रामधारीसिंह 'दिनकर' की सांस्कृतिक चेतना

संस्कृति के चार अध्यायः रामधारीसिंह 'दिनकर' की सांस्कृतिक चेतना

डॉ. के0वी०एल० पाण्डेय

ओज, राष्ट्रीयता और निर्भीक वैचारिकता के कवि दिनकर अपनी कविता में भावपरकरता के आधार पर जिस सांस्कृतिक चेतना से प्रेरित हैं वही उनकी महत्त्वपूर्ण कृति 'संस्कृति के चार अध्याय में विवेचन और विश्लेषण के रूप में प्रस्तुत है। यह ऐसा समाज शास्त्रीय इतिहास है जिसमें तटस्थता और वस्तुपरकता से निकले निष्कर्षोकी प्रामाणिकता है और ममत्व तथा परत्व से अविचलित रहकर चिन्तन की निष्ठा है। संस्कृति के इस भाष्य में दिनकर का अध्ययन-विस्तार और सन्दर्भों का अन्तरिक्ष चमत्कृत करता है। दिनकर भले ही इसे इतिहास नहीं बल्कि साहित्य का ग्रंथ कहें पर वह भारतीय संस्कृति का क्रमिक इतिहास ही है और वह भी इतिहास-लेखन की दृष्टि सम्पन्नता के साथ। दिनकर के विवेचन की पद्धति यह है कि वह विभिन्न मुद्दों पर विद्वानों के गतों का उल्लेख करते हैं और फिर उनमें से सही मत के पक्ष में निर्णय लेते हैं। वह तर्क और प्रमाण के बिना सपाट तरीके से निष्कर्ष तक नहीं पहुँचते।

जवाहर लाल नेहरू ने इस पुस्तक की भूमिका में संस्कृति को मन, आचार अथवा रूचियों की परिष्कृति या शुद्धि और सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना माना है। दिनकर ने कहा है कि भारतीय संस्कृति का मूल तत्त्व सामास्तिकता है। अपने इसी विचार के प्रतिपादन में उन्होंने रवीन्द्र नाथ टैगोर की कविता उद्धृत की है हेथाय आर्य, हेथाय अनार्य, हेथाय द्राविड़ चीन /शक हूण दल पाठान मोगल एक देहे हलो लीन। अर्थात् यहाँ आर्य हैं, अनार्य है, द्रविड़ और चीनी वंश के लोग हैं शक हूण, पठान, मुगल यहाँ आये और सब एक ही शरीर में समा कर एक हो गये। इन सबके मिलन से भारतीय संस्कृति को अनेक संस्कृतियों के योग से बना हुआ मधु कहा जा सकता है। दिनकर कहते हैं कि यह -आग्रह बिल्कुल निस्सार है कि हिन्दुओं का सारा धर्म और सारी संस्कृति वेदों से निकली है।

दिनकर भारतीय संस्कृति के इतिहास चार बड़ी क्रान्तियाँ मानते हैं। पहली क्रांति आर्यों के भारत आगमन और आर्येतर जातियों से उनके सम्पर्क के रूप में हुई। वही भारत की बुनियादी संस्कृति बनी। इससे स्पष्ट है कि दिनकर ने आर्यों को भारत के बाहर से आगत माना है। दूसरी क्रान्ति यहाँ स्थापित धर्म के विरूद्ध गौतम बुद्ध के विद्रोह के साथ हुई। तीसरी क्रान्ति तब हुई जब विजेताओं के धर्म के रूप में इस्लाम भारत पहुँचा और चौथी क्रान्ति योरोप के आगमन के साथ हुई। यही संस्कृति के चार अध्याय है। प्रथम अध्याय में दिनकर भारतीय जनता की रचना पर विचार करते हुए सभ्यता के उद्गम तक जाते हैं । नीग्रो, औष्ट्रिक, द्रविड़, आर्य, मंगोल, यूनानी, युची, शक, आभीर, हूण, तुर्क आये और सभी हिन्दू समाज के चार वर्णों में समाहित हो गये सी एम. जोड़ के शब्दों में भारतीय हमेशा से ही अनेक जातियों के लोगों और अनेक प्रकार के विचारों के बीच समन्वय स्थापित करने को तैयार रहे हैं। इससे भारतीय संस्कृति में विश्वजनीनता उत्पन्न हुई। विश्व मानवता के अपूर्व चिन्तक रोमाँ रोलौं मानते हैं कि अगर इस धरती पर कोई ऐसी जगह है जहाँ सभ्यता के आरंभिक दिनों से ही मनुष्यों के सारे सपने आश्रय पाते रहे हैं। तो वह जगह हिन्दुस्तान है।

दिनकर ने ऋग्वेद का काल 6500 वर्ष पूर्व माना है वह जाति, प्रथा, अन्तर्जातीय विवाह से उत्पन्न समन्वय की परख करते हैं और शिव, राम, कृष्ण भक्ति और विभिन्न देवताओं की मान्यता पर विचार करते हैं। वह आर्य और आर्येतर के सम्बन्धों का विश्लेषण करते हैं। वह इस निष्कर्ष पर पहुॅचते हैं कि संस्कृति की रचना किस तरह परस्पर प्रभावों से होती है। द्रविड़ों का मूल निवास कहीं एजियन समुद्र के पास था उनमें सिंहारूढ़ देवी माता और वृषभारूढ़ देव पिता की कल्पना थी। द्रविड़ों में यौवन युद्ध और वीरता के एक अलग देवता थे मुरूकन। आर्यों के कार्तिकेय द्रविड़ों के मुरूकन हैं। सम्पूर्णानन्द जी ने गणेश जी को आर्येतर देव माना है। गणानात्वा गणपति ग में गणपति का अर्थ गणेश नहीं है। यह गणपति अश्वमेध का अश्व है। गणेश पहले विघ्नकर्ता के रूप में पूजित थे। विघ्नहर्ता तो वह बाद में हुए। शका' और 'कुहू' शब्द पुनर्जन्म की कल्पना 'गंगा' सब्द सिन्दूर नारियल, पान आग्रेय जाति से आये हैं प्रेत पूजा भी आग्रेय है यह दिनकर अपने गम्भीर शोध में प्रतिपादित करते हैं।

आर्य और आर्येतर समन्वय पर विचार करते हुए दिनकर कहते हैं कि आर्यों की जाति प्रथा को अन्य जातियों ने भी स्वीकार कर लिया। यह सांस्कृतिक समन्वय का पहला कदम था। आर्य और द्रविड़ मिलन भी इसी तरह का समन्वय था। सात नगरियों और सात नदियों को साथ रखना भौगोलिक एकता का उदाहरण है । दिनकर अपने वैचारिक सथ्य के साथ लिखते हैं कि हिन्दू संस्कृति का आज जो रूप है उसके भीतर प्रधानता उन बातों की नहीं है जो ऋग्वेद में लिखी मिलती है बल्कि हमारे बहुत से अनुष्ठानों और हमारी कई रीतियों का उल्लेख वेदों में नहीं मिलता। विष्णु, शिव, रूद्र आदि देवताओं तथा चावल, नारियल, सिन्दूर, जैसी अनेक को जब दिनकर बहिरागत मानते हैं तो आज की बनी धारणा को झकझोर देते हैं। वह कहते हैं कि सिन्दूर नाग लोगों की वस्तु है। इसीलिए उसे नाग गर्भ और नाग संभव कहा गया। वह सामाजिक समन्वय में नारियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण मानते हैं और राम कथा का देश की एकता में बहुत महत्त्व निर्धारित करते हैं ।

दूसरे अध्याय में दिनकर प्राचीन हिन्दुत्व से विद्रोह के रूप में बौद्ध धर्म का परीक्षण करते हैं। स्वयं हिन्दुत्व में ही वेदों के बाद उपनिषद् का विवेच्य बदल गया है। भारतीय संस्कृति का पुराना रूप वही है पर आज नास्तिक और भौतिकवादियों का छोड़कर अधिकतर हिन्दू परलोक भय मानते हैं । वैदिक ऋषि मृत्यु से भीत नहीं है। उसके विचार में स्वर्ग नरक नहीं है वह आत्मा पुनर्जन्म और कर्मफल के बारे में ज्यादा नहीं सोचता। वेदों का वातावरण उल्लास का है। उनमें प्रार्थनाएँ हैं कि हमारे बैल पुष्ट हों, अश्व बलवान हों, फसलें अच्छी हों और शत्रुओं पर हमें विजय मिले। इस आशावादी और बहुदेववादी समाज के बाद उपनिषद् काल में सूक्ष्म चिन्तन आ गया मोक्ष जीवन का परम ध्येय बन गया। वैराग्य और संन्यास माध्यम बन गये। वैदिक जीवन में सांसारिकता प्रेय है। उपनिषद् प्रेय को छोड़ कर श्रेय की ओर बढ़े। दिनकर कहते हैं कि वेदों के समय का धर्म प्रकृति के तत्त्वों को सजीव मानने वाले भावुक मनुष्य का धर्म है। हिंसा और अहिंसा के द्वन्द्व में जैन धर्म की अहिंसा को प्रतिष्ठा मिली। बौद्धों ने जाति प्रथा को चुनौती दी और कर्म की महत्ता को श्रेय मिला। दिनकर ने इस समय के अन्त संघर्षों और परस्पर टकरावों पर तटस्थ विचार करते हुए कहा है कि हिन्दुत्व और बौद्ध धर्म में इसके बावजूद समानता है। बौद्ध धर्म का महत्त्व यह भी है कि इसी समय बाहरी दुनिया से हमारा प्रत्यक्ष सम्पर्क हुआ। बौद्ध विदेशों में गये।

तीसरा अध्याय हिन्दू मुस्लिम सम्बन्धों की भूमिका का विमर्ष है। दिनकर लिखते हैं कि इस्लाम अपने प्रगतिशील युग में भारत में नहीं आया। वह अपने आरम्भ में बहुत ऊँचे धरातल पर था लेकिन जब हूण, तुर्क और मंगोल भी मुसलमान हुए तो उन जातियों की बर्बरता का उस पर प्रभाव पड़ा। दिनकर का यह कथन महत्त्वपूर्ण है कि संसार के सभी धर्मों में इस्लाम ही ऐसा धर्म है जिसका विषय केवल व्यक्ति नहीं, पूरा समाज है । मौलिक इस्लाम से भेद होते हुए भी सूफी रहस्यवाद ने उसमें नया आयाम जोड़ा। बाबर, ने हुमायूँ को जो वसीयतनामा किया था उसमें लिखा था हिन्दुस्तान में अनेक धर्मों के लोग बसते हैं। भगवान को धन्यवाद दो कि उन्होंने तुम्हें इस देश का राजा बनाया है। तुम तअस्सुब यानी साम्प्रदायिकता से काम न लेना, निष्पक्ष होकर न्याय करना ओर सभी धर्मों के लोगों की भावना का ख्याल रखना। इस वसीयतनामे की एक प्रति भोपाल के राज पुस्तकालय में उपलब्ध रही है मुस्लिम समाज ने हिन्दुओं के अनेक रीति-रिवाज ग्रहण कर लिये। कला और साहित्य में भी दोनों में आदान प्रदान हुए। हिन्दुओं की जीवन शैली भी अनेक स्वीकारों के लिए तत्पर रही। इस्लाम के स्वरूप और उसके प्रभाव पर विचार करते हुए दिनकर भारत में मुस्लिम शासन के कारणों की भी समीक्षा करते हैं। वह कहते हैं कि हिन्दुओं में धार्मिकता की गलत धारणा, पाखण्ड, देश के एकत्व के भाव का अभाव तथा बाहर जाने को धार्मिक दृष्टि से निषिद्ध मानना वे कारण है जिनसे उनका पतन हुआ। जाति प्रथा की कट्टरता ने वंचित लोगों को इस्लाम अपनाने पर। 1. मजबूर कर दिया। धर्म की रक्षा का गलत अर्थ लगाया गया

दिनकर ने इस पुस्तक को संस्कृति के चार अध्याय कहा है। तो स्वाभाविक है कि उसमें राजनीतिक स्थिति के साथ संस्कृति पर अधिक विचार हो। संस्कृति समावेशी शब्द है। उनमें जीवन शैली. उदात्त आदर्श, कला, साहित्य आदि विभिन्न आयाम समाहित हैं। इस्लाम के भारत आगमन और मुस्लिम शासन के वर्षों के भारत की स्थिति कई दृष्टियों से विशिष्ट है इस समय धार्मिक कट्टरता के अतिरेक से अन्याय भी हुए और उसके विपरीत हिन्दू मुस्लिम संस्कृतियों के परस्पर आदान प्रदान भी हुए।

दिनकर ने हिन्दू धर्म में भक्ति आन्दोलन के उदय का वर्णन करते हुए तीन तरह के कवियों का उल्लेख किया है। एक वर्ग में जायसी दूसरे में कबीर और तीसरे में विद्यापति और तुलसी। वह कबीर, मीरा, बोधा और घनानन्द के भावुक पक्ष पर प्रेम के सूफी स्वरूप का प्रभाव मानते हैं इसी काल में उर्दू का जन्म हुआ। भाषाओं में शब्दों के आदान प्रदान हुए और सांस्कृतिक परस्परता के कारण सामाजिक संस्कृति का स्वरूप उभरा।

संस्कृति के चौथे अध्याय में भारतीय संस्कृति और योरोप की अंतःक्रिया का विवेचन है। योरोप के विभिन्न देशों के भारत आगमन, भाषा और संस्कृति पर पड़ रहे वांछित और अवांछित प्रभावों, नव जागरण के समाज सुधारों वैज्ञानिक दृष्टि के उदय तथा टूटती रूढ़ियों का आख्यान ही इस युग का कथानक है। ब्रह्म समाज, आर्य समाज, धर्म समाज, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, अरविन्द, गांधी आदि के माध्यम से व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में बौद्धिकता और तर्क का अभिनव पाठ लिखा जा रहा था प्राचीन भारत में आर्य और आर्येतर संस्कृतियों के मेल से निकली संस्कृति मध्ययुग में मुसलमानों के साथ संवादरत रही। अब एक और भिन्न संस्कृति के साथ उसका संभाषण चला। विज्ञान और अध्यात्म दोनों समाज को अपनी तरह निर्धारित कर रहे सामन था। विचार, कला, साहित्य, और भूगोल का एक व्यापक विश्व हमारे ज्ञान के नये गवाक्ष और विश्ववाद के नये और हमारी चेतना को नया सूर्यादय दिखा रहे थे एक सर्वथा भिन्न संस्कृति के साथ अब हमारा सामना हो रहा था अभी तक मुस्लिम शासन और जीवन पद्धति से हमारी असमानता, द्वन्द्व थी। अब योरोपीय संस्कृति से भी हमारी भिन्नता प्रभावित हो रही थी । अंग्रेज शासकों का सांस्कृतिक वर्चस्व भी हो रहा था और सामाजस्य भी। गुलामी के खिलाफ अभियान भी चला और भाषा, वेशभूषा, खानपान प्रभावित भी हुआ।

मेरे नगपति मेरे विशाल 'कुरूक्षेत्र 'परशुराम की प्रतीक्षा' और 'उर्वशी' के कवि

दिनकर की रचनाशीलता का एक अलग औदात्य है, संस्कृति के चार अध्यायों में। जैसे भावना के कलश में ज्ञान का महासागर भर दिया गया हो। दिनकर की संस्कृति चेतना एक ऐसे व्यक्ति की अनुभूति है जिसे निजता प्रिय है पर उसका विवेक सजग है। वह अपने गुण दोषों का परीक्षण करते हुए इतिहास लेखक की निष्पक्षता का, उदात्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। संस्कृति का ऐक्साविमर्श करते हुए

दिनकर एक व्यक्ति नहीं रह जाते बल्कि संदेहों और भ्रमों से परे एक सर्व समावेशी

संस्थान बन जाते हैं। उनका अपरिमित ज्ञान विस्मित भी करता है और आश्वस्त भी।

डॉ० के.बी.एल. पाण्डेय

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