शहद क़ी गुड़िया- प्रकरण- 19
" आप ने मुझे सस्पेंस में रखा था. सिनेमा देखने के पागल पन में क़्या खोया था. वह राज आज मुझे बताया था. "
आप उन दिनों आठवीं कक्षा में पढ़ते थे. टर्मिनल एग्जाम का अंतिम पेपर बाकी था. ऊस दिन दशहरा का दिन था.. एग्जाम खत्म होते ही फ़िल्म देखने क़ी आप क़ी प्रणाली थी और आप सुबह सुबह फ़िल्म ' घराना ' क़ी टिकिट लेने थियेटर गये थे. कतार में खडे रहकर दुसरे दिन के शाम क़ी अपर क्लास में टिकिट बुक कर के घर को लौट रहैं थे. "
" रास्ते में दूसरा थियेटर था जिस में केवल अंग्रेजी फिल्मे प्रदर्शित होती थी. ऊस वक़्त कोई पुरानी अंग्रेजी फ़िल्म के फोटोस लगाये था. उसे देखने के लिये उधर आप रुक गये थे. "
" ऊस वक़्त दो अंजान युवान लडके आप के पास आये थे. ऊस में से एक ने सीधा आप से बात क़ी थी. "
" हमारे पास इस फ़िल्म के पास हैँ, तुम्हे फ़िल्म देखनी हैँ केवल चार आना ही देना हैँ. "
" आप ने सीधा मुंह जवाब दिया था.' मेरे पास फूटी कोड़ी भी नहीं है, ऐसा क़ह के आप आगे बढ़ गये थे.. ऊस वक़्त उन्होंने आप को रोकते हुए कहां था. "
" कोई बात नहीं, पास बेकार नहीं जाना चाहिये तुम ऐसे ही हमारे साथ आ जाओ. "
" उन क़ी बात मानकर आप साथ में होल में चले गये थे. फ़िल्म शुरू हो गई थी. आप भाषा तो समझते नहीं हैँ लेकिन होट रोमांस देखकर भी आप कुछ समझ नहीं पाये थे. आप चुपचाप फ़िल्म देख रहे थे. "
" थोड़ी देर के बाद एक शख्स ने आप क़ी घड़ी के बारे में सवाल किया था. "
" तुम्हारी घड़ी कौन से ब्रांड क़ी है? "
" आप ने ऊसे बताया था. "
" सुनकर उन्होंने आप क़ी घड़ी क़ी तारीफ क़ी थी लेकिन पट्टे के बारे में नाराजगी व्यक्त करते हुए कहां था.. "
" घड़ी तो अफलातून हैँ पर पट्टा ऊस पर सूट नहीं होता. "
" मेरे मामा इस थियेटर के मैनेजर हैँ साथ में उन का घड़ियों के पट्टो का अच्छा खासा व्योपार हैँ उन क़ी दुकान भी हैँ जो लड़का चलाता हैं. तुम चाहो तो तुम्हे अच्छा सा पट्टा दिलवा सकता हूं. "
" एक तो फोगट क़ी फ़िल्म ऊपर से नये पट्टे का लालच आप तो बिल्कुल पिघल से गये थे. आप ने फट से घड़ी उतारकर ऊस अंजान शख्स के हाथो में थमा दी थी. और वह शख्स ' अभी आता हूं कर के होल से बाहर निकल गया था. दूसरा शख्स आप क़ी बाजु में ही था, इस लिये उन के गलत इरादों क़ी कोई गंध नहीं आई थी. "
" फ़िल्म खत्म होते हुए आप ने ऊस शख्स को सवाल किया था. " आप का जोड़ीदार कहाँ हैं? " आप के सवाल का ऊस ने जवाब दिया था. " वह हमें बाहर गेट के पास मिलेगा. " अब तक आप को कुछ पता नहीं था. होल से बाहर काफ़ी भीड़ थी और वह भी मौका देखकर उड़न छू हो गया था. "
" तब जाकर आप को सारा खेल समझ आया था.. लेकिन कुछ भी करने के लिये सक्षम नहीं थे.. घर में पिताजी के सामने झूठ बोलकर आपने यह मुआमला वही बंद कर दिया. "
"आप नसीब वाले थे, जो आप के पिता जी ने आप क़ी सारी बात मान ली और कुछ नहीं कहां. "
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" बचपन से ही आप को घड़ी का जूनून था. आप रिश्तेदारों से भी मांगकर घड़ी पहनते थे.. आप के पिताजी ने ऊस से थक्कर सेकंड हैंड घड़ी दिलाई थी. जो घड़ी घड़ी बिगड़ जाती थी. इस हालत में आप को नई घड़ी दिलाई थी जो आप ने अपनी नादानी में खो दी थी."
" सच्चाई जानकर मैंने ऐसा अपना प्रतिभाव व्यक्त किया था. "
दादू! आप बचपन में इतने भोले थे. दशहरा क़ी खुशी के दिन अपनी नादानी से इतना बड़ा दुख पा लिया था. उन धौकेबाजो के बारे में आप को कोई संदेह भी नहीं हुआ? आप क़ी मासूमियत और भोलेपन क़ी वजह से आपने अपनी प्यारी चीज खो दी?, "
" होल के अँधेरे में आप बिल्कुल सुधबुध के मोहताज हो गये? "
" यह तो केवल नमूना था.. बाद में उन के साथ बहुत गलत हुआ था.
" मा के निधन के बाद उन के पिताजी ने दूसरी शादी क़ी थी. उन क़ी बड़ी सौतेली बहन जो बदकिस्मती से दादू की मौसी थी. उन की नजर सौतेली मा की मिल्कत पर थी. इस लिये मौसी ने अपने मतलब के लिये दादू को दूर रखने बड़ा राजकारण खेला था.
" उन्होंने दादू को यहीं एहसास दिलाने की कोशिश की थी : वह मुर्ख, बेवकूफ और पागल हैं. दादू को अपनी नई मा से लगाव था. यह बात मौसी के परिवार को बहुत खटकती थी. दादू ने अपनी ' यादों की सहेलगाह ' ऊस बात का जिक्र किया था.
" मौसी ने मा बेटे को अलग करने लिये नाटक किया था. अस्पताल में कोई बीमार हैं ऐसा कहकर वह दादू की मा को भी साथ लेने की जिद लेकर बैठ गई थी..
" छोटे बच्चे अस्पताल नहीं जा सकते ऐसा कहकर उसे घर में अकेला रोता, तड़पता छोड़कर चले गये थे."
" ऊस वक़्त दादू की मदद में भगवान ने एक लड़की को भेजा था. जो बिना बाप की बेटी थी.. ऊस का नाम अनन्या था. ऊस ने दादू के पिताजी को फोन क़र के घर बुलाया था. "
" आप का बेटा घर में अकेला रो रहा हैँ. "
" यह सुनकर पिताजी काम छोड़कर घर दौड़े आये थे. अपने बेटे को लेकर मौसी के घर गये थे. लेकिन उन का कोई पता नहीं लगा था. "
00000000000 ( क्रमशः)