विष कन्या - 20 in Hindi Classic Stories by Bhumika books and stories Free | विष कन्या - 20

विष कन्या - 20

       आगे हमने देखा की, राजगुरु सौमित्र कुछ समय पश्चात गुरुकुल से राजमहल पधारे हैं। महाराज उनके साथ वार्तालाप कर रहे ही तभी  वहां मृत्युंजय आता है। राजगुरु ने मृत्युंजय को राजकुमारी वृषाली के स्वास्थ्य के विषय में जान ने केलिए बुलाया है। वो सब वार्तालाप कर ही रहें हे तभी एक अनुचारिका दौड़ te हुए आती है और सब उसके पीछे पीछे राजकुमारी के कक्ष की ओर जाते हैं। अब आगे......


               अनुचारिका तेज गति से राजकुमारी वृषाली के कक्ष की ओर जा रही हैं। पीछे महाराज भी दौड़ रहे हे। वो बेसुध होकर तेजी से दौड़ते हुए राजकुमारी के कक्ष में दाखिल हुए। अनुचारिका ने हाथ से राजकुमारी की ओर इशारा किया जब महाराज ने राजकुमारी को देखा तो उनके होश उड़ गए। तब तक मृत्युंजय और राजगुरु भी राजकुमारी के कक्ष में पहुंच गए।


       सब वहां का दृश्य देखकर आश्चर्य में थे। मृत्युंजय तेज गति से राजकुमारी की शयन सैया के समीप गया। राजकुमारी के हाथ पैर हिल रहे थे। कई माह से एक शव की भांति मूर्छित राजकुमारी के शरीर में आज चेतना का संचार हुआ था। महाराज ये देखकर बहुत भावुक हो गए, उनकी आंखो से अश्रु बहने लगे और वो राजकुमारी के समीप जाकर राजकुमारी  वृषाली...बेटा वृषाली बोलने लगे।


       मृत्युंजय बिना विलंब किए राजकुमारी के पांव के तलवों को अपने हाथ से रगड़ते हुए ऊष्मा देनेका प्रयास करने लगा। राजगुरु भी राजकुमारी के हाथ की हथेलियों को ऊष्मा देने का प्रयास करने लगे। 


       राजगुरु हमारी बेटी क्या मूर्छा से बाहर आ गई हैं? वो अपनी आंखे क्यों नही खोल रही? महाराज बडी आतुरता से प्रश्न करने लगे। वो कभी राजकुमारी के पांव के पास कभी सिरके पास तो कभी हाथों के पास घूम रहे थे।


       लावण्या और सारिका भी तेजगति से भागते हुए कक्ष में आई। उन्हे भी अनुचर से संदेश मिल गया था। लावण्या तेजी से राजगुरु के समीप गई और बोली राजगुरु में कर देती हूं। राजगुरु पीछे हट गए और लावण्या अपने हाथ से राजकुमारी की हथेलियों को रगड़ ने लगी। अब राजकुमारी के हाथ पांव की हिलचाल रुक गई थी।


       मृत्युंजय के मुखपर थोड़ी निराशा दिखी वो पांव को रगड़ना छोड़ खड़ा हुआ। रहने दो लावण्या अब प्रयास मत करों। महाराज मृत्युंजय के समीप गए, क्या हुआ मृत्युंजय हमारी राजकुमारी आंखे क्यों नही खोल रही? वो ठीक तो हैं ना? मृत्युंजय ने महाराज के सामने देखा उनके मुख् पर आशा की एक किरण दिख रही थी।


       राजगुरु भी मृत्युंजय के समीप आए, वो कुछ बोले नहीं पर उनकी आंखो में भी यहीं प्रश्न था। मृत्युंजय ने कहा, राजकुमारी की  मूर्छा अभी भंग नहीं हुई हैं, पर प्रसन्नता की बात यह हे की लंबे समय से वो चेतनाहीन हो गई थी किंतु अब उनके हाथ पांव में चेतना का संचार हुआ है। इस से प्रतीत होता है की, उनका उपचार सही हो रहा है और अब वो ईश्वर की कृपा से जल्द ही मूर्छा से बाहर आ जायेंगी।


       ये सुनकर महाराज को समझ नही आ रहा की वो प्रसन्न हो या दुखी। उनके मुखपर फिर से निराशा छा गई। महाराज ये बहुत प्रसन्नता की घड़ी हे  निराश मत होइए राजकुमारी बहुत जल्द ठीक हो जाएंगी। राजगुरु ने महाराज को आश्वस्त  करते हुए आशा बंधाई।


       मृत्युंजय और लावण्या दोनो एक दूसरे की ओर देख रहे हैं। राजगुरु, महाराज अब आप अपने अपने कक्ष में जाकर विश्राम कीजए राजकुमारी के पास में और लावण्या हे।राजगुरु ने महाराज को पलके जपकाकर मृत्युंजय की बात मान ने को कहा और वो दोनो वहां से चले गए।


       मृत्युंजय सिलबट्टे पर कुछ पत्तियां पिसने लगा। सारिका जो दूर खड़िंथी वो तेजी से मृत्युंजय के समीप आई और बोली लाइए में पीस देती हूं। धन्यवाद किंतु में करलूंगा। मृत्युंजय का उत्तर सुनकर लावण्या आगे आई  उसने मृत्युंजय का हाथ पकड़ा और रोकते हुए उसकी आंखो में आंखे डालकर बोली में पिसती हूं आप रहने दे।मृत्युंजय ने कोई उत्तर नही दिया और सिलबट्टा छोड़कर वहां से पीछे हट गया।


       भुजंगा ने तेज गति से कक्ष में प्रवेश किया उसने जोला मृत्युंजय के सामने रक्खा। मृत्युंजय ने उसमे से एक छोटी सी पुड़िया निकाली और सारिका के सामने इशारा किया, सारिका नजदीक आई, इस घुट्टी को तेल में मिलाकर राजकुमारी के हाथ ओर पैरों पर मालिश करो। सारिका कार्य में जुट गई। मृत्युंजय कक्ष में चहलकदमी करने लगा, उसके मुख पर गंभीर रेखाए तन गई थी। ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी बात को लेकर  बहुत चिंतित हे। 


       लावण्या सिलबट्टे पर पत्तियां पिसते पिसते तिरछी नजर से चुपके चुपके मृत्युंजय को देख रही थी। वो समज गई की, जरूर मृत्युंजय किसी गहन विषय में सोच रहा है। पर वो विषय क्या होगा। आज न वो बात कर रहा है ना कोई व्यंग कर रहा है। लावण्या ने सारिका की ओर देखा और दोनो सखियों ने जैसे आंखो आंखो में बार करली।


क्रमशः........

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