विष कन्या - 38 in Hindi Classic Stories by Bhumika books and stories Free | विष कन्या - 38

विष कन्या - 38

       अपने पिता तेजप्रताप के विषय में सत्य जानकर लावण्या का ह्रदय टूट जाता है। वो रोने लगती है, विलाप करने लगती है। अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय पुत्री को इस दशा में देखकर तेजप्रताप अपने आप को लज्जित पाता है। उसे बहुत क्रोध आता है वो दौड़कर महाराज  इंद्रवर्मा के पास जाता हे और उनके कमर में लटकती म्यान से तलवार खींच लेता है और महाराज इंद्रवर्मा पर वार करने की कोशिश करता हे।


        ये सब पलक झपकते ही होता हे। कोई कुछ समझे उससे पहले सब हो जाता है। तभी  कुमार निकुंभ मध्य में आकर महाराज इंद्रवर्मा के प्राणों की रक्षा करते हे।


       तेजप्रताप बहुत क्रोधित हे वो चिल्ला रहा हे मुझे छोड़ दो में इस इंद्रवर्मा से उसके प्राण ले लूंगा, उसे जीने का कोई अधिकार नही है। 


       ये सब देखकर सब भयभीत हो जाते हैं की, अगर एक क्षण का भी विलंब होता और कुमार निकुंभ मध्य में आकर तेजप्रताप के वार को विफल नही करते तो कितना बड़ा अनर्थ हो जाता।


       महाराज ने ऊंचे स्वर में सैनिकों को आवाज दी सैनिक दौड़ते हुए कक्ष में आए। इस अपराधी और  षड्यंत्रकारी तेजप्रताप को यहां से लेकर जाओ और काराग्रह में डाल दो अन्यथा हम यहीं इस समय उसका वध कर बैठेंगे


       सैनिकों ने तेजप्रताप को पकड़ लिया और बेडियो में जकड़ लिया। तेजप्रताप क्रोधित होकर खींचा तानी कर रहा है और सैनिक उसको वश में करने का प्रयास कर रहे हैं। ये दृश्य देखकर लावण्या को बहुत पीड़ा हो रही हे। उसके लिए उसका पिता आदर्श व्यक्ति था, उसने कभी स्वप्न में भी नही सोचाथा की उस पिता को वो कभी इस दशा में भी देखेंगी।


       सैनिक तेजप्रताप को बेड़ियों में बांधकर घसीटते हुए कक्ष से काराग्रह की और ले जा रहे हैं  इस दृश्य को देख कनकपुर के महाराज भानुप्रताप लज्जित और दुखी हैं। वो तेजप्रताप  के समीप गए, तेजप्रताप उनसे आंखे नही मिला पा रहा है।


       ये क्या किया तुमने तेजप्रताप? अपनी प्रतिशोध की अग्नि में इतना अंध हो गए की इस अग्नि में हमारे कुल की मान, मर्यादा, सम्मान सब जला दिया? तुमने हमारे कुल को कलंकित कर दिया? क्या आवश्यकता थी ये सब करने की? 


       दो राज्य परस्पर शत्रु ना बन जाए इस लिए हमारी बहन ने जिस बात को अपने ह्रदय के किसी कोने में छुपाकर रख्खी तुमने उसी बात केलिए ये नीच और घिनौना षडयंत्र रचा? तुमने हमारी बहन के त्याग और बलिदान को लज्जित कर दिया। हमारी बहन की आत्मा जहां कहीं भी होगी तुम्हे पीड़ा से देख रही होंगी।


        बाल्यावस्था से हमे हमारे माता पिता और गुरुजनों से ये सिख मिली हे की, जैसे आग कभी आग नही बुझा सकती ऐसे ही प्रतिशोध की अग्नि को कभी क्रोधाग्नि शांत नही कर सकती। तुमने प्रतिशोध और क्रोध में हमारे संस्कारों को लज्जित कर दिया तुमने ऐसा क्यूं किया  तेजप्रताप?


       तेजप्रताप अपने जेष्ठ के प्रश्नों का उत्तर नही दे सकता था। वो लज्जित होकर कक्ष के बाहर चल पड़ा। महाराज इंद्रवर्मा हम आपके अपराधी हैं, आप हमे जो दंड दे हमे स्वीकार है, आप हमे भी कारागृह में डाल दीजिए, मृत्यु दंड दे दीजिए किंतु हमारे कारण हमारी प्रजा को दंडित मत कीजिएगा ये हमारी आपसे करबद्ध विनती है। भानुप्रताप हाथ जोड़े महाराज इंद्रवर्मा से विनती करने लगे।


       महाराज अपनी जगह से तेज गति से भानुप्रताप के समीप आए, ये आप क्या कर रहे हे भानुप्रताप, जो अपराध आपने किया ही नहीं उसके लिए भला आप क्यों क्षमा मांग रहे हैं, और रही बात दंड की तो विजयगढ़ का सुनहरा इतिहास हे की उसने कभी निर्दोष व्यक्ति को दंडित नही किया। 


       जो हुआ उसमे आपकी एवम आपके राज्य की प्रजा की कोई गलती नही है इस लिए निश्चिंत रहिए आपको और आपकी प्रजाको ना अकारण दंडित किया जाएगा और न ही आपका राज्य आपसे छीना जाएगा।


       महाराज ने उचित कहा भानुप्रताप विजयगढ़ हमेशा  से न्याय प्रिय रहा है, राजगुरु ने कहा। किंतु मैं तो अपराधी हुं ना मेरे लिए क्या दंड हैं महाराज? लावण्या ने लज्जा से शीश झुकाए महाराज से कहा। हम तो न चाहते हुए भी अनजाने में ही सही किंतु अपने पिता के षडयंत्र में सम्मिलित तो गए थे कृपया हमे भी मृत्युदंड दे दीजिए। 


       नही पुत्री तुम तो निश्छल हो, तुमने तो पूरे मन से लगन से राजकुमारी वृषाली की दिन रात ना देखते हुए सेवा और।सहायता की है, तुम तो हमारे लिए हमारी पुत्री के समान हो। महाराज इंद्रवर्मा ने लावण्या की ओर देखते हुए कहा। महाराज इंद्रवर्मा के विशाल ह्रदय को देख सब प्रसन्न हो गए।


       लावण्या तुम हमारी सखी थी और हमेशा रहोगी। हमारे मन में जो स्नेह तुम्हारे लिए ये सब ज्ञात होने से पूर्व था वही स्नेह अभी हे और रहेगा। वृषाली ने ऐसा कहते हुए लावण्या को गले लगा लिया।


क्रमशः.......


       




       


       
 

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