30 Shades of Bela - 27 in Hindi Social Stories by Jayanti Ranganathan books and stories PDF | 30 शेड्स ऑफ बेला - 27

30 शेड्स ऑफ बेला - 27

30 शेड्स ऑफ बेला

(30 दिन, तीस लेखक और एक उपन्यास)

Day 27 by Shuchita Meetal शुचिता मीतल

गवाही दे रहा है चांद

आशा चौंककर अपने मन की भूलभुलैया से बाहर आई।

''हां, क्या कह रही थीं, दीदी? सॉरी, ध्यान ज़रा भटक गया था,'' आशा ने संभलते हुए कहा।

नियति ने ग़ौर से उसके चेहरे को देखा। उसकी प्यारी, नटखट, पहाड़ी नदी सी चंचल बहन कब और कैसे इस धीर-गंभीर औरत में बदल गई थी! नियति ने तो कभी उसके मन की थाह लेने की कोशिश ही नहीं की थी। बस अपने में, अपने रंगों में मगन रही। बचपन से अम्मा, पुष्पेंद्र की मां, को उसने अपनी मां ही माना था। इसलिए जब उन्होंने पुष्पेंद्र के लिए उसका हाथ मांगा तो बिना कुछ सोचे, बस हमेशा उनके साथ रहने की गरज़ से वो ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो गई। सोचा ही नहीं कि पुष्पेंद्र के लिए उसके मन में क्या है, या कि आशा को भी वो पसंद हो सकता है। कैसी नादान थी वो भी! इतना भी नहीं जानती थी कि शादी गुड्डे-गुड़िया का खेल नहीं होती। लेकिन पुष्पेंद्र को भी तो सोचना चाहिए था! मां ने कहा तो नियति से शादी कर ली। नियति ने कहा तो आशा से संतान को जन्म देने को तैयार हो गए। उसने भी कभी जानना नहीं चाहा कि पुष्पेंद्र क्या चाहते हैं, वो तो अम्मा के संग-साथ में ही रमी रही। नियति ने गहरी सांस ली। शायद अब उसे ही कोई क़दम उठाना होगा।

''आशा, तुम तो जानती हो मैं मन से कभी पुष्पेंद्र से जुड़ नहीं पाई थी। मैंने फिर भी इस रिश्ते को संभालने की पूरी कोशिश की। राहुल मेरा प्यार नहीं था, मेरा सहारा था। उसके जाने के बाद कभी मन नहीं हुआ कि किसी और से जुड़ूं। अब मुड़कर देखती हूं तो पाती हूं कि शायद मैं ही दोषी थी। मैंने न तुम्हें समझा, और न पुष्पेंद्र को। मगर ख़ुद को भी कहां जाना था मैंने! कहीं न कहीं हम सबसे ग़लती हुई थी, और अब शायद उसे सुधारने का वक़्त आ गया है।''

आशा का दिल धक से रह गया। कौन सी ग़लती सुधारना चाहती हैं नियति दी? क्या एक बार फिर ज़िंदगी उसे बियाबान में लाकर छोड देने वाली है?

मगर नियति तो कह रही थी, ''अघोरी बाबा बहुत दिनों से चाहते थे कि मैं दीक्षा ले लूं और गृहस्थ जीवन को पूरी तरह त्याग दूं। अब मैंने तय कर लिया है उनकी राह पर चलूंगी। मगर जाने से पहले मैं चाहती हूं कि तुम्हें तुम्हारा हक़ मिल जाए। तुम्हारे और पुष्पेंद्र के रिश्ते को एक नाम मिल जाए। हमारी बच्चियों को उनका पिता मिल जाए। तुम्हें और पुष्पेंद्र को जीवन की सांझ में ही सही, मगर एक-दूसरे का साथ मिल जाए। क्या तुम पुष्पेंद्र से शादी करोगी, आशा?''

नियति ने आज़िज़ी से आशा के हाथ थाम लिए। उसकी आंखों में अनकही सी याचना थी, एक हूक थी। यही उसका मोक्ष था।

पनीली आंखों से आशा ने उसके हाथ थाम लिए। दोनों बहनों ने देख लिया था कि दरवाज़े पर खड़ा एक साया धीरे से मुड़कर वापस अंदर चला गया था। पुष्पेंद्र थे।

दोनों बहनें देर तक ऐसे ही एक-दूसरे के मन को छूती बैठी रहीं, अचानक किसी कार के रुकने की आवाज़ दोनों को यथार्थ में लौटा लाई। गेट खुला और पहले पद्मा और पीछे-पीछे रिया को गोद में लिए समीर अंदर आ रहा था। इन्हें तो सुबह आना था!

सोई रिया जग न जाए, इसलिए हाथ से चुप रहने का इशारा करते हुए समीर अंदर चला गया। पद्मा वहीं रुक गई। समीर की रिक्वेस्ट पर एयरलाइंस ने उन्हें पहली फ़्लाइट में सीट दे दी थी।

कुछ ही पल बाद हाथ में एक पैकेट लिए बेला भी बाहर आ गई। वो जल्दी से जल्दी लॉकर में मिला पत्र बेला को सौंप देना चाहती थी। उसे देखकर पद्मा दौड़कर उसके गले लग गई और फिर सहारा देकर बाहर लाई। दोनों बहनें बरामदे के खंभों से पीठ टिकाकर मुंडेर पर आमने-सामने बैठ गईं। बेला ने ख़ामोशी से पैकेट पद्मा को थमा दिया। उसके मन में ढेरों सवाल थे, रिचर्ड कौन था? क्या हुआ था पद्मा की ज़िंदगी में, अब वो क्या करेगी? लेकिन पहले पद्मा पढ़ तो ले माइक का ख़त...

पद्मा ने जल्दी से ख़त खोला और सबकी ओर से पीठ करके एक सांस में पढ़ गई। वो नहीं चाहती थी कि उसके चेहरे पर बनते-बिगड़ते जज़्बाती रंगों को कोई देखे। पढ़कर कुछ पल वो ठगी सी बैठी रही। फिर उसने धीरे से बेला से कहा, ''दीदी, लाइट बंद कर दोगी?'' बेला ने चुपचाप बरामदे की स्काई लाइट बंद कर दी और चारों स्त्रियां रात के गुमसुम से अंधेरे में कहीं जुड़ती तो कहीं छिटकती सी बैठी रहीं।

खंभे से लगी बेला ने नज़र उठाकर आसमान को देखा। पूर्णमासी का चांद अपनी पूरी ख़ूबसूरती के साथ आसमान में इठला रहा था। चांद के पास एक नन्हा सा तारा जैसे रात का डिठौना बना हुआ था। हल्की-हल्की हवा के झोंकों के साथ उठती मोंगरे और रात की रानी की महक ने अजीब सी ख़ुमारी पैदा कर दी थी। चारों महिलाओं के मन में उठ रहे ज्वारभाटे से बेख़बर चांदनी लॉन में पसरी हुई थी।

''डैड मुझे बहुत प्यार करते थे। मां के हमें छोड़कर वापस आ जाने के बाद वो टूट गए थे,'' पद्मा की उदास आवाज़ उभरी। ''वो चाहते थे कि किसी भी तरह मुझे अपने पास रोककर रख लें। मैं कभी उनकी नज़रों से दूर न होऊं, इसीलिए उन्होंने अपने ऑफ़िस में काम करने वाले रिचर्ड को गाहे-बगाहे घर बुलाना और मुझसे मिलवाना शुरू कर दिया। रिचर्ड लंबा, ख़ूबसूरत था, उसकी नीली आंखें समंदर सी गहरी और तन्हा थीं। कुछ मुलाक़ातों के बाद रिचर्ड और मैंने शादी कर ली। मगर मेरा मन अशांत था, जैसे कोई डोर मुझे खींचती रहती थी। फिर एक दिन मैं बिना कुछ कहे चुपचाप भारत आ गई। मुझे पता था मां बनारस में हैं। मां के पास गई, लेकिन पुष्पेंद्र अंकल के साथ मां की नज़दीकी, डैड से उनकी बेवफ़ाई मैं बर्दाश्त नहीं कर पाई और कब ड्रग्स में डूबती गई, मुझे पता ही नहीं चला।''

सब स्तब्ध थे। सबके मन में एक ही बात थी कि हमारे क़रीबी लोगों की ज़िंदगी में कितना कुछ घटता रहता है, और हम जान भी नहीं पाते। पद्मा आगे कह रही थी।

''मैं नहीं जानती डैड ने ये सब चीज़ें यहां लॉकर में कैसे पहुंचवाईं। हां, कृष को लेकर मैं एक बार उनसे मिलने गई थी। उन्होंने बताया था कि मेरे वापस आने के बाद रिचर्ड ने किसी और से शादी कर ली थी और अपनी नई ज़िंदगी में वो ख़ुश था। यह देखकर उन्हें अच्छा लगा था कि कृष मेरा कितना ध्यान रखता है। वो चाहते थे कि हम वहीं बस जाएं उनके पास। हमने शादी नहीं की थी, लेकिन कृष ने मुझे अपनी पत्नी मान लिया था। मगर जब मुझे कृष और बेला दीदी के बारे में पता लगा तो मेरा मन उखड़ गया था। मैं ख़ुद को उससे दूर करने की कोशिश में यहां चली आई। दूर रहकर मैंने जाना कि कृष मेरे लिए क्या था। उसने मेरी ज़िंदगी को एक मायना दिया था।'' बेला के अंदर एक टीस सी उठी। क्या उनकी क़िस्मत में भी मां और मौसी की तरह एक ही इंसान को चाहना बदा था!

उधर पद्मा के शब्दों में अजीब सी दृढ़ता आ गई थी। ''मगर जो हुआ सो हुआ। अगर कृष को कोई एतराज़ नहीं है तो मैं अपने बच्चे के लिए, और डैड की इच्छा पूरी करने के लिए एक बार फिर कोशिश करूंगी।''

पद्मा चुप हो गई। आशा ने उठकर उसे गले लगा लिया। मां-बेटी के गिले-शिकवे घुलने लगे थे। बेला ने ख़ुद को संभाला। अपने स्वर में भरसक उत्साह भरते हुए उसने कहा, ''अरे, अब रोना-धोना बहुत हुआ! बहुत काम है। एक शादी की तैयारी जो करनी है!''

''एक नहीं, दो की,'' नियति का शांत-संयत स्वर गूंजा।

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