Wedding of Wounds - 12 in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | ज़ख्मों की शादी - 12

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ज़ख्मों की शादी - 12

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सृष्टि ने ये बात कबीर को बताते हुए जैसे अपनी पूरी हिम्मत समेट ली थी। आवाज़ काँप रही थी, आँखें झुकी हुई थीं।


सृष्टि  बोली - 

क… कबीर जी… मैं… मैं प्रेग्नेंट हूँ।


कमरे में सन्नाटा भर गया। कबीर ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं।


बस ठंडे, सपाट लहज़े में बोला—

बच्चा गिरा दो।


बस…यहीं सृष्टि का सब्र टूट गया। उसकी आँखों में जो डर था,

वो पल भर में आग बन गया।


सृष्टि (गुस्से और टूटे हुए आत्मसम्मान के साथ) बोली - 

गिरा दूँ?!

कैसे गिरा दूँ?!

आप ऐसे बोल रहे हैं जैसे हमारा बच्चा नाजायज़ हो!


वो काँप रही थी, पर अब डर से नहीं गुस्से से।


सृष्टि बोली —

हमारा बच्चा नाजायज़ नहीं है!

शादी हुई है हमारी!

ये मेरा हक़ है!

आप कौन होते हैं मुझे ये कहने वाले?!


कबीर ने पहली बार उसकी तरफ़ देखा। आँखों में वही पुरानी सख़्ती।


कबीर बोला —

मैं तुम्हारा पति और इस बच्चे का बाप होता हूँ।

और मैं अभी बच्चा नहीं चाहता।

समझी तुम?


सृष्टि हँस पड़ी। एक ऐसी हँसी जिसमें दर्द था, तंज था, और बरसों की दबी हुई चीख़ें थीं।


सृष्टि बोली —

नहीं चाहते थे तो खुद पर कंट्रोल रखते ना!


उसकी आवाज़ ऊँची हो गई। आज वो चुप रहने वाली नहीं थी।


सृष्टि बोली—

देखिए…ये बच्चा दुनिया में आकर रहेगा।

और मैं इसे आपका ही नाम दूँगी।

चाहे कुछ भी हो जाए।


कबीर के चेहरे पर झटका सा लगा। उसे शायद पहली बार एहसास हुआ सृष्टि सिर्फ़ डरी हुई औरत नहीं रही। वो माँ बन चुकी थी।और एक माँ के सामने कबीर की धमकियाँ पहली बार कमजोर पड़ रही थीं। कमरे में खामोशी फिर छा गई।बपर अब ये खामोशी डर की नहीं थी ये आने वाले तूफ़ान की चेतावनी थी।


कबीर के अंदर कुछ टूटने लगा था। सृष्टि की वो आख़िरी बात—

“ये बच्चा दुनिया में आकर रहेगा”

उसके दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रही थी।


उसे पहली बार एहसास हुआ सृष्टि अब सिर्फ़ उसकी चुप रहने वाली पत्नी नहीं रही। अब उसके पास एक वजह थी…एक बच्चा।

और यही वजह कबीर के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गई।

उस रात कबीर देर तक कमरे में टहलता रहा। कभी सृष्टि की तरफ़ देखता जो पलंग के कोने पर सिमटी बैठी थी। उसकी आँखों में डर नहीं था। बस एक अजीब-सी मज़बूती थी।


कबीर (मन ही मन) बोला—

अगर ये बच्चा आया…तो ये औरत मुझसे दूर हो जाएगी।

मुझसे सवाल करेगी। मुझे छोड़ भी सकती है…


और कबीर सब कुछ सह सकता था पर सृष्टि को अपने काबू से बाहर जाता नहीं। वो अचानक उसके पास आया। सृष्टि चौंक गई।

दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।


कबीर (सख़्त आवाज़ में) बोला—

ज़्यादा मज़बूत मत बनने की कोशिश करो, सृष्टि।

तुम भूल रही हो तुम किसके साथ रह रही हो।


सृष्टि ने कुछ नहीं कहा। बस अपने पेट पर हाथ रख लिया। वही एक हरकत कबीर को आग लगा गई।


कबीर बोला—

इस बच्चे को ढाल मत बनाओ।

मैं जो कहूँगा, वही होगा।


उसने सृष्टि की कलाई पकड़ी। बहुत कसकर नहीं पर इतनी ज़ोर से कि डर लौट आए। सृष्टि की आँखों से आँसू बहने लगे। पर इस बार उसने माफ़ी नहीं माँगी।


धीमी, टूटी हुई आवाज़ में बोली—

आप मुझे तोड़ सकते हैं…पर इसे नहीं।


बस…यहीं कबीर पीछे हट गया। उसने उसका हाथ छोड़ दिया।

जैसे अचानक उसे समझ आ गया हो कि अगर उसने एक कदम और बढ़ाया तो वो हमेशा के लिए खुद को खो देगा।

वो बिना कुछ कहे कमरे से बाहर चला गया। सृष्टि वहीं बैठी रही।

काँपती हुई। रोती हुई। पर अपने पेट पर हाथ रखे—

आज पहली बार उसे किसी का सहारा मिला था। उधर कबीर

अंधेरे में खड़ा खुद से लड़ रहा था। डर…नफ़रत…और एक अजीब-सा पछतावा तीनों मिलकर उसे अंदर से खा रहे थे।


Present Time – जब यादें कबीर को तोड़ने लगीं


कबीर की आँखें सूनी हो गईं। वो सोफ़े पर बैठा-बैठा अचानक सिमट गया… जैसे पूरा अतीत उसके ऊपर टूट पड़ा हो। उसे वो रातें याद आने लगीं जब वो इंसान नहीं, हैवान था। सृष्टि का वो चेहरा…

डर से सफ़ेद पड़ चुका चेहरा। सीने से गिरता हुआ घूँघट। आँखों से गिरते मोटे-मोटे आँसू। उसके काँपते होंठ…उसकी हिचकियाँ…

दर्द से लाल हो चुका चेहरा…पीछे हटने की नाकाम कोशिशें…

सब…एक-एक करके कबीर के दिमाग़ में आग की तरह जलने लगा। कबीर ने अचानक अपना सिर दोनों हाथों से पकड़ लिया।


कबीर बोला - 

नहीं… नहीं…


उसके मुँह से बेसाख़्ता निकला। उसकी साँसें बेकाबू होने लगीं।

छाती फटने लगी। अचानक वो चीख पड़ा—एक ऐसी चीख़

जिसमें गुस्सा नहीं, खुद से नफ़रत थी।


वो बोला - 

मैंने क्या कर दिया…!


वो उठ खड़ा हुआ और अपने मुट्ठी को ज़ोर-ज़ोर से टाइल्स वाली ज़मीन पर मारने लगा। एक वार…फिर दूसरा…फिर तीसरा…खून निकल आया। हाथ काँपने लगा। पर वो रुका नहीं। जैसे हर मुक्का

उस जुर्म की सज़ा हो जो उसने सृष्टि के साथ किया था। अचानक उसकी ताक़त जवाब दे गई। वो वहीं बैठ गया। उसने अपने बालों को दोनों हाथों से नोच लिया। आँखें लाल हो चुकी थीं। आँसू बह नहीं रहे थे, बस अंदर ही अंदर सब कुछ टूट रहा था।


वो बुदबुदाया —

तूने उसे मार दिया कबीर…ज़िंदा होते हुए भी…।


उसी पल उसके कानों में सृष्टि की आवाज़ गूँज गई—

मैं आपसे नफ़रत करती हूँ…


कबीर की पलकों से पहली बार शर्म के आँसू गिरे। वो समझ चुका था, सृष्टि उससे इसलिए नफ़रत नहीं करती कि उसने उसे प्यार नहीं दिया…बल्कि इसलिए क्योंकि उसने उसके भरोसे को उसकी आत्मा को उसकी हँसी को सब कुछ कुचल दिया था। आज

पहली बार कबीर को एहसास हुआ, सृष्टि का सबसे गहरा ज़ख्म

कोई और नहीं…वो खुद है।


To be continued...


सृष्टि और कबीर के बच्चे के साथ क्या हुआ ?

क्या past में कबीर सुधरा?

क्या kabir अपनी गलती का प्रायश्चित करेगा?

क्या सृष्टि कभी कबीर को माफ कर पायेगी?


Aapko kya kya lagta hai -

Kabir misscarege karane ke liye kyun bol Raha hoga?

Kabir ko is time pachhtava kyu ho Raha hoga?

Apne opinion comment karke jarur batayen 


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