Woman flying in the forbidden space - 2 in Hindi Novel Episodes by Ranjana Jaiswal books and stories PDF | वर्जित व्योम में उड़ती स्त्री - 2

वर्जित व्योम में उड़ती स्त्री - 2

भाग दो-

कभी-कभी अपने ठगे जाने का एहसास मन को उदासियों से भर देता है और एक साथ ही क्रोध, विवशता, मोह, ग्लानि, घृणा जैसे भावों से जूझने लगती हूँ | सोचती हूँ निश्चय ही मुझमें कुछ गंभीर दोष होंगे, जिसके कारण मैं एक असफल जीवन जी रही हूँ | या फिर मैं सचमुच ही इतनी महत्वाकांक्षी हूँ कि कोई मेरा साथ नहीं दे सकता | अपनी महत्वाकांक्षा के बीज बचपन में ढूंढती हूँ | गहरी दृष्टि से निरीक्षण करती हूँ तो देखती हूँ कि मैं बचपन से ही  उपेक्षित, हीन- भावना से ग्रस्त, भयभीत, उदास, निराशावादी लड़की थी, जो इस डर से सुख-स्वप्न नहीं देखती थी कि वे कभी पूरे नहीं होंगे | मैं रूप-रंग से साधारण होते हुए भी महसूस करती है कि लोगों की दृष्टि मेरे प्रति कामुक है इसलिए मैं संकुचित होकर खुद से भी खुद को छिपाए रखती थी | हर समय भयग्रस्त रहती है कि कोई मुझे छू न दे | एक-एक सीढ़ी आगे बढ़ती थी | महत्वाकांक्षा तो जैसे मुझमें थी ही नहीं | 
फिर मेरे जीवन में तुम आए । मेरे जीवन के पहले पुरूष!मेरी शराफत, विद्वता और सौंदर्य से प्रभावित ...खुद विवाह का प्रस्ताव लिए | मैंने अपने भीतर जबरन आकर्षण पैदा किया क्योंकि तुम जीवन साथी बनने वाले थे । शादी के बाद जब मेरा आकर्षण दीवानेपन तक पहुंचा, तुमने अपनी क्षुद्रता दिखा दी | मेरे भीतर छिपी अग्नि से आशंकित ...भयभीत, हीनता से ग्रस्त तुम बार-बार मुझे कुचलने का प्रयास करते रहे | मैं किशोरी थी और खुद से भी अंजान थी | तुम्हारे अत्याचार से भयभीत, उदास, दुखी मैं किताबों में सुकून ढूंढने लगी तो तुमने महत्वाकांक्षी कहकर मुझे सताया | आखिर मेरे भीतर की अग्नि जली और जन्म-जन्मांतर का कहा जाने वाला वह रिश्ता झुलस गया | 
उम्र थी तो प्रेम के और भी रिश्ते बने पर कोई भी टिकाऊ न हुआ। 
तब मैंने सोच लिया कि अब मैं प्रेम की खुशबू को कैद नहीं करूंगी | प्रेम आएगा स्वतंत्र, जाएगा भी स्वतंत्र | कोई उम्मीद...कोई अपेक्षा ...कोई बंधन नहीं | एकाएक मुझे लगा मेरा मन फूल -सा हल्का हो गया | राहु- केतुओं ने जैसे अब तक मेरे व्यक्तित्व रूपी सूर्य को ढँक लिया था | अब मैं मुक्त हूँ ..मैं उन्हें क्षमा कर दूँगी  | वे इस लायक भी नहीं कि याद रखे जाएँ | वे दीन-हीन भिखारी थे | मुझसे दान लिया | उनके पास भावनाओं की संपत्ति नहीं थी, मैं ही अपने पलड़े से उनके पलड़े में भाव-पुष्प डालती रही | अब मेरी समझ में आ गया कि पुरूष से प्रेम की उम्मीद ही गलत है | लोग अतीत से सबक लेते हैं पर मैं तो छाछ की जली दूध पीने लगी| मुझे सोचना चाहिए था कि आखिर मीरा ने कृष्ण मूर्ति से प्रेम क्यों किया ? क्या उसके समय में पुरूषों का अकाल था ? क्या एक भी पुरूष इस योग्य नहीं था कि महादेवी वर्मा उससे प्रेम कर पातीं | वे दोनों जानती थीं कि पुरूष प्रेम के काबिल ही नहीं होता | कम से कम उस तरह से प्रेम के तो कतई नहीं, जिस तरह का प्रेम स्त्री करती है | इस धरती पर ईश्वर भी पुरूष रूप में आता है तो प्रेम नहीं कर पाता | क्या राम ने सीता से सच्चा प्यार किया ? क्या कृष्ण ने राधा को नहीं छला ? मैं इन सबसे सबक लूँगी और पुरूषों से दूर रहूँगी | 
पर वही सूर की पीड़ा –बिना साकार के मन ’निरालंब कित धावे’| कोई बात नहीं मेरा भी आलंबन होगा, जैसे मीरा का था...महादेवी का था पर कृष्ण नहीं ....कोई और ...शायद   वही ....वही, जिसके भरम में मैं अभी तक छली जाती रही हूँ | 
अगर मेरी किस्मत में सच्चा प्यार होगा तो वह जरूर आएगा | इतना सोचते ही जाने कैसे मेरे चारों तरफ घंटियाँ बजने लगीं | मेरे भीतर जैसे एक नयी स्त्री पैदा हुई | तन...मन से पवित्र...निर्दोष....निष्पाप ...अब मैं नए प्रेम के योग्य हो गयी हूँ | कहीं से खुशबू आ रही है ....मेरा  तन-मन उत्फुल्लित है ...मैं सुन रही है एक मधुर धुन ...मैं ध्यान से देखती हूँ दीवार पर तीन अक्षर खुद गए हैं | उसी से आ रही है वह खुशबू ....वह मधुर धुन ...| वह आ रहा है रूप धारण कर ...वही जो मेरी आत्मा में बसता है | नहीं टूटेगा प्रेम का यह सिलसिला ....जारी रहेगा जन्म-जन्मांतर तक |  

तुमसे कैसा रिश्ता था मेरा | तुम्हारे आते ही मैं सारे गिले-शिकवे भूलकर तुम्हें समर्पित हो जाती थी | तुम भी जब तक मेरे साथ रहते पूरी आस्था और प्रेम से समर्पित रहते पर जाते-जाते कुछ ऐसा कह जाते, जिसके दंश से मैं तब तक छटपटाती रहती, जब तक तुम दुबारा आकर नहीं मिलते | रात-दिन तुममें ही उलझी रहती ...किसी काम में मन नहीं लगता ...जीने को भी मन नहीं करता, पर जीती रहती जाने किस प्रत्याशा में!  
मैं एक साहसी स्त्री थी, अकेली रहती थी, चीजों को लेकर मेरे मन में व्यर्थ की जटिलताएं नहीं थीं | मैं आम स्त्रियों से अलग थी | तुम मुझमें जिंदगी का नया अर्थ देखने लगे थे पर तुममें इतना साहस नहीं था कि स्थिति का ठीक से सामना कर सको | तुम झूठ और धोखाधड़ी के आधार पर सम्बन्धों को घसीटना चाहते थे | तुममें सब चीजों को अपने पक्ष में कर लेने की मर्दाना चतुराई थी | तुम एक लहीम -शहीम पुरूष थे | जब तुम मुझसे मिले तब मेरी दोस्ती के लिए लालायित थे | धीरे-धीरे तुम मेरे घर तक पहुँच गए | तुमने मुझसे प्रेम की याचना की और एक दिन मैं जाने किस भावना के तहत तुम्हारे प्रेम का प्रत्युत्तर दे बैठी | शायद मेरा अकेलापन मुझ पर हावी हो गया था या फिर देह-मन की जरूरतें बढ़ गई थीं | कुछ तो था कि मैं तुम्हारे करीब हो गई, पर मुझे पाते ही तुम बदल गए | बात-बात पर प्रताड़ित करने लगे | तुम ना तो रिश्ता तोड़ते थे, ना समाज के सामने जोड़ने को तैयार थे | तुम एक पाखंडी पुरूष थे, फिर भी मैं तुम्हें छोड़ नहीं पा रही थी |   
मैं जरूरत से ज्यादा तुम्हारे प्रति गंभीर हो गयी थी पर तुम्हारा कुछ निश्चित नहीं था कि तुम मेरे प्रति कितने गंभीर हो| कभी तो तुम बहुत अपने, बहुत करीबी लगते तो कभी इतने पराये ...इतना दूर कि लगता ही नहीं था यह तुम्हीं हो जिसे मैं प्यार करती हूँ | मैं क्या करूं? तुम कभी खुलकर बात भी तो नहीं करते | दो-चार वाक्य बोलोगे या फिर सिर्फ आँखों से बात करोगे | न इंकार न इकरार | एक तो अकेले मिलते नहीं | कुछ देर को मिलोगे तो बस चुपचाप प्यार करोगे ...न कुछ बोलोगे न बोलने दोगे | उस दिन मैं ही बोली –अब नहीं आऊँगी तुमसे मिलने तो मेरे अधरों पर अपनी एक अंगुली से मारते हुए बोले –फिर बोलो कि नहीं आऊँगी ..तुमसे मिले बिना कैसे रहूँगा मैं .....? 
और मैं पिघल गयी | तुमसे ज्यादा मिलने लगी, तब तुम कहने लगे--रोज-रोज मत आया करो, लोग शक करेंगे | पंद्रह दिन में बस एक बार | 
मेरे लिए तो एक पल भी तुम्हारे बगैर जीना मुश्किल था और तुम पंद्रह दिन की बात करते थे | पर तुम जो भी कहते मुझे करना ही पड़ता| हम दोनों का राज़दार एक मित्र था | वह मुझे समझा चुका था कि तुम अपनी शर्तों पर ही मुझसे रिश्ता रखोगे | मुझे तुम्हारी पद-प्रतिष्ठा, परिवार, समाज सबका ध्यान रखना होगा | प्रेम का स्वाभिमान मुझे भी मान करने का हक देता था पर तुम नहीं | कभी मैं रूठ जाती तो तुम्हें विशेष परवाह नहीं होती थी | मैं खुद गुस्सा करती और खुद तुम्हारे पास दौड़ी चली आती | मेरी भावुकता पर तुम हँसते और मुझे ‘बावली’ कहते | सच ही मैं दीवानेपन की सीमा तक जा पहुंची थी पर तुम अपना संतुलन बनाए हुए थे | तुम सबके सामने मुझसे सामान्य परिचित -सा व्यवहार करते, पर एकांत मिलते ही बेहद रोमांटिक हो जाते | तुम्हारे मन के चोर ने तुम्हें बेहद सतर्क बना दिया था | मुझे बाहर देखकर भी तुम अनदेखा कर देते इसलिए कहीं बाहर मिलने का सवाल ही नहीं था | तुम्हारे घर आती तो पर्दा गिराकर बैठते। ऐसे समय अपने घर आने को कहते, जब बाहर के लोग न आते हों और घर के बाकी लोग सो रहे हों | अपने घर आने वाली स्त्रियों और लड़कियों के सामने तो और भी सावधान रहते | भरसक तो यही चाहते कि मैं उनके सामने ही ना पडूँ| कभी-कभी मुझे ये बातें बहुत बुरी लगतीं –‘प्यार किया तो डरना क्या’- पर यह सिर्फ मैं सोचती थी | तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा जान से प्यारी थी | तुम्हारे भाई-बहन मुझे सम्मान देते थे | उन्हें हमारे रिश्ते के बारे में पता था पर वे इस बात को प्रकट नहीं करते थे | 
एक दिन तुम्हारी बहन ने मुझसे फिल्म दिखाने को कहा | मैंने उससे कहा कि भैया से पूछ लेना फिर चलेंगे | पर तुमने मना कर दिया | तुम नहीं चाहते थे कि बाहर के लोग यह जाने कि मेरा तुम्हारे परिवार से करीबी रिश्ता है | उस दिन मुझे बहुत दुख हुआ | पता नहीं यह तुम्हारी कायरता या बुज़दिली थी या अतिरिक्त सावधानी थी या फिर कुछ और | 
पर मैं भी कम बुजदिल नहीं थी | पाँच सालों की अंतरंगता के बाद भी मैं इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाई कि तुमसे कह सकूँ कि तुम मुझसे ब्याह कर लो | शायद मैं डरती थी कि तुम इंकार न कर दो | एक तो तुमने किसी से भी विवाह न करने का फैसला किया था | दूसरे मैं खुद को अपने अतीत के कारण तुम्हारे योग्य नहीं पाती थी | ये अलग बात थी कि जब कभी हम दोनों आईने के सामने खड़े होते तो आईना भी इस जोड़ी पर मुग्ध हो जाता | पर तन-मन से सुंदर और शिक्षित होने से क्या फर्क पड़ता है | मैं जाति, पद और स्तर में तुमसे छोटी थी | तुम्हारा प्यार ही मेरा एकमात्र धन था | कहीं विवाह की जिद से तुम मुझसे दूर हो गए तो मैं यह सदमा कैसे सह सकूँगी ? शायद उसी दिन मर जाऊँ| मेरी सारी तेजस्विता तुम्हारे आगे फीकी पड़ जाती थी | प्रेम में अहम का त्याग करना ही पड़ता है पर क्या सिर्फ एक को ? 
आज मन बहुत उदास है | पता नहीं यह क्या होता जा रहा है मुझे | शायद कोई रोग है ....हर समय का अकेलापन अब यूँ क्यों काटने लगा है, नहीं जानती | शायद तुम्हारे परिचय ने मुझे खुद से बेखबर कर दिया है वरना यह सब क्यों ? 
मैं जिंदगी के पिछले अध्याय समाप्त कर अकेलेपन की आदी हो चुकी थी पर अब अकेले रहा नहीं जाता | काश, तुम मेरे हो सकते | 
जीवन में जब भी मैंने बाहें फैलाई, केवल शून्यता और रिक्तता ही हाथ लगी | फिर हर परिचय से डर लगने लगा | हर आदमी से नफरत हो गयी| जैसे अमृत के लिए तरसते मन को किसी ने जहर दे दिया हो | आत्मा तक जल उठी ....फिर वह सब पचा गयी | जब बर्दास्त से बाहर हो गया तो मैंने उस जिंदगी को बड़ी निर्दयता से काटकर अपनी जिंदगी से बाहर कर दिया | मैंने स्वयं अपने आप, हाँ और समझौते मैं नहीं कर सकी ....| फिर अपनी बुझी हुई जिंदगी  ....सुलगता –सा सब कुछ | कभी-कभी अंतर धू -धू कर जल उठता है ...मैं अपने-आप से दूर भागती हूँ पर क्या करूं? 
मुझे चौराहे पर लटकाकर सब मेरा तमाशा देखना चाहते हैं | चौराहे की भीड़ ...उठती हुई अंगुलियाँ और उन सबके बीच में खड़ी अकेली मैं विद्रोह के लिए तत्पर हूँ ...जी चाहता था जो अंगुली उठे उसे काट डालूँ ....जो आवाज उठे उसके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँ । एक दिन मैंने बेझिझक सिर उठाकर अपने गिर्द जमी काई-कीचड़ को देखा। क्या यह सब मेरी नियति है? अन्यथा कोई तो मेरी पांखों की शुभ्रता को देख पाता । ...मैंने सब कुछ छोड़ दिया ....जीना भी ...| यंत्रवत जीती रही ....| 
फिर तुम मिले ...पतझर में सुगंध की कोंपल फूट गयी ....मुझे सब कुछ भाने लगा और मैंने खुद को फिर से संवार लिया | अपने –आप पुरूष वर्ग से नफरत खत्म हो गयी | सच ही जीना तभी अच्छा लगता है जब जिंदगी में कोई अपना हो ...यह अपनापन कटते ही जिंदगी बेकार लगने लगती है | खीझ, उलझन, बेचैनी, सबसे कटे रहना ...यह सब क्यों होता है ...जानती हूँ | मेरा रोग बढ़ता जा रहा है निदान तुम उपचार भी तुम| फिर यों मेरा तमाशा क्यों देखते हो ? मैं तो तुमसे अलग होने की कल्पना से भी परेशान हो जाती हूँ | क्या मैंने तुम्हें समझने में भूल की है ? क्या तुम वह हो ही नहीं जिसे मैंने तुममें देखा, जाना और समझा था | 
ये रातें खत्म होती हैं पर ये अंधेरे ..ये धुंधलके शेष नहीं होते | 
आजकल बैठे-बैठे मन उचाट हो जाता है | पर जब तुम्हारे साथ होती थी तब ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत बड़ी निधि हाथ लग गयी हो | मैं उस वक्त को कहीं बांध कर रख लेना चाहती थी ...उस ढेर-सारी सुगंध को कहीं छिपाकर समेट लेना चाहती थी...| 
समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा है | तुम्हें पाकर मुझे अपनी व्यथा से रिहाई मिली थी और अपने भीतर एक खुशी पाई थी, पर वह खुशी अब चुक रही है | फिर से तीतेपन का एहसास मन में एक अनजाने दर्द को जन्म दे रहा है | मेरे मन के अंदर कोई परकटा पक्षी अपनी बैंजनी उड़ाने भरने को ब्याकुल है | 
यह सच है कि अब तुम मुझसे इतनी दूर चले गए हो कि मिलने की संभावना ही नहीं रह गयी | फिर भी तुम दूर नहीं हो | 
जिस स्त्री ने तप्त रेत का अनुभव किया था, उसे खजूर की छांव कब शीतल कर सकती थी ? तुमने मेरी दैनिक समस्याओं, संघर्षों व तपन से दूरी ही बनाए रखी | फिर तुमने शादी कर ली | मैं बहुत ही अतृप्त व अकेलेपन की गिरफ्त में फड़फड़ाती स्त्री थी लेकिन पत्नी की पीड़ा से परिचित स्त्री भी थी इसीलिए मेरी भावनाओं पर कोमा लग गया, मैं ठहर गयी |  सुदूर नियति के उस कोने से एक बवंडर उठकर मेरे मन में समा गया| अंदर–अंदर मेरे अस्तित्व, मेरी आत्मा, मेरे प्राणों का दम घुटने लगा परंतु मन के इस अंधड़ में कहीं आलोक का कतरा रह गया था, जो दीप-स्तम्भ की तरह मुझे फिर आगे बढ़ाता रहा –आलोक प्रेम का .....स्मृतियों  का ....|  
केवल कैलेंडर बदलने से रिश्ते नहीं बदलते | गत साल के बकाया का भुगतान नए साल में करना होता है | 
न जाने विधाता को मुझसे क्या वैर है ? जिंदगी में यूं ही क्या कम गम थे कि एक नया दर्द लगा दिया ...एक ऐसा दर्द जो चिता के साथ जाएगा | अनजाने में अनायास ..| पर मुझे क्या अधिकार है कि अपने काँटों में तुम्हें घसीटूँ ? क्यों अपेक्षा करूँ कि तुम मुझे अपनाओ? यह तो स्वार्थ हुआ और प्यार तो पूजा का दूसरा नाम है | मेरे जीवन में इतनी उलझने हैं कि कोई भी उसे सुलझाने में चकरा जाएगा | किसी भी व्यक्ति में मेरे पूरे सच को स्वीकारने का नैतिक साहस नहीं हो सकता| वैसे भी उजाले में हाथ थामने को तैयार व्यक्ति कम होते हैं फिर मैं तुम पर क्यों दबाव डालूँ | तुमने तो मेरी काल्पनिक प्रिय मूर्ति को साकार किया है ...| मुझे ज्ञात है तुम्हारा प्रेम सिर्फ एक आकर्षण है....लालसा है और कुछ नहीं | तुम मेरे जीवन -संघर्ष में दो कदम भी साथ नहीं चल पाओगे | जिसने दुख जाना ही नहीं, वह दुख का साथ कैसे दे सकता है ? मेरा जीवन तो समाप्त –प्राय ही है | इतनी ही उम्र में मैंने सब कुछ देख लिया है, पर तुम्हें तो अभी बहुत कुछ देखना बाकी है | 
मुझे फिर से संगीत भाने लगा है, रोमांटिक फिल्में अच्छी लगने लगी हैं, जिन्हें मैं लगभग छोड़ चुकी थी | तुम जो आ गए हो | तुम, जिसे अपने जीवन में होने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी | 
पहले भी तुम प्रेम की बातें किया करते थे, जिन्हें बचकाना समझ कर मैं टाल दिया करती थी, पर न जाने कब और क्यों तुम्हारी बातें भाने लगीं ....सच लगने लगीं | फिर भी मैने खुद को रोका ...तुम्हें भी समझाया कि यह सब गलत है | हमारा आपस में कोई जोड़ नहीं | न उम्र में ...न अन्य चीजों में | तुम मेरा साथ नहीं दे पाआगे पर तुम मानने को तैयार नहीं थे | तुम मेरे द्वारा गिनाए गए बंधनों और रूकावटों को बहाना मानकर आत्महत्या की धमकी देने लगे | तुम ....वह सब कुछ कहने और करने लगे, जो मेरी कल्पना में बसा नायक ही कर सकता था | दिन में कई –कई बार फोन करते ...रूठती तो मनाते ...फिर तुम विवाह की बात करने लगे और परित्यक्ता होने के बावजूद न जाने मेरा मन इतना कुंवारा क्यों था कि मुझे विवाह के सपने भाने लगे | ऐसा लगा ही नहीं कि मुझे ऐसे सपने नहीं देखने चाहिए | ’प्रेम कोई बंधन नहीं मानता’ क्या यही सच था ? मैं कभी गंभीर भी होती तो तुम मुझे अपने बहाव में बहा ले जाते । मैं पहले कभी इस तरह कमजोर नहीं पड़ी थी | तुम मुझे अपनी दुल्हन कहते और कई-कई घंटे प्रेम की बात करते | मैं कभी तुमको टालती ....कभी डाँटती ...कभी समझाती और फिर तुम्हीं में डूब जाती | तुम्हारा प्यार-मनुहार मन को अच्छा लगता | मैं सब कुछ भूलने लगी | हमेशा एक नशा –सा छाया रहता | फोन ही हमारे मिलने का माध्यम था | कई बार तुम मिलने भी आए | तुम अपनी बाहें खोल देते और मैं उसमें समा जाती | तुम्हें सीने से लगाकर मेरी छटपटाहट मिट जाती | तुमने कभी मुझसे इससे अधिक कुछ नहीं मांगा | तुम बड़े विश्वास से कहते ---तुम मेरी हो ....जानता हूँ तुम मिलोगी ही | जब चाहूँ तुम्हें पूरी तरह पा सकता हूँ | पर मैंने तुम्हारे शरीर को पाने के लिए तुम्हें प्यार नहीं किया है | बस अपना प्यार मुझे दो | हाँ, मेरा तन-मन –धन सब तुम्हारा है ....जो चाहे ले लो | ’
तुम यह भी कहते कि तुम दुनिया के लिए बड़ी रहना ...मेरे लिए नहीं ...मैंने तुममें हमेशा एक छोटी बच्ची देखी है ...भोली-भाली मासूम बच्ची...छली जाती बच्ची ...और उसी से प्यार हो गया मुझे ...तुम हमेशा इसी रूप में रहना | गुड़िया -सी प्यारी बच्ची की तरह | और सच ही मैं गुड़िया बन गयी, जिसकी डोर तुम्हारे हाथ में थी | तुम मुझे नियमित फोन करते, चाहे कितने भी व्यस्त हो और मैं भी सारा काम छोड़कर फोन के पास ही बैठी रहती | मुझ पर नई प्रेमिका -सा दीवानापन छा गया था | 
पर अब तुमको करीब से जानने और तुम्हारी बातें सुनने के बाद एक गहरा पछतावा –सा उठता है कि मैंने अपनी भावनाएँ गलत जगह संप्रेषित कर दी है | न जाने क्यों मैं तुम्हारे प्रति कमजोर पड़ गयी और यह पछतावा मुझे सालता है | मुझे ऐसा क्यों लगने लगा था कि तुम औरों से भिन्न हो और तुम्हारे साथ मैं एक अच्छा जीवन जी सकती हूँ | शायद मेरी मन की चाहत ने तुमको मनचाहा रूप दे दिया था । तुम तो सदा से ऐसे ही थे, जैसे आज हो | असाधारणता की मुझे चाह नहीं पर मेरा मन यह जरूर चाहता है कि जिसे मैं प्यार करूँ ....उसमें आम लोगों से हटकर कोई बात हो और वह चीज मैंने तुममें देखी थी | वह चीज क्या थी ? अब तक नहीं समझ सकी हूँ, एक नया अनुभव जरूर हुआ है |  
अब मैं बदल गई हूं। सच भी है कि स्त्री पहली बार तब समर्पित होती है जब किसी की स्नेह- पूर्ण दृष्टि उसके तन-मन को आच्छादित कर लेती है, तब वह कुछ लेती है कुछ देती है | उसमें कोई स्वार्थ नहीं होता पर दूसरी बार जब वह समर्पित होती है तब वह किन्हीं भी कारणों से…..उस स्नेह-धूप से वंचित हो चुकी होती है । अब उसके पास देने को कुछ नहीं होता | केवल लेने ही लेने को होता है | उसकी मान्यता होती है कि जो भी दे सकती थी ....दे चुकी | अब जितना ले सकते हो लो, लिए चलो | जो वह देती है वह भी उसका अपना नहीं होता, उस निर्मम पुरुष का ही समझकर वह दिया करती है | वह स्वयं भी अपनी नहीं होती | 
दरअसल जो मुझमें है वह मैं दूसरों में तलाशती रही हूँ | नहीं मिला तो दुख पाती रही और खुद को भाग्यहीन कहती रही | यह मेरी कैसी नादानी है !जो खाली थे .....खोखले थे ...मेरी भावनाओं ने जिन्हें एक सुरूप दिया ...जिन्हें भरा ....वे भला मुझे क्या दे सकते थे ? उन्होंने मुझसे ही मांगा ....लिया और मैं खुशी –खुशी सब कुछ उलीचती रही | पर वे छोटे पात्र थे जल्दी भर गए ....इतना भरे कि फट पड़े और मेरा सारा देय गलत जगहों पर बह गया | मैं बदली की तरह खाली होती रही पर खाली रहना मेरा स्वभाव न था। मैं ...फिर ...फिर भरी और फिर....फिर वही नियति !जिस समुद्र से मैं भरती रही, उसे खारा समझकर उससे दूर रही ... जबकि उसी से मेरा अस्तित्व था ....यह कैसी विडम्बना है ? जल से भरी होकर भी मैं इतनी प्यासी क्यों हूँ ? क्यों मैं खुद को दूसरों में तलाशती हूँ ...क्या चाहिए मुझे ? 
क्या घर !हाँ, अपना घर चाहती थी, जो किसी से नहीं मिला।  नहीं मिला, तो क्या हुआ अपनी मेहनत से एक छोटा –सा अपना घर बनाया तो है!कितनी स्त्रियों का होता है सिर्फ अपना घर ? ये मेरी बड़ी उपलब्धि है पर अपने घर से भी मैं खुश नहीं हूँ। मैं इस घर में तुमको देखना चाहती हूँ जो यहाँ नहीं हो सकते | मैंने यह घर शायद तुम्हारे साथ के लिए बनवाया था ....सजाया था ...पर तुम मेरे थे ही नहीं | तुम मेरे इस घर को सिर्फ अपने लिए चाहते थे | तुम किसी और के साथ मेरे इस घर में रहना चाहते थे | मेरे जीते-जी ये कैसे हो सकता था ? मैं या मेरा घर इस्तेमाल की चीज तो नहीं | दोनों ही शुद्ध भावनाओं से बने हुए हैं | कोई भावना- विहीन इसमें कैसे और कब तक रह सकता था? तुम चले गए | 
विडम्बना कि तुम्हारे बिना यह घर काटने को दौड़ता है ....बिखरा-बिखरा रहता है .....घर क्या बना .....तुम और भी दूर हो गए मुझसे ....मेरे सारे सपने आग पर लोटने लगे ....| क्यों ? 
शायद घर मेरे लिए महत्वपूर्ण नहीं था  .....कीमती थे तुम..जो मेरे नहीं थे और न हो सकते थे शायद इसीलिए मेरे नहीं हो सके | 
मैं अपनी नियति जानती थी इसीलिए पहले जब तुम मेरी ओर बढ़ते थे मैं पीछे हट जाती थी ...दुनियावी सारी बाधाएँ गिनाती थी | पर तुम कहाँ माने थे और मैं ही तुम्हारे सामने कहाँ दृढ़ रह पाई थी ? एक सैलाब आया था जिसमें सब कुछ बह गया था .....| कितने सुंदर—सुखद भावना -भरे दिन थे और कितने सुंदर सपनों से सजीं रातें ...लगता था कि कितना.....कितना कुछ मिल रहा है मुझे!पर क्या पता था कि वे सुख क्षणिक थे ......वे भरम थे ...खूबसूरत भरम !....तुम बदलने लगे और इस बात को छिपाते रहे पर सच कब तक छिप सकता था ? ......फिर तुम दूर चले गए ....इतने दूर कि मेरे हाथ तुम्हें छू नहीं सकते थे पर तुममें जो मेरा था, वह मेरे इतना निकट आ गया कि मेरा एक पल भी उससे जुदा नहीं है| अब तुम्हें क्या पता कि देह के भीतर एक आत्मा रहती है, जिसमें तुम्हारा ही रूप समाया है ...ईश्वर के अस्तित्व की तरह | जब कभी तुम अपने शरीर में आत्मा टटोलेगो तो शायद तुम्हें मेरी याद आए .....शायद तुम्हें लगे कि तुमने क्या खो दिया है ? 
सोचती हूँ क्या तुम्हें मेरी याद नहीं आती होगी ..? .बिना कुछ मांगे हरसिंगार की तरह झरने वाला मेरा प्यार कैसे भूल सकते हो तुम....? क्या आम स्त्रियों से अलग मेरा नि:स्वार्थ अस्तित्व तुम नहीं महसूसते होगे? क्या देह की कसावटों के बीच ढीला पड़ गया होगा मेरा प्यार !पता नहीं ...शायद हाँ ....शायद नहीं .....| मेरा औरों के जैसा न होना ही मेरे दुख का कारण है ....तो क्या मेरा दूसरों से अलग होना तुम्हें याद न होगा ? ...क्या इतना खुदगर्ज होता है इंसान ....!शायद हाँ ...परिस्थितियाँ कहती हैं.....समाज कहता है ...अनुभव कहते हैं ....पर हाय रे मन ...जाने क्यों स्वीकार नहीं कर पाता ये सच !वह कहता है जितना दिखाई...सुनाई पड़ता है उतना ही सच नहीं है | 
हर बार की तरह इस बार भी तुम्हारे चले जाने से मुझे तकलीफ हुई है | होनी चाहिए कि नहीं इस पर तमाम खयालात हो सकते हैं | इतनी बोल्ड लेडी को मजबूत होना चाहिए ....इतनी मजबूत कि बड़ी से बड़ी बात भी ऊपर से गुजर जाए ...ये क्या कि सामान्य स्त्री की तरह आँसू टपकाने लगे ...| हाँ, कई बार मैंने इसी बात के लिए खुद को लताड़ा है । क्यों प्रभावित होती हूँ किसी की बातों से ....? क्यों किसी की उपेक्षा पीड़ित करती है ? क्यों चाहती हूँ कि मुझे सामान्य स्त्री –सा सम्मान मिले? मैं सामान्य तो हूँ नहीं फिर......| क्या मैं नहीं जानती कि स्त्री को इस सम्मान की कितनी कीमत देनी पड़ती है ! ....क्या मैं दे सकी या दे पाऊँगी इतनी कीमत ! फिर क्यों ललकती हूँ उस सुख के लिए, जो उन्हें मिल रहा है ? विवाह...सिंदूर ...सुहाग ...बच्चे ...परिवार कितने आकर्षक फंदे हैं जानती तो हूँ फिर .....क्यों आज भी इन फंदों में बंध जाने को मन मचलता है | बहुत करीब से देखा है इन खूबसूरत फंदों को ...कितने...कितने कमजोर निकले ये  फंदे ....ये बंध....कितनी-कितनी तकलीफ़ें दीं इन्होंने ....जी-जान से उन्हें बचाने की कोशिश में कितने-कितने युवा -वर्ष व्यर्थ गंवा दिए ...ऊर्जा से भरपूर वर्ष ....कामनाओं से भरे वर्ष......पर  जिंदगी की सलाई से वे फंदे एक बार गिर गए तो फिर नहीं चढ़े थे ......अब फिर वही चाह ...वही ललक .....क्या ये मृग तृष्णा नहीं है  .....

वह मेरी ज़िंदगी का तीसरा दशक था, जब मेरे दुखी जीवन में खुशियों का संकेत लेकर, पतझर को बसंत में बदलने के हठ के साथ तुम आए थे| तुमने मुझे एहसास कराया कि जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है| एक नया जीवन शुरू करने का वक्त अभी चुका नहीं है कि फिर से नयी शुरूवात की जा सकती है कि वनफूल वर्षा, आतप, शिशिर सह कर और निखर आया है और तुम साथ हो | साथ के अहसास से सूख रहे वृक्ष पर न जाने कहाँ से कोंपले निकल आयीं| सुप्त कामनाओं ने अंगड़ाई ली| प्रीत ने पायल बजाई और मेरी आँखों में इंद्र्धनुष उभर आया| अतृप्त इच्छाएँ खिलखिला उठीं और नव -पुष्प सदृश्य मैं भ्रमर-गुंजार से मदमस्त हो गयी | इस प्रेम में वर्तमान का सुख इतना अधिक था कि भविष्य आगे उपेक्षित-सा रास्ते में पड़ा रहा | जब तक वहाँ पहुंचे तो लगा खुद बेचारा रास्ते से हटकर और आगे चला गया है | 
फिर वही हुआ जो सदियों से होता आ रहा है| इस असमय की बहार ....प्रकृति की उपेक्षा और ठूंठ की खिलखिलाहट से जगत जल-भुन गया और उसने पुष्प पर ओलों की बौछार कर दी | पर पुष्प के अंतर में जो नवीन गंध बस चुकी थी वह सदा उसके साथ रह कर उसका हौसला बढ़ाती रही और उस पर ओलों का कुछ भी असर नहीं हुआ | पुष्प को जो सुख पाना था उसने पा लिया था | फिर उसका जो भी हो, उसे इसकी परवाह नहीं थी | 
पर जीवन इतनी जल्दी समाप्त नहीं होता | वही भ्रमर जिसने पुष्प के अंतस में खूशबू फैलाई थी ...बदल गया | खुद अपने पैने डंकों से बार-बार पुष्प की पहले से ही आहत पंखुरियों पर चोट करने लगा | उसे शर्म आने लगी कि वह क्षतिग्रस्त फूल का स्वामी है | उसने तो असमय मुरझाते पुष्प पर दया की पर उसे क्या खबर थी कि इस काम से ऐसा अपयश होगा कि उसे बिखरने के करीब इसी पुष्प से संतोष करना पड़ेगा | उसे पछतावा होने लगा और वह अपना प्रतिकार पुष्प से लेने लगा | 
आह पुष्प, तेरी नियति क्या यही है ? तूने प्रकृति पर विजय पाने की कोशिश की | तूने भाग्य और समाज से दुहरा संघर्ष किया | तेरी जिजीविषा का यह पुरस्कार!तुझे तो एक दशक पूर्व ही धूसरित हो जाना था, फिर नवजीवन के लिए क्यों ललक पड़ा ? बिना धूसरित हुए नए जीवन की कल्पना क्यों की ? उसी पुरानी  काया से नव श्रृंगार क्यों किया ? पर क्या भ्रमर इसके लिए दोषी नहीं था | पुष्प को मतिभ्रम तो उसी ने किया | क्यों किया? 
एक वक्त था जब वह इसी पुष्प की गंध के लिए बेचैन था....उसे पाने की कल्पना भी नहीं कर पाता था| काँटों से घिरे पुष्प का सौंदर्य उसे स्वर्गिक लगता था, जिसको पाना असंभव था | वह दूर से ललकता था ...प्यार करता था ...पुष्प को उसकी भय-ग्रस्तता पर ...ललक पर ...निर्मल नेह पर ...एकाकीपन और उदासी पर ऐसा प्यार उमड़ा कि वह खुद ही काँटों को लांघकर उसके दामन में टपक पड़ा | काँटों ने उसकी पंखुरियों में छेद कर दिया पर पुष्प ने अपने चाहने वाले के सर्वांग को महका दिया पर खुद टपका यह पुष्प अपनी अमूल्यता...अपनी दिव्यता खोकर एक साधारण वस्तु बन गया | उसको चाहने वाला उसका महत्व भूला बैठा पर पुष्प ने प्रीत की रीति निभा दी और यही उसका सुख-संतोष है | पर उसकी हर पंखुरी चीखती है –प्रीत न करिए कोय |  

क्या किसी को पा लेने के बाद अच्छी भावनाएँ अपना मूल्य खो बैठती हैं ? फिर क्यों हम सामान्य स्त्री-पुरूष की तरह छोटी-छोटी बातों पर लड़ते-झगड़ते जीवन काटने लगे थे| हमारा वह दिव्य प्रेम अहंकार और विवशता के पाँव तले दबकर सिसकने क्यों लगा था ? वही तुम थे, जो मुझे जीवन से ज्यादा अजीज थे और वही मैं थी, जिसके लिए तुम मृत्यु का वरण करने के लिए भी तैयार थे | फिर यह क्यों हो गया ? हम कल्पना के संसार में विचरण करने वाले तो न थे, जो यथार्थ की कठोर धरती पर पैर रखते ही गिर पड़े | मैं सब सह सकती थी पर तुम्हारा यह अभिमान सहन नहीं होता था कि तुम मेरे पालक, आश्रयदाता मालिक, उद्धारक और जाने क्या-क्या हो ? मैं तो उसे जानती थी जो मेरे प्यार को स्वर्ग मानता था और मुझ पर खुद से ज्यादा विश्वास करता था | तुम ही तो कहते थे न –तुम दिव्य प्रकाश वाली अप्सरा हो जो मरणासन्न जीवन में प्रकाश भर देती है | फिर क्या हुआ जो तुम इतना बदल गए | 

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Suresh

Suresh 10 months ago