Emperor Ashoka: sword, war, and dharma - 5 in Hindi Biography by Rishav raj books and stories PDF | सम्राट अशोक : तलवार, युद्ध और धर्म - 5

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सम्राट अशोक : तलवार, युद्ध और धर्म - 5



मैं हूँ अशोक।

कलिंग के युद्ध के बाद मेरा जीवन बदल चुका था। मैंने युद्ध का मार्ग छोड़कर धर्म और करुणा का मार्ग अपना लिया था। अब मेरा लक्ष्य केवल अपने मौर्य साम्राज्य को मजबूत बनाना नहीं था, बल्कि मानवता के लिए एक नया रास्ता दिखाना था।

मैं चाहता था कि गौतम बुद्ध का संदेश केवल मेरे साम्राज्य तक सीमित न रहे। यह संदेश पूरी दुनिया तक पहुँचे।



एक दिन मैंने अपने दरबार में विद्वानों और भिक्षुओं को बुलाया।

मैंने उनसे कहा: यदि बुद्ध का संदेश लोगों के जीवन में शांति ला सकता है, तो इसे हर जगह पहुँचाना हमारा कर्तव्य है।

दरबार में उपस्थित भिक्षुओं ने मेरी बात का समर्थन किया।

उन्होंने कहा कि यह कार्य केवल सैनिकों की शक्ति से नहीं, बल्कि ज्ञान और करुणा से ही संभव है।

तभी मैंने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया।

मैंने तय किया कि भिक्षुओं के दल विभिन्न देशों में भेजे जाएँगे, ताकि वे बौद्ध धर्म का संदेश फैलाएँ।

मेरे बच्चों की भूमिका

मेरे दो बच्चे थे —
मेरा पुत्र महेंद्र
और मेरी पुत्री संघमित्रा।

दोनों ही बुद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित थे।

एक दिन मैंने उन्हें अपने पास बुलाया।

मैंने उनसे कहा:

“अगर तुम सच में बुद्ध के मार्ग पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें इस संदेश को दुनिया तक पहुँचाना होगा।”

उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के यह जिम्मेदारी स्वीकार कर ली।

उस दिन मुझे बहुत गर्व हुआ।



धर्म प्रचार के लिए सबसे महत्वपूर्ण यात्रा थी श्रीलंका की।

उस समय वहाँ के राजा थे देवानंपिय तिस्स।

मैंने अपने पुत्र महेंद्र को भिक्षुओं के एक समूह के साथ श्रीलंका भेजा।

समुद्र पार करके वे वहाँ पहुँचे।

जब राजा देवानंपिय तिस्स ने महेंद्र से मुलाकात की, तो वे उनकी बुद्धिमत्ता और शांत स्वभाव से बहुत प्रभावित हुए।

महेंद्र ने उन्हें बुद्ध की शिक्षाओं के बारे में बताया —

दया

अहिंसा

और सत्य का मार्ग


राजा ने इन शिक्षाओं को स्वीकार किया।

धीरे-धीरे श्रीलंका में भी बौद्ध धर्म फैलने लगा।

कुछ समय बाद मेरी पुत्री संघमित्रा भी वहाँ पहुँची।

वह अपने साथ बोधि वृक्ष की एक शाखा लेकर गई थीं, जो बोधि वृक्ष से ली गई थी।

उस शाखा को श्रीलंका में लगाया गया।

आज भी वह वृक्ष वहाँ श्रद्धा के साथ पूजित है।


मेरे द्वारा भेजे गए भिक्षु केवल श्रीलंका ही नहीं गए।

वे कई अन्य क्षेत्रों में भी गए —

मध्य एशिया

दक्षिण-पूर्व एशिया

और हिमालय के पार के क्षेत्रों में


धीरे-धीरे बुद्ध का संदेश दूर-दूर तक फैलने लगा।

मुझे यह देखकर बहुत संतोष होता था कि अब लोग युद्ध की बजाय शांति और करुणा की बात करने लगे थे।



पहले मेरी पहचान एक विजेता के रूप में थी।

लेकिन अब लोग मुझे एक ऐसे सम्राट के रूप में देखने लगे थे जो धर्म और मानवता के लिए काम कर रहा था।

मैंने अपने साम्राज्य में कई नए कार्य शुरू किए —

सड़कों का निर्माण

यात्रियों के लिए विश्राम गृह

लोगों और पशुओं के लिए अस्पताल

कुएँ और पेड़ लगवाना


मैं चाहता था कि मेरे राज्य के लोग केवल सुरक्षित ही नहीं, बल्कि सुखी भी हों।

मेरे जीवन की संतुष्टि

जब मैं पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखता हूँ, तो मुझे समझ आता है कि मेरी सबसे बड़ी विजय कलिंग पर जीत नहीं थी।

मेरी सबसे बड़ी विजय थी — अपने हृदय को बदलना।

अगर कलिंग का युद्ध न होता, तो शायद मैं कभी यह नहीं समझ पाता कि असली शक्ति क्या होती है।

और इसी कारण लोग आज मुझे केवल एक सम्राट के रूप में नहीं, बल्कि धर्म के मार्ग पर चलने वाले राजा के रूप में याद करते हैं।