कर्म सिद्धांत और मनोविज्ञान in Hindi Novel Episodes by Dr Mrs Lalit Kishori Sharma books and stories Free | कर्म सिद्धांत और मनोविज्ञान

कर्म सिद्धांत और मनोविज्ञान

श्रीमद भगवत गीता में कहा गया है "कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन" भगवान श्री कृष्ण के मुखारविंद द्वारा कथित इस कथन से एक बात पूर्णता स्पष्ट होती है कि मानव का अधिकार केवल कर्म करने में ही है। ठीक इसी तथ्य की पुष्टि करते हुए श्री गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं 
कर्म प्रधान विश्व करि राखा 
जो जस कराई सो तस फल चाका 
गोस्वामी जी के इस कथन से कर्म की प्रधानता तो सिद्ध होती है साथ ही यह भी स्पष्ट है कि कर्म के अनुसार ही फल का चक्र भी निरंतर गतिशील रहता है । जैन धर्म में भी कर्म वाद की प्रामाणिकता को स्वीकार किया गया है । इस्लाम बौद्ध सिख ईसाई आदि विश्व के अनेक धर्मों में कर्म की महत्ता को स्वीकार किया गया है 
अब प्रश्न उठता है कि आखिर यह कर्म सिद्धांत है क्या? और यह किस प्रकार सृष्टि चक्र की विभिन्न गतिविधियों को प्रभावित करता है कर्म की सर्व व्यापकता एवं कर्म की दुर्लघनीय शक्ति अनंत है श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान ने निज मुख से कहा है 
भूत भाव बोद भव करो विसगः कर्म  संहिता 
अर्थात भगवान का स्वभाव सच्चिदानंद मय एक रस है उसी अलौकिक सत्ता का त्याग करके जो भूतों की उत्पत्ति कराते हैं उसको कर्म कहते हैं अतः स्पष्ट है कि अपनी अलौकिक शक्तियों को छोड़कर जब प्रभु पृथ्वी पर अवतरित होते हैं तो वे स्वयं भी इस कर्म सिद्धांत से मुक्त नहीं रह पाते अर्थात वे स्वयं कर्म करने इस पृथ्वी पर आते हैं अपने कर्मों का उल्लेख करते हुए स्वयं भगवान कहते हैं 
परित्राणाय साधु नाम विनाशाय च दुष्कृतम् 
धर्म संस्थापनार थायो संभवामि युगे युगे 
अर्थात सज्जन पुरुषों की रक्षा के लिए दुष्ट प्रवृत्तियों के विनाश हेतु तथा धर्म की स्थापना के लिए मैं प्रत्येक युग में अवतरित होता हूं 
प्रकृति त्रिगुणा मई है रजोगुण के कारण प्रकृति का परिणाम सदैव होता रहता है यह परिणाम कभी सत्त्व से तम की ओर और कभी तम से सत्व की ओर स्वभावतः होता जैसे प्रकृति में त्रिगुण का होना स्वभाव सिद्ध है उसी प्रकार यह परिणाम भी स्वभाव सिद्ध है इसी स्वभाव सिद्ध स्पंदन को ही कर्म कहते हैं मीमांसा कारोने कर्म के 3 भेद कहे हैं पहला सहज कर्म दूसरा जैव कर्म तीसरा ऐष कर्म । सहज कर्म प्राकृतिक स्पंदन के साथ ही प्रकट होते हैं आदि सृष्टि में ब्रह्मांड गोलक का बनना जीव सृष्टि का उदभिज रूप से उत्पन्न होना यह सब सहज कर्म के उदाहरण हैं सहज कर्म के कारण ही जीव उदभिज योनि स्वेदन योनि अंडज ओनी जरा यू योनी मैं होता हुआ अंत में पूर्ण अवयव मनुष्य योनि में पहुंच जाता है पूर्ण अवयव होने के कारण ही वो पाप और पुण्य का अधिकारी हो जाता है उस समय जीव में जैव कर्म का उदय होता है इस जैब कर्मों के कारण ही जीव आवागमन चक्र में घूमता हुआ अपने कर्मों के अनुसार ही प्रेत योनि नरक लोक स्वर्ग लोक असुर लो क तथा मनुष्य लोक में आता जाता रहता है इस दशा में जीव की क्रमोन्नति के लिए वेद पुराण स्मृति तंत्र आदि शास्त्र स्वतः प्रवृत्त रहते हैं सहज कर्म और जैब कर्म दोनों से प्रथक विचित्र एस कर्म  कहलाता है इस कर्म का साक्षात संबंध देव लोक से है और परोक्ष संबंध मनुष्य लोक से है मनुष्य को क्रमशः आवागमन चक्र से छुड़ाकर देव लोक की परिधि मैं पहुंचाना इस कर्म का ही कार्य है 
कर्म की महिमा अनंत है वस्तुतः त्रिगुणात्मक सम्मिश्रण कर्म का विपाक अत्यंत गूढ़ है कोई भी जाति या व्यक्ति अपने किए कर्मों की प्रतिक्रिया से बच नहीं सकता इस समय यूरोप की जो अदा पतित दशा हो गई है ब्रिटिश जाति की शक्ति का जो क्षय हो गया है वह उनके पूर्व कृत समस्त कर्मों का ही परिणाम है इस समय भारत भूखंड की जो अस्त-व्यस्त दशा दिखाई पड़ती है पर्यावरण प्रदूषण भ्रष्टाचार अशांति दिन प्रतिदिन बढ़ती बीमारियां मनोरोग आदि का बाहुल्य तथा समस्त पृथ्वी पर जो घोर हलचल देखने में आती है वह सब मनुष्य जाति के समष्टि कर्मों का ही फल है।  कर्म की प्रधानता के कारण ही भगवान कृष्ण ने इसे कर्म क्षेत्र की संज्ञा दी है कर्म की महिमा के कारण ही अनेक कर्म मीमांसाक कर्म को ही ईश्वर मांगते हैं इसी कारण जैन आचार्यो ने ईश्वर को न मानते हुए कर्म की प्रधानता को ही स्वीकार किया है। 
कर्म की इस प्रभावशीलता को देखते हुए ही भारतीय संस्कृति में कर्म को धर्म समन्वित करने की सलाह दी गई है संसार में बड़े से बड़े दान और उपकार के कार्यों को भी ईश्वर की उपासना और त्याग की सच्ची भावना से युक्त होना चाहिए जिससे महान कर्म करने पर भी व्यक्ति में अहम् की भावना का प्रादुर्भाव ना हो। इसीलिए गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं की 
यत करोशी यादष्स नासि यज् जुहोशि द दासी यत 
यत परस्यसि कौंतेय तत्पकुरुष मदपोणम 9/27
अर्थात हे कौनतेय  तुम जो कुछ करो जो कुछ खाओ जो कुछ हवन करो जो भी दान करो जो भी तप करो सब कुछ मुझे अर्पण कर दो 
वस्तुतः कर्म तो सभी प्राणी करते हैं परंतु साधारण प्राणी और कर्म योगी द्वारा किए गए कर्मों में बड़ा भारी अंतर होता है साधारण मनुष्य आसक्ति ममता कामना आदि को साथ रखते हुए कर्म करता है और कर्म योगी आसक्ति ममता कामना आदि को छोड़ कर काम करता है यह आसकती ही पतन करने वाली है कर्म नहीं। साधारण कर्मी के कर्मों का प्रवाह संसार हित में होता है यही कारण है कि कर्मी बंध जाता है और कर्म योगी मुक्त हो जाता है गीता में कहा गया है 
तस्मात् आसक्त: सततं कार्यम कर्म समाचार: 
आसक्तो हया चरण कर्म परमाप्नोति पुरुषः 3/9
अर्थात निरंतर आसक्ति रहित होकर कर्तव्य कर्म का भली-भांति आचरण करना चाहिए क्योंकि आसकती रहित कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है वास्तविकता यह है कि स्वार्थ के वशीभूत होकर कर्म करने से ही संसार में लड़ाई झगड़े ईर्ष्या द्वेष घृणा वैमनस्य  आदि का साम्राज्य होता है  यह कर्म करने से मुझे सुख की प्राप्ति होगी यश मिलेगा आदि इस प्रकार सोचकर जो कर्म किया जाता है वह मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है इस प्रकार की सोच का सबसे बड़ा कारण होता है---मन इसलिए मन को ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण माना गया है 
मनः एव मनुष्य नाम कारणम् बंध मोछयो 
प्रत्येक कार्य के पीछे मन की भावना ही प्रधान होती है भावना के अंतर के कारण ही स्वार्थ वष किसी को मारना हत्या कहलाती है और राष्ट्रहित की भावना से हजारों को मारना भी देशभक्ति कही जाती है एक से पातक मिलता है तो दूसरे कर्म से सम्मान इस प्रकार कर्म के पीछे छिपी मन की भावना ही हमारे सुख एवं दुख का कारण बनती है वेद व्यास जी विष्णु पुराण में कहते हैं 
मनसः  परिणामो सुखम  दुख आदि लक्षणः 
अर्थात सुख और दुख की भावना मन में मन का ही परिणाम है एक व्यक्ति की सामान्य छोटी सी छोटी वस्तु में आ सकती होने के कारण उसके नष्ट हो जाने पर दुख का अनुभव करता है परंतु राजा जनक जैसे विदेह व्यक्ति संपूर्ण मिथिला नगरी के अग्नि भस्म होने पर किंचित मात्र भी दुख का अनुभव नहीं करता इसका मूल कारण है मन से अनासक्त हो ना तभी तो किसी कवि ने कहा है 
मन के हारे हार है मन के जीते जीत 
महासामर के समय महा मना चर्चिल ने कहा था--- विजई होने की भावना हमारे मन में बनी रहेगी तो अंत में हमारी जीत अवश्य होगी और बार-बार होने पर भी हार होने पर भी अंत में जर्मनों पर उन्होंने विजय प्राप्त की कविता काम मिनी के साथ कारागार में भी विहार करने वाले लवलेश की वाणी कितनी मार्मिक है उन्होंने कहा था कि--- जिसका मन निर्मल और प्रशांत है उसके लिए न तो पाशाण की दीवार कारागार है और नहीं लोहे की छड़े पिजरा है यह तो उन्हें तीर्थ स्थान समझता है।-- कि वास्तव में गीता वे गीता के इस उपदेश के अनुयाई थे---
आत्मसस्थं मनः  कृत्वा न  किचिंत अति चिंतयेत् 
अर्थात अपने मन को आत्म स्थित करके और कुछ भी चिंतन नहीं करना चाहिए 
यहां विचारणीय प्रश्न यह है कि इस शरीर के अंदर बैठा हुआ मन सभी कर्मों का मूल कारण माना जाता है यह वस्तु है है क्या? और इस का कर्म के साथ किस प्रकार का संबंध है इन प्रश्नों पर विचार कर ने पर हम पाते हैं कि ---मानव मन भगवान की विभूति है--- क्योंकि गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है---- इंद्रियाणाम  मनः चासमि--- अर्थात इंद्रियों में मन हूं--- एकोहम बहूस्याम्--- इस वेदोक्ति के अनुसार भी जीव को ईश्वर का अंश माना गया है पुरुष स्थूल सूक्ष्म और कारण त्रिविद शरीर को प्राप्त होती है और उसके जाते ही वह पंच भूतों का जड़ समुचय मात्र रह जाता है मन में संग्रहित जन्म जन्मांतर के संस्कार ही जीवात्मा के साथ रहते हैं और उन्हीं के कारण वह अपने प्रारंब्ध और संचित कर्मों का फल भोगता है गीता में कहा गया है---
 कारंणम गुणसंगोऽस्य सदऽसद योनि जन्मसु 13/21
कठोपनिषद में कहा गया है---- कर्मों का फल भोगने वाला जीवात्मा इंद्रियों और मन से युक्त मनीषियों द्वारा कहा गया है गीता में कहा गया है ---- मूझ अव्यक्त से यह समूचा जगत परिपूर्ण है वस्तुतः ईश्वर के तेजांश से ही  मनो यंत्र का वैसे ही संचालन होता है जैसे आधुनिक यंत्र बिजली से गतिमान होते हैं और यह स्थूल शरीर मशीन की तरह  मन द्वारा कृयाशील होता है इस प्रकार परमात्मा में अवस्थित होने के कारण समस्त जीव मन और शरीर एकता के सूत्र में जुड़ जाते हैं और संसार के अनेकता में एकता प्रकट होती है इसलिए जैन धर्म मैं इस मन को प्राणी मात्र के प्रति दयावंत होने की प्रेरणा दी गई है और अहिंसा परमो धर्मा के मूल मंत्र का शंखनाद संपूर्ण विश्व में गूंज उठा 
जिस प्रकार समुद्र की तरंगों का आगार सागर होता है ठीक उसी प्रकार मानव मन की सारी शक्ति का स्रोत ईश्वर है ज्यों ज्यों पुरुष परमेश्वर परायण होता जाता है त्यों त्यों उसका मन निर्मल होकर अधिकाधिक शक्तिशाली होता जाता है इसीलिए भगवान श्री कृष्ण अर्जुन का बारंबार यही उपदेश देते हैं मन मना भव अर्थात हे अर्जुन तो मुझ में ही अपना मन लगा वस्तुतः मन अनंत शक्ति संपन्न है ससीम होते हुए भी ईश्वर के तेज के अंश से संभूत होने के कारण मानव के मन में अनेक शक्तियों का भंडार है रेडियो दूरदर्शन वायुयान कृत्रिम उपग्रह कंप्यूटर और नर यंत्र रोबोट आदि जिनसे समस्त विश्व विस्मय मुग्ध है यह सब भी मानव मन की ही उपज है  मन ने मन द्वारा ही अनेक अद्भुत आविष्कार कर डाले वास्तव में सृष्टि का संपूर्ण सौंदर्य मनोभव ही है भौतिक विज्ञान की दृष्टि से समस्त संसार परमाणुओं के अभिराम चक्र  नृत्य का ही परिणाम है शब्द प्रकाश गंद इत्यादि से लहरियां मानव मन के संपर्क में आते ही सर समान रूप लावण्य और सुगंध में परिवर्तित हो जाती हैं मन ही विज्ञान के सूने संसार को रसीला और सुंदर बना देता है जर्मन विद्वान कांटे और ईगल ने मंकी इस महानता का प्रतिपादन किया है योग वशिष्ठ मैं भी इसी बात की पुष्टि की गई है 
मनो मात्र मतों विश्वम यद् यद्जातम तदैव ही 3/25
अर्थात विश्व केवल मन ही है जो जो कुछ उत्पन्न है वह सब मन ही है सब कुछ मन से ही होने के कारण गीता में भगवान ने संपूर्ण कर्मों को मन से ही त्यागने की बात कही है 
सर्व कर्माणि मनसा सननयस5/13
वस्तुतः कर्म किस भाव और उद्देश्य से कैसे किए जाएं कि करने का राग सर्व था मिट जाए उस कर्तव्य कर्म को करने की कला को ही गीता में कर्म योग कहा गया है जिसमें न कर्म के फल प्राप्ति की इच्छा रहती है और ना ही करता पन की भावना ऐसा निष्काम कर्म योग ही श्रेष्ठ कहा गया है 
कर्म योगो विशेष्यते5/2
 क्योंकि निष्काम कर्म करने पर कर्म तो परोपकार के लिए होता है और स्वयं के लिए वह योग बन जाता है ऐसा कर्म योगी ही श्रेष्ठ है संपूर्ण सृष्टि की रचना करने पर भी प्रभु करता पर की भावना से रहित होते हैं इसीलिए भगवान को सबसे बड़ा कर्म योगी कहा गया है 
अब मानव मन के गोचर अनुभवों व कर्मों पर विचार किया जाए संसार रूपी विषय वारिधि के बीच विलास में मानव मन विमुग्ध और बी मूड हो जाता है आत्मा रूपी रथि शरीर रूपी रथ में बैठा हुआ झांकता रहता है जब चंचल मन को इंद्रिय रूपी घोड़े वर वस विषयों की ओर खींच ले जाते हैं इंद्रियों द्वारा ही मन वाह जगत से संपर्क करता है पांच ज्ञानेंद्रियां ही जगत के संदेश को मन में लाती हैं या प्रत्यक्ष वह दो कराती हैं और पंच कर्म इंद्रियों द्वारा ही  मन प्रतिक्रिया करता है मस्तिष्क ब्रेन मानव मन का कार्यालय है जिसमें आधुनिक विज्ञान के अनुसार 3 अरब के लगभग कोष या क्लर्क काम करते हैं जिस प्रकार ग्रामोफोन के रिकॉर्ड पर अंकित ध्वनि के संस्कार सर्व था स्थिर रहते हैं ठीक उसी प्रकार किसी इंद्रिय द्वारा जो संस्कार किसी कोष पर पढ़ते हैं ब मन में सदा बने रहते हैं जिन अनुभवों का बोध रहता है वह मन के तल पर या चेतन स्तर पर रहते हैं और जो विस्मृति में विलीन हो जाते हैं वह मन के अंतर स्थल गुफा में या अवैध अवस्था में बने रहते हैं और तल पर आने की प्रतीक्षा उन्हें सदैव बनी रहती है मंकी अनेक दबी हुई कामनाएं भय क्रोध राग द्वेष इत्यादि आवेश इसी अंतःस्ल के तहखाने में छिपे रहते हैं और अनुकूल परिस्थिति प्राप्त होने पर समुद्र तल पर प्रादुर्भाव होकर तद अनुकूल कर्म को प्रेरित करते हैं डॉक्टर फ्राइड का भी यही मत है की जो बात अंतस्तल नीति विरुद्ध या समाज के प्रतिकूल होती है उनका दमन किया जाता है और वे अनिरुद्ध वासना एहि अज्ञात मनु जगत से निकलकर स्वप्न संसार में अपनी संतुष्टि की चेष्टा करती हैं जैन धर्म में क्रोध मान माया लोग यह चार कषाय ही ज्ञान के बाधक तत्व माने गए हैं इन पर विजय प्राप्त करके ही मानव अध्यात्म शक्ति की अनुभूति करता है 
आत्म वल से मनोबल प्राप्त होता है योग के अष्टांग मार्ग में यम नियम संयम आदि के पालन पर विशेष बल दिया गया है जैन धर्म में भी इन्हीं नियमों की पुष्टि की गई है योग शास्त्र विभूति पाद मैं बताया गया है कि संयम द्वारा कि संयम द्वारा योगी अणिमं  लघिमा महिमा गरिमा इत्यादि सिद्धियां प्राप्त कर लेता है अतः मनोबल प्राप्त हो जाने पर अनेक चमत्कारिक कर्म किए जा सकते हैं जैसे अंतर्ध्यान हो जाना भूख प्यास से निवृत्ति पा लेना दूसरे के मन की बात जान लेना जल पर एवं कांटों पर चलना आकाश में उड़ सतना शरीर को  अनणु के समान सूक्ष्मा बनाना तथा पर्वता काय विशाल बनाना आदि क्षमताएं प्राप्त हो जाती हैं हनुमान जी को यह सिद्धियां प्राप्त होने के कारण ही
 जस जस सुरसा बदन बढ़ावा 
तासु लून कपि रूप दिखावा 
और पुनृ लघु रूप धारण करना यही योग है योगा चित्र वृत्ति निरोध: चित्त की वृत्ति का निरोध ही योग है अतः मनोबल ही प्रमुख है 
मन के संदर्भ में एक विशेष बात और जो हमें विश्व एकता की ओर ले जाती है जिसका जैन धर्म में विशेष रुप से मनः पर्याय के नाम से उल्लेख किया गया है जिसे अंग्रेजी में हम टेलीपैथिक मेथड कह सकते हैं उच्च कोटि का मनोबल प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति दूसरे के मन में प्रवेश करता है और उसके मनोभावों को समय लेता है तथा तदनुसार व्यवहार परिवर्तन कर सकता है इसके मूल कारण को स्पष्ट करते हुए गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं 
कि मई सर्वमिदम  प्रोतम सूत्रं मणि गाना इव
अर्थात यह संपूर्ण जगत सूत्र में मणियों के सद्रास मुझे ईश्वर में गुॅथा हुआ है इस वचन से जन मन और तन में एकत्वम भाव सिद्ध होता है एक मन की पहुंच दूसरे मंत्र बिना किसी माध्यम के होने के अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं स्वामी विवेकानंद ने सन उन्नीस सौ में अमेरिका में अपने भाषण मैं इसी बात की पुष्टि करने वाला एक अनुभव प्रस्तुत किया था उनका संपर्क एक बार एक ऐसे महात्मा से हुआ जो प्रश्न सुनने से पहले ही उसका उत्तर बता दिया करते थे विवेकानंद जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ प्रश्नों के उत्तर देने के पश्चात महात्मा ने एक कागज पर कुछ लिखा उसे मोड कर उसके पीछे हस्ताक्षर करवाए और विवेकानंद जी से बिना पढ़े ही उसे जेब में रखने को कहा ऐसा ही उनके अन्य साथियों के साथ किया कुछ समय तक चर्चा करने के पश्चात उन्होंने सभी से किसी भी भाषा में एक वाक्य मन में सोचने के लिए कहा स्वामी जी ने संस्कृत भाषा में एक साथी ने जर्मन भाषा में तथा अन्य ने अरबी भाषा में वाक्य सोचा तब उन्होंने सभी की जेबों से कागज निकालने का आदेश दिया तब सभी ने पाया कि उनके कागजों में वही वाक्य उसी भाषा में लिखे हुए थे जो उन्होंने मन में सोचे थे थे जबकि उन महात्मा ने सोचने के 1 घंटे पूर्व ही लिखकर दे दिए थे तथा वे उन भाषाओं से अनभिज्ञ थे इस अनुभूति के माध्यम से स्वामी जी ने अपने व्याख्यान में स्पष्ट किया कि प्रत्येक मन दूसरे मन से संलग्न है और प्रत्येक मन चाहे जहां रहने पर भी संपूर्ण विश्व के व्यापार में प्रत्यक्ष भाग ले रहा है मन एक अखंड वस्तु है और इस अखंडता के कारण ही हम अपने विचारों को एकदम सीधे बिना किसी माध्यम के आपस में संक्रमित कर सकते हैं स्वामी विवेकानंद ने यह भी कहा था कि--- यदि किसी गुफा में बैठे व्यक्ति के निर्मल मन में कोई उच्च विचार उठे तो वह समस्त संसार में लहरें उत्पन्न कर देता है और तदनुसार कार्य हो जाता है कविंद्र रविंद्र ने भी कहा है ---विश्व मन और मेरा मन एक हैं मन के भीतर एक दिशा है जो सर्व मानव चित्र की ओर जाती है सत्य का विस्तार विश्व मन में है जहां का प्रकाश आश्चर्यजनक है 
वस्तुतः मन और कर्म का विवेचन अनंत है अनिर्वचनीय है समय अनुकूल लेखनी को विराम देना ही उचित होगा अंत में प्रभु से यही प्रार्थना है की सभी कार्यों के प्रेरणा देने वाला मेरा मन कल्याणकारी विचारों वाला हो 
तन्मय मना शिव संकल्पम अस्तु
                                                 इति 

लेखिका डा श्रीमती ललित किशोरी शर्मा