The Cat Who Used to Be Human -7 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | बिल्ली जो इंसान बनती थी -7

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बिल्ली जो इंसान बनती थी -7

शानवी उस फाइल वाली बात को बार-बार याद करके
खुद को ही समझा रही थी —

वो बोली - 
मैं सच में पागल हो रही हूँ…एक बिल्ली को इंसान से जोड़ रही हूँ…

वो अपने बिल्ले से बहुत प्यार करती थी। शाम को ऑफिस से लौटकर…वो पहले अपनी मम्मी-पापा से कॉल पर बात करती।उनकी आवाज़ सुनकर थोड़ा हल्का महसूस करती। और फिर…अपने कमरे में आकर उसी सफेद बिल्ले से बातें करने लगती।

वो बोलती - 
आज बॉस ने फिर डाँटा…
और तुम… आज बहुत शरारती थे…

बिल्ला बस उसे देखता रहता। वो उसे गुदगुदी करती....उसके कान सहलाती…प्यार से खाना खिलाती…और कभी-कभी…उसे बाहों में भर लेती।

उस दिन भी…वो उसे सीने से लगाए बैठी थी। बहुत पास। बहुत अपनेपन से। फिर…बिना सोचे… उसने उसके सिर पर एक किस कर दिया। उसी पल…बिल्ला सिहर गया। पूरा शरीर एक झटके से काँप उठा। शानवी चौंक गई।

शानबी बोली - 
अरे? क्या हुआ?

उसे लगा शायद वो डर गया। लेकिन असल वजह कुछ और थी…क्योंकि वो… इंसान था। कार्तिकेय का दिल बहुत ज़ोर से धड़क रहा था।

उसने सोचा -
अगर ये जान जाती…अगर इसे एहसास हो गया…।

वो खुद को उसकी बाँहों से अलग कर के नीचे कूद गया। शानवी हैरान होकर उसे देखती रह गई।

वो बोली - 
आजकल तुम अजीब बर्ताव करने लगे हो…।

वो मुस्कुरा दी। लेकिन कार्तिकेय…एक कोने में बैठकर…अपनी धड़कनों को शांत करने की कोशिश कर रहा था।

वो सोचने लगा - 
ये सब…मेरे लिए बहुत मुश्किल होता जा रहा है…।

उस दिन शाम को शानवी घर पर थी। रविवार था…वो सफाई कर रही थी। मंदिर के पास रखी चीज़ें भी ठीक कर रही थी।कार्तिकेय… यानी उसका सफेद बिल्ला…हमेशा की तरह उछल-कूद कर रहा था। कभी पलंग पर…कभी सोफे पर…कभी अलमारी के पास…
उसी मस्ती में…वो मंदिर वाली शेल्फ पर चढ़ गया।

शानवी ने हँसते हुए कहा —
अरे! वहाँ मत जाओ… गिर जाओगे!

लेकिन…उसी वक्त… उसके पंजे से एक सिंदूर की डिब्बी टकरा गई। और… धपाक! पूरी की पूरी डिब्बी सीधी आकर शानवी के सिर पर गिर गई। लाल सिंदूर…उसके बालों में फैल गया…उसकी माँग पूरी भर गई…और आधे बाल…पूरे लाल हो गए। शानवी कुछ सेकंड तक सन्न रह गई। फिर शीशे में खुद को देखा…और चौंक गई।

वो बोली - 
हे भगवान! ये क्या हो गया!

उसके बाल....उसकी माँग…सब कुछ लाल…वो घबराकर साफ करने लगी। लेकिन तभी…उसकी नजर आईने में… खुद पर पड़ी।
लाल सिंदूर में…वो अजीब तरह से…सुहागन सी लग रही थी।
उसका दिल अजीब सा धड़क गया। पीछे…वो बिल्ला…उसे चुपचाप देख रहा था। कार्तिकेय उसकी आँखों में…आश्चर्य…
और कुछ ऐसा…जो वो खुद भी समझ नहीं पा रहा था।

वो बोला - 
ये… सिर्फ इत्तेफ़ाक है? 
या… किस्मत का इशारा…?

शानवी ने झल्लाकर कहा —
तुम सच में बहुत शरारती हो!

लेकिन उसके दिल में…एक अजीब सी हलचल शुरू हो चुकी थी।
और कार्तिकेय…

बस एक ही बात सोच पा रहा था —
क्या ये वही लकीर है…जो मेरी किस्मत बदल देगी…?

शानवी बहुत थक चुकी थी। उसने आईने के सामने खड़े होकर
सिंदूर मिटाने की बहुत कोशिश की…पानी से…तौलिये से…यहाँ तक कि फेसवॉश से भी… लेकिन…उसकी माँग में लालपन कहीं न कहीं रह ही गया। थक हारकर…वो बिस्तर पर आकर लेट गई।
बिल्ला पास ही बैठा था। चुप। बेचैन।

क्योंकि…उसे पता था —
कुछ ही देर में…मैं फिर से इंसान बनने वाला हूँ…

रात गहरी हो गई। घड़ी ने 12 बजाए। और…कार्तिकेय फिर से
इंसान बन चुका था। वो धीरे से उठने ही वाला था…कि...अचानक…शानवी ने नींद में ही उसे अपनी तरफ खींच लिया।
उसे लगा…वो कोई तकिया है। और वो…उसके सीने में बिल्कुल सिमट गई। जैसे…कोई पत्नी अपने पति से लिपटकर सोती है।

कार्तिकेय का पूरा शरीर सख्त हो गया। साँस तक रोक ली उसने।उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

वो बोला -
हे भगवान…अगर ये जाग गई तो…?

शानवी गहरी नींद में थी। उसका सिर उसके सीने पर था। उसकी उँगलियाँ उसकी शर्ट को पकड़े हुए थीं। और वो…बस…घड़ी देख रहा था।
1:10…
1:45…
2:30…

समय…जैसे चल ही नहीं रहा था।

वो बोला - 
बस… चार बज जाए…
बस… चार बज जाए…

वो हिल भी नहीं पा रहा था। क्योंकि ज़रा सी हरकत…शानवी को जगा सकती थी। और अगर वो देख लेती…तो सब खत्म हो जाता।
बाहर हवा चल रही थी।।कमरे में हल्की ठंड थी।।शानवी और भी पास सिमट आई। और कार्तिकेय…

वो बोला - 
किस्मत मेरी परीक्षा क्यों ले रही है …?

आख़िरकार…घड़ी ने 3:50 दिखाया। उसकी धड़कन और तेज़ हो गई। बस…कुछ ही मिनट…

आपको क्या लगता है - 
क्या कार्तिकेय का राज खुल जाएगा?