The Sindoor of the Deal - Part 7 in Hindi Drama by Anil singh books and stories PDF | सौदे का सिन्दूर - भाग 7

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सौदे का सिन्दूर - भाग 7

राठौर मेंशन का वह विशाल हॉल आज किसी प्राचीन मंदिर के गर्भगृह जैसा लग रहा था। हवा में जलते हुए कपूर की गंध, घिसे हुए चंदन और ताजे गेंदे के फूलों की भारी महक तैर रही थी, जो साँसों के साथ शरीर के अंदर तक जाकर एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर रही थी। पंडित जी के मंत्रोच्चार की गूंज ऊंची छतों से टकराकर पूरे घर में एक पवित्र कंपन पैदा कर रही थी। लेकिन इस पवित्रता के बीच एक अजीब सा दिखावा भी था। दीवारों और खंभों को विदेशी ऑर्किड और गुलाबों से ऐसे लाद दिया गया था जैसे किसी ने दौलत की नुमाइश लगा दी हो। वहां मौजूद मेहमानों के भारी रेशमी कपड़े और हीरों की चमक भगवान की आस्था के लिए कम, और एक-दूसरे की हैसियत नापने के लिए ज्यादा थी।
सान्वी अपने कमरे में आईने के सामने खड़ी थी। उसके शरीर पर जो लाल रंग का जोड़ा था, उसकी कीमत शायद उसके पिता की पूरी जिंदगी की कमाई से भी ज्यादा रही होगी। गले में कुंदन का नौलखा हार, कानों में भारी झुमके और मांग में भरा गहरा सिन्दूर। वह हार उसे एक लोहे की जंजीर जैसा महसूस हो रहा था जो उसका दम घोंट रहा था। कानों के झुमकों के बोझ से उसकी कानों की नसें खिंच रही थीं। वह आईने में दिख रही उस लड़की को पहचानने की कोशिश कर रही थी।
यह सान्वी वर्मा नहीं थी। यह 'मिसेज आर्यन राठौर' थी—एक ऐसा किरदार जिसे उसे आज पूरी शिद्दत से निभाना था। कल रात अस्पताल में माँ के कांपते हाथों का वो बेजान स्पर्श उसे अब भी अपनी हथेलियों पर महसूस हो रहा था। उस छुअन ने उसके अंदर के सारे डर को राख कर दिया था। अब उसकी आँखों में वो पुरानी सहमी हुई लड़की नहीं, बल्कि एक ठंडी और शांत जिद्द बैठी थी।
तभी कमरे का भारी दरवाजा एक हल्की सी चरमराहट के साथ खुला और आर्यन अंदर आया। उसने क्रीम कलर की शेरवानी पहन रखी थी और कंधे पर एक मरून दुपट्टा था। वह किसी पुरानी रियासत के राजकुमार जैसा लग रहा था, लेकिन उसकी आँखों में वही पुरानी, जमा देने वाली ठंडक थी। उसके चेहरे की एक भी मांसपेशी हिल नहीं रही थी।
वह सान्वी को देखकर एक पल के लिए दरवाजे पर ही ठिठक गया। सान्वी आज इतनी सुंदर लग रही थी कि उस पर से नजरें हटाना मुश्किल था। आर्यन की उंगलियों ने अनजाने में ही अपनी शेरवानी का बटन टटोला, जैसे वह अंदर उठ रही किसी अनजान हलचल को दबाना चाह रहा हो। लेकिन उसने तुरंत अपनी भावनाओं पर काबू पाया और अपनी कलाई की महंगी घड़ी देखते हुए, एकदम सपाट आवाज़ में कहा,
"नीचे सब आ चुके हैं। याद रखना, सान्वी, आज तुम्हें कम बोलना है और ज्यादा मुस्कुराना है। मेरी बुआ, मौसी और शहर के कई बड़े लोग आए हैं। उनकी बातें सुई की तरह चुभेंगी, लेकिन तुम्हे उनकी बातों पर ध्यान नहीं देना।"
सान्वी ने आईने से नजरें हटाकर पलटकर उसे देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—शायद आंसू की, या शायद उस जिद्द की जो कल अस्पताल से लौटते वक्त उसमें पैदा हुई थी। उसने अपने कंधों को बिल्कुल सीधा किया, जैसे किसी युद्ध के मैदान में उतरने से पहले कोई सिपाही अपनी ढाल कसता है।
"चिंता मत कीजिये," सान्वी ने अपनी भारी चुनरी को सिर पर सहेजते हुए कहा। उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था, बस एक ठहरा हुआ सन्नाटा था। "मैंने सौदा किया है, तो उसे निभाऊंगी भी। आपकी इज्जत पर आंच नहीं आने दूंगी, चाहे मेरी आत्मा जल जाए।"
आर्यन कुछ नहीं बोल पाया। उसके जबड़े की नसें एक पल के लिए तन गईं। सान्वी की बातों में अब एक ऐसी धार थी जो उसे निरुत्तर कर देती थी। वह बिना कुछ कहे मुड़ा और बाहर की तरफ बढ़ गया, और सान्वी भारी कदमों से उसके पीछे हो ली।

शार्क के बीच एक मछली
जब सान्वी आर्यन के साथ सीढ़ियों से नीचे उतरी, तो हॉल में बज रही शहनाई की आवाज़ के बावजूद एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। सैकड़ों आँखें एक साथ उन पर टिक गईं। औरतों की फुसफुसाहटें किसी छत्ते में भिनभिनाती मधुमक्खियों की तरह गूंजने लगीं।
"अरे, यही है वो लड़की?"
"सुना है बहुत साधारण घर से है।"
"किस्मत हो तो ऐसी, रातों-रात फर्श से अर्श पर पहुँच गई।"
सान्वी का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसे लग रहा था जैसे उसके गले में रेत भर गई हो। उसे लग रहा था जैसे वह सीढ़ियां नहीं उतर रही, बल्कि किसी गहरी खाई में उतर रही है जहाँ चारों तरफ शिकारी बैठे हैं। लेकिन तभी उसे अपनी माँ का चेहरा याद आया। उसने  एक गहरी साँस भरी, अपनी मुट्ठियों को थोड़ा ढीला किया और चेहरे पर एक सौम्य, परंतु अभेद्य मुस्कान सजा ली।
पंडित जी ने उन्हें हवन कुंड के पास बैठने का इशारा किया। दादी माँ वहां पहले से बैठी थीं, उनका चेहरा गर्व से चमक रहा था। सान्वी को देखते ही उन्होंने पास बुलाया, "आ मेरी बच्ची, यहाँ बैठ मेरे पास।"
दादी का झुर्रियों भरा, गर्म हाथ थामते ही सान्वी को लगा जैसे उसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो। उसके तने हुए कंधे थोड़े से ढीले पड़ गए।
तभी शीतल चाची, जो अब तक मेहमानों के बीच अपनी भारी बनारसी साड़ी का प्रदर्शन कर रही थीं, बड़े नाटकीय अंदाज में पास आईं। उनके साथ दो-तीन और महिलाएं थीं, जिनकी बाज जैसी नजरें सान्वी के गहनों का मोल-भाव कर रही थीं।
"अरे वाह! बहु तो वाकई चाँद का टुकड़ा है," चाची ने मीठी छुरी वाली टोन में कहा। "वैसे आर्यन, हमें तो लगा था कि तुम किसी बड़े घराने की मॉडर्न लड़की लाओगे। पर यह तो बिल्कुल... क्या कहें... 'देसी' है।"
उनके साथ खड़ी एक और महिला ने तंज कसा, अपने होठों को अजीब सा सिकोड़ते हुए, "सुना है इसके पिता स्कूल मास्टर थे? बेचारी को तो आदत भी नहीं होगी इतने नौकर-चाकर और ठाठ-बाट देखने की। कहीं घबरा न जाए।"
आर्यन के जबड़े भिंच गए। उसने अपनी मुट्ठी इतनी कस ली। वह कुछ कहने ही वाला था कि सान्वी ने दादी का हाथ अपने हाथ में लिया और बड़े शांत स्वर में बोली,
"सही कहा आपने चाची जी। मेरे पिता एक साधारण शिक्षक थे।" सान्वी ने चाची की आँखों में सीधा देखा, उसकी पलकें एक बार भी नहीं झपकीं। "उन्होंने मुझे महलों में रहना तो नहीं सिखाया, लेकिन यह जरूर सिखाया है कि महल हो या झोपड़ी, इंसान का कद उसके मकान से नहीं, उसके संस्कारों से नापा जाता है। और रही बात घबराने की, तो जिस घर में दादी माँ जैसी बुजुर्ग का आशीर्वाद हो, वहां डर कैसा?"
सान्वी की आवाज़ में न तो गुस्सा था, न ही कोई कम्पन। बस एक ठहरा हुआ पानी जैसा सच था, जिसने चाची के तंज को बीच हवा में ही काट दिया।
चाची का चेहरा देखने लायक था। उन्हें उम्मीद थी कि यह लड़की शर्म से सिर नीचे झुका लेगी, या घबराहट में अपनी साड़ी का पल्लू नोचने लगेगी, लेकिन यहाँ तो पासा ही पलट गया। दादी माँ ने सान्वी की पीठ थपथपाई और गर्व से कहा, "बिल्कुल सही कहा मेरी लाडो ने। संस्कार ही सबसे बड़ा दहेज है, जो यह अपने साथ भरकर लाई है।"
आर्यन ने तिरछी नजरों से सान्वी को देखा। उसके होठों के कोने पर एक बहुत हल्की, न दिखने वाली मुस्कान आई। उसे लगा जैसे उसने किसी कांच के खिलौने को हाथ लगाया हो, और वह अंदर से फौलाद का निकला हो। उसे पहली बार लगा कि यह लड़की सिर्फ एक 'डील' नहीं है, इसमें उससे कहीं ज्यादा कुछ है।

लेखक की टिप्पणी:
"यह अध्याय सान्वी के एक मूक किरदार से एक सशक्त व्यक्तित्व में बदलने की यात्रा है, जहाँ वह अपनी गरिमा से अमीरी के खोखलेपन को आईना दिखाती है।"