Abhii bhii zindaa hai zameer in Hindi Short Stories by Rakesh Kaul books and stories PDF | अभी भी कहीं ज़िंदा है ज़मीर

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अभी भी कहीं ज़िंदा है ज़मीर

अभी भी कहीं ज़िंदा है ज़मीर

आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो यक़ीन ही नहीं होता कि मैं एक मध्यमवर्गीय परिवार की वही मासूम सी छोटी लड़की गोमती हूँ जो कभी अकेले बाज़ार जाने से भी हिचकिचाती थी वही लड़की आज ख़ुद को अपराधिक ज़िंदगी के मुहाने पर खड़ी पाती है | यह तो कुछ माँ-बाबूजी के दिए हुए संस्कार हैं जिन्होंने मुझे ग़लत दिशा में अगला कदम उठाने से रोक दिया नहीं तो न जाने आगे मेरा क्या हश्र होता | कई मर्तबा ताज्जुब होता है कि एक अच्छे ख़ानदान से ताल्लुक रखने के बावजूद भी मैं कैसे अपनी राह से इस कद्र भटकती चली गई हूँ |

मेरा बचपन एक छोटे शहर हल्दवानी में बीता है | आप इसे एक कस्बा भी कह सकते हैं | हमारे परिवार में माँ-बाबूजी के अलावा दादाजी और हम दो भाई-बहन थे | बाबूजी शहर के ही डाकखाने में पोस्टमास्टर थे | ख़ानदान की परंपरा के मुताबिक बाबूजी ने अपनी पूरी ज़िंदगी ईमानदारी से गुज़ारी थी | उन्होंने चाहे कुछ कमाया हो या नहीं, लेकिन इज्ज़त ख़ूब कमाई | हमने कभी भी उनके बारे में कुछ भी ग़लत नहीं सुना है | उनके इस सफ़र में माँ उनका एक मज़बूत सहारा बनी रहीं | एक पोस्टमास्टर की मामूली तन्ख्वाह में पाँच लोगों के परिवार का खर्च उठाना कोई मज़ाक नहीं था |  यह तो माँ का ही बूता था कि वे कुछ न कुछ खींच-तान करके जैसे-तैसे घर का खर्च चलाती रहती थीं | तमाम दुश्वारियों के बावजूद भी उन्होंने हम दोनो भाई बहनों को अच्छी तालीम दिलवाई चाहे इसके लिए उन्हें हर महीने कई तरह के समझौते क्यों न करने पड़े हों | हमने उन्हें अक्सर पुराने कपड़ों को मरम्मत करके पहनते हुए देखा है | इतनी जद्दो-जहद के बावजूद भी मजाल है कि उनके चेहरे पर कभी कोई शिकन दिखाई पड़ी हो | वे हमेशा हँसती-मुस्कुराती नज़र आती थीं लेकिन मुझे माँ-बाबूजी का इस तरह से जद्दो-जहद करते हुए जीना अच्छा नहीं लगता था | मेरी नज़र में ऐसी ईमानदारी का क्या फ़ायदा जिसकी वजह से सारी ज़िंदगी खींच-तान में ही गुज़र जाए | आखिरकार यह ज़िंदगी हमें दुबारा फिर नसीब नहीं होने वाली है | अगर थोड़े बहुत समझौते करने से हम सबके सपने और ख्वाहिशें पूरी हो सकती हैं तो इसमें हर्ज ही क्या है | हमारे आसपास ऐसे बहुत से सरकारी मुलाज़िम रहते थे जो मामूली ओहदों पर होने के बावजूद भी हमसे कहीं ज़्यादा खुशहाल ज़िंदगी बसर कर रहे थे | घर में मैंने जब भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखनी चाही तो मुझे हमेशा चुप करा दिया जाता था | हमारे ख़ानदान का हमेशा से यह दृढ़ उसूल रहा है कि ईमानदारी की सूखी रोटी बेईमानी से कमाई गई मलाई खाने से कहीं ज़्यादा बेहतर है क्योंकि उसमें ग़ैरत और पसीने की ख़ुशबू शामिल होती है |

अपनी ज़िंदगी के पहले बड़े बदलाव का वह दिन आज भी मेरी यादों में ज़िंदा है जब मैंने शहर के एक नामी कॉलेज में कदम रखा था | बारहवीं दर्जा अच्छे नम्बरों से पास करने का बाद मैंने बी.एस.सी में दाख़िला लिया था | स्कूल के बंदिशों वाले माहौल के मुकाबले कॉलेज में मैं ज़्यादा आज़ादी और खुलापन महसूस कर रही थी | यहाँ की तर्ज़े-ज़िंदगी कुछ इस किस्म की थी कि न कोई देर से आने के लिए टोकता था और न ही आने-जाने पर किसी किस्म की पाबंदी थी | हमारे कई साथी घर से तो कॉलेज आते थे, लेकिन उनका ज़्यादातर वक़्त या तो कैंटीन में गुज़रता था या कॉलेज के सामने स्थित सिनेमा हॉल में | इसी दौरान मेरी मुलाक़ात पंकज से हुई थी | देखने में वह एकदम फिल्मी हीरो की तरह स्मार्ट दिखाई देता था - गोरा रंग, ऊँचा कद, गठी हुई कद-काठी | उसकी शख्सियत में कुछ ऐसी कशिश थी कि बहुत जल्द ही वह सभी विद्यार्थियों में लोकप्रिय हो गया था | ख़ासकर कॉलेज की तमाम लड़कियाँ तो उस पर दिलो-जान से फ़िदा थीं | हालाँकि पढ़ाई-लिखाई में वह मामूली ही था लेकिन उसकी शानो-शौक़त वाली तर्ज़े-ज़िंदगी उसे सबसे अलग दिखाती थी | वह कॉलेज का एक अकेला ऐसा छात्र था जो एक बड़ी, इम्पोर्टेड कार में आता था जबकि ज़्यादातर लड़के-लड़कियाँ साईकिलों से ही कॉलेज आया-जाया करते थे | यहाँ तक कि प्रोफेसर भी ज़्यादा से ज़्यादा स्कूटर से ही कॉलेज आते थे | पंकज के पिता एक जाने-माने ठेकेदार थे | लिहाज़ा उसके पास पैसों की कोई कमी नहीं रहती थी | वह बिना सोचे-समझे पैसा पानी की तरह बहाता रहता था | पंकज का यूँ शाही अंदाज़ में जीने का ढंग मुझे बहुत मुतासिर करता था | शायद ज़िंदगी की कठोर दुश्वारियों से मैं इस कद्र परेशान हो चुकी थी कि मुझे ऐसी ही ज़िंदगी जीने की तमन्ना थी जहाँ अपने सपने पूरे करने के लिए कोई जद्दो-जहद न करनी पड़े | वक़्त बीतने के साथ हमारी बातचीत बढ़ने लगी | पहले क्लास में पढ़ाई के मुत्तलिक रस्मी बातचीत फिर कैंटीन में हल्की-फुल्की अनौपचारिक गुफ़्तगू से बढ़ते-बढ़ते मुलाकातों का यह सिलसिला शहर के रेस्त्राँ और फिल्म थिएटर तक जा पहुँचा | मुझे उसका साथ अब अच्छा लगने लगा था | आहिस्ता-आहिस्ता हमारे दरमियाँ फासला कम होता चला गया और एक दिन हमें एहसास हुआ कि हम एक दूसरे से प्यार करने लगे हैं |

बी.एस.सी पास करने के बाद परिवार में मेरे लिए शादी के रिश्ते आने लगे थे | उनमें से माँ-पिताजी को राजेश का रिश्ता पसंद आया था | इंजीनियरिंग करने के फ़ौरन बाद ही उन्हें एक अच्छी मल्टी-नेशनल कम्पनी में नौकरी लग गई थी | उनके घरवालों को भी मैं पसंद आई थी | इस दौरान किसी ने भी मेरी मर्जी जानने की ज़रुरत नहीं समझी | उन दिनों छोटे शहरों में लड़कियाँ का शादी-ब्याह के मामलों में मुँह खोलना अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था लेकिन और कोई चारा न देख मैंने माँ से अपनी दिल की बात ज़ाहिर की | यह राज़ खुलते ही घर में हंगामा मच गया | पंकज के ग़ैर-बिरादरी के होने की वजह से माँ-पिताजी को पंकज के साथ मेरा रिश्ता किसी कीमत पर मंज़ूर नहीं था | बात बढ़ने के डर से उन्होंने आनन-फानन में मेरा ब्याह राजेश के साथ कर दिया | यह सब इतनी तेज़ी से हुआ कि मुझे इतना भी मौक़ा नहीं मिला कि मैं पंकज से बात कर सकूँ |           

राजेश के साथ ज़बरदस्ती थोपे गए इस रिश्ते से मैं भीतर ही भीतर बुरी तरह से आहत महसूस कर रही थी | ऐसा महसूस होता था जैसे किसी गाय-भैंस की तरह मुझे अपने घर के खूँटे से खोलकर दूसरे घर के खूँटे से बाँध दिया गया हो | माँ-बाबूजी के लिए खानदान की इज्ज़त के सामने बेटी के ख्वाब और उसकी खुशियों की कोई अहमियत नहीं थी | उनके इस मनमाने फैसले ने पंकज के साथ देखे मेरे सारे हसीं सपनों को एक ही झटके में चकनाचूर कर के रख दिया था । उस वक़्त मुझे सारे जहाँ में एक भी ऐसा हमदर्द नज़र नहीं आ रहा था जिसे मेरे दिल के भीतर पल रहे इस ग़म का रत्ती भर भी एहसास हो | हालाँकि राजेश एक शरीफ़, संजीदा और महत्वाकांक्षी इंसान हैं लेकिन वे किसी भी नज़र से पंकज की बराबरी के नहीं दिखते हैं | शादी के वक़्त’ राजेश शहर की ही एक नामी कंपनी में टीम लीडर के ओहदे पर काम कर रहे थे | कम्पनी में हमेशा से उनकी पहचान एक मेहनती और समर्पित मुलाज़िम के रूप में होती है | अपनी मेहनत के बूते ही उन्होंने कम वक़्त में ही अच्छी ख़ासी तरक्की कर ली है लेकिन घर में मैंने उन्हें एक कम बोलने वाले रिज़र्व तबीयत के शख्स के रूप में ही पाया है | आजकल के नौजवानों की तरह उनकी फितरत नुमाइश-पसंद नहीं है | किसी तरह की कोई बनावट नहीं है उनके स्वभाव में | जैसा सोचते हैं, वही उनकी ज़ुबाँ पर होता है और वैसा ही वे बर्ताव करते हैं | हालाँकि मैं जानती हूँ कि वे मुझसे मुहब्बत करते हैं और मेरी हर छोटी से छोटी ज़रुरत का ख्याल भी रखते हैं लेकिन अपने जज़्बातों को सबके सामने ज़ाहिर करने के बजाए वे उन्हें अपने दिल के भीतर ही सहेज कर रखना ज़्यादा पसंद करते हैं | उनका यह व्यवहार मेरे ख़्वाबों के राजकुमार की खूबसूरत तस्वीर से मेल नहीं खाता था | मुझे हमेशा से यह ख्वाहिश रही थी कि मेरा होने वाला शौहर मुझसे न केवल बेइंतिहा मुहब्बत करे बल्कि वह मेरी मुहब्बत में वह सब कुछ करे जो एक फिल्मी हीरो अपनी महबूबा के लिए करता है | लेकिन राजेश से इस किस्म के व्यवहार की उम्मीद करना ही बेईमानी है | ऊपर से काम के प्रति उनका ज़रुरत से ज्यादा जूनून उन्हें नीरस बना देता है | वे अक्सर शाम को देर से घर आते और घर में भी दफ्तर के काम में उलझे रहते हैं | उन्हें न तो फिल्म देखने का शौक है और न ही वे कभी सैर सपाटे के लिए बाहर निकलते हैं | अपनी मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि की वजह से वह एक भी पैसा फ़ालतू खर्च करने से पहले दस दफ़ा सोच-विचार करते हैं | उनमें दूर-दूर तक पंकज जैसे दीवाने आशिक की झलक नहीं मिलती है | पंकज की मीठी बातों से मुहब्बत टपकती थी और वह अपनी महबूबा के एक इशारे पर कुछ भी कर गुज़रने के लिए हमेशा तैयार रहता था | मेरी हर ख्वाहिश मुँह से निकलने से पहले ही पूरी हो जाया करती थी | उसके साथ बिताए गए उन ख्व़ाब से हसीं दिनों की ख़ुशबू मेरे ज़ेहन में हमेशा ताज़ा बनी रही | लेकिन इंसान के चाहने से क्या होता है, उसे वही मिलता है जो उसकी किस्मत में लिखा होता है |   

कुछ ही हफ़्तों में मुझे राजेश के खुश्क बर्ताव की वजह से ज़िंदगी बेमज़ा जान पड़ने लगी थी | आहिस्ता-आहिस्ता मेरे भीतर एक कुंठा की भावना घर करने लगी थी | इस किस्म की दमघोंटू ज़िंदगी से कई दफ़ा मैं इस कद्र उकता जाती थी कि मेरी हताशा गुस्से की शक्ल में राजेश पर फूट पड़ती थी | शादी के कुछ ही महीनों में हमारे बीच में वाक-युद्ध होने लगे थे जिनका नतीजा अक्सर बोलचाल बंद होने के रूप में सामने आता था | कई मर्तबा बंद बातचीत का दौर काफ़ी लंबा खिंचता चला जाता था | राजेश का तो दफ़्तर में साथियों से बातचीत हो जाती थी लेकिन मेरे दर्दो-गम को साझा करने वाला यहाँ कोई नहीं था | राजेश तो जो सुबह नौ बजे घर से रवाना होते थे तो रात नौ बजे से पहले वापिस नहीं आते थे | मेरा ज़्यादातर वक़्त इस डिब्बेनुमा फ्लैट की चहारदीवारी में ही निकलता था | न कोई आने वाला और न ही कोई जाने वाला | इस छोटे से घर की दरो-दीवारें मेरी ज़िंदगी के राज़दार रहे हैं जिनसे मैं तन्हाई में अक्सर घंटो गुफ़्तगू करती रहती थी |

मायूसी के उस दौर में एक दिन मैं दोपहर के वक़्त शॉपिंग करने के मकसद से एक मॉल में चहलकदमी कर रही थी कि अचानक पीछे से किसी की आवाज़ सुनाई दी “रिंकी” | इस अजनबी शहर में अपने घर का नाम सुनकर मैं एकाएक चौंक उठी | पीछे मुड़ कर देखते ही मैं हैरान रह गई | मेरे सामने पंकज खड़ा मुस्कुरा रहा था | एक सेकेंड को ऐसा एहसास हुआ जैसे कि एक प्यासे इंसान को खुश्क रेगिस्तान में मीठे पानी का झरना मिल गया हो | इतने लम्बे अरसे बाद पंकज को अपने सामने खड़ा पाकर मुझे जो खुशी नसीब हुई थी उसे अल्फाज़ों में बयाँ करना मुश्किल है | मेरी आँखों से खुशी के आँसू बहे जा रहे थे | ऐसे हालत में मैं अपने जज्बातों पर काबू न रख सकी और दौड़ कर पंकज के सीने से लिपट गई | उसकी बाहों में सिमट कर मुझे जन्नत मिल गई थी | हम दोनों बहुत देर तक एक दूसरे के गले लग कर रोते रहे | पंकज ने मुझे बताया कि एक दोस्त के मार्फ़त ही उसे मेरी शादी के बारे में पता चला था लेकिन ख़बर मिलते-मिलते बहुत देर हो चुकी थी | उसने मुझे ढूँढ़ने की बहुत कोशिश की लेकिन कहीं कुछ पता नहीं चला | यह किस्मत का ही खेल था कि वह यहाँ मुंबई में अपनी कम्पनी के काम से आया हुआ था और इतने बड़े शहर में इस तरह हमारी मुलाक़ात हो गई |

पंकज का साथ मिलने के बाद से दिल में भरी हुई निराशा एकाएक काफ़ूर हो गई थी और मेरे भीतर मृतप्राय पड़ी हुई हँसमुख और चुलबुली लड़की “रिंकी” एक बार फिर से ज़िंदा हो गई थी | ज़िंदगी एक बार फिर से रंगीन और ख़ुशनुमा जान पड़ने लगी थी | उस दिन के बाद से हमारी मुलाकातों का सिलसिला चल पड़ा | सुबह से ही मुझे पंकज से मिलने का इंतज़ार रहता था | राजेश के दफ़्तर जाते ही मैं तैयार होकर घर से निकल जाती थी उससे मिलने और शाम को राजेश के घर आने से पहले घर वापिस आ जाती थी | पंकज के साथ कब सुबह से शाम हो जाती थी एहसास ही नहीं होता था | हमारा ज़्यादातर वक़्त किसी पार्क, रेस्त्राँ, सिनेमा घर या शॉपिंग मॉल में गुज़रता था | पंकज अक्सर मुझे कीमती तोहफे दिलाता रहता था | मैं जिस भी चीज़ पर हाथ रख देती थी दूसरे ही पल वह मेरी हो जाती थी |  

उन दिनों मैं पंकज के साथ अपने ख़्वाबों सी खूबसूरत ज़िंदगी जी रही थी लेकिन साथ में दुश्वारी यह थी मैं अब दोहरी ज़िंदगी जी रही थी | घर के बाहर पंकज की प्रेमिका और घर में पति के सामने उसकी सती-सावित्री धर्मपत्नी | मुझे हर हाल में रात नौ बजे से पहले घर पहुँच जाना होता था और सुबह राजेश के घर छोड़ने तक घर से बाहर नहीं निकल सकती थी | इतवार और छुट्टियों के दिन तो घर एक जेल की तरह जान पड़ता था | दिन भर राजेश के घर पर मौजूद होने की वजह से मैं लाख चाह कर भी बाहर नहीं निकल पाती थी | मेरा बस चलता तो दिन के चौबीसों घंटे पंकज के साथ ही बिताती लेकिन मैं हालात के आगे मजबूर थी | इस दौरान कई मर्तबा अंतरात्मा ने मुझे आगाह करने की कोशिशें की कि एक शादी-शुदा औरत के लिए अपने प्रेमी से यूँ नाजायज़ ताल्लुकात रखना न केवल समाज की नज़र में गलत है बल्कि शादीशुदा ज़िंदगी के लिए भी घातक है | ज़्यादातर मौकों पर ऐसे रिश्तों का अंत दुःखद ही होता है | लेकिन उस वक़्त तो मेरे ऊपर पंकज की मुहब्बत का नशा सवार था जिसके आगे मुझे कुछ और नज़र ही नहीं आ रहा था | दूसरी तरफ राजेश तो अपने कामों में इस कद्र मसरूफ रहते थे कि उन्हें ज़रा भी इल्म नहीं था कि उनकी पीठ पीछे घर में क्या चल रहा है |

इसी दौरान राजेश को दफ़्तर के काम से करीब दो महीने लम्बे टूर पर अमेरिका जाने का मौक़ा मिला था | यह पहला मौका था जब उन्हें इतने लम्बे वक़्त तक घर से बाहर रहना था | यह ख़बर सुनकर मेरा दिल बल्लियों उछल रहा था कि मैं इन दो महीनों में पूरी तरह से आज़ाद ज़िंदगी जी पाऊँगी | बाहरी तौर पर मैं राजेश के सामने बनावटी फ़िक्रमंदी ज़ाहिर करते हुए कहती, “इतने लम्बे वक़्त तक मैं तुम्हारे बगैर घर में अकेली कैसे रह पाऊँगी | अगर यह तुम्हारे बेहतर भविष्य का ख्याल न होता तो मैं तुम्हें यूँ अकेला विदेश कभी न जाने देती |” दूसरी तरफ मेरी कारगुज़ारियों से अंजान राजेश मुझे बराबर दिलासा देते रहते कि वह हर रोज़ मुझसे टेलीफोन पर बात कर लिया करेंगे और जल्द से जल्द अपना काम निपटा कर घर वापिस आ जाएँगे | उनकी रुख्सती के दिन मैं बाकायदा उनको छोड़ने हवाई अड्डे तक गई जिससे कि उनके ज़ेहन में किसी किस्म का शक-ओ-शुबह न आने पाए |

राजेश के जहाज़ के रवाना होते ही दिल ने एक गहरी राहत की साँस ली मानो किसी लम्बे क़ैद से निजात मिल गई हो | कम से कम अगले दो महीनों तक मेरे और पंकज के बीच की एक मात्र बाधा दूर हो गई थी | मैं इस सुकून के दिनों को भरपूर जी लेना चाहती थी | शौहर की ग़ैरमौजूदगी में और ज़्यादा खुदमुख्तार हो गई थी | बाहर कहीं मिलने के बजाए अब मैं पंकज को घर पर ही बुलाने लगी | घर की महफूज़ चहारदीवारी के भीतर मिलने से हमारे बीच मौजूद शर्मो-हया का पर्दा बहुत जल्द हट गया और एक दिन ऐसा भी आया जब हम दोनों तन-मन से एक हो गए | अब पंकज होटल के बजाए पूरी तरह से हमारे घर में ही शिफ्ट हो गया | बिना लाग-लपेट के साफ लफ़्ज़ों में कहा जाए तो हम दोनों एक ही छत के नीचे मियाँ-बीवी की तरह रह रहे थे |

दूसरी तरफ घर में चल रहे खेल से अंजान राजेश बाकायदा रोज़ रात में नियत वक़्त पर फ़ोन करते रहते थे | एक अच्छे शौहर की तरह वे न केवल मेरी खैरियत के बारे में पूछताछ करते थे बल्कि अपनी गतिविधियों के बारे में भी तफ़सील से जानकारी देते थे | हर मर्तबा वे मुझे भरोसा दिलाते थे कि वे वायदे के मुताबिक़ नियत वक़्त पर घर वापिस आ जाएँगे | मैं भी एक अच्छी बीवी की तरह उनकी सभी बातों को गौर से सुनने का न केवल नाटक करती थी बल्कि बीच-बीच में अपनी राय भी देती जाती थी | अपनी बातों और हाव-भाव से मैं ऐसा कोई भी मौक़ा देना नहीं चाहती थी जिससे कि उन्हें मेरे आचरण पर शक हो |

ऐसा कहा जाता है कि अच्छा वक़्त बहुत जल्दी बीत जाता है | हमारे ये हसीं पल भी पंख लगा कर उड़ रहे थे | देखते ही देखते राजेश के वापिस आने में केवल एक हफ्ता बाक़ी रह गया था | जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे हम दोनों के ज़ेहन में एक अजीब सी चिंता बढ़ती जा रही थी | पिछले पचास दिनों में हम एक दूसरे के इतने करीब आ चुके थे कि एक बार फिर से अलग होने के ख्याल मात्र से ही तनाव बढ़ना शुरू हो जाता था |  बातों ही बातों में पंकज अक्सर सुझाव देते थे कि मैं राजेश को तलाक़ दे दूँ जिससे कि हम हमेशा के लिए एक हो सकें लेकिन तलाक़ की पेचीदी कानूनी प्रक्रिया को देखते हुए कम से कम अगले एक बरस तक हमारी शादी की कोई गुंजाइश दिखाई नहीं पड़ती थी | मौजूदा हालात में हमें एक रोज़ भी एक दूसरे से जुदा रहना मुश्किल जान पड़ता था | पंकज तो मुझ पर अपना मालिकाना हक समझने लगे थे | वह किसी भी सूरत में मुझे किसी दूसरे की बीवी के रूप में बर्दाश्त नहीं कर सकते थे | इस परेशानी का कोई फ़ौरी हल नज़र नहीं आता था | एक दिन बातों ही बातों में पंकज ने मेरे सामने ऐसा अजीब प्रस्ताव रखा जिसकी तो मैं ख्व़ाब में भी कल्पना नहीं कर सकती थी |

पंकज - मेरे पास अपनी परेशानी का एक हल है | इसका रास्ता थोड़ा मुश्किल ज़रुर है लेकिन अगर तुम साथ दो तो हम बहुत जल्द एक हो सकते हैं |

मैं – मैं कुछ समझी नहीं | ज़रा खुल कर बताओ तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है ?

पंकज – मेरा सुझाव है कि क्यों न हम अपने रास्ते के काँटे को जड़ से उखाड़ फेंकें | एक झटके में सारी तकलीफें दूर हो जाएँगी |

पंकज की बात सुनते ही मैं एक पल को अवाक रह गई | समझ में नहीं आ रहा था कि कि उसके ज़ेहन में ऐसा ख्याल आया कैसे ? मुझे उस से ऐसी सोच की उम्मीद कतई उम्मीद नहीं थी | यह सच था कि मैं पंकज से बेइंतिहा मुहब्बत करती थी लेकिन उसे पाने के लिए अपने मासूम शौहर के क़त्ल करने की बात सपने में भी सोच नहीं सकती थी | थोड़ी देर तक तो मैं जड़वत खड़ी रही | आँखों के सामने अंधेरा ही अंधेरा छा गया था | किसी तरह हिम्मत बटोर कर मैंने जवाब दिया |

मैं – तुम्हारा दिमाग तो ठिकाने पर है | मैं चाहे कितनी भी बुरी क्यों न हूँ लेकिन अपने शौहर की जान लेने के बारे में सोचना भी मेरे लिए हराम है | तुमने कैसे मान लिया कि मैं इस घिनौने अपराध में तुम्हारा साथ दूँगी |

पंकज – तुम बेवजह ज़रुरत से ज़्यादा जज़्बाती हुई जा रही हो | समझने की कोशिश करो हमारी मुहब्बत के रास्ते में राजेश सबसे बड़ी रुकावट है | उसके ज़िंदा रहते हुए हम आसानी से एक नहीं हो पाएँगे | मेरी समझ में हमारे मिलन के लिए यही एक मात्र रास्ता बचा है |”

मैं – हरगिज़ नहीं | मुझसे यह सब नहीं हो पाएगा | यक़ीन मानो एक मासूम इंसान को बेवजह कत्ल करके हम कभी भी सुकून से जी नहीं पाएँगे | जब मैं उसे तलाक देने के लिए तैयार हूँ तो तुम यह गलत रास्ता क्यों अख्तियार करना चाहते हो ?

पंकज - तुम्हें यह सच्चाई समझ लेनी चाहिए कि अब तुम मेरी और सिर्फ़ मेरी हो | मैं राजेश से तुम्हारे तलाक के लिए बरसों इंतज़ार नहीं कर सकता हूँ और न ही एक लम्हे के लिए भी तुम्हें किसी दूसरे मर्द के साथ साझा कर सकता हूँ |

मैं – तुम्हारे कदम जुर्म की ओर मुड़ रहे हैं जो हमें गर्त में ले जाएँगे | हमारी आगे की ज़िंदगी सुख के बजाए जेल की सलाखों के पीछे कटेगी |

पंकज – ऐसा कुछ भी नहीं होगा | मुझ पर भरोसा रखो | मेरे दिमाग में एक मुकम्मल ख़ाका तैयार है जिससे साँप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी | किसी को कोई शक नहीं होगा | बस तुम्हें थोड़ी हिम्मत दिखानी है | बाकी सब तुम मेरे ऊपर छोड़ दो मैं सब कुछ संभाल लूँगा |

मैं – माफ़ करना मैं इस अपराध में तुम्हारी साथी नहीं बन सकती हूँ |

पंकज (ऊँची आवाज़ में) – हम अब काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं | इस मुकाम तक आकर एक बार फिर से तुम्हें खोना मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा | अपनी मुहब्बत को हासिल करने के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूँ चाहे इसका अंजाम कुछ भी क्यों न हो |

मैंने पंकज को समझाने की भरसक कोशिश की कि उसकी सोच उसे जुर्म के रास्ते पर ले जा रही है | इस रास्ते पर चलकर बर्बादी के सिवाय कुछ और हासिल नहीं होने वाला  है लेकिन पंकज के सिर पर तो उस वक़्त शैतान सवार था | वह कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं था | उल्टे वह मुझसे गाली-गलौज पर उतर आया था | दो-तीन दिनों तक हमारे बीच वाद-विवाद चलता रहा लेकिन नतीजा सिफ़र ही रहा | पंकज अपने रुख से टस से मस नहीं हुआ | मुझे एहसास हो चला था कि समझाने-बुझाने का अब उस पर कोई भी असर नहीं होने वाला है | विनाशकाले विपरीत बुद्धि | हारकर मुझे अपना रुख सख्त करना पड़ा |

मैं – पंकज, मैंने एक बार न कह दी है तो कह दी है | यह मेरा आख़िरी फ़ैसला है | किसी भी सूरत में मैं तुम्हारे इस पाप के खेल में न तो भागीदार बनूँगी और न ही तुम्हें यह सब करने दूँगी | मैं एक बार तुम्हें छोड़ सकती हूँ लेकिन कभी किसी की जान नहीं ले सकती हूँ | बेहतर होगा कि तुम इस घर से फ़ौरन बाहर निकल जाओ और आइंदा मुझसे मिलने की कोशिश भी मत करना |

मेरे इन अल्फाजों को सुनकर पंकज का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा था | उसके गुस्सा चरम सीमा तक जा पहुँचा था | हमेशा मीठे बोल बोलने वाले पंकज का स्वर उग्र हो गया था और उसके मुँह से मेरे लिए धाराप्रवाह गालियाँ बह रही थीं |

पंकज (गुस्से में) - तुम्हें हर सूरत में मेरा साथ देना ही पड़ेगा | तुम मुझे यूँ बर्बाद करके राजेश के साथ सती-सावित्री पत्नी बन कर रहने का नाटक नहीं कर सकती हो | अगर तुम मेरी न हुई तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं होने दूँगा | याद रखना मेरे पास तुम्हारे कई राज़ महफूज़ हैं जो तुम्हारी शादीशुदा ज़िंदगी को तबाह करके रख देंगे | तुम्हारी हालत धोबी के कुत्ते की तरह हो जाएगी – न घर की रहोगी न घाट की | आज तक तुमने सिर्फ मेरी मुहब्बत देखी है, दुश्मनी नहीं | अब तुम देखोगी कि दुश्मनी निभाने के लिए मैं किस हद तक गिर सकता हूँ | ऐसा कहते हुए पंकज गुस्से में अपना सामान समेट कर तेज़ी से घर से बाहर निकल  गया |

पंकज के जाने के बाद भी उसके एक-एक अल्फाज़ मेरे कानों में गूँज रहे थे | यह पहला मौका था जब पंकज का यह शैतानी चेहरा मेरे सामने ज़ाहिर हुआ था और ज़ाहिर था यही उसकी हकीकत है | उसके खतरनाक मंसूबे देखकर मैं बुरी तरह से दहशत में आ गई थी | मौजूदा हालात में वह अपनी दौलत और रसूख के दम पर कुछ भी करवाने की ताकत रखता है - राजेश, मुझे या दोनों को जान से मरवा सकता है या मेरी फोटो को सोशल मीडिया पर वायरल करके मुझे समाज में बदनाम कर सकता है | दोनों ही सूरतों में मेरी बर्बादी तय है | समझ नहीं आ रहा है कि ख़ुद के बनाए इस चक्रव्यूह से कैसे बाहर निकलूँ ? इस वक़्त रह-रह कर मुझे माँ के वे अल्फाज़ याद आ रहे हैं जिनका असल मतलब आज कुछ-कुछ मुझे समझ में आ रहा है | वे अक्सर कहा करती थीं, “झूठ और फरेब के खूबसूरत बाहरी चेहरे में गज़ब की कशिश होती है लेकिन इस राह पर चलकर इंसान अंधकार के गर्त में गिरता चला जाता है | वहीं दूसरी ओर तमाम दुश्वारियों के बावजूद भी सच्चाई ही सच्चा सुकून देती है |” आज मुझे एहसास हो रहा है कि मैं कितनी बड़ी ग़लतफ़हमी में जी रही थी | ऐसा कहा भी जाता है “All that glitters is not gold.” मुझसे इंसान को पहचानने में बहुत बड़ी ग़लती हुई है | अपने शरीफ़ और सादगीपसंद शौहर को मैं लगातार धोखा देती आई हूँ और बाहरी चमक-दमक के छलावे में आकर एक शैतान को अपना सर्वस्व सौंपने का जो पाप मैंने किया है उसका कोई भी प्रायश्चित नहीं हो सकता है | मेरा भविष्य बिलकुल स्याह नज़र आ रहा है | आज मैं ख़ुद की नज़रों से गिर चुकी हूँ | दो दिन बाद राजेश घर लौट आएँगे | समझ नहीं आता है कि किस मुँह से मैं उनका सामना कर पाऊँगी | मैं जानती हूँ कि वे मुझे एक सच्ची और वफ़ादार बीवी के रूप में देखते हैं जो बड़ी बेसब्री से अपने शौहर के लौटने का इंतज़ार कर रही है | पिछले फ़ोन कॉल में उन्होंने बड़े प्यार से बताया था उनके पास मेरे लिए कुछ सरप्राइज़ है | दूसरी तरफ मेरे पास जो उनके लिए सरप्राइज़ है उसकी तो उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी | किसी भी इंसान के लिए ऐसा धोखा एक बड़े आघात से कम नहीं है |

पंकज से अलगाव के बाद पिछले दो-तीन दिनों से मैं एक अजीब पशोपेश के हालात से गुज़र रही हूँ | समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूँ | देखते ही देखते राजेश के आने का दिन भी आ पहुँचा है | कल सुबह-सुबह ही वे घर आ जाएँगे | आज रात ही मुझे इस मुत्तलिक फैसला लेना है | ज़ेहन में ख़्यालों की ज़बरदस्त कश्मकश जारी है | दोहरी ज़िंदगी जीते-जीते मैं अब ख़ुद उकता चुकी हूँ | इंसान दुनिया भर को धोखा देकर चैन से रह सकता है लेकिन ख़ुद की नज़रों से गिरकर जीना आसान नहीं होता है | उसकी अंतरात्मा मरते दम तक उसे कचोटती रहती है | दुनिया भर की तमाम दौलत और ऐशो-आराम के साज़ो-सामान कभी भी इस अंदरुनी ज़ख्म की ख़लिश को कम नहीं कर सकते हैं | आज यह भी एक सच्चाई है कि मेरी बदसूरत सच्चाई आज नहीं तो कल राजेश के सामने आनी ही है | अब इसे ज़्यादा दिनों तक छुपाया नहीं जा सकता है | किसी और ज़रिये से पता लगने से बेहतर है कि मैं ख़ुद ही इसका इकरार कर लूँ | बहुत सब सोच-विचार के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँची हूँ कि मैं अपनी सारी सच्चाई राजेश के सामने साफ़-साफ़ लफ़्ज़ों में बयाँ कर दूँगी चाहे इसका अंजाम कुछ भी हो | यह उनके लिए भी किसी सदमे से कम नहीं होगा | वे तो ख्वाब में भी अपनी भरोसेमंद बीवी से ऐसी बेवफ़ाई की उम्मीद नहीं कर सकते हैं | मुझे पूरा यकीन है कि इसके बाद वे मुझसे हमेशा-हमेशा के लिए सभी रिश्ते-नाते तोड़ कर घर से बाहर निकाल देंगे | मेरे गुनाह इतने संगीन हैं कि मैं किसी भी हमदर्दी के लायक नहीं हूँ | फिर भी न जाने क्यों ज़ेहन के किसी कोने में एक धुँधली सी उम्मीद ज़िंदा है कि शायद वे बड़ा दिल दिखाते हुए मुझे माफ़ कर दें | अब चाहे नतीजे कुछ भी हों उनका सामना करने के लिए मैंने ख़ुद को दिमागी तौर पर तैयार कर लिया है |

मायूसी के इस आलम में आहिस्ता-आहिस्ता ऐसा एहसास होने लगा है मानो मेरे मुर्दा ज़मीर में ज़िंदगी वापिस लौट रही हो |