Mahabharat ki Kahaani - 228 in Hindi Spiritual Stories by Ashoke Ghosh books and stories PDF | महाभारत की कहानी - भाग 228

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महाभारत की कहानी - भाग 228

महाभारत की कहानी - भाग-२३२

युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ

 

प्रस्तावना

कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने महाकाव्य महाभारत रचना किया। इस पुस्तक में उन्होंने कुरु वंश के प्रसार, गांधारी की धर्मपरायणता, विदुर की बुद्धि, कुंती के धैर्य, वासुदेव की महानता, पांडवों की सच्चाई और धृतराष्ट्र के पुत्रों की दुष्टता का वर्णन किया है। विभिन्न कथाओं से युक्त इस महाभारत में कुल साठ लाख श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने इस ग्रंथ को सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाया और फिर अन्य शिष्यों को पढ़ाया। उन्होंने साठ लाख श्लोकों की एक और महाभारत संहिता की रचना की, जिनमें से तीस लाख श्लोक देवलोक में, पंद्रह लाख श्लोक पितृलोक में, चौदह लाख श्लोक ग़न्धर्बलोक में और एक लाख श्लोक मनुष्यलोक में विद्यमान हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने उस एक लाख श्लोकों का पाठ किया। अर्जुन के प्रपौत्र राजा जनमेजय और ब्राह्मणों के कई अनुरोधों के बाद, कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का अनुमति दिया था।

संपूर्ण महाभारत पढ़ने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। अधिकांश लोगों ने महाभारत की कुछ कहानी पढ़ी, सुनी या देखी है या दूरदर्शन पर विस्तारित प्रसारण देखा है, जो महाभारत का केवल एक टुकड़ा है और मुख्य रूप से कौरवों और पांडवों और भगवान कृष्ण की भूमिका पर केंद्रित है।

महाकाव्य महाभारत कई कहानियों का संग्रह है, जिनमें से अधिकांश विशेष रूप से कौरवों और पांडवों की कहानी से संबंधित हैं।

मुझे आशा है कि उनमें से कुछ कहानियों को सरल भाषा में दयालु पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का यह छोटा सा प्रयास आपको पसंद आएगा।

अशोक घोष

 

युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ

माघ माहिना की द्वादशी तिथि में शुभ नक्षत्रयोग में युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को बुलाकर भीम से कहा, अर्जुन शीघ्र लौट आएगा। तुम यज्ञस्थान निर्धारण के लिए वेदज्ञ ब्राह्मणों को भेजो। युधिष्ठिर के आदेशानुसार स्थान निर्धारित होने पर स्थपतिगण शत-शत प्रासाद, गृह, स्तम्भ, तोरण एवं पथ समन्वित यज्ञस्थल का निर्माण करने लगे। आमंत्रित राजा अपनी स्त्रियों को साथ लेकर बहुमूल्य रत्न, घोड़े एवं अस्त्र-शस्त्र लिये उपस्थित हुए। यज्ञसभा में वाग्मी ब्राह्मणगण एक-दूसरे को परास्त करने के लिए तर्क करने लगे। आमंत्रित राजा अपनी इच्छानुसार विचरण करते हुए यज्ञ के आयोजन को देखने लगे। स्थान-स्थान पर स्वर्णभूषित यूपकाष्ठ, स्थलचर, जलचर, पर्वतीय एवं अरण्य के विविध पशु-पक्षी एवं उद्भिद, अन्न के स्तूप, दही एवं घी की परिमाण देखकर वे विस्मित हुए। एक-एक लाख ब्राह्मण भोजन के पश्चात् दुन्दुभि बजने लगी। प्रतिदिन इस प्रकार अनेक बार दुन्दुभि ध्वनि सुनाई दे रही थी।

कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, महाराज, द्वारकावासी एक दूत द्वारा अर्जुन ने आपको कहलाने के लिए मुझे कहा है कि समागत राजगण का समुचित समादर हो और अर्घ्यदान काल में ऐसा कुछ न हो जिससे राजाओं के विद्वेष से प्रजानाश हो सके। युधिष्ठिर ने कहा, कृष्ण, तुम्हारी बात सुनकर मैं आनंदित हुआ हूँ। सुना है अर्जुन जहाँ गए हैं वहाँ ही राजाओं से उनका युद्ध हुआ है। वे सर्वदा दुःख भोग करते हैं, किन्तु मैं उनके शरीर में कोई अनिष्ट सूचक लक्षण नहीं देखता। कृष्ण ने कहा, महाराज, अर्जुन के पैरों की पेशियाँ अधिक स्थूल होने के फल से उन्हें सर्वदा भ्रमण करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त उनके शरीर में अशुभ सूचक कुछ नहीं है। युधिष्ठिर ने कहा, तुम्हारी बात ठीक है। द्रौपदी ने कृष्ण की ओर तीरछि दृष्टि डाली तो कृष्ण ने भी स्नेह से उसकी ओर देखा। भीम आदि कौतूहल से अर्जुन के उस कथन पर चर्चा करने लगे।

अगला दिन अर्जुन यज्ञ के घोड़े सहित हस्तिनापुर लौट आये और धृतराष्ट्र, युधिष्ठिर आदि को अभिवादन करके कृष्ण को आलिङ्गन किया। इस समय मणिपुरराज बभ्रुवाहन भी अपनी दोनों माताओं के साथ उपस्थित हुए और गुरुजनों को वन्दन करके पितामही कुन्ती के भवन में गये। चित्रांगदा एवं उलूपी ने विनीत भाव से कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा आदि से मिले। बभ्रुवाहन को कृष्ण ने स्वर्णभूषित महामूल्य रथ उपहार दिया, युधिष्ठिरादि ने भी उन्हें विपुल धन दिया।

तृतीय दिन वेदव्यास ने युधिष्ठिर से कहा, यज्ञ का मुहूर्त उपस्थित हो गया है, आज से तुम यज्ञ आरम्भ करो। महाराज, इस यज्ञ में तुम ब्राह्मणों को तिगुण दक्षिणा दो, इससे तीन अश्वमेध का फल मिलेगा और ज्ञातिवध के पाप से मुक्त हो जाओगे। अनन्तर वेदज्ञ याजकगण यज्ञ के यथाविधि सभी कार्य करने लगे। विश्व, खदिर, पलाश इस तीन प्रकार काष्ठ के प्रत्येक के छह, देवदारु के दो तथा श्लेष्मतक काष्ठ के एक घूप निर्मित हुए। तदन्तर धर्मराज के आदेश से भीम ने स्वर्णभूषित बहु यूप शोभा के लिए तैयार कराये। चार अग्निस्थान युक्त अठारह हाथ यज्ञवेदी त्रिकोण गरुड़ाकार निर्मित हुई। ऋत्विकगण नाना देवताओं के उद्देश्य से बहु पशु-पक्षी, वृष एवं जलचर संग्रहित किये। तीन सौ पशुओं सहित यज्ञीय घोड़ा भी यूपबद्ध हुआ।

अग्नि में अन्यान्य पशुओं का यथाविधि उत्सर्ग के पश्चात् ब्राह्मणों ने शास्त्रानुसार यज्ञीय घोड़े का बध करके द्रुपदनन्दिनी को उसके निकट बिठाया। तत्पश्चात् उन्होंने घोड़े की चर्बी अग्नि में आहुति दी, युधिष्ठिर एवं उनके भाइयों ने उस सर्वपापनाशक ज्वलन्त चर्बी के धुएँ का घ्राण ग्रहण किया। षोडश ऋत्विक ने घोड़े के अङ्गसकल अग्नि में आहुति दी। इस प्रकार यज्ञ समाप्त होने पर सशिष्य वेदव्यास ने युधिष्ठिर का संबर्धन किया। युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों को सहस्र कोटि स्वर्णमुद्रा एवं वेदव्यास को बसुन्धरा दक्षिणा दी। वेदव्यास ने कहा, महाराज, ब्राह्मण धनार्थी हैं, तुम बसुन्धरा के स्थान पर मुझे धन दो। युधिष्ठिर ने कहा, अश्वमेध महायज्ञ में पृथ्वी-दक्षिणा ही विधित है। अर्जुन ने जो जीता है वह पृथ्वी मैंने दान कर दी है, आपलोग उसका भाग लिजिए। यह पृथ्वी अब ब्राह्मणों की सम्पद है, मैं उसे ग्रहण नहीं कर सकता, मैं वनगमन करूँगा। द्रौपदी एवं भीमादि ने कहा, महाराज ने यथार्थ कहा है। तब सभास्थ सभी रोमंचित हुए, अन्तरिक्ष से साधु-साधु ध्वनि सुनाई दी, ब्राह्मणगण हृष्ट होकर प्रशंसा करने लगे।

वेदव्यास ने पुनः कहा, महाराज, मैं तुम्हें पृथ्वी प्रत्यर्पण कर रहा हूँ, तुम उसके स्थान पर सुवर्ण दो। कृष्ण ने कहा, धर्मराज, आप भगवान वेदव्यास के आदेश का पालन करें। तदनन्तर युधिष्ठिर एवं उनके भाइयों ने तिगुण दक्षिणा के कोटि गुण दान किये, वेदव्यास ने उसे चार भाग करके ऋत्विकों में वितरित किया।

यज्ञस्थल पर जो सभी स्वर्णमय अलङ्कार, तोरण, घूप, घट, स्थाली, ऋष्टक आदि थे, युधिष्ठिर के आदेश से ब्राह्मणों ने भाग लेकर ग्रहण किया। अवशिष्ट द्रव्य क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं म्लेच्छों को दिया गया। यज्ञ समाप्त होने पर ब्राह्मण प्रभूत धन लेकर चले गये। वेदव्यास ने अपना भाग कुन्ती को दिया। युधिष्ठिर ने अपने भ्राताओं सहित यज्ञ के अन्त में स्नान करके समागत राजगण को बहु रत्न, हस्ती, घोड़े, स्त्री, वस्त्र एवं सुवर्ण उपहार दिये और बभ्रुवाहन को भी विपुल धन दिया। राजाओं विदा लेकर चले गये। दुःशला के बालक पौत्र को युधिष्ठिर ने सिन्धुराज्य में अधिष्ठित किया। कृष्ण, बलराम आदि वृष्णिवंशी वीरगण यथोचित समादर प्राप्त करके युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर द्वारका प्रस्थित हुए।

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(धीरे-धीरे)