छोटा सा कमरा। पीली बल्ब की रोशनी। रात गहरी हो चुकी थी।
खिड़की से हल्की ठंडी हवा आ रही थी। और कमरे के बीच में —
एक ही बिस्तर। दोनों दरवाज़ा बंद करके अंदर आए। कुछ पल शांति रही। फिर…दोनों की नजर एक साथ बिस्तर पर पड़ी।
रुद्रांश (सीधा) बोला -
मैं बेड पर सोऊँगा।
खुशी (भौंह उठाकर) बोली -
क्यों?
रुद्रांश बोला -
क्योंकि मैं पहले बोला।
खुशी बोली -
तो? पहले बोलने से हक मिल जाता है क्या?
रुद्रांश ने तकिया उठाकर बेड पर फेंका।
रुद्रांश बोला -
मैं जमीन पर नहीं सोने वाला।
खुशी (हाथ बाँधकर) बोली -
और मैं भी नहीं।
दोनों आमने-सामने। जैसे कोई युद्ध शुरू होने वाला हो।
रुद्रांश बोला -
देखो, मैं लड़ाई नहीं करना चाहता।
खुशी बोली -
तो मत करो। बेड मुझे दे दो।
रुद्रांश बोला -
ये नहीं होगा।
खुशी (चिढ़कर) बोली -
आप बहुत जिद्दी हो।
रुद्रांश बोला -
और तुम बहुत ज्यादा बोलती हो।
कुछ सेकंड सन्नाटा। फिर—
खुशी बोली -
ठीक है। जो जीतेगा वही सोएगा।”
रुद्रांश (चुनौती भरे अंदाज़ में) बोला -
कैसे?
खुशी बोली -
Stone–paper–सीजर।
दोनों ने हाथ आगे किए। एक… दो… तीन! खुशी जीत गई।
खुशी (उछलकर) बोली -
येस! मैं बेड पर सोऊँगी!
रुद्रांश ने गहरी साँस ली।
रुद्रांश (बड़बड़ाते हुए) बोला -
बचपना है…
कुछ पल बाद उसने हार मान ली। फर्श पर चादर बिछाई। तकिया रखा।
रुद्रांश (लेटते हुए) बोला -
ठीक है। महारानी जी बेड पर सोएँ।
खुशी (खुश होकर) बोली -
थैंक्यू।
दोनों अपने-अपने स्थान पर लेट गए। कमरे में अब शांति थी।
कुछ देर बाद…
खुशी (धीरे) बोली -
रुद्रांश…
रुद्रांश (आँखें बंद किए) बोला -
क्या है?
खुशी बोली -
अगर… हमें कभी अपना असली नाम याद आ गया तो?
रुद्रांश कुछ सेकंड चुप रहा।
रुद्रांश बोला -
तो शायद… हम ऐसे नहीं झगड़ेंगे।
खुशी (मुस्कुराकर) बोली -
या शायद और ज्यादा झगड़ेंगे।
दोनों हल्का सा हँसे। कुछ देर बाद खुशी ने करवट ली। नीचे देखा।
रुद्रांश सो नहीं रहा था। वो छत देख रहा था।
खुशी (धीमे) बोली -
ठंड तो नहीं लग रही?
रुद्रांश बोला -
नहीं।
पर उसकी आवाज़ में हल्की सख्ती थी। खुशी ने कंबल का आधा हिस्सा नीचे गिरा दिया।
खुशी बोली -
ले लो… आधा।
रुद्रांश ने कुछ नहीं कहा। बस कंबल पकड़ लिया। कमरे में दो अलग बिस्तर थे। पर एक ही कंबल। रात धीरे-धीरे बीतने लगी।
झगड़ा खत्म नहीं हुआ था। रिश्ता शुरू भी नहीं हुआ था। पर कहीं न कहीं उनके बीच एक अनजाना सा बंधन
फिर से बन रहा था।
रात आधी बीत चुकी थी। कमरे में हल्की सी चांदनी घुली हुई थी।
खुशी की आँखें खुलीं। उसने करवट ली…नीचे देखा। रुद्रांश फर्श पर था। कंबल आधा खिसका हुआ। हाथ सिर के नीचे। चेहरे पर वही जिद्दी सख़्ती…पर नींद में वो उतना कठोर नहीं लग रहा था।
खुशी का दिल अजीब सा भारी हो गया। उसे समझ नहीं आया —
क्यों बुरा लग रहा है?
वो तो जीत गई थी। बेड उसी का था। फिर भी… उसके अंदर कुछ हलचल हुई। जैसे…कोई रिश्ता जो उसे याद नहीं पर महसूस हो रहा था।
धीरे से वो उठी। बिना आवाज़ किए बेड से उतरी। उसने कंबल उठाया…सावधानी से रुद्रांश के ऊपर ठीक से फैला दिया। कुछ पल उसे देखती रही। उसकी सांसें गहरी थीं। खुशी के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
खुशी (बहुत धीमे फुसफुसाकर) बोली -
जिद्दी हो… पर बुरे नहीं हो…
फिर…पता नहीं क्यों वो वहीं रुक गई। दिल ने कहा —
दूर मत जा।
वो धीरे से फर्श पर बैठी। फिर लेट गई…रुद्रांश के बिल्कुल पास।
कुछ पल हिचकिचाई। फिर जैसे उसके अंदर की पत्नी जाग उठी हो। यादें नहीं थीं। पर अपनापन था। धीरे से वो खिसककर उसकी बाँहों के पास आ गई। रुद्रांश की एक बाँह आधी खुली थी। खुशी ने संकोच से उसमें खुद को समेट लिया। और उसके सीने से हल्का सा सट गई। रुद्रांश की भौंहें नींद में हल्की सी हिलीं। उसकी बाँह
अनजाने में खुशी के चारों तरफ आ गई। जैसे वो आदत से मजबूर हो। खुशी की आँखें बंद हो गईं। उसके चेहरे पर सुकून था। जैसे
वो सही जगह पर है।
रुद्रांश नींद में ही बुदबुदाया —
सं…स्कृ…
शब्द अधूरा रह गया। खुशी ने हल्की सी हरकत की। उसे कुछ समझ नहीं आया। पर दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई।
कमरे में अब दो अजनबी नहीं थे। दो शरीर एक-दूसरे में समाए हुए थे। बिना यादों के भी रिश्ते मरते नहीं। वो बस सो जाते हैं। और आज…वो रिश्ता फिर से जागने लगा था।
रात अभी बाकी थी। चाँदनी अब और फीकी हो गई थी। कमरे में बस धीमी साँसों की आवाज़ थी। खुशी रुद्रांश की बाँहों में थी।
उसने सोचा था वो बस यूँ ही पास लेटी रहेगी। पर तभी…रुद्रांश की पकड़ धीरे-धीरे कसने लगी। उसकी उँगलियाँ खुशी की पीठ पर जकड़ गईं। खुशी हल्का सा चौंकी।
खुशी (मन में) बोली -
ये… क्या कर रहे हैं?
रुद्रांश सो रहा था। पर उसका चेहरा बेचैन था। भौंहें सिकुड़ी हुईं।
साँस तेज। जैसे कोई सपना देख रहा हो। कोई दर्द…कोई डर…अचानक उसने अपना चेहरा खुशी की गर्दन में छिपा लिया। खुशी की साँस रुक सी गई। उसका दिल जोर से धड़कने लगा। रुद्रांश ने
नींद में ही उसे और पास खींच लिया। फिर… उसके होंठ हल्के से उसकी गर्दन को छू गए। एक बार। फिर…धीरे-धीरे। खुशी ठिठक गई। उसका शरीर जैसे जम गया हो।
खुशी (धीमे, काँपती फुसफुसाहट में) बोली -
रुद्रांश…?
कोई जवाब नहीं। वो अब भी सो रहा था। उसकी पकड़ में कोई वासना नहीं थी बस एक अजीब सी तड़प थी। जैसे किसी अपने को खोने का डर। वो हल्के-हल्के उसकी गर्दन के पास साँसें छोड़ रहा था। खुशी की आँखें खुली थीं। वो सब महसूस कर रही थी।
उसे समझ आ गया वो जागा हुआ नहीं है। ये सब उसके दिल की आदत है। यादें भले चली गईं…पर स्पर्श की पहचान कहीं अंदर बची हुई थी।
रुद्रांश ने नींद में ही बहुत धीमे कहा —
मत जाओ…
खुशी का दिल भर आया। उसने धीरे से अपना हाथ उसके सिर पर रख दिया।
खुशी (बहुत धीमे) बोली -
कहीं नहीं जा रही…
रुद्रांश की साँस धीरे-धीरे सामान्य होने लगी। उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई पर अब उसमें बेचैनी नहीं थी। खुशी ने आँखें बंद कर लीं।
उसका चेहरा लाल था। दिल अब भी तेज धड़क रहा था। पर डर नहीं था। क्योंकि वो जानती थी ये किसी अजनबी का स्पर्श नहीं।
ये उस रिश्ते की परछाईं है जिसे वो याद नहीं कर पा रही। रात ने
उन दोनों के बीच एक नई खामोश डोर बाँध दी।
सुबह…जब रुद्रांश को कुछ भी याद नहीं होगा तब खुशी क्या करेगी?
क्या वो बताएगी?
या ये पल उसके दिल में ही रह जाएगा?