नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 3 in Hindi Social Stories by राज बोहरे books and stories Free | नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 3

नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 3

राजेन्द्र लहरिया-नाट्यपुरुष 3

 

उसके बाद दोनों खड़े हुए और आंगन में जाने के लिए झोंपड़ी के द्वार की ओर मुड़े; तो अचानक उन्हें लगा कि मँड़ैया में अभी-अभी जलाये दोनों दीये बुझ गये हैं: मँड़ैया के द्वार में अपना-अपना सूखा-सा मुँह लिये सोना और रामू खड़े थे!...

 

क्यू में लगा बूढ़ा अब देख रहा था: रंग-मंच पर मंगलिया एवं श्यामा; और मँडैय़ा के द्वार में खड़े उनके दोनों बच्चों-सोना और रामू - के मासूम रुखे-सूखे-भूखे चेहरों को पीली रौशनी का वृत्त डाल कर उजागर किया गया है; और उसके साथ ही वाइलिन का मंद्र स्वर उभरता है - ऐसा मंद्र - करुणाई स्वर जो दर्शकों के भीतर रुदन और हाहाकार पैदा करता हुआ कुछ देर तक माहौल पर तारी रहता है। उसके बाद मंच पर मौजूद वह दृश्य और स्वर धीरे-धीरे अँधेरे में विलीन हो जाते हैं।...

 

इस बीच बूढ़े का चेहरा पसीने से तर-बतर हो गया था। उसने रुमाल से चेहरे को पोंछा; और फिर उस मंच की तरफ़ देखा, जिस पर 'महामहिमावान’ का स्वागत हो रहा था। बूढ़े के आगे लगे लोगों की क़तार अभी बहुत लंबी थी।

तो बूढ़ा फिर अपने रंग-मंच का हो लिया:

 

रंग-मंच का एक-तिहाई भाग लाल रौशनी से उजागर होता है - ठीक रक्त की तरह के लाल रंग की रौशनी से। उसके बाद पाश्र्व से निकल कर एक आदमी उस लाल रौशनी में दाख़िल होता है, जिसका हुलिया कपड़ों-लत्तों और शक्ल-सूरत से फटेहाली और बदहाली का है। ख़ास बात यह है कि उसने अपने दाँये कंधे पर कुछ उठाया हुआ है- कुछ ऐसा जो उसके कंधे के आगे की तरफ़ और पीछे की तरफ़ भी लंबाई में तना हुआ-सा एक मैले कपड़े में लिपटा हुआ है; और जिसके वज़न के कारण उस आदमी की टाँगें डगमगाती-सी चाल से। तभी नेपथ्य से सूत्रधार की आवाज़ सुनाई देती है, ''यह है... आपकी ही दुनिया का एक आदमी! आपके ही जैसा एक इंसान! ...पर इसकी मुसीबत यह है कि इसने अपने जन्म से लेकर अब तक लगातार ग़रीबी की मार झेली है... ग़रीबी भी ऐसी क्रूर कि उसको इस पर कभी क्षण भर को भी दया नहीं आई; और उसी के कारण इसकी घरवाली एक दिन बीमार पड़ गयी! ऐसी बीमार कि उसका इलाज कराना ज़रूरी हो गया! तो इस आदमी ने उसका इलाज पहले तो गाँव के ही एक 'झोलाछाप डॉक्टर’ से कराया। पर उस 'झोलाछाप’ के इलाज से वह कई दिनों तक ठीक नहीं हुई, तो यह उसे ज़िला-शहर के सरकारी अस्पताल में लाया। वहाँ इसकी घरवाली का इलाज चलता रहा; पर उसके बावजूद एक दिन ऐसा आया, इसकी घरवाली अस्पताल के बिस्तर पर ही चल बसी। इस आदमी ने अपनी घरवाली को अपनी आँखों के सामने प्राण त्यागते देखा - इस आदमी ने अस्पातल के बिस्तर पर अपनी घरवाली की अचानक खुली रह गई आँखों को देखा, तो इसने ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर को बताया। डॉक्टर ने आकर इसकी घरवाली की नब्ज पकड़ी, जाँच-पड़ताल की; उसके बाद इस आदमी की तरफ़ देखते हुए निहायत मशीनी ढंग से कहा, 'तुम्हारी घरवाली नहीं रही।’ डॉक्टर की बात सुनकर यह आदमी जैसे सकते में आ गया था। इसने ऐसा तो कभी नहीं सोचा था कि इसके कंधे से कंधा जोड़कर मेहनत-मजूरी करने वाली इसकी घरवाली यों अचानक इसे छोड़ कर चली जावेगी!... इसने घरवाली की खुली हुई आँखों पर हथेली फेर कर बंद किया था। उसके बाद यह कुछ देर तक किंकत्र्तव्यविमूढ़-सा बना रहा। फिर उसे चेत आया कि अब इसको अपनी घरवाली की मिट्टी को गाँव ले जाना है! पर मुश्किल यह थी कि इसकी जेब ख़ाली थी- उसमें एक पैसा भी न था! इसी बीच अस्पताल-कर्मियों ने आकर इसकी घरवाली के शव को बेड से उतार कर बेड खाली कर दिया।... उसके बाद इस आदमी ने अपनी समस्या अस्पताल के डॉक्टर को बताई। उसने इसे एक अन्य डॉक्टर के पास भेज दिया। इसने उस डॉक्टर के पास जाकर गुहार लगाई कि इसकी घरवाली की मिट्टी को किसी तरह इसके गाँव तक पहुँचाने का इंतजाम हो जाये तो बड़ी मेहरबानी होगी; क्योंकि इसके पास उसे गाँव तक ले जाने के लिए पैसा नहीं है!.... उसके बाद इस आदमी को अस्पताल में इधर से उधर, उधर से इधर भटकाते रहा गया; और आख़िर में कहा गया कि अस्पताल के पास 'शव वाहन उपलब्ध नहीं है!...’ तो मजबूरन यह आदमी अपनी घरवाली के शव को अपने गाँव तक ले जाने के लिए खुद ही 'शव वाहन’ बन गया... इसके दाँये कंधे के ऊपर मैले-से कपड़े में लिपटा हुआ जो कुछ आप देख रहे हैं, वह अस्पताल में मर गई इसकी घरवाली की मुर्दा देह है! और यह आदमी उसे अपने गाँव अपने घर ले जाने के लिए अपने कंधे पर ढो रहा है।’’

रंग-मंच की लाल रौशनी में, अपने कंधे पर कपड़े में लिपटी अपनी घरवाली की अब तक जकड़ कर सख्त हो चुकी मृत देह को लिये वह आदमी बदस्तूर अपनी डगमग चाल से आगे बढ़ रहा है...

तभी रंग-मंच का वह दो-तिहाई हिस्सा जो अब तक अँधेरे में गुम था, यकायक दूधिया रौशनी से नहा उठता है। इसके साथ ही उस उज्जवल रौशनी में कारों का एक काफिला नमूदार होता है - ऐसा काफ़िला, जिसके आगे चलती हुई कार के हूटर की कर्कश आवाज़ से मंच की फ़ज़ा भर उठती है। और नेपथ्य से सूत्रधार की आवाज़ गूँजती है, ''ये हैं सूबे के माननीय... मंत्री जी, जो एक मजलिस को संबोधित करने अपने अमला फैला और सुरक्षा-बंदोबस्त की कारों के साथ निकले हैं!...’’

रंग-मंच पर लाल रौशनी में अपनी पत्नी का शव कंधे पर ढोते आदमी का दृश्य; एवं दूधिया रौशनी में... मंत्री जी के कार-काफिले का दृश्य एक साथ दिखाई देते हैं!

बूढ़े के ज़ेहन में आइडिया है कि रंग-मंच पर चलती कारों के रूप में गत्ते से बने कार-मॉडलों को ओढ़े रंग-कलाकार चल रहे हैं; और हूटर आदि की आवाज़ों को नेपथ्य से प्ले किया जा रहा है...

 

बूढ़े ने एक बार फिर रूमाल से चेहरे का पसीना पोंछा; और फिर 'महामहिमावान’ के अभिनंदन मंच की ओर देखा। वह अब तक क्यू में मंच से इतनी दूर (दरअसल इतने पास) पहुँच चुका था कि अब उसे 'महामहिमावान’ की शक्ल का आभास होने लगा था - ख़ास कर 'महामहिमावान’ के सिर के सफेद बाल, उसकी निगाह की जद में आसानी से स्पष्ट हो रहे थे - उन सफेद बालों के ऊपर से गुज़रती हुई स्वागतार्थियों की फूलमालाएँ 'महामहिमावान’ के गले तक पहुँच रही थीं...

और अचानक बूढ़ा एक स्मृति के घटाटोप से घिर गया। उसकी स्मृति-चेतना में सफेद बालों वाले उस आदमी का किरदार आकार लेने लगा, जिसके बारे में उसे रणजीत ने बताया था...

...रणजीत से बूढ़े की मुलाकात कुछ साल पहले हुई थी... उस दिन उसने 'अंधेर नगरी’ मंच पर उतारा था। सभागार खचाखच भरा था... उस मंचन में सभागार अनेक बार तालियों से गूंजा था। नाटक की समाप्ति के बाद, एक व्यक्ति उससे आ कर मिला था। उस व्यक्ति के बात करने में ही नहीं, हाव-भाव में भी नाटक-प्रस्तुति की तारीफ़ थी। उसने अपना नाम रणजीत बताया था, और उससे घर पर मिलने की इच्छा जाहिर की थी। उस व्यक्ति की आँखों में एक बेलौस सच्चाई दिखाई दे रही थी; इसलिए उसे मिलने के लिए अगले हफ्ते का दिन-समय दे दिया था।

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ramgopal bhavuk

ramgopal bhavuk Matrubharti Verified 6 months ago