहले ही अखंड तपस्या में लीन हो जाऊंगा और फिर कब तपस्या से बाहर आऊंगा कह नहीं सकता। तोह, सिर्फ तुम्हीं हो जिस पर मुझे पूरा विश्वास है।" गुरुजी कहते है।

"क्या हम इस अंडे को नष्ट नहीं कर सकते, गुरुजी?" कपाली पूछता है।

"नहीं पुत्र। हम किसी की हत्या नहीं करते। हमें नहीं पता इसमें किस तरह का जीव है। हां, अगर ये कोई दानव हुआ तो इसे नष्ट कर देना। क्योंकि वो हत्या नहीं वध होगा। अब तुम इसे छोटा कर दो। फिर ऐसी जगह रखना की किसीको पता ही न चले। मैं तुम्हें एक मंत्र देता हूं जिससे तुम इसे जब चाहे इसका कद अपनी इच्छा के मुताबिक कम - ज्यादा कर सको।" कहकर गुरुजी कपाली के कान में मंत्र बोलते है। कपाली उस मंत्र का प्रयोग कर उस अंडे को छोटा कर देता है। फिर गुरु और शिष्य आश्रम लौट जाते है।

मध्यरात्रि का समय था। आश्रम में सब सो रहे थे की अचानक सबके चिल्लाने की आवाज सुनाई देने लगी। घोड़ों के पैरो की, लोगों के चीख और चिल्लाने की आवाज से गुरुजी की नींद खुल गई। वे अपनी कुटिया से बाहर आकर देखते है तो चौंक उठते है। वे देखते है की डाकुओंने आश्रम पर हमला कर दिया है। डाकू सबको मार काट रहे है।

तभी डायनासोर का एक बच्चा गुरुजी के सामने आता है। गुरुजी पहली बार इस जानवर को देख रहे है और सबसे ज्यादा चौंका देने वाली बात यह थी की इस डायनासोर के बच्चे की सवारी ओर कोई नहीं बल्कि कपाली कर रहा था। कपाली के हाथ में टूटा हुआ सोने का अंडा था जिसे वो गुरुजी पर फेंकता है।

गुरुजी उस टूटे हुए सोने के अंडे को हाथ में लेकर समझ जाते है की उनके सामने खड़ा भयानक जानवर जो एक डायनासोर का बच्चा है वही इस अंडे से बाहर आया होगा।

"आया होगा नहीं, बुड्ढे, मैंने इसे इस अंडे से निकाला है। अब यह मेरा पालतू और वफादार है।" गुरुजी के मन की बात सुनकर कपाली बोलता है और जोर जोर से हंसने लगता है।

"अब इसका क्या करना है, सरदार?" एक डाकू खून से लद तलवार हाथ में लिए कपाली के पास आकर गुरुजी के सामने गुस्से से देखते हुए कपाली से पूछता है।

"कुछ मत करो। वैसे भी मेरे प्यारे गुरुजी थोड़ी ही देर में गहरी तपस्या में लीन हो जाएंगे और पता नहीं कब वापिस आएंगे। वैसे भी अब इनके पास पाने के लिए न कुछ है और न ही खोने के लिए कुछ है। तो रहने दो इन्हे यहीं। हमें उस खजाने के लिए जाना है। खजाने के बाद यह सारा संसार हमारा गुलाम होगा।" सारे डाकू कपाली के आदेश से चीखते चिल्लाते उत्सव मनाते दूसरी ओर जाने लगे।

गुरुजी ने देखा की सारा आश्रम तहस नहस हो चुका है। खून की नदी सी बह गई है। आश्रम के सभी लोग मृत हालत में जमीन पर पड़े है। सबको इस हालत में देख गुरुजी क्रोधित हो उठते है।

"आपने कहा था ना की मैं राजा बन सकता हूं। तो लीजिए मैं बन गया राजा।" कपाली बोलता है।

"विश्वासघाती।" गुरुजी चिल्लाते है। "तुम राजा नहीं हो। तुम चोर हो। तुम लुटेरे हो। तुम डाकू हो। तुम काल हो।" कहकर गुरुजी अपनी आंखे बंध कर वहीं बैठ जाते है।

डायनासोर का बच्चा यह देख जोर से चीखता है। दहाड़ लगाता है। कपाली उसे दूसरी ओर जाने के लिए इशारा करता है जिस ओर उनकी डाकू की टुकड़ी गई है और डायनासोर का बच्चा तेजी से उस ओर दौड़ पड़ता है।

To Be Continued...



अस्वीकरण:-
इस कहानी में दर्शाए हुए सभी पात्र, स्थान एवं घटनाएं काल्पनिक है और इसका किसी भी जीवित या मृतक व्यक्ति, स्थल, वस्तु या घटना से कोई संबंध नहीं है। इस कहानी का उद्देश्य केवल और केवल मनोरंजन है।

Rate & Review

Rohini Raahi Parmar
Vaibhav Surolia

Vaibhav Surolia Verified User 5 months ago

next part jaladi sa lao

Ratan Porwal

Ratan Porwal 5 months ago

Mehul Katariya

Mehul Katariya 5 months ago

Ria

Ria 5 months ago