: : प्रकरण - 80 : :
संजना के साथ भगवान ने मुझे दूसरा उपहार दिया था.
उस का नाम माया था.
जिस के पति ने भी हमारे रिश्ते को तहेदिल से कबूल किया था.
सचमुच प्यार के मुआमले में भगवान मुझ पर बड़ा मेहरबान था.
माया सचमुच प्यार की अनमोल मिशाल थी. उस की दो संतान थी जो जवानी की दहलीज पर आकर ख़डी थी. लड़का चिनाई में काम करता. उस का पति का भी खुद का धंधा था. वह सोसायटी का सेक्रेटरी था. वह प्रभु का चुस्त भक्त था. दिन में चार पांच घंटे भगवान की सेवा में व्यस्त रहता था. वह अपनी बीवी माया से बहुत प्यार करता था. दोनों सुखी दाम्पत्य जीवन बिता रहे थे.
मैंने उन का और उस की बहन का काम किया था. तब से हमारी पहचान बनी थी. उस बात को काफ़ी समय बीत गया था. फिर दोबारा हमारा मिलना हुआ था. और दोनों ने बडे विश्वास और आस्था के साथ यह रिश्ता निभाया था.
माया के पति को भी मुझ पर बड़ा विश्वास था. वह हमेशा मुझ से कहता रहता था.
" आप हमारे घर आते रहना! "
उस के पति का नाम मनोज था. वह दो बजे के बाद काम पर निकलता था. और देर रात घर लौटता था.
उस के किसी ने पैसे हड़प लिये थे जो वापस देने का नाम नहीं लेता था. उस बात का मनोज को हमेशा दुःख रहता था.
कर्जदार से पैसे वापस लेने के लिये ऊस ने स्टंट किया था. ऊस ने पार्टी को मेरे सामने पैसे के लिये फोन किया था. और स्पीकर चालू किया था. मैंने ऊँची आवाज में पैसे की डिमांड की थी.
पार्टी एक महिला थी. वह ऊस वक़्त बैंक में थी. ऊस ने बाद मैं फोन करती हूं. कहकर फोन काट दिया था.
मैं घर से निकल रहा था. ऊस समय ऊस ने मना करते हुए मेरे कमीज की जेब में 200 रूपये की नोट सरका दी थी.
उन दोनों पति पत्नी को को मेरी तरह भगवान पर अटूट विश्वास था.
माया हर समय मेरी खातिर दारी करती थी. कभी भी मुझे बिना चाय नास्ता कराये बिना छोड़ती नहीं थी.
मैं शुरु में सुबह रात उसे मेसेज करता था. और वह भी मुझे जवाब देती थी. रात को दो बजे उस के पति के घर पहुंचने के बाद अचूक मेरे मेसेज का जवाब देती थी.
मैं उन दिनों काफ़ी परेशान था. मैंने अपनी कहानी उन्हें बताई थी. सुनकर माया ने सहानुभूति व्यक्त की थी.
घर में लडके की वजह से काफ़ी तनाव पैदा होता था. सुंदर के कारण आरती की हालत बिगड गई थी. वह भी कुछ ना कुछ बकबक करती रहती थी. दोनों के बीच 24 घंटे कुछ ना कुछ गरमा गरमी होती रहती थी. इस स्थिति में मैं बिल्कुल कंटाल गया था. घर छोड़कर भाग जाने का मन करता था
'ओल्ड एज होम ' में भर्ती होने का ख्याल आता था. लेकिन वह दोनो मेरे बिना एक कदम भी चलने को सक्षम नहीं थे . वह कुछ नहीं कर सकते थे. इस लिये मैं चाहते हुए भी दोनों को अकेला छोड़ नहीं सकता था.
मैंने अपनी समस्या उस के सामने बयान की थी. सुनकर उसे बहुत दुःख हुआ था. उस ने मुझे आश्वस्त भी किया था. उस के हर क़ोई मेसेज अपने आप प्रेरणा स्रोत बन जाता था.
मैं बारबार उस के घर जाता था. वह मेरा ख्याल करती थी. मुझे चाय नास्ता करवाती थी. और बदले में मुझे अहसान फरामोश होने का ख्याल आता था. मुझे उन को अपने घर बुलाकर उन की खातिरदारी करनी चाहिये थी. लेकिन आरती की मानसिकता को लेकर समस्या खड़ी होगी, ऐसा सोचकर उन्हें मैं चाहते हुए भी उसे घर नहीं बुला पाता था.
आरती ने कुछ उल्टा सुलटा बोलकर कुछ बोल दिया तो?
यह सवाल मुझे खटकता था. रिश्ता दोनों तरफ तराजू की तरह समतौल होना चाहिये.. लेकिन यहाँ रिश्ता एक तरफी हो रहा था. उस के लिये मैंने माया की माफ़ी मांगी थी.
मा बेटे के चुप रखने के लिये झूठ ही मेरा सहारा बन गया था. मुझे हर बात में झूठ बोलना पड़ता था. मैंने आरती से माया के परिवार से संबंध होने की बात भी मजबूरन छिपाई थी.
माया को रोज तो मिलना संभावित नहीं था.. क्यों की हम दोनों के घर के बीच काफ़ी दुरी थी. मैं पालघर में रहता था और वह विरार में.
महिने में एक बार कैसे भी बहाना बनाकर मैं उसे मिलने जाता था... यह गलत था.. लेकिन मैं अपने भले के लिये, घर की शांति के लिये झूठ बोलता था, जो सच्चाई से बढ़कर था.
मनोज बहुधा सेवा पूजा में व्यस्त रहता था. उस के लिये उस से ज्यादा बातें नहीं होती थी, फिर भी वह ईश्वर प्रति मेरी आस्था से बड़ा प्रभावित होता था., मेरी कद्र करता था.
मैंने सुंदर के लिये सब कुछ किया था. लेकिन उसे मेरी कद्र नहीं थी. वह मुझे बाप भी नहीं कहता था.. कभी मेरी हालचाल के बारे में पूछता भी नहीं था.
उस के लिये शेयर बाजार के सिवा और कुछ बचा नहीं था. वह बाकी समय में एक घाटी की तरह काम करता था. सुबह छह बजे उठकर वह सभी चीजे इधर उधर लगाने में व्यस्त हो जाता था.
घर में वोशिंग मशीन में कपड़े धोना, पोता लगाना.. इत्यादि कामों में जुड़ जाता था. एक मिनिट भी वह शांति से बैठता नहीं था.
उस की जुबान भी एक मिनिट शांत नहीं रहती थी.
किसी की क़ोई भी बात सुनकर वह जोरो से बात कर के सारी दुनिया को बताता था.
उस के ऐसे रवइये से मुझे गुस्सा आता था. मेरी आवाज का वॉल्यूम बढ़ जाता था. उस के लिये वह खुद जिम्मेदार था.. फिर भी सारा दोष मुझ पर मढ़ देता था.
और कहता था:
" तुम्हारे चिल्लाने की वजह से सोसायटी वाले तुम्हे घर से निकाल देंगे. "
किसी भी बात को सीधे अर्थ में ले नहीं सकता था.
आरती का दिमाग़ भी उस ने बिगाड़ दिया था.
वह एक मा होकर अपने बेटे की हालत का अनादर करती थी.
वह अंधा था. यह जानते हुए भी वह अपने बेटे से नोर्मल व्यकित की तरह हर चीज की अपेक्षा करती थी, हर छोटी मोटी गलती के लिये बडबडाती रहती थी.
सुंदर किसी का एक शब्द भी सुन नहीं पाता था. एक शब्द के बदले दस शब्दों से जवाब देने के बाद भी चुप नहीं रहता था. उस की जुबान रुकने का नाम नहीं लेती थी..उस की बातों से उबकर वह सुंदर पर हाथ उठाती थी तो वह अपनी मा को सामने से मारता था.
घर में पूरा दिन उन दोनों की बहस चालू रहती थी. उन की शाब्दिक लड़ाई का अंत नहीं आता था. इस स्थिति में घर में रहना मुश्किल हो जाता था. जाऊं तो कहाँ जाऊं? मैं दुविधा में रहता था.
एक पढ़े लिखे लडके ने नकारात्मक सोच की उंगली पकडकर अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारी थी, यह बात वह समझ नहीं पाता था . डोक्टर की बात को मानकर उस ने अपने सारे हथियार फेंक दिये थे.
उस के सामने मैंने एक जिवंत उदाहरण पेश किया था.
एक आदमी चिंता ग्रस्त स्थिति में मौत के करीब पहुंच गया था. डोक्टर ने उस के बारे में आगाही की थी.
" छह महिने में आप की मृत्यु हो जायेगी "
उस की उम्र 24-25 साल के करीब थी.
उस समय उस ने डेल कारनेगी की लिखी हुई किताब ' How to stop worrying and start living ' किताब पढ़ने की किसी दोस्त ने मुझे सिफारिश की थी. और वह 82 साल तक जिया था.
मैंने यह किस्सा सुंदर को सुनाया था.वह बिना वजह किसी छोटी मोटी बातों में चिंता करने लगता था.. वह जैसा सोचता था वैसा होता नहीं था..लेकिन फालतू चिंता ने उसे बीमार कर दिया था और अपनी बर्बादी का प्रणेता बनने जा रहा था.
उस वक़्त वोही किताब उस के काम आई थी.
और वह बड़ी लंबी जिंदगी जीने का हकदार हो गया था.
लेकिन सुंदर में क़ोई सुधार नहीं आया था.
उस की मा का दिमाग़ उस ने ख़राब कर दिया था. उस की सारी हरकते मेरा दिमाग़ ख़राब कर रही थी.
000000000000 ( क्रमशः).