विष कन्या - 3 in Hindi Novel Episodes by Bhumika books and stories Free | विष कन्या - 3

विष कन्या - 3

       आगे हमने देखाकि आने वाला युवान अपनी पहेचान बताते हुए कहता  है कि में महान वेदाभ्याशी वेदर्थी का पुत्र मृत्युंजय हूं ओर इस बात को प्रमाण देते हुए एक अंगूठी राजगुरु सौमित्र के हाथ में देता है। फिर महाराज राजगुरु से वेदर्थी के बारे में पूछते है तो राजगुरु बताते हे की वो गुरुकुल मे साथ थे ओर परम मित्र थे , ओर फिर कैसे वो सोनगढ़ के प्रधान आचार्य बने ओर उनके साथ षडयंत्र करके उन्हे राज द्रोही प्रमाणित कर दिया गया अब आगे.......


       राजगुरु इतने व्यथित हो गए है कि अब वों आगे बोल नहीं सकते थे। मृत्युंजय ने आगे की बात बताना शुरू किया.....


        षडयंत्र  की जाल बहुत सोच समजमर बूनी गई थी। ओर  पिताजी उसमे फंस चुके थे। उनको सोनगढ़ के राजा को मार ने के षड्यंत्र का दोषी करार कर के  राजद्रोह का इल्ज़ाम लगाकर  कारावास मे डाल दिया गया। मेरी मां को भी राजद्रोही की पत्नी मान कर राज्य से बाहर निकाल दिया। तब में अपनी मां की कोख में था। इस अवस्था में मेरी मां ने दर दर की ठोंकरे खाई लेकिन किसी भी राज्य ओर नगर ने उनको सहारा नहीं दिया।


        तब जंगल के एक वनवासी कबिलेने मां को सहारा दिया। वही उस काबिले में ही मेरा जन्म हुआ ओर मेरे जन्म के समय ही मां स्वर्ग सिधार गई। मृत्युंजय के चहेरे पर पीड़ा साफ दिखाई दे रही है। फिर उसने तुरंत अपने आप को संभाल लिया ओर आगे बात कहना शुरू किया।


       गुरुकुल के कुछ शिष्य जो तन मन धन से पिताजी को अपना गुरु मान ते थे उनसे ये बात सही नहीं गई। उन्होंने पूरे षडयंत्र का पता लगाकर सच्चाई सोनगढ़ के राजा के सामने रखदी ओर सही गुनहगार को दुनिया के सामने खड़ा कर दिया। ओर वो षडयंत्रकारी कोन थे महाराज से पूछे बिना रहा नहीं गया। गुरुकुल के एक आचार्य ओर सोंगढ़के राजा का एक मंत्री। 


       महाराज को ये सुनकर बड़ा विस्मय हुआ, खुद राजा के राज्य के मंत्री ओर आचार्य ही राजा को मार ने का षडयंत्र करे तो फिर राजा ओर राज्य कैसे सुरक्षित रहेंगे। ये बात तो सचमे पीड़ा देने वाली ओर सोचने वाली है। वो थोड़ी देर मौन रहे। फिर क्या हुआ मृत्युंजय आगे की बात बताओ उन्होंने कहा।


       मेरे पिता निर्दोष थे उन्हे रिहा कर दिया गया ओर उनके सर से सारे इल्ज़ाम खारिज कर दिए गए। सोनगढ़ के राजा ने उनसे माफी मांगी और फिर से अपने पद पर वापस आने केलिए बिनती की लेकिन पिताजी ने मना कर दिया। राजा ने हाथ जोड़कर मिन्नते की लेकिन पिताजी का मन अब इन सब चीजों से उठ चुका था। उन्होंने राज्य छोड़ दिया ओर गुरुकुल का प्रधान आचार्य पद भी। बोलते बोलते मृत्युंजय खामोश हो गया। पूरे कक्ष में सिर्फ ओर सिर्फ खामोशी ही थी।


       थोड़ी देर बाद राजगुरु ने अपने आपको संभाला और आसन से उठकर मृत्युंजय के पास गए । उनकी आंखों मे कही प्रश्न साफ साफ दिखाई दे रहे थे। 


       उन्होंने बोलना शुरू किया। जब मुझे पता चला कि वेदर्थी निर्दोष प्रमाणित हो गया है तब मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। में उस से मिलने के लिए सोनगढ़ पहुंच गया पर वहा जाके मुझे पता चला कि वो सब कुछ त्याग के  वहा से जा चुका था। मैने वर्षो तक उसे ढूंढ नेकी बहुत कोशिश की लेकिन मुझे फिर कभी उसका पता नहीं चला। राजगुरु का मे मन पीड़ा से भर गया था। मुजे हमेशा दिल में इस बात की पीड़ा रही की मेरे मित्रने मुझ से  एक भी बार मिलना या संदेश करना भी उचित नहीं समझा।


       मृत्युंजय वो कहां था, किस हाल में था, इतने वर्षो उसने क्या किया। राजगुरु के शब्दों में अपने मित्र के प्रति दिल में उठ रही पीड़ा ओर नाराजगी साफ साफ दिखाई दे रही थी। वो ये जान ने केलिए व्याकुल थे कि इतने वर्षो तक उनका मित्र किस हाल में था।


       पिताजी ने तन मन धन से सोनगढ़ के राजा, राज्य ओर गुरुकुल के प्रति सदैव अपना दायित्व निष्ठा से निभाया उसके बावजूद जो हुआ उसके बाद उनका मन द्रवित हो गया था। ऊपर से जब उनको पता चला कि मां की मृत्यु किस हालत में हुई तो उनका मन सबके प्रति रोष से भर गया।


       एसा राज्य ओर समाज जो एक गर्भवती स्त्री का रक्षण ओर पोषण ना कर सके वो रहने के योग्य नहीं होता। इस लिए उन्होंने सोनगढ़ रज्यका, उसके राजा का ओर कहे जाने वाले सभ्य समजका त्याग कर दिया। 


       कुछ शिष्य जिन्होने पिताजी को बेकसूर प्रमाणित करने में योगदान दिया था उन्होने पिताजी को मेरे बारे में बताया। पिताजी मुझे लेकर दूर हिमालय की घाटी में जाकर वहा के वनवासी लोगो के साथ बस गए। उन्हों ने महसूस किया कि राजा ओर नगरके लोगो से उनकी ज्यादा जरूरत इन वनवासी प्रजा को थी। ओर ये अनपढ़ और असभ्य कहे जाने वाले वनवासी सिर्फ कहे जाने वाले सभ्य लोगो से ज्यादा समजदार ओर वफादार थे। 


       पिताजी ने सारी उम्र हिमालय की पहाड़ियों में मिलने वाली औसधी ओर जड़ीबुटी पर संशोधन किया ओर वनवासियों की सेवा की। उन्हों ने उन वनवासी प्रजा को थोड़ा बहुत वेदों के बारे में ओर धर्म के बारे में ज्ञान भी प्रदान किया। वो वनवासियों के बच्चो को आयुर्वेद ओर जड़ीबुटी के बारे में भी ज्ञान देने लगे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगो को सही उपचार ओर मदद मिल शके।


       राजगुरु बीच मे ही बोल पड़े सब किया पर क्या कभी उसे अपने मित्र की याद नहीं आई???


क्रमशः


 

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