“वो चिट्ठी… जिसने सब बदल दिया”
रात के करीब साढ़े दस बजे थे।
शहर की सड़कों पर हल्की बारिश हो रही थी। स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी पानी की बूंदों में टूटकर चमक रही थी, जैसे आसमान के सितारे जमीन पर उतर आए हों।
लेकिन उस खूबसूरत रात में भी आयरा के दिल में अजीब सा सन्नाटा था।
वो अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी थी।
हाथ में कॉफी का कप था… जो अब ठंडा हो चुका था।
उसकी आँखें बाहर गिरती बारिश को देख रही थीं, लेकिन उसका मन कहीं और भटक रहा था।
कभी-कभी कुछ यादें इंसान का पीछा नहीं छोड़तीं।
चाहे जितना आगे बढ़ने की कोशिश करो…
वो पीछे से आकर फिर दिल को जकड़ लेती हैं।
आयरा की जिंदगी में भी एक ऐसी ही याद थी।
आरव।
उसका नाम आते ही आयरा की आँखें हल्की सी भर आईं।
तीन साल बीत चुके थे…
लेकिन आज भी वो उस रात को भूल नहीं पाई थी।
वो रात जब सब कुछ खत्म हो गया था।
तभी अचानक…
टिंग टोंग…
डोरबेल बजी।
आयरा चौंक गई।
इतनी रात को…?
वो कुछ पल तक दरवाजे की तरफ देखती रही।
फिर धीरे-धीरे उठकर दरवाजे की तरफ बढ़ी।
दिल अजीब तरह से धड़क रहा था।
उसने दरवाजा खोला।
बाहर… कोई नहीं था।
सीढ़ियों में हल्का अंधेरा था और बारिश की आवाज गूंज रही थी।
आयरा ने इधर-उधर देखा।
कोई दिखाई नहीं दिया।
वो दरवाजा बंद करने ही वाली थी कि उसकी नजर जमीन पर पड़ी।
वहाँ एक सफेद लिफाफा रखा था।
आयरा झुककर उसे उठाने लगी।
जैसे ही उसने लिफाफा पलटा…
उसकी साँस अचानक अटक गई।
लिफाफे पर साफ अक्षरों में लिखा था —
“आयरा के नाम”
उसके दिल की धड़कन तेज हो गई।
ये लिखावट…
उसे कहीं देखी हुई लग रही थी।
वो धीरे-धीरे कमरे में वापस आई और कुर्सी पर बैठ गई।
कुछ पल तक वो लिफाफे को देखती रही।
जैसे उसके अंदर कोई राज छिपा हो।
आखिर उसने गहरी सांस ली और लिफाफा खोल दिया।
अंदर एक कागज था।
सफेद कागज…
जिस पर नीली स्याही से कुछ लिखा हुआ था।
आयरा ने पढ़ना शुरू किया।
"तुम आज फिर रोई थीं…"
उसकी आँखें अचानक फैल गईं।
वो तेजी से अगली लाइन पढ़ने लगी।
"तुमने सबके सामने मुस्कुराने की कोशिश की…
लेकिन रात को अपने कमरे में अकेले टूट गई।"
आयरा के हाथ काँपने लगे।
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
क्योंकि ये बात…
सिर्फ उसे पता थी।
आज शाम सच में वो ऑफिस से लौटकर रोई थी।
लेकिन उसके घर में तो कोई नहीं था।
फिर…
किसे पता चला?
उसने जल्दी-जल्दी आगे पढ़ा।
"तुम हमेशा सोचती हो कि मैं तुम्हें छोड़कर चला गया…
लेकिन सच ये है कि मैं आज भी तुम्हारे पास हूँ।"
आयरा की आँखों में आँसू भर आए।
उसके दिल में एक अजीब सी बेचैनी उठी।
क्योंकि अब उसे अंदाज़ा हो रहा था…
ये चिट्ठी किसकी हो सकती है।
उसने काँपते हाथों से आखिरी लाइन पढ़ी।
"डरो मत आयरा…
मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ।"
और नीचे…
एक नाम लिखा था।
आरव
चिट्ठी उसके हाथ से गिर गई।
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
क्योंकि…
आरव तीन साल पहले मर चुका था।
आयरा की आँखों के सामने वो रात घूमने लगी।
तेज बारिश…
सड़क पर फिसलती कार…
और फिर हॉस्पिटल का वो ठंडा कॉरिडोर।
डॉक्टर बाहर आया था।
उसके चेहरे पर अजीब सा सन्नाटा था।
और उसने सिर्फ एक वाक्य कहा था —
“हम उसे बचा नहीं पाए…”
उस दिन आयरा की दुनिया खत्म हो गई थी।
उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।
वो धीरे से फुसफुसाई —
“नहीं… ये नहीं हो सकता…”
तभी अचानक…
धड़ाम!
खिड़की तेज आवाज से खुल गई।
तेज हवा कमरे में घुस आई।
टेबल पर रखे कागज उड़ने लगे।
परदे जोर-जोर से लहराने लगे।
आयरा डरकर खिड़की की तरफ मुड़ी।
उसी वक्त हवा के साथ एक और कागज कमरे में उड़कर आया और उसके पैरों के पास गिर गया।
आयरा का दिल जैसे रुक गया।
वो धीरे-धीरे झुकी और कागज उठाया।
उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी —
“अगर सच जानना है… तो कल रात 12 बजे पुराने रेलवे स्टेशन आना।”
आयरा की धड़कन और तेज हो गई।
उसने नीचे देखा।
वहाँ फिर वही नाम लिखा था।
आरव
आयरा की आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
उसने खिड़की के बाहर अंधेरे में देखा।
बारिश अभी भी हो रही थी।
लेकिन अंधेरे में उसे ऐसा महसूस हो रहा था…
जैसे कोई उसे देख रहा हो।
उसने धीरे से खुद से कहा —
“लेकिन… तुम तो मर चुके हो…”
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
लेकिन आयरा को ऐसा लग रहा था…
जैसे कमरे में कोई और भी मौजूद है।
और खिड़की के बाहर…
अंधेरे में…
कोई उसका इंतजार कर रहा था।
लेकिन असली कहानी अब शुरू होने वाली थी।
कल रात…
पुराने रेलवे स्टेशन पर…
आयरा किससे मिलने वाली थी?
और सबसे बड़ा सवाल —
अगर आरव मर चुका है…
तो ये चिट्ठियाँ कौन भेज रहा था..?