Yes, I'm a Runaway Woman (Part Fourteen) in Hindi Novel Episodes by Ranjana Jaiswal books and stories PDF | हाँ, मैं भागी हुई स्त्री हूँ - (भाग चौदह)

हाँ, मैं भागी हुई स्त्री हूँ - (भाग चौदह)

(भाग चौदह)

कभी -कभी बहुत गुस्सा आता है अपने छोटे बेटे आयुष पर। वह मुझसे इतना अकड़ा हुआ क्यों रहता है?इतने घमंड, उपहास, उपेक्षा से बात करता है कि लगता है दुनिया की सबसे बुरी औरत मैं ही हूँ। मानती हूँ मेरे प्रति ये सारे भाव उसके पिता की देन है। उसने उसके मन में मेरे लिए इतनी नफरत भर दी है कि वह उस नफ़रत के धुंध में सच नहीं देख पा रहा। हाँ, ये सच है कि पांच साल की उम्र में वह मुझसे अलगाया गया था और तब से उसने सिर्फ पिता को जाना। उसकी ही बातें सुनी। उसकी आँखों से सब कुछ देखा....मुझे भी। पर अब तो वह युवा हो चुका है एक बेटे का पिता है। देश- दुनिया देख रहा है। मेरी बहन से सारी सच्चाई जान चुका है! फिर भी कुछ समझने को तैयार नहीं । जानती हूँ कि बचपन में ही माँ के प्यार से वंचित बेटे की मनःस्थिति कैसी रही होगी?मुझे अनुमान है उन तानों का, जिसे सुनना पड़ा होगा उसे। अपनी माँ के भाग जाने की बात उसे कितना कष्ट पहुँचाती होगी। वह घर, पड़ोस, स्कूल, सभा-समाज, दोस्त- मित्र सबसे इसलिए आँख चुराता होगा कि उसकी माँ भाग गई है। उसके भीतर इसीलिए इतनी कड़वाहट है, इसीलिए वह उम्र से पहले ही मैच्योर हो गया। इसीलिए वह इतना गम्भीर और जिम्मेदार है। इसीलिए वह एक सामान्य लड़का नहीं है। बारहवीं पास करते ही वह एयरफोर्स की नौकरी के लिए चला गया और तब से उसका पिता उसका धन -दोहन कर रहा है। 

मैं उसे समझ रही हूँ। अपने प्रति उसके गुस्से को, उसकी नफ़रत को, पर क्या वह मुझे समझ पा रहा है?वह क्यों अपने बचपन की त्रासदियों के लिए सिर्फ मुझे जिम्मेदार समझ रहा है?एक बार भी उसने मेरी त्रासदी, मेरे अकेलेपन, मेरे दुःख को समझने का प्रयास क्यों नहीं किया?उसे क्यों लगता है कि अपनी आजादी, मौज -मस्ती व महत्वाकांक्षा के कारण मैंने अपने पति और बच्चों को छोड़ दिया?कोई भी संवेदनशील स्त्री ऐसा नहीं कर सकती। 

कैसे बताऊं कितना तड़पी हूँ अपने बच्चों के लिए...कितने आँसूं बहाए हैं। अकेले में चीखी- चिल्लाई हूँ  ईश्वर से फरियाद किया है। हर ईंट, - पत्थर को देवता समझ उसके सामने माथा पटका है ताकि मेरे बच्चों का कभी बुरा न हो। वह क्या जाने कि बरसों से मैं पूजा- पाठ, व्रत उपवास कुछ नहीं करती क्योंकि जिस ईश्वर ने एक माँ से उसके बच्चों को छीन लिया, उसके प्रति कैसी आस्था!क्यों मैं उसकी पूजा करूँ?वह नहीं जानता कि मैंने रोजगार के लिए स्कूल इसलिए चुना ताकि दूसरे बच्चों को प्यार देकर अपने बच्चों को प्यार न दे सकने की पीड़ा भूल जाऊँ। उसे क्या पता कि आज भी सपने में नन्हे बच्चों को ही देखती हूँ, जो मुझसे बिछड़ जाते हैं। बड़े बेटे की तरह वह भी मेरी तकलीफ नहीं समझ सकता। 

उसे यह नहीं पता कि मैंने उन्हीं के लिए उनके पिता पर खर्च का दावा नहीं किया। बिना तलाक के विवाह करने की सज़ा नहीं दिलाई। 

और जो पिता बच्चों को पालने की आड़ में नई जवान बीबी के साथ मौज करता रहा, बच्चे पैदा करता रहा, वह मेरे अपने बेटों के लिए भगवान हो गया। उसने जो कहा वही सच हो गया। 

वह उनका पिता ही था, जो उनके गर्भ में आते ही मुझे मायके पटक गया। कपड़े खराब होने के डर से उन्हें कभी गोद नहीं उठाया। उनकी किसी जरूरत का ख्याल नहीं रखा। उनके पांच साल का होने का इंतजार करता रहा ताकि टट्टी -पिशाब की उम्र को वे पार कर जाएं। क्या उसने कभी पत्नी के पेट पर हाथ रखकर उनकी हरकत महसूस की? उनकी धड़कन को सुना?गीले में सोया?उन्हें अंगुली पकड़कर चलना और बोलना सिखाया? नहीं, यह सब मैंने अकेले किया और यह कोई अहसान नहीं था। हर माँ ऐसा करती है और यह भी सच है कि ऐसा करके उसे अपार सुख मिला था। मेरे जीवन के सबसे आनंदपूर्ण क्षण वही थे। 

जब बच्चे गर्भ में होते हैं तो माँ को जिस पूर्णता, सार्थकता और ब्रह्मानंद का आभास होता है, पिता उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। स्त्री गर्भावस्था में इसीलिए तो इतनी सुंदर, मधुर और शालीन हो जाती है। आत्मिक आनंद की जैसी अनुभूति उसे उस समय होती है, फिर कभी नहीं होती। मैं उस अनुभूति से गुजरी हूँ। वे घोर अभाव, गरीबी, बदहाली के दिन थे पर मैं भरी -पूरी, खुशहाल और धनवती थी। क्योंकि मेरे गर्भ में सृजन हो रहा था। मैं विधात्री थी। 

अपार पीड़ा सहकर बच्चों  को जन्म दिया, पर जन्म देने के बाद जब उनका मुँह देखा तो सारे कष्ट भूल गयी। रूखा- सूखा खाने के बाद भी मेरे स्तनों से दूध की धार बहती रहती । पूरे दो वर्ष तक उन्हें ममता का अमृत पिलाती रही। मेरी दोनों बाहें उनके लिए तब तक तकिया बनी रहीं, जब तब वे अलग नहीं कर दिए गए। कैसा लगा होगा उस वक्त, जब मेरी बाहें सूनी कर दी गयी थीं?कैसे माफ कर देती उस आदमी को जिसने मेरी आत्मा पर ऐसा घाव लगाया था!

बेटे इन अनुभूतियों को नहीं समझ सकते। स्त्री होते तो शायद किसी दिन जरूर समझते, पर वे तो बस इतना समझते हैं कि मैं उन्हें प्यार नहीं करती। उन्हें जन्म देना नहीं चाहती थी, उनको पाला नहीं और उन्हें छोड़कर भाग गई। 

मैं उनकी नजरों में बस एक भागी हुई स्त्री हूँ। 

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Sushma Singh

Sushma Singh 10 months ago

Vansh

Vansh 10 months ago